शिक्षा एवं स्वास्थ्य

क्या महिलाओं को योनि से अधिक गुदा मैथुन में आनंद आता है? जानिए क्या कहता है पारंपरिक और अधुनिक ज्ञान-विज्ञान

वर्तमान डिजिटल युग और इंटरनेट मंचों, जैसे विकिपीडिया (Wikipedia), आदि पर महिलाओं की यौन प्राथमिकताओं को लेकर कई भ्रामक दावे किये जा रहे हैं. क्या वाकई महिलाओं को योनि से अधिक गुदा मैथुन में आनंद आता है? प्राचीन भारतीय कामशास्त्रों के पारंपरिक दृष्टिकोण से लेकर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के 'पुडेंडल नर्व नेटवर्क' और वर्ष 2022 के ऐतिहासिक 'PLOS ONE' वैज्ञानिक सर्वेक्षण के आंकड़ों तक- जानिए इस विषय का संपूर्ण, प्रामाणिक और शारीरिक सच.

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वैश्वीकरण और सूचना प्रोद्योगिकी के इस तीव्रगामी युग में, मानवीय जीवन के उन पक्षों पर भी विमर्श का द्वार खुला है जिन्हें सदियों से रूढ़िवादिता और सामाजिक संकोच के घने आवरण में बंद रखा गया था. मानव व्यवहार, मनोविज्ञान और यौन स्वास्थ्य (Sexual Health) अब सामाजिक वर्जनाओं (Taboos) से मुक्त होकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तार्किक विश्लेषण की धुरी पर आकर टिक गए हैं. यह बौद्धिक चेतना का ही परिणाम है कि आज समाज कामुकता और शारीरिक प्राथमिकताओं से जुड़े विषयों पर बिना किसी पूर्वाग्रह के अकादमिक चर्चा करने की दिशा में अग्रसर है. परंतु, सूचना के इस अनियंत्रित प्रवाह का एक स्याह पक्ष भी है- वह है भ्रामक, अप्रमाणिक और अतिशयोक्तिपूर्ण जानकारी का प्रसार. योनि से अधिक गुदा मैथुन में आनंद मिलने का दावा भी इन्हीं में से एक है.

वर्तमान डिजिटल परिदृश्य में, विकिपीडिया (Wikipedia) जैसे खुले मंचों, विभिन्न डिजिटल चर्चा-फोरम और सोशल मीडिया रील में, मानवीय यौन प्राथमिकताओं को लेकर कई प्रकार के सनसनीखेज दावे किये जा रहे हैं. इन्हीं दावों में से एक अत्यंत प्रचलित और चर्चित दावा यह है कि ‘महिलाओं को योनि मैथुन से अधिक गुदा मैथुन में आनंद आता है (Women Get More Pleasure from Anal Sex Than Vaginal Sex).’ यह वाक्य न केवल युवा पीढ़ी के मानस पटल पर एक कृत्रिम धारणा का निर्माण कर रहा है, बल्कि यौन व्यवहार के स्वाभाविक संतुलन को भी विरूपित कर रहा है. किसी भी वैज्ञानिक संदर्भ या क्लीनिकल ट्रायल के बिना साझा किये जाने वाले ऐसे विचार अक्सर पोर्नोग्राफिक संस्कृति (Pornographic Culture) से प्रेरित होते हैं, जहाँ दृश्य-रंजन को ही सार्वभौमिक सत्य मान लिया जाता है.

एक जिम्मेदार लेखक और वैज्ञानिक समाज का यह दायित्व है कि वह ऐसे दावों की गहराई से पड़ताल करे. यौन आनंद केवल एक तात्कालिक शारीरिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह मानव शरीर की जटिल तंत्रिका संरचना (Nerve Network), मानसिक तत्परता और शारीरिक अनुकूलता का एक मिलाजुला परिणाम है. अतः, इस आलेख का प्राथमिक उद्देश्य किसी भी प्रकार की अश्लीलता या सनसनी से कोसों दूर रहते हुए, विशुद्ध रूप से चिकित्सकीय विज्ञान (Medical Science) और ऐतिहासिक साक्ष्यों के आलोक में इस दावे का निष्पक्ष और प्रामाणिक विश्लेषण करना है. हम यह समझने का प्रयास करेंगें कि मानव शरीर की बनावट इस संदर्भ में क्या कहती है और क्या वाकई प्रकृति ने स्त्री शरीर को इस प्रकार निर्मित किया है कि वह पारंपरिक संभोग से इतर किसी अन्य क्रिया में अधिक संतुष्टि पा सके.

इस आधुनिक विमर्श की दिशा तय करने के लिए हमे केवल प्रयोगशालाओं के समकालीन आंकड़ों तक सीमित नहीं रहना होगा, बल्कि मानव सभ्यता के उस वैचारिक इतिहास को भी खंगालना होगा जहाँ काम (Pleasure) को जीवन के पुरुषार्थ के रूप में स्वीकार किया गया था. आधुनिक जगत जिसे आज ‘नया विमर्श’ मानकर कौतूहलवश देख रहा है, भारतीय मनीषा और पारंपरिक दर्शन ने सदियों पूर्व उसकी सीमाओं और संभावनाओं को रेखांकित कर दिया था. अतः विज्ञान के सूक्ष्म सिद्धांतों में उतरने से पहले, यह अत्यंत आवश्यक है कि हम इस विषय पर अपने पारंपरिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण को समझें, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि प्राचीन समाज इस प्रकार की शारीरिक विविधताओं को किस दृष्टि से देखता था.

1.पारंपरिक विचार (Traditional Perspective)- प्राचीन समाज और कामशास्त्रों का दृष्टिकोण

जब हम मानवीय इतिहास के पारंपरिक दर्शन का अध्ययन करते हैं, तो भारत की भूमि इस दृष्टि से अनूठी दिखाई देती है. जहां विश्व की कई प्राचीन सभ्यताओं ने शारीरिक आनंद और काम-वासना को हमेशा हीन भावना, अपराध बोध या ‘पाप’ की श्रेणी में रखा, वहीं भारतीय मनीषा ने मानव जीवन के समग्र विकास के लिए चार पुरुषार्थों का निर्धारण किया- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष. यहां ‘काम’ को केवल एक जैविक आवश्यकता नहीं, बल्कि आत्मा और शरीर के संतुलन का एक माध्यम माना गया. इसी वैचारिक स्वतंत्रता का परिणाम था कि भारत में महर्षि वात्सयायन ने कामसूत्र (The Kama Sutra) जैसे कालजयी ग्रंथ की रचना की, जो केवल संभोग के आसनों की पुस्तक नहीं है, बल्कि वह मानव मनोविज्ञान, सामाजिक आचरण और काम-कला का एक विशुद्ध वैज्ञानिक वर्गीकरण है.

कामसूत्र के द्वितीय अधिकरण (अध्याय) का यदि सूक्ष्मता से अध्ययन किया जाये, तो यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन विचारक मानवीय काम-इच्छाओं की विविधता से भली-भांति परिचित थे. महर्षि वात्सयायन ने ग्रंथ में ‘औपरिष्टक’ (Oral Stimulation) और ‘चित्ररत’ (Alternative Sexual Practices/Positions) जैसी विभिन्न वैकल्पिक शारीरिक क्रियाओं का एक अत्यंत विस्तृत और मर्यादित वर्गीकरण किया है. प्राचीन ग्रंथों में इस बात को स्वीकार किया गया है कि मानवीय प्रवृत्ति और शारीरिक रूचि हर व्यक्ति में भिन्न हो सकती है. प्रकृति ने मनुष्य को इच्छाओं की जो विविधता दी है, प्राचीन शास्त्र उसके प्रति किसी आक्रामक निषेध (Curb) की वकालत नहीं करते हैं, बल्कि उसे मर्यादित करने का मार्ग दिखाते हैं.

परंतु, यहाँ सबसे महत्वपूर्ण और ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि प्राचीन भारतीय परंपरा या कामशास्त्रों ने कभी भी इन वैकल्पिक क्रियाओं को मुख्य संभोग (योनि मैथुन) से श्रेष्ठ या उसका विकल्प नहीं माना. शास्त्रों के अनुसार योनि मैथुन ही ‘प्रकृति सम्मत’ (Natural) और ‘सृष्टि-अनुकूल’ क्रिया है, जो न केवल वंश-वृद्धि (Procreation) का आधार है, बल्कि स्त्री और पुरुष के बीच उर्जा के प्राकृतिक विनिमय (Natural Energy Exchange) का सर्वोत्तम माध्यम भी है. वैकल्पिक क्रियाओं को शास्त्रों में केवल ‘विशिष्ट परिस्थितियों’ या ‘असामान्य अभिरुचियों’ (Specific Inclinational Variances) के अंतर्गत स्थान दिया गया है.

अतः, पारंपरिक विचार के आधार पर यह दावा कि महिलाओं को इस वैकल्पिक मार्ग से अधिक आनंद मिलता है, या फिर यूं कहिये कि योनि से अधिक गुदा मैथुन में आनंद आता है, पूरी तरह निराधार साबित होता है. परंपरा इसे कलात्मक विविधता या व्यक्तिगत रूचि के रूप में तो स्वीकार करती है, लेकिन आनंद और संतुष्टि के सार्वभौमिक पैमाने के रूप में केवल और केवल प्रकृति सम्मत मार्ग- योनि मार्ग को ही मान्यता देती है.

2.आनंद का शरीर विज्ञान- महिलाओं का पेल्विक नर्व नेटवर्क (The Physiology of Pleasure: Female Pelvic Nerve Network)

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और मानव शरीर रचना विज्ञान (Human Anatomy) इस विषय पर और भी अधिक तार्किक और अकाट्य प्रमाण प्रस्तुत करते हैं. किसी भी अंग में आनंद या संवेदना का अनुभव इस बात पर निर्भर करता है कि उस क्षेत्र में तंत्रिकाओं (Nerves) का संजाल कितना सघन है. महिलाओं के पेल्विक क्षेत्र (Pelvic Region) यानी पेडू या बस्ति प्रदेश (मलाशय और जननांगों का निचला हिस्सा) की बनावट वैज्ञानिक दृष्टि से विस्मयकारी है. इस पूरे हिस्से की संवेदनाओं को संचालित करने वाली जो मुख्य तंत्रिका है, उसे चिकित्सा विज्ञान में पुडेंडल तंत्रिका (Pudendal Nerve) कहा जाता है.

क्लीवलैंड क्लिनिक (Cleveland Clinic) के न्यूरो-एनाटॉमी शोध के अनुसार, पुडेंडल तंत्रिका रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से से निकलकर पूरे पेल्विक फ्लोर (श्रोणी तल) में फैलती है. इस तंत्रिका की अत्यंत महत्वपूर्ण और सूक्ष्म शाखा जिसे इन्फीरियर रेक्टल नर्व (Inferior Rectal Nerve) कहते हैं, गुदा मार्ग के बाहरी स्फिंकटर (Sphincter) और उसके आसपास की त्वचा तक जाती है. इस शारीरिक बनावट के कारण गुदा क्षेत्र (Anal Region) और उसके ठीक भीतर का शुरुआती मार्ग (Anal Canal) हज़ारों सूक्ष्म तंत्रिका अंत (Nerve Endings) से भरा होता है.

इसी सघन तंत्रिका जाल के कारण यह हिस्सा स्पर्श, दबाव और खिंचाव के प्रति असाधारण रूप से संवेदनशील (Highly Sensitive) हो जाता है. जब इस क्षेत्र में कोई बाह्य दबाव या घर्षण होता है, तो ये तंत्रिकाएं सक्रिय हो जाती हैं और मस्तिष्क को तीव्र संवेदी संकेत (Sensory Signals) भेजती हैं.

महिलाओं के संदर्भ में यह आनंद और भी जटिल हो जाता है क्योंकि पेल्विक फ्लोर की ये नशें अलग-थलग काम नहीं करती हैं. वे आपस में इस तरह गुंथी हुई होती हैं कि गुदा क्षेत्र में होने वाली किसी भी हलचल की तरंगें सीधे जननांगों तक पहुँचती हैं.

चिकित्सा विज्ञान इस घटना को ‘क्रॉस ओवर सेंसेशन’ (Cross-Over Sensation) कहता है. यानी एक हिस्से की उत्तेजना नसों के साझा नेटवर्क के कारण पूरे पेल्विक क्षेत्र को सिहरन से भर देती है. यही वह प्राथमिक जैविक और शारीरिक कारण है, जिसकी वज़ह से कुछ महिलाओं को इस क्रिया के दौरान एक अत्यंत तीव्र और भिन्न प्रकार के शारीरिक आनंद (Anal Pleasure) की अनुभूति होती है. लेकिन क्या यह आनंद योनि से अधिक होती है? इसे समझने के लिए हमें क्लिटोरिस की छिपी हुई संरचना और वैश्विक वैज्ञानिक सर्वेक्षणों के वास्तविक आंकड़ों को देखना होगा.

3.आंतरिक उत्तेजना: क्लिटोरिस का छिपा हुआ सच (Internal stimulation: The Hidden Truth of clitoris)

मानव शरीर रचना विज्ञान (Human Anatomy) के इतिहास में संभवतः सबसे अधिक उपेक्षित और देर से समझा जाने वाला अंग भगशेफ़ या क्लिटोरिस (Clitoris) रहा है. सदियों तक चिकित्सा जगत भी यही मानता रहा कि क्लिटोरिस केवल योनि के ऊपरी छोर पर स्थित एक मटर के दाने के आकार की बाहरी संरचना है. परंतु, आधुनिक गाइनेकोलॉजिकल और रेडियोलॉजिकल शोधों (विशेषकर उन्नत एमआरआई स्कैनिंग) ने इस रुढ़िवादी धारणा को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया. विज्ञान ने यह सिद्ध किया कि जो हिस्सा बाहर से दृष्टिगोचर होता है, वह तो क्लिटोरिस का मात्र 10 प्रतिशत भाग है, जिसे ग्लांस (Glans) कहा जाता है. इसका शेष 90 प्रतिशत भाग स्त्री के पेल्विक फ्लोर (श्रोणी तल) के भीतर एक गहरे और विस्तृत संजाल के रूप में छिपा हुआ है.

शारीरिक बनावट की दृष्टि से, क्लिटोरिस के आतंरिक भाग में दो लंबे प्रवर्धन (Extensions) होते हैं जिन्हें चिकित्सा विज्ञान में ‘क्लिटोरल क्रूरा’ (Clitoral Crura) या क्लिटोरिस के आतंरिक पैर कहा जाता है. ये आंतरिक पैर उल्टे ‘V’ आकार में योनि मार्ग (Vaginal Canal) की दीवारों के अत्यंत समीप तक फैले होते हैं. इसके अतिरिक्त, इसके ठीक नीचे ‘पेरिनियल स्पंज’ (Perineal Sponge) नामक उत्तेजनशील उत्तक (इरेक्टाइल टिशू) का एक अत्यंत संवेदनशील तकिया (Pad) होता है, जो योनि और गुदा मार्ग के बीच के विभाजनकारी हिस्से (Perineum) में स्थित होता है.

जब गुदा मैथुन या उस क्षेत्र में गहरी उत्तेजना होती होती है, तो मलाशय के भीतर होने वाला घर्षण और दबाव केवल उसी मार्ग तक सीमित नहीं रहता है. वह दबाव आंतरिक रूप से मलाशय की दीवार को धकेलते हुए ठीक उसके सामने स्थित क्लिटोरिस के इन आतंरिक पैरों (Clitoral Crura) और पेरिनियल स्पंज पर सीधा और तीव्र दबाव डालता है. परिणामतः, महिलाओं को जो आनंद अनुभव होता है, वह वास्तव में गुदा मार्ग का स्वतंत्र आनंद नहीं होता है, बल्कि वह क्लिटोरिस की आतंरिक और परोक्ष उत्तेजना (Indirect Clitoral Stimulation) होती है. यही कारण है कि कई महिलाएं इस क्रिया के दौरान अत्यंत गहरे, आंतरिक और तीव्र चरमसुख (Anal Orgasm) का अनुभव करती हैं. यह तथ्य यह तो स्पष्ट करता है कि इस क्रिया में आनंद का जैविक आधार क्या है, परंतु योनि मैथुन से इसकी श्रेष्ठता को सिद्ध नहीं करता है, जिसे समझने के लिए दोनों लिंगों की जैविक भिन्नता को जानना अनिवार्य है.

4.जैविक भिन्नता: स्त्री और पुरुष के अनुभव में मुख्य अंतर (Biological Variation: The Core Difference Between Male and Female Experience)

इस पूरे विमर्श का सबसे भ्रामक पक्ष यह है कि अक्सर पुरुषों के अनुभवों को ही सामान्य मानकर उसे स्त्रियों पर भी लागू करने का प्रयास किया जाता है. इंटरनेट पर उपलब्ध अधिकांश सामग्रियां इस बुनियादी जैविक और संरचनात्मक अंतर को पूरी तरह नज़रअंदाज कर देती हैं कि प्रकृति ने स्त्री और पुरुष के पेल्विक हिस्से (श्रोणी भाग, पेडू) को पूरी तरह भिन्न उद्देश्यों के लिए निर्मित किया है. यद्धपि दोनों ही लिंगों में पुडेंडल तंत्रिका (Pudendal Nerve) का जाल समान रूप से घना और संवेदनशील होता है, परंतु उस तंत्रिका के मार्ग में आने वाले आंतरिक अंग (Internal Organs) इस पूरे खेल को बदल देते हैं.

पुरुषों की शारीरिक संरचना में मलाशय या गुदा मार्ग की अगली दीवार (Front Wall) के ठीक पीछे पौरुष ग्रंथि या प्रोस्टेट ग्लैंड (Prostate Gland) स्थित होती है. चिकित्सा विज्ञान में प्रोस्टेट को ‘मेल जी-स्पॉट’ (Male G-Spot या P-Spot) के नाम से जाना जाता है. यह ग्रंथि अत्यंत संवेदनशील होती है और वीर्य स्खलन तथा चरमसुख को नियंत्रित करने वाली ‘प्रोस्टेटिक प्लेक्सस’ नामक नसों के एक जटिल महाजाल से घिरी होती है. जब पुरुषों में गुदा प्रवेश (गुदा मैथुन के दौरान लिंग प्रवेश) या उत्तेजना होती है, तो प्रोस्टेट ग्लैंड पर सीधा, भौतिक और प्रत्यक्ष (Direct) दबाव पड़ता है. यह सीधा दबाव पुरुषों को एक अत्यंत तीव्र, अद्वितीय और लिंग की उत्तेजना से सर्वथा भिन्न चरमसुख (Prostate Orgasm) प्रदान करता है. यानी पुरुषों के लिए गुदा मार्ग जैविक रूप से एक प्रत्यक्ष आनंद केंद्र (Direct Pleasure Center) के रूप में कार्य करता है.

इसके विपरीत, महिलाओं के शरीर में इस स्थान पर प्रोस्टेट जैसी कोई स्वतंत्र आनंद-ग्रंथि नहीं होती है. महिलाओं में गुदा मार्ग की अगली दीवार के ठीक सामने योनि की पिछली दीवार (Posterior Wagina Wall) होती है. इसलिए, महिलाओं के लिए गुदा उत्तेजना का अर्थ केवल नसों का साझा नेटवर्क और क्लिटोरिस के आंतरिक हिस्सों पर पड़ने वाला परोक्ष दबाव ही है. सीधे शब्दों में कहें, तो पुरुषों के लिए जो क्रिया एक प्राथमिक और प्रत्यक्ष जैविक आनंद (Direct Biological Pleasure) का स्रोत है, महिलाओं के लिए केवल एक द्वितीयक और अप्रत्यक्ष (Indirect) संवेदी अनुभव है. यह संरचनात्मक अंतर ही इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि महिलाओं के लिए यह क्रिया कभी भी प्राकृतिक या प्राथमिक आनंद का मुख्य स्रोत नहीं हो सकती है. यूं कहिये कि संरचनात्मक दृष्टि से भी महिलाओं को योनि से अधिक गुदा मैथुन में आनंद मिलने का दावा खारिज़ हो जाता है.

5.आधुनिक वैज्ञानिक शोध और वैश्विक सर्वेक्षण के आंकड़े (Modern Scientific Research and Global Survey Data)

जब हम व्यक्तिगत धारणाओं और इंटरनेट के मिथकों से परे हटकर शुद्ध डाटा और क्लिनिकल रिसर्च की ओर देखते हैं, तो इस विषय पर पूरी तस्वीर साफ़ हो जाती है. महिलाओं के यौन आनंद (Female Sexual Pleasure) और प्राथमिकताओं को समझने के लिए आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा, प्रामाणिक और ऐतिहासिक वैज्ञानिक अध्ययन वर्ष 2022 में प्रसिद्ध वैज्ञानिक जर्नल PLOS ONE में प्रकाशित हुआ था. यह शोध इंडियाना यूनिवर्सिटी (Indiana University) के सेंटर फॉर सेक्सुअल हेल्थ प्रमोशन के शोधकर्ताओं द्वारा 18 से 93 वर्ष की 3,017 महिलाओं के व्यापक, राष्ट्रीय स्तर के गुणात्मक और मात्रात्मक सर्वेक्षण पर आधारित था, जिसे ‘OMGYES Pleasure Report’ के नाम से जाना जाता है.

इस ऐतिहासिक शोध के आंकड़े इंटरनेट पर चल रहे विकिपीडिया (Wikipedia) जैसे दावों की पोल पूरी तरह खोल देते हैं. शोध के मुख्य निष्कर्ष निम्नलिखित वैज्ञानिक सत्य को उजागर करते हैं:

(1) आनंद की तीव्रता की पुष्टि: अध्ययन में शामिल महिलाओं में लगभग 30% से 40% महिलाओं ने यह स्वीकार किया कि उनके यौन जीवन में गुदा क्षेत्र की उत्तेजना (चाहे वह बाहरी हो या आंतरिक) उनके चरमसुख की तीव्रता (Orgasm Intensity) को बढ़ाने में सहायक सिद्ध होती है.

(2) भावनात्मक संतुष्टि का स्तर: लगभग 18% महिलाओं ने माना कि यह क्रिया उन्हें अपने साथी के साथ अत्यंत गहरा और आत्मिक जुड़ाव (Profound Intimacy) महसूस कराती है.

(3) भ्रम का पूर्ण खंडन (The Ultimate Myth-Bust): परंतु, सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा यह सामने आया कि 70% से 80% से भी अधिक महिलाओं ने स्पष्ट रूप से यह प्रमाणित किया कि उन्हें चरमसुख (Orgasm) प्राप्त करने के लिए अनिवार्य रूप से भगशेफ उत्तेजना (Clitoral Stimulation) और पारंपरिक योनि मैथुन की ही आवश्यकता होती है.

इस शोध ने चिकित्सा जगत में यह अंतिम रूप से स्थापित कर दिया कि बहुसंख्यक महिलाओं (Majority of Women) के लिए आनंद, संतुष्टि और चरमसुख का स्वाभाविक, सहज और और प्राथमिक केंद्र केवल और केवल योनि और भगशेफ (Vagina and Clitoris) ही हैं. आधुनिक विज्ञान इस सनसनीखेज इस दावे को पूरी तरह ख़ारिज और असत्य घोषित करता है कि महिलाओं को योनि से अधिक गुदा मैथुन में आनंद आता है. विज्ञान के अनुसार यह अनुभव कुछ महिलाओं की अत्यंत व्यक्तिगत प्राथमिकता (Individual Preference) या एक विशिष्ट रूचि (Niche Preference) हो सकता है, लेकिन इसे किसी भी स्थिति में स्त्री जाति का सामान्य नियम या सार्वभौमिक सत्य नहीं माना जा सकता है.

6.वैज्ञानिक वर्गीकरण- महिलाओं के अनुभव के तीन स्तर (Scientific Classification- The Three Levels of Anal Pleasure)

आधुनिक यौन विज्ञान (Sexology) की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसने मानवीय अनुभूतियों को केवल सतही तौर पर नहीं देखा है, बल्कि उनके पीछे की बारीकियों का सूक्ष्म वर्गीकरण किया है. जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है कि इंडियाना यूनिवर्सिटी द्वारा ‘PLOS ONE’ जर्नल में प्रकशित शोध ने यह स्पष्ट किया कि महिलाओं द्वारा गुदा क्षेत्र से प्राप्त किया जाने वाला आनंद किसी एक निश्चित क्रिया तक सीमित नहीं है. विज्ञान ने महिलाओं के इस संवेदी अनुभव को तीन विशिष्ट स्तरों (Three Levels of Pleasure) में विभाजित किया है, जो समाज में फैले इस भ्रम को तोड़ता है कि गुदा मैथुन का अर्थ केवल अत्यधिक गहरा प्रवेश ही है:

(1) बाहरी स्पर्श या एनल सर्फेसिंग (Anal Surfacing): इस स्तर पर मलाशय के भीतर किसी प्रकार का प्रवेश नहीं किया जाता है. इसके अंतर्गत, केवल गुदा मार्ग के बाहरी हिस्से, स्फिंक्टर की संवेदनशील त्वचा और उसके आसपास के पेल्विक क्षेत्र को उंगलियों या अन्य माध्यमों से हल्के ढ़ंग से छुआ और सहलाया जाता है. शोध के अनुसार, लगभग 40% महिलाओं ने माना कि इस बाहरी तंत्रिका जाल (External Nerve Network) की हल्की उत्तेजना ही उन्हें तीव्र संवेदी सुख देने के लिए पर्याप्त होती है.

(2) अल्प प्रवेश या एनल शैलोइंग (Anal Shallowing): इस वैज्ञानिक तकनीक के तहत, प्रवेश को अत्यंत सीमित रखा जाता है. इसमें केवल उंगली के अग्रभाग (Pore) जितनी न्यूनतम गहराई तक ही प्रवेश किया जाता है, जहाँ गुदा मार्ग की शुरुआती आंतरिक नसें स्थित होती हैं. सर्वे में शामिल 35% महिलाओं ने इस विधि को अत्यधिक सुखद और सुरक्षित बताया, क्योंकि इसमें आंतरिक उत्तकों को नुकसान पहुँचने या दर्द होने की संभावना न के बराबर होती है.

(3) संयुक उत्तेजना या एनल पेयरिंग (Anal Pairing): यह महिलाओं के लिए चरमसुख प्राप्त करने का सबसे प्रभावी वैज्ञानिक तरीक़ा माना गया है. इसके अंतर्गत गुदा क्षेत्र की हल्की उत्तेजना (बाहरी या आंतरिक) के साथ-साथ महिलाओं के मुख्य आनंद केंद्र यानी भगशेफ (Clitoris) को प्रत्यक्ष रूप से उत्तेजित किया जाता है. 40% से अधिक महिलाओं ने पुष्टि की कि जब इन दोनों क्षेत्रों को एकसाथ सक्रिय किया जाता है, तो ‘क्रॉस ओवर सेंसेशन’ के कारण उनका आनंद दोगुना हो जाता है और वे आसानी से तीव्र चरमसुख (Orgasm) तक पहुंच पाती हैं.

यह वर्गीकरण सिद्ध करता है कि महिलाओं के आनंद का मार्ग आक्रामकता में नहीं, बल्कि तंत्रिकाओं की संवेदनशीलता को समझने में है.

7.चिकित्सा विज्ञान की चेतावनी- प्राकृतिक चिकनाई की कमी (Medical Warning: Lack of Natural Lubrication)

मानव शरीर की जैव रासायनिक (Biochemical) और उत्तकीय (Tissue) संरचना का यदि सूक्ष्मता से अध्ययन किया जाये, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रकृति ने शरीर के प्रत्येक मार्ग को एक विशिष्ट उद्देश्य के लिए निर्मित किया है. योनि (Vagina) और मलाशय या गुदा (Rectum/Anus) के उत्तकों के बीच का सबसे बड़ा और बुनियादी अंतर ‘स्व-संरक्षण’ (Self-protection) की क्षमता में निहित है. चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, यह अंतर ही निर्धारित करता है कि कौन-सी क्रिया शरीर के लिए सहज है और कौन-सी कष्टप्रद या अत्यधिक कष्टप्रद हो सकती है.

स्त्री की योनि की आंतरिक दीवारें एक विशेष प्रकार की श्लेष्मा झिल्ली या म्यूकस मेम्ब्रेन (Mucous Membrane) से ढँकी होती हैं. जब महिला मानसिक और शारीरिक रूप से यौन उत्तेजना का अनुभव करती है, तो तो पेल्विक हिस्से (पेडू या बस्ति प्रदेश) में रक्त का प्रवाह अत्यधिक बढ़ जाता है. इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप, योनि के भीतर स्थित बथोलिन ग्रंथियां (Bartholin’s Glands) सक्रिय हो जाती हैं और एक प्राकृतिक चिकनाई या द्रव का स्राव करती हैं, जिसे चिकित्सा की भाषा में स्वयं-स्नेहन या सेल्फ लुब्रिकेशन (Self-Lubrication) कहा जाता है. यह प्राकृतिक द्रव संभोग के दौरान होने वाले घर्षण (Friction) को पूरी तरह समाप्त कर देता है, जिससे आंतरिक उत्तक सुरक्षित रहते हैं और आनंद का मार्ग प्रशस्त होता है.

इसके सर्वथा विपरीत, गुदा और मलाशय मार्ग की आंतरिक संरचना मुख्य रूप से शरीर के अपशिष्ट पदार्थों (Stool) को बाहर निकालने के लिए निर्मित की गई है. इस मार्ग के आंतरिक उत्तकों में उत्तेजना के समय किसी भी प्रकार प्राकृतिक द्रव या चिकनाई बनाने वाली कोई ग्रंथि मौजूद नहीं होती है. इसका सीधा अर्थ यह है कि इस मार्ग में प्राकृतिक रूप से ‘शून्य चिकनाई’ होती है.

यदि पूरी मानसिक तैयारी और कृत्रिम लुब्रिकेंट (Water-based or Silicone-based Lube) के अत्यधिक उपयोग के बिना इस मार्ग में प्रवेश का प्रयास किया जाये, तो घर्षण के कारण मलाशय की बेहद नाजुक आंतरिक दीवारें आपस में रगड़ खाने लगती हैं. ऐसी स्थित में, यह क्रिया किसी भी प्रकार का आनंद देने के बजाय महिलाओं के लिए असहनीय, तीव्र और भयानक दर्द (Excruciating Pain) का कारण बन जाती है. इसलिए चिकित्सा विज्ञान यह स्पष्ट चेतावनी देता है कि बिना कृत्रिम चिकनाई के इस क्रिया को करने का प्रयास करना मानव शरीर की प्राकृतिक व्यवस्था के साथ एक गंभीर और दर्दनाक खिलवाड़ है.

8.गंभीर स्वास्थ्य जोखिम और सुरक्षा उपाय (Severe Health Risks and Safety Measures)

एक जिम्मेदार लेखक और वैज्ञानिक समाज के नाते, इस विषय के केवल संवेदी पक्ष को देखना पर्याप्त नहीं है; इसके साथ जुड़े गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों (Health Hazards) पर खुलकर और प्रामाणिक रूप से बात करना अनिवार्य है. चिकित्सा जगत इस तथ्य को पूरी तरह स्वीकार करता है कि मानव शरीर के सभी यौन व्यवहारों में से गुदा मैथुन जैविक रूप से सबसे अधिक जोखिम भरा (Highest-risk Sexual Activity) माना जाता है. इसके पीछे मुख्य चिकित्सकीय कारण और सुरक्षा उपाय निम्नलिखित हैं:

(1) सूक्ष्म घाव (Micro-Tears) और उत्तकीय क्षति

मलाशय की आंतरिक त्वचा (Rectal Lining) योनि की त्वचा की तुलना में अत्यंत पतली और नाजुक होती है. यौन क्रिया के दौरान होने वाले घर्षण और खिंचाव के कारण इस आंतरिक परत में बहुत आसानी से बारीक़ कट या घाव हो जाते हैं, जिन्हें चिकित्सा विज्ञान में ‘माइक्रो-टियर्स (Micro-Tears) कहा जाता है. कई बार ये घाव इतने सूक्ष्म होते हैं कि बाहर से दिखाई नहीं देते हैं, परंतु इनसे आंतरिक स्राव (Internal Bleeding) शुरू हो जाता है.

(2) संक्रमण का उच्चतम जोखिम (Highest Risk of STIs & HIV)

यूएस सेंटर फोर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) के अधिकारिक आंकड़ों और शोधों के अनुसार, असुरक्षित गुदा मैथुन के माध्यम से एचआईवी (HIV) और अन्य यौन संचारित संक्रमणों (SITs), जैसे सिफलिस, गोनोरिया और क्लेमिडिया के फैलने का ख़तरा योनि मैथुन की तुलना में कई गुना अधिक होता है. इसके पीछे का कारण यह है कि मलाशय की पतली त्वचा में हुए ‘माइक्रो टियर्स’ के माध्यम से वायरस और बैक्टीरिया सीधे शरीर के रक्तप्रवाह (Bloodstream) में प्रवेश कर जाते हैं. इसके अतिरिक्त, मलाशय प्राकृतिक रूप से बैक्टीरिया (जैसे E. coli) का घर होता है, जिससे संक्रमण का ख़तरा दोनों ही पार्टनर के लिए समान रूप से बढ़ जाता है.

(3) स्फिंक्टर मांसपेशियों को नुकसान (Damage to Anal Sphincter)

गुदा के मार्ग को नियंत्रित करने वाली मांसपेशियों के छल्ले को स्फिंक्टर (Anal Sphincter) कहा जाता है. प्लांड पेरेंटहुड (Planned Parenthood) की चिकित्सा गाइडलाइन के अनुसार, यदि बिना पर्याप्त तैयारी, बिना लुब्रिकेंट या अत्यधिक आक्रामक तरीक़े से इस मार्ग में बार-बार प्रवेश किया जाये, तो ये मांसपेशियां खिंचकर ढीली या क्षतिग्रस्त हो सकती हैं. दीर्घकाल में इसके कारण मल नियंत्रण खोने (Fecal Incontinence) जैसी गंभीर शारीरिक समस्या उत्पन्न हो सकती है.

अनिवार्य सुरक्षा और बचाव के चिकित्सकीय नियम (Essential Safety Protocols)

यदि कोई जोड़ा अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकता और पूर्ण सहमति से इस मार्ग को चुनता है, तो चिकित्सा विज्ञान निम्नलिखित कड़े सुरक्षा नियमों का पालन करने की अनिवार्य सलाह देता है:

(1) कंडोम का अनिवार्य प्रयोग: संक्रमण और एचआईवी के ख़तरे को शून्य करने के लिए प्रत्येक प्रयास में (हर बार) उच्च गुणवत्ता वाले लैटेक्स या पॉलीयूरेथेन कंडोम का उपयोग अत्यंत अवस्श्यक है.

(2) अत्यधिक और सही लुब्रिकेंट: केवल और केवल जल-आधारित (Water-based) या सिलिकॉन-आधारित (Silicone-based) लुब्रिकेंट (स्नेहक) प्रचुर मात्रा में उपयोग करें. थूक (Saliva) या तेल (Oil-based products) का उपयोग कभी न करें, क्योंकि ये कंडोम को फाड़ सकते हैं और संक्रमण बढ़ा सकते हैं.

(3) उत्साही और मानसिक सहमति (Enthusiastic Consent): इस क्रिया में जबरदस्ती या साथी पर दबाव बनाना शारीरिक और मानसिक आघात (Trauma) का कारण बनता है. यदि महिला को थोड़ा भी दर्द या असहजता महसूस हो, तो क्रिया को तुरंत रोक देना चाहिए.

(4) स्वच्छता (Hygiene): गुदा क्रिया या मैथुन के बाद इस्तेमाल किये गए कंडोम, या उंगली को बिना अच्छी तरह धोये सीधे योनि या मुंह के संपर्क में कभी भी नहीं लाना चाहिए, अन्यथा मलाशय के खतरनाक बैक्टीरिया योनि में पहुंचकर गंभीर यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI) पैदा कर देते हैं. इसी प्रकार, मुंह के अंदर जाने से पाचन-तंत्र प्रभावित होता है.

(9)मनोवैज्ञानिक पहलू और आपसी सहमति (Psychological Aspect and Enthusiastic Consent)

चिकित्सा विज्ञान और मनोविