ईसा मसीह की वंशावली पर मतभेद क्यों? कौन क्या कहता है जानिए

ईसा मसीह की वंशावली को लेकर तरह-तरह की बातें क्यों पढ़ने-सुनने को मिलती हैं? क्या ये लोगों के अपने विचार या कल्पनाएँ हैं, या फिर ईसाई ग्रंथों में ही अजीबोगरीब बातें लिखी हुई हैं? मगर, ईसाई विद्वानों की ओर से इस बाबत जो दलीलें दी गई हैं वह भी कम हैरान करने वाली नहीं हैं. आखिर वे क्या छुपाना चाहते हैं? आइए, पवित्र बाइबल और उसके सुसमाचारों में देखते हैं कि वहाँ क्या कहा गया है, और तथ्यों के आधार पर सच की पड़ताल कर सही निष्कर्ष तक पहुँचते हैं.
वंशावली किसी की भी हो, बहुत मायने रखती है. खासतौर से, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाले लोग, जिनसे कुछ सीखने-समझने को मिलता है, उनकी वंशावली खोज का विषय होती है. किसी की पहचान भी तो उसकी वंशावली से ही होती है. लेकिन यदि वंशावली ईश्वर तुल्य या स्वयं ईश्वर की हो, तो यह इन तमाम बातों से परे, आस्था और विश्वास के महासागर के निर्मल और पारदर्शी जल की तरह होती है. इसमें किसी भी तरह की विसंगति या त्रुटि सीधे भावनात्मक ठेस पहुँचाती हुई मोहभंग का कारण बनती है. यही स्थिति ईसाइयों के परमेश्वर पुत्र या परमेश्वर कहे जाने वाले ईसा मसीह की वंशावली की है.
विदित हो कि पाँच बार संशोधित हो चुके बाइबल में कई त्रुटियाँ अब भी मौजूद हैं. कई स्थानों पर विरोधाभासी वर्णनों के साथ आंकड़ों में भी फर्क साफ नजर आता है. ईसा मसीह की वंशावली भी उन्हीं में से एक है. इसमें मत्ती द्वारा दी गई वंशावली लूका वाली वंशावली से मेल नहीं खाती है. दोनों में पूर्वजों की संख्या के साथ नाम भी अलग-अलग हैं. यहाँ तक कि ईसा मसीह के दादा का नाम भी दोनों सुसमाचारों (गॉस्पेल)) में अलग-अलग है.
मगर क्यों? इस सवाल पर जवाब भी अलग-अलग मिलते हैं. दरअसल, ईसाई रिलीजन में मतों की विभिन्नता की तरह (अनेक मत के होने के कारण) इन मामलों में भी विद्वानों में मतभेद है.
वंशावली में पूर्वजों की संख्या और नाम अलग-अलग
बाइबल के अनुसार, परमेश्वर ने अपने प्रिय पुत्र यीशु या ईसा मसीह के चार शिष्यों- मत्ती (मैथ्यू), मरकुस (मार्क), लूका (ल्यूक) और युहन्ना (जॉन) को प्रेरित कर उनके माध्यम से और गॉस्पेल या सुसमाचारों की रचना करवाई. चूँकि इनमें लिखे गए शब्द स्वयं परमेश्वर के वचन हैं, इसलिए इनमें रत्तीभर भी त्रुटि या झूठ की गुंजाईश नहीं है. यानी ये अकाट्य हैं. हालाँकि, जब हम ईसा मसीह की वंशावली खोजते हैं, तो पाते हैं कि मरकुस और युहन्ना के सुसमाचारों में इसका वर्णन नहीं है. मत्ती और लूका के सुसमाचारों में वर्णन मिलते हैं, परंतु वे भी आपस में मेल नहीं खाते हैं. आइए, इसे सारिणी (Table) के माध्यम से समझते हैं:
| लूका (ल्यूक) | मत्ती (मैथ्यू) |
| अब्राहम | अब्राहम |
| इसाक | इसाक |
| जेकब | जुडास |
| जुडा | फेयर्स |
| अमिनादाब | एस्रौम |
| नासौन | एरम |
| साल्मौन | अमिनादाब |
| बूज | नासौन |
| ओबैद | साल्मौन |
| जैसी | बूज |
| राजा डेविड | ओबैद |
| नाथन | जैसी |
| मत्ताथा | राजा डेविड |
| मेनन | सोलोमन |
| मेलेया | रोबोआम |
| एलिअकिम | अबिया |
| जोनान | असा |
