कानून और अदालत

समन और वारंट में अंतर जानिए

समन और वारंट, दोनों ही बुलावा या आदेश पत्र हैं, मगर इनमें अंतर है. एक में भाव सामान्य है तो दूसरे में जबरदस्ती है. यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है. कोई व्यक्ति अदालत के आदेश पर हाजिर नहीं होता है, तो सलाखों के पीछे पहुँच सकता है. इस लेख में जानिए इन दोनों आदेश पत्रों का वह बारीक कानूनी अंतर, जो आपको मुसीबत से बचा सकता है.

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अदालती कार्यवाही में समन और वारंट हमेशा चर्चा का विषय होते हैं. दरअसल, ये दोनों ही कोर्ट की ज़रूरी प्रक्रियाएं हैं, जिनका परिस्स्थितियों के अनुसार प्रयोग किया जाता है. समन के मामले में समन और वारंट के मामले में वारंट जारी होते हैं. मगर यह अदालत के विवेक पर निर्भर करता है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए वह समन के बदले वारंट और वारंट के बदले समन जारी कर सकती है.
 
 
जिला न्यायलय  और उसकी कार्यवाही का दृश्य जिसमें बायीं ओर समन और वारंट जैसी कार्यवाही में जज के सामने मुवक्किल और वकील उपस्थित हैं, और दायीं ओर प्रवेश/निकास द्वार से वादी, प्रतिवादी और वकील न्यायलय भवन में आते-जाते दिखाई दे रहे हैं.
समन और वारंट: अदालती कार्यवाही और बाहर आते-जाते वकील-मुवक्किल
कंप्लेंट केस हो या पुलिस केस, उसकी सुनवाई में प्रतिवादी की उपस्थिति आवश्यक है, ताकि उसे अपने ऊपर लगे आरोपों की पूरी जानकारी हो जाए और उसके अनुसार वह अपना बचाव कर सके. यही इंसाफ़ का तक़ाज़ा है, और इसीलिए प्रतिवादी या अभियुक्त को समन जारी किए जाते हैं. मगर, समन की अवहेलना पर वारंट जारी किए जाते हैं यानी उसे पकड़कर अदालत के सामने पेश करने का आदेश दिया जाता है. इस प्रकार समन और वारंट अदालती कार्यवाही का महत्वपूर्ण हिस्सा और परिस्थितियों का परिणम हैं.   
 
आमतौर पर लोग समन को ही गिरफ़्तारी का आदेश समझ लेते हैं और इससे बचने की कोशिश करते हैं. ऐसा कर बेवज़ह ही वे अपने लिए मुसीबत खड़ी कर लेते हैं. इससे वारंट की स्थिति बन जाती है.
 
वारंट की स्थिति में लोग उन अतिरिक्त कानूनी प्रक्रियाओं में उलझ जाते हैं, जिनकी आवश्यकता ही नहीं होती है.
 
ऐसे में, समन और वारंट क्या हैं, इनकी प्रक्रियाएं क्या होती हैं, और ये दोनों एक दूसरे से कैसे अलग हैं, इन पर रौशनी डालना ज़रूरी हो जाता है.
 
 

समन क्या है?

समन (Summons) अंग्रेजी भाषा का शब्द है.इसका मतलब होता है बुलावा या बुलावा पत्र.इसे एक उदारतापूर्ण आमंत्रण कह सकते हैं, जिसमें अदालत आदरपूर्वक किसी व्यक्ति को हाज़िर होने का आदेश करती है.इस आदेश में न तो किसी की आज़ादी छिनी जाती है और न ही उसे गिरफ़्तार किया जाता है.
 
समन में, दरअसल अदालत द्वारा इंसाफ़ को लेकर अदालत में हाज़िर होने के लिए किसी व्यक्ति को आदेश तो दिया जाता है मगर, उसे मजबूर कर या जबरन अदालत में पेश नहीं किया जाता.
 
इस प्रकार, सरल भाषा में कहें, तो अदालत में जब कोई पीड़ित व्यक्ति केस दायर करता है तब अदालत, प्रतिवादी को सुनवाई में हाज़िर होने के लिए लीगल नोटिस जारी करती है.इस लीगल नोटिस को समन कहा जाता है.
 
समन पर कोई व्यक्ति अदालत में ख़ुद हाज़िर हो सकता है, या अपने वकील, या अपने पावर ऑफ़ अटॉर्नी होल्डर, या फिर अपने किसी अधिकृत एजेंट के माध्यम से भी अदालत में पेश हो सकता है.
 
समन तीन प्रकार के होते हैं- सिविल समन, आपराधिक समन और प्रशासनिक समन.
 
भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता के अध्याय-6 (न्यायलय की आदेशिकाएं) में धारा-61 से लेकर धारा-69 तक में समन की प्रक्रिया को लेकर विस्तार से चर्चा की गई है.
 
समन अदालत की ओर से किसी प्रतिवादी या अभियुक्त को जारी हो सकता है.
 
यह किसी गवाह या किसी ऐसे व्यक्ति के लिए भी जारी हो सकता है, जिसके पास कोर्ट के लिए ज़रूरी दस्तावेज़ हों.
 
समन पुलिस-प्रशासन और आयोग की तरफ़ से भी जारी होते हैं.
 
समन हमेशा दो प्रतियों में होता है.एक, समन प्राप्त करने वाले के लिए होती है, जबकि दूसरी प्रति उस व्यक्ति के दस्तख़त के साथ पावती के रूप में वापस चली जाती है.
 
समन लिखित रूप में निर्धारित प्रारूप में होता है.जिस व्यक्ति को समन जारी किया जाता है, समन पर उसका नाम-पता, पेशा, न्यायलय का नाम, केस में आरोप या संबंधित विषय आदि लिखा होता है.इसमें अदालत में हाजिरी की तारीख़ व समय भी दर्ज़ होते हैं.
 
इस पर पीठासीन अधिकारी, यानि मजिस्ट्रेट या जज के दस्तख़त के साथ मुहर (मुद्रा, छाप) भी लगी होती है.
    
ध्यान रहे कि अदालत में पेशी के दिन अगर अदालत में कोई अवकाश (जज साहब छुट्टी पर हों या अन्य किसी विशेष कारणवश कोर्ट खुला न हो) हो, तो यह नहीं समझ लेना चाहिए कि समन की मियाद ख़त्म हो गई.समन प्राप्त करने वाले व्यक्ति को फिर अगले कार्यदिवस को अदालत में उपस्थित होना पड़ेगा.इसके बाद ही समन की प्रक्रिया या मियाद ख़त्म समझी जाती है.
 
 

समन की तामील

समन के साथ ही समन की तामील (सर्विस) भी कम महत्वपूर्ण विषय नहीं है.यह आसान नहीं होती क्योंकि आमतौर पर लोग समन से बचने की कोशिश में छुपते फिरते हैं.कुछ तो अपने घरों ताले तक लगा देते हैं जैसे कि उन पर गिरफ़्तारी की तलवार लटक गई हो, जबकि समन की तामील यानि निष्पादन का उद्देश्य केवल समन का उसके प्राप्तकर्ता (प्रतिवादी, अभियुक्त) तक पहुंच जाना होता है.यानि पीठासीन अधिकारी (मजिस्ट्रेट या जज) के आदेश की जानकारी प्रतिवादी को हो जाए, इसे ही समन की तामील कहते हैं.
 
समन की तामील कैसे हो, विभिन्न परिस्थितियों में इसके तरीक़े क्या हैं, इस सब के बारे में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा-62, 63, 64 और 65 में पूरी चर्चा है.
 
अगर समन के तामीली अधिकारी की पूरी कोशिश के बावजूद व्यक्ति (प्रतिवादी) नहीं मिल रहा है (यानि वह सामने नहीं आ रहा है या छुपता फिर रहा है), तो धारा-64 कहती है कि समन उस व्यक्ति के परिवार के किसी वयस्क पुरुष (जो उसके साथ रहता हो) के ज़रिए तामील करवाई जा सकती है.
 
समन, समन प्राप्तकर्ता के घर के नौकर-चाकर या महिला सदस्य को तामील नहीं करवाया जा सकता, ऐसा स्पष्ट विधान है.
 
समन की तामीली के लिए तामीली अधिकारी समन प्राप्तकर्ता के घर में नहीं घुस सकता.वह प्रतिवादी को दरवाज़े के बाहर से ही आवाज़ देकर बुला सकता है और उसके परिवार के सदस्यों से बात कर सकता है.
 
ऐसे व्यवस्था भी है कि अगर प्रतिवादी के घर पर ताला लगा हो, तो समन की प्रति बाहर से स्पष्ट नज़र आने वाली जगह जैसे दरवाज़े या खिड़की पर चस्पां (चिपकाना) की जा सकती है.
 
 

समन संबंधी कुछ अपवाद या छूट

वैसे तो सभी भारतीय नागरिक को हमारे सक्षम न्यायलय समन जारी कर सकते हैं परंतु, इसके कुछ अपवाद भी हैं.इन्हें हम कुछ ख़ास लोगों के लिए न्याय व्यवस्था की ओर से मिली छूट भी कह सकते हैं.
 
वे महिलाएं, जो अपनी प्रथा के कारण सार्वजनिक नहीं हो सकतीं, यानि अदालत में खड़ी नहीं हो सकतीं, उन्हें कुछ रियायत दी गई है.
 
इसके अलावा, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज, लोकसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष, विधानसभा अध्यक्ष, राज्यपाल, केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के मंत्रियों को विशेष छूट दी गई है.
 
इनके खिलाफ़ सिविल कोर्ट समन जारी नहीं कर सकती है.फिर, भी अगर समन जारी हो गया हो, तो भी वे अदालत में पेश होने के लिए बाध्य नहीं हैं.
 
 

वारंट क्या है?

वारंट एक कानूनी आदेश या आदेश पत्र होता है, जिसे मजिस्ट्रेट या जज जारी करते हैं.इसमें पुलिस को किसी व्यक्ति को पकड़ने या गिरफ़्तार करने का अधिकार मिल जाता है.वारंट में समन के विपरीत व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन कर उसे गिरफ़्तार कर न्यायलय के समक्ष पेश किया जाता है.
 
वारंट अंग्रेजी भाषा का शब्द है, जिसका मतलब होता है विशेष आदेश या आज्ञा पत्र.इसे कोई अदालत ही जारी कर सकती है.
 
इसे सरल शब्दों में कहें तो कोई व्यक्ति यदि समन की अवहेलना करता है, यानि समन प्राप्त होने के बाद भी अगर वह अदालत में हाज़िर नहीं होता, तो अदालत उसके खिलाफ़ वारंट जारी कर देती है.
 
यह वारंट दरअसल, स्थानीय पुलिस अधिकारी के नाम जारी एक विशेष आदेश होता है, जिसमें यह ज़िम्मेदारी होती है कि वह (अधिकारी) वांछित व्यक्ति को गिरफ़्तार कर उसे अदालत में पेश करे.इस विशेष आदेश को ही वारंट कहते हैं.
 
वारंट केवल गिरफ़्तारी के लिए ही जारी नहीं होता.विभिन्न मामलों या परिस्थितियों में इसमें कई चीज़ें शामिल होती हैं.यह अभियुक्त के घर और अन्य ठिकानों की तलाशी के अलावा उसके घर-संपत्ति की कुर्की या जब्ती को लेकर भी जारी होता है.
 
भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता के अध्याय-6 (न्यायलय की आदेशिकाएं) में धारा-70 से लेकर धारा-81 तक में वारंट की प्रक्रिया को लेकर विस्तार से चर्चा की गई है.
  
वारंट अदालत की ओर से किसी प्रतिवादी या अभियुक्त को जारी हो सकता है.
 
यह किसी गवाह या किसी ऐसे व्यक्ति के लिए भी जारी हो सकता है, जिसके पास कोर्ट के लिए ज़रूरी दस्तावेज़ हों.
 
वारंट केवल मजिस्ट्रेट या जज ही जारी कर सकता है.
 
वारंट हमेशा एक प्रति में होता है.यह लिखित रूप में निर्धारित प्रारूप में इस प्रकार होता है कि जिसमें पुलिस अधिकारी का नाम-पदनाम, गिरफ़्तार किए जाने वाले व्यक्ति के नाम-पते आदि के साथ-साथ मामला और संबंधित कार्यवाई आदि का जिक्र होता है.
 
वारंट दो प्रकार का होता है- जमानती वारंट और ग़ैर-जमानती वारंट.
 
प्रावधानों के अनुसार, जमानती वारंट में पुलिस अभियुक्त को गिरफ़्तार करने के बजाय उसे जमानत पर छोड़ देती है.फिर, उसे कोर्ट में भी जमानत लेनी होती है.
 
दूसरी तरफ़, ग़ैर-जमानती वारंट के मामले में पुलिस अभियुक्त को गिरफ़्तार का अदालत में पेश करती है.
 
 

समन और वारंट में अंतर

समन और वारंट, दोनों ही अदालत के आदेश पत्र हैं लेकिन, दोनों की प्रकृति और प्रक्रिया में काफ़ी अंतर होता है.आमतौर पर समन के बाद ही वारंट की आवश्यकता होती है.
 
1. समन एक अदालती बुलावा पत्र होता है, जबकि वारंट गिरफ़्तारी का आदेश होता है.
 
2. समन प्रतिवादी, गवाह या किसी ऐसे व्यक्ति के नाम (उसे संबोधित करता हुआ) जारी होता है, जिसके पास कोई सबूत या दस्तावेज़ हों.इसके विपरीत, वारंट एक पुलिस अधिकारी के नाम जारी होने वाला आदेश पत्र है.इसमें केस में वांछित व्यक्ति की गिरफ़्तारी का आदेश होता है.
 
3. समन रजिस्टर्ड डाक द्वारा या व्यक्तिगत रूप से केस से संबंधित व्यक्ति के पास भेजा जाता है, जबकि वारंट हमेशा एक पुलिस अधिकारी लेकर जाता है.
 
4. समन में प्रतिवादी या अन्य को अदालत में अपना पक्ष, सबूत और दस्तावेज़ पेश करने का निर्देश होता है, जबकि वारंट में पुलिस अधिकारी को अभियुक्त को पकड़कर अदालत में पेश करने या उसके घर की तलाशी लेने या फिर उसके घर-संपत्ति की जब्ती आदि का निर्देश होता है.
 
5. समन का उद्देश्य किसी व्यक्ति को अदालत में बुलाकर उसे उसके कानूनी दायित्व की जानकारी देना होता है.इसके विपरीत, वारंट का उद्देश्य समन की अवहेलना करने वालों को अदालत में हाज़िर करना होता है.
 
6. समन दो प्रतियों में होता है, जबकि वारंट हमेशा एक ही प्रति में होता है.
 
7. समन जारी होने की तारीख़ से लेकर अदालत में प्रतिवादी या अन्य के व्यक्तियों के उपस्थित होने तक मान्य होता है.इसके बाद इसकी मान्यता समाप्त हो जाती है.लेकिन, वारंट के साथ ऐसी बात नहीं है.
 
वारंट जारी होने की तारीख़ से लेकर तब तक मान्य रहता है जब तक कि अभियुक्त अदालत में पेश न कर दिया जाए, या फिर कोर्ट ख़ुद उस वारंट को खारिज़ न कर दे.
 
वारंट की समयसीमा को इस बात से समझा जा सकता है कि बरसों तक भी अभियुक्त हत्थे नहीं चढ़ता, तो भी वारंट प्रभावी रहता है.
 
8. समन मजिस्ट्रेट या जज के अलावा अन्य अधिकारी के भी हस्ताक्षर (अगर हाईकोर्ट का आदेश हो तो) हो सकते हैं, जबकि वारंट पर केवल और केवल मजिस्ट्रेट या जज के ही हस्ताक्षर होते हैं.
 
9. किसी व्यक्ति को समन करने का अधिकार अदालत के अलावा कुछ अन्य संस्थानों जैसे पुलिस, अन्य प्रशासनिक विभाग, आयोग आदि को भी है, मगर वारंट जारी करने का अधिकार केवल और केवल अदालत को ही है.
 
10. समन में गिरफ़्तारी या जमानत जैसी कोई स्थिति नहीं होती है.मगर, वारंट तो जारी ही होते हैं गिरफ़्तारी के लिए, भले ही इनमें जमानत की भी व्यवस्था होती है.

 

समन और वारंट में तुलनात्मक अंतर को नीचे सारिणी (Table) के माध्यम से भी समझा जा सकता है:

तुलना का आधार समन (Summons)वारंट (Warrant)
मूल प्रकृतियह अदालत द्वरा जारी एक बुलावा पत्र या लीगल नोटिस है.यह अदालत द्वारा पुलिस को जारी गिरफ़्तारी का आदेश पत्र है.
किसे संबोधित होता है यह सीधे प्रतिवादी, अभियुक्त या गवाह के नाम जारी होता है.यह स्थानीय पुलिस अधिकारी के नाम निर्देशित और जारी होता है.
तामील का माध्यमइसे रजिस्टर्ड डाक, कोर्ट अधिकारी या डिजिटल माध्यम (WhatsApp/Email) से भेजा जाता है.इसे हमेशा एक पुलिस अधिकारी तामील (निष्पादित) कराने लेकर जाता है.
मुख्य उद्देश्य व्यक्ति को अदालत में बुलाकर उसके कानूनी दायित्व की जानकारी देना.समन की अवहेलना करने वाले वांछित को कोर्ट में हाजिर करना.
प्रतियों की संख्या यह हमेशा दो प्रतियों (2 Copies) में जारी होता है.यह हमेशा एक ही प्रति (1 Copy) में जारी किया जाता है.
समय सीमा/मान्यता कोर्ट में पेशी होने या निश्चित तारीख के बाद इसकी मान्यता समाप्त हो जाती है.यह तब तक प्रभावी रहता है जब तक आरोपी पकड़ा न जाये या कोर्ट इसे ख़ुद खारिज न करे.
जारी करने वाली संस्था अदालत के अलावा, पुलिस, प्रशासनिक विभाग या आयोग भी इसे जारी कर सकता है.वारंट जारी करने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ अदालत के पास होता है.
पुराना कानूनी प्रावधान (CrPC, 1973)पहले इसकी चर्चा CrPC के अध्याय-6 की धारा 61 से 69 में थी.पहले इसकी चर्चा CrPC के अध्याय-6 की धारा 70 से 81 में थी.
नया कानूनी प्रावधान (BNSS, 2023)BNSS के अध्याय-6 की धारा 61 से लेकर धारा 71 तक में समन की विस्तृत प्रक्रिया है.BNSS के अध्याय-6 की धारा 72 से लेकर धारा 83 तक में वारंट की पूरी प्रक्रिया है.
  

निष्कर्ष (Conclusion)

समन और वारंट अदालत द्वारा उपस्थिति सुनिश्चित करने के कानूनी माध्यम हैं. समन जहाँ अदालती बुलावा पत्र है, वहीं वारंट पुलिस द्वारा आरोपी को गिरफ्तार कर पेश करने का आदेश है. समन की अवहेलना वारंट- गिरफ़्तारी और जेल यात्रा का कारण भी बन सकती है. इसलिए समन आये, तो अनदेखा करने या छुपने के बजाय अदालत में हाजिर होकर अपनी सफ़ाई पेश करें और हर संभव सबूत दें अथवा अदालत आपसे जो कुछ जानकारी चाहती है, उसे उपलब्ध करायें. यही एकमात्र रास्ता है.

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS, 2023) के तहत समन और वारंट की तामील में अब डिजिटल प्रक्रियाएं भी शामिल हैं, इनका भी सम्मान करते हुए कानून का पालन करें.

 

समन और वारंट से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1.क्या समन मिलने का मतलब गिरफ़्तारी होता है?

नहीं, बिल्कुल नहीं. समन अदालत या जांच एजेंसी द्वारा भेजा गया एक बुलावा पत्र (Notice) है, जिसका उद्देश्य आपको मामले की जानकारी देना और अपना पक्ष रखने का मौका देना है. समन होने पर व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं किया जाता है.

2.यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर समन लेने से इनकार करता है, तो क्या हो सकता है?

समन लेने से इनकार करने या छुपने पर भी समन को तामील (Served) मान लिया जाता है. प्रक्रिया के रूप में, तामिली अधिकारी समन की एक कॉपी व्यक्ति के घर के दरवाजे या दीवार पर चिपका देता है. नए कानून (BNSS) के तहत समन ईमेल या व्हाट्सएप पर भी भेजा जा सकता है. इसके बाद भी हाजिर न होने पर अदालत वारंट जारी कर सकता है यानी गिरफ़्तारी का आदेश दे सकता है.

3.जमानती वारंट (Bailable Warrant) और गैर-जमानती वारंट (Non-Bailable Warrant) में क्या अंतर है?

जमानती वारंट: इसमें पुलिस आरोपी को गिरफ्तार तो करती है, लेकिन यदि आरोपी निर्धारित मुचलका (Bond) और जमानती (Surety) देने को तैयार हो, तो पुलिस उसे मौके पर ही या थाने (Police Station) से छोड़ देती है.

गैर-जमानती वारंट: इसमें पुलिस को आरोपी को गिरफ्तार करने और सीधे मजिस्ट्रेट या जज के सामने पेश करने का प्रावधान है. जमानत का फैसला कोर्ट करता है.

4.क्या कोर्ट बिना समन भेजे गिरफ़्तारी वारंट जारी कर सकता है?

हाँ, कोर्ट ऐसा कर सकता है. सामान्य मामलों में कोर्ट व्यक्ति को पहले ख़ुद उपस्थित होने के लिए समन (बुलावा पत्र) जारी करता है. लेकिन यदि मामला गंभीर अपराध से जुड़ा हो, या मजिस्ट्रेट को यह विश्वास हो कि समन भेजने पर आरोपी फरार हो जायेगा या सबूत नष्ट कर देगा, तो कोर्ट कानूनन बिना समन भेजे भी पहली बार में ही गिरफ़्तारी वारंट जारी कर सकता है.

5.क्या पुलिस बिना वारंट के किसी को गिरफ्तार कर सकती है?

हाँ, गंभीर मामलों में पुलिस ऐसा कर सकती है. कानून के अनुसार, यदि मामला किसी गंभीर और संज्ञेय अपराध (जैसे हत्या, डकैती या गंभीर हिंसा) से जुड़ा है, तो आरोपी को पुलिस बिना अदालती वारंट के भी सीधे गिरफ्तार कर सकती है. लेकिन छोटे या दीवानी मामलों में पुलिस बिना कोर्ट के वारंट के किसी को गिरफ्तार नहीं कर सकती है.

6.गिरफ़्तारी वारंट की मियाद (Validity of Arrest Warrant) कितने समय की होती है?

समन की मान्यता तो कोर्ट में पेश होने या तारीख बीतने के साथ ही ख़त्म हो जाती है, लेकिन वारंट की मियाद ख़त्म नहीं होती है. कोर्ट द्वारा जारी किया गया वारंट तब तक प्रभावी रहता है जब तक उस व्यक्ति को गिरफ्तार न कर लिया जाये, या फिर जिस कोर्ट ने उसे जारी किया है, वह ख़ुद उसे रद्द न कर दे.

7.नए कानून (BNSS) के डिजिटल समन और वारंट को लेकर क्या नियम हैं?

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत अब समन और वारंट को ईमेल, व्हाट्सएप या अन्य प्रमाणित इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों (Digital Media) से भेजना पूरी तरह से कानूनी रूप से मान्य है. जैसे ही किसी व्यक्ति को फोन या ईमेल पर डिजिटल समन या वारंट डिलीवर (पहुँचना) हो जाता है, कानूनन उसे सफल तामील (उचित सूचना) मान लिया जाता है, और इसके बाद कोर्ट की कार्यवाही में उपस्थित होना अनिवार्य होता है.

लेकिन ध्यान रखें, डिजिटल अरेस्ट (वर्चुअल गिरफ़्तारी) जैसा कोई प्रावधान कानून में नहीं है. यह पूरी तरह साइबर अपराधियों द्वारा ठगी के लिए गढ़ा गया एक फर्जी तरीका है.     

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