| जोसेफ | जोसाफात |
| जुडा | जोरम |
| सिमिओन | ओजिअस |
| लेवी | जोआथम |
| मत्थात | अकाज |
| जोरिम | एजेकियास |
| एलिएजर | मनासेस |
| जोसे | आमोन |
| एर | जोसिआस |
| एल्मोदम | जेकोनिआस |
| कोसाम | सलाथियल |
| अड्डी | जोरोबबेल |
| मेल्की | अबियुड |
| नेरी | एलिआकिम |
| सलाथियल | अजोर |
| जोरोबबेल | सैदौक |
| रहेजा | अचिम |
| जोआना | इलियड |
| जुडा | एलिआजर |
| जोसेफ | मत्थान |
| सेमेयी | जेकब/याकूब |
| मत्तथिआस | जोसफ/युसूफ |
| माठ | जीसस (जो यीशु या ईसा मसीह कहलाया) |
| नग्गे | |
| एसलि | |
| नौम | |
| अमोस | |
| मत्तथिआस | |
| जोसेफ | |
| जन्ना | |
| मेल्की | |
| लेवी | |
| मत्थात | |
| हेली/एली | |
| जोसफ/युसूफ | |
| जीसस (जो यीशु या ईसा मसीह कहलाया) |
हम यहाँ देखते हैं कि मत्ती द्वारा दी गई यीशु या ईसा मसीह की वंशावली में उनके पूर्वजों की कुल संख्या 39 है, जबकि लूका वाली वंशावली में यह संख्या 52 है.
विदित हो कि ईसाई मिशनरियाँ ईसा मसीह को किंग डेविड (राजा दाउद) से जोड़कर देखती हैं और उससे शुरू होने वाली वंशावली को प्राथमिकता देती हैं, क्योकि उनका मानना है कि ईसा मसीह राजा दाउद के वंशज थे और उसकी राजगद्दी पर बैठने के हकदार थे. ऐसे में, जब हम मत्ती द्वारा दी गई वंशावली में दाउद से शुरू करते हैं, तो यीशु या जीसस का नाम 27वें नंबर पर आता है, जबकि लूका वाली वंशावली में यीशु/जीसस का नाम 42वें नंबर पर पहुँच जाता है.
दोनों- लूका और मत्ती, द्वारा दी गई वंशावली में शुरुआत में 4 नाम तो मिलते हैं, लेकिन आगे बदलते जाते हैं. कुछ आगे-पीछे हो जाते हैं, और जब हम और आगे बढ़ते हैं, तो समान नाम मिलने बंद हो जाते हैं. और, अंत आते-आते मत्ती वाले में यीशु/जीसस आ जाता है, लेकिन लूका में चूँकि पूर्वज ज्यादा हैं, इसलिए सूची लंबी होती जाती है और यीशु बहुत बाद में नजर आता है.
वंशावली में ईसा मसीह के दादा का अलग-अलग
ईसा मसीह की वंशावली में पूर्वजों की संख्या के साथ उनके नामों में विसंगतियाँ स्पष्ट दिखाई देती हैं. यहाँ तक कि ईसा मसीह के दादा का नाम भी अलग-अलग है. यह ऐसा मुद्दा है जिस पर ईसाई विद्वान आलोचकों से घिरे, और सफाई देते दिखाई देते हैं. मगर उनकी दलीलें बहुत अजीबोगरीब हैं.
1.यहोवा के साक्षी नामक वेबसाइट के लेख में दलील
यहोवा के साक्षी (मत्ती और लूका में दी यीशु की … – JW.org) नामक वेबसाइट में प्रकाशित एक लेख में कहा गया है:
इस लेख में दावे व कथन: 1.कानूनी हक बनाम पैदाइशी हक का नैरेटिव- मत्ती यूसुफ के जरिए यीशु को राजगद्दी का कानूनी हक देता है, और लूका मरियम के जरिए पैदाइशी हक देता है. 2.सुलेमान बनाम नातान (वंशवृक्ष की दो शाखाएँ)- इसमें कहा गया है कि यूसुफ दाउद के पहले बेटे सुलेमान के वंश से था और मरियम दाउद के दूसरे बेटे नातान के वंश से थी. 3.उस जमाने का दस्तावेजीकरण और ‘प्रचलित धारणा’- कहा गया है कि ‘उस जमाने के लोग अच्छी तरह जानते थे कि यूसुफ, एली का दामाद था.’ 4.’जैसा समझा जाता था’ (लूका 3:23) का सुरक्षा कवच- इसमें कहा गया है कि लूका ने यूसुफ को एली का बेटा बताया क्योंकि औरतों के नाम दर्ज नहीं होते थे.
आइए, अब इन्हीं दावों या दलीलों का बिन्दुवार विश्लेषण करते हैं:
(1) ‘कानूनी हक’ बनाम ‘पैदाइशी हक’ का नैरेटिव (दावा नंबर 1)
यह तर्क सच पर पर्दा डालने या ‘एक सुविधाजनक कवर अप’ (Covenient cover-up) से ज्यादा कुछ नहीं लगता है. मत्ती और लूका दोनों ने अपनी किताबों में वंशावली की शुरुआत यूसुफ से (अब्राहम से यीशु की ओर) की है. लूका के मूल यूनानी पाठ में कहीं भी ‘मरियम’ का नामोनिशान तक नहीं है. यह कहना कि लूका मरियम की वंशावली लिख रहा था, बाद के विचारकों द्वारा दोनों किताबों के भारी अंतर्विरोध को जबरदस्ती जोड़ने (Force-fitting) के लिए गढ़ा गया एक काल्पनिक पुल है. अगर दोनों को परमेश्वर से प्रेरणा मिली थी- उनके पास दिव्य ज्ञान था, तो उन्हें एक ही सच को साबित करने के लिए दो अलग-अलग और उलझे हुए रास्तों की जरुरत क्यों पड़ी?
(2) ‘लोग अच्छी तरह जानते थे कि यूसुफ दामाद था’ (दावा नंबर 3)
यह दावा ऐतिहासिक रूप से निराधार और कमजोर है. अगर उस जमाने के लोग यह ‘अच्छी तरह जानते थे’, तो शुरुआती ईसाई समाज में सदियों तक इसको लेकर सिरफुटव्वल और बहस क्यों हुई? सच तो यह है कि यह बात कोई नहीं जानता था. जब बाद में लोगों ने दोनों सुसमाचारों या गॉस्पेल को आमने-सामने रखकर पढ़ा और पाया कि दादा, परदादा, आदि सबके नाम अलग हैं, तब जाकर चर्च के विद्वानों को समाज को शांत करने के लिए ‘दामाद वाले नियम’ की थ्योरी पेश करनी पड़ी, ताकि उनके ग्रंथ (पवित्र बाइबल) की विश्वसनीयता बची रहे.
(3) ‘जैसा समझा जाता था’ का सुरक्षा कवच (दावा नंबर 4)
लूका (लूका 3:23 में) द्वरा प्रयुक्त वाक्यांश ‘जैसा समझा जाता था’ (As was supposed) कोई बुद्धिमानी का संकेत नहीं, बल्कि एक खामी या लूपहोल (Loophole) है. यह लेखक की उस कश्मकश या चालाकी को दिखाता है जहाँ वह एक तरफ यीशु को कुँआरी से पैदा हुआ या अलौकिक भी दिखाना चाहता है, और दूसरी तरफ यहूदियों को प्रभावित करने के लिए उन्हें दाउद के इंसानी वंश से भी जोड़ना चाहता है. ये दोनों बातें एक साथ सच नहीं हो सकती हैं- या तो यीशु अलौकिक थे (तो वंशावली का कोई अर्थ नहीं है), या फिर वे दाउद के वंशज थे (तो वे यूसुफ के जैविक पुत्र थे). लूका ने बीच का रास्ता निकालकर दोनों नावों पर पैर रखने की कोशिश की, जो तार्किकता की कसौटी रूपी नदी में डूब जाती हैं.
2.गॉट क्वेश्चन्स नामक वेबसाइट की दलील
इंटरनेट पर ईसा मसीह और ईसाइयत के प्रचार और विस्तार के कार्य में समर्पित बाइबल, गॉड, ईसाई रिलीजन और धर्मशास्त्रों से जुड़े प्रश्न-उत्तर (Christian Q&A) वाली दुनियाभर में मशहूर गॉट क्वेश्चन्स (https://www.gotquestions.org/Hindi/Hindi-Jesus-genealogies.html) नामक आध्यात्मिक मंत्रालय (Ministry of Spirituality) की वेबसाइट ने भी ऐतिहासिक उदाहरण के साथ यीशु की वंशावली पर दलील दी है, परंतु यह एक बिल्कुल अलग ही नजरिया पेश करता है.
इसमें इतिहासकार येसुबियस (Eusebius) के जिस नियोग विवाह (Levirate Marriage) वाले सिद्धांत का जिक्र है, वह दरअसल इसी वेबसाइट के तर्कों का हिस्सा है. आइए, इनके तर्कों- दावों का विश्लेषण करते हैं.
(1) ‘नियोग विवाह’ की थ्योरी: ऐतिहासिक सच या डैमेज कंट्रोल?
दावा: यदि एक भाई (एली) बिना संतान के मर गया, तो दूसरे भाई (याकूब) ने उसकी पत्नी से विवाह किया, जिससे यूसुफ पैदा हुए. इस तरह यूसुफ कानूनी रूप से एली के और जैविक रूप से याकूब के पुत्र बने.
विश्लेषण: यह सिद्धांत ऐतिहासिक तथ्यों से ज्यादा एक ‘गणितीय जोड़-तोड़’ जैसा प्रतीत होता है. मत्ती और लूका की वंशावलियों में विसंगति इतनी बड़ी है कि केवल दादा (एली और याकूब) का स्तर ही नहीं बदलता है, बल्कि राजा दाउद से लेकर यूसुफ तक के बीच की लगभग पूरी पीढियाँ और नाम ही पूरी तरह अलग हैं. अगर केवल एक पीढ़ी में नियोग विवाह हुआ था, तो उससे पिछली 30-40 पीढ़ियों के सारे नाम (जैसे एक में सुलेमान का वंश और दूसरे में नातान का वंश) कैसे बदल गए? स्पष्ट है कि यह दलील पूरी वंशावली के अंतर्विरोध को नहीं सुलझाती है, बल्कि केवल यूसुफ के पिता वाले नाम के तात्कालिक अंतर्विरोध पर पर्दा डालती है.
(2) येसुबियस (Eusebius) के संदर्भ का चश्मा
दावा: तीसरी-चौथी शताब्दी के प्रसिद्ध कलीसियाई इतिहासकार येसुबियस (Eusebius) ने इस दृष्टिकोण को थामा यानी अपनाया था.
विश्लेषण: यहाँ यह समझना जरुरी है कि येसुबियस कोई स्वतंत्र विचारों वाले और निष्पक्ष इतिहासकार नहीं थे. वे रोमन सम्राट कॉन्सटेंटाइन के समय के चर्च के एक प्रमुख अंग थे, जिनका मुख्य कार्य ईसाई मत की सर्वोच्चता और धर्मग्रंथों की अचूकता (Inerrancy) को किसी भी प्रकार से स्थापित करना था. जब ईसाइयत साम्राज्य का राजधर्म बन रही थी, तब धर्मग्रंथों में किसी भी प्रकार का अंतर्विरोध दिखना एक बड़ा राजनीतिक और धार्मिक जोखिम था. इसलिए येसुबियस का इस सिद्धांत को बढ़ावा देना एक प्रशासनिक एवं धार्मिक मजबूरी (Theological Necessity) थी, न कि किसी निष्पक्ष ऐतिहासिक खोज का परिणाम.
(3) वैधानिक (Legal) बनाम जैविक (Biological) का विरोधाभास
दावा: मत्ती जैविक वंशावली दिखा रहा है और लूका वैधानिक या कानूनी वंशावली का पता लगा रहा है.
विश्लेषण: यह तर्क अपने आप में ही विरोधाभाषी हो जाता है. ईसाई धर्मशास्त्र के अनुसार, यीशु का जन्म कुँआरी मरियम से हुआ था और यूसुफ से उनका कोई जैविक संबंध (Blood relation) नहीं था. अगर मत्ती यूसुफ की ‘जैविक’ वंशावली दिखा रहा है, तो उसका यीशु के लिए कोई अर्थ नहीं बचता है, क्योंकि यूसुफ तो यीशु के जैविक पिता थे ही नहीं! एक तरफ यीशु को अलौकिक बताना और दूसरी तरफ यूसुफ की जैविक वंशावली को इतना महत्त्व देना, इस तर्क के पूरे ढाँचे को ही कमजोर कर देता है.
(4) लक्षित पाठक और नैरेटिव का खेल
यदि हम तटस्थ होकर देखें, तो मत्ती और लूका दोनों लेखकों ने अपने-अपने लक्षित पाठकों (Target Audience) को प्रभावित करने के लिए अलग-अलग कहानियाँ बुनीं. मत्ती यहूदियों को यह समझाना चाहता था कि यीशु राजा सुलेमान वाले शाही और कानूनी घराने से है, ताकि वे उन्हें राजा स्वीकार करें. लूका गैर-यहूदी और गरीब तबके के पाठकों के लिए लिख रहा था, इसलिए उसने दाउद के दूसरे बेटे नातान (जो राजा नहीं बना) के वंश को चुना, ताकि यीशु को आम इंसानों से जोड़ा जा सके. जब बाद में इन दोनों एजेंडों के तहत लिखे गए दस्तावेज एक ही किताब (बाइबल) में संकलित किये गए, तो इस तरह के विरोधाभास सामने आना तय था.
जहाँ तक गॉट क्वेश्चंस जैसी प्रचारक वेबसाइटों का सवाल है, इनका मुख्य उद्देश्य इतिहास की खोज करना नहीं, बल्कि आस्था का बचाव (Apologetics) करना है. उपरोक्त ‘नियोग विवाह’ का तर्क इतिहास के किसी अकाट्य साक्ष्य पर आधारित नहीं है, बल्कि यह दो अलग-अलग लेखकों द्वारा अपने-अपने समय पर गढ़े गए नेरेटिव के आपसी टकराव को सुलझाने का एक ‘थियोलोजिकल डैमेज कंट्रोल’ है.
3.डिजायरिंग गॉड नामक वेबसाइट में जॉन पाइपर की काल्पिनक और गणितीय दलील
उपरोक्त दोनों वेबसाइटों की जैसी ही दलील ईसाइयत का प्रचार करने वाली डिजायरिंग गॉड नामक ईसाई धर्मशास्त्र और शिक्षण मंत्रालय (Christian teaching ministry) की अधिकारिक वेबसाइट (https://www.desiringgod.org/articles/who-was-jesus-grandfather) के संस्थापक और शिक्षक जॉन पाइपर ने भी दी है. उनके विचार पढ़कर ऐसा लगता है कि वे मानो वंशावली के विश्लेषण के बजाय गणित का सवाल हल कर रहे हों. देखिए (हिंदी अनुवाद):
इन्होंने यहां जैसे याक़ूब को मार दिया है. साथ ही, उस की बीवी की एली (हेली) से शादी करा कर उसे (एली को) युसूफ (ज़ोसफ़) का जैविक पिता जबकि याक़ूब को क़ानूनी पिता घोषित कर दिया है.
मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ने यानी जितने सिर उतने ही दिमाग़ हैं यहां भी दृष्टिगोचर है. क्या यह सही है?
निष्कर्ष
विदित हो कि विषमताओं से भरे इस जटिल और विविधतावादी संसार में पग पग पर विरोधाभास देखने को मिलते हैं. परंतु, उनके समाधान भी होते हैं. यहां यदि झूठ है तो सच भी विद्धमान है.
ग़लतियां मान लेने से सम्मान बढ़ता है. साथ ही,भूल-सुधार के मौक़े भी मिलते हैं. लेकिन,सफ़ाई में ग़लत तथ्य पेश कर लीपापोती की कोशिश करना ग़लतियां दुहराने जैसा कार्य होता है ,जिसे कोई सभ्य समाज पसंद नहीं करता है.
जॉन पाइपर तो एक बड़े विद्वान हैं. दुनियाभर में मशहूर वे 50 से अधिक पुस्तकों के लेखक हैं. 33 वर्षों तक उन्होंने बेथलेहम बैपटिस्ट चर्च, मिनियापोलिस और मिनेसोटा के पादरी के रूप में सेवा की है.
क्या उनसे ऐसी अपेक्षा की जा सकती है?
कदापि नहीं.
व्यक्ति की बातों में विरोधाभास आते ही वह अविश्वसनीय बन जाता है.
और चलते चलते अर्ज़ है यह शेर…
झूठा है झूठ बात ये बोलेगा आईना,
आओ हमारे सामने हम सच बताएंगें |
और साथ ही…
जब तक वो झूठ कहता रहा सर पे ताज़ था,
सच कह दिया तो ताज़ ही क्या सर नहीं मिला |
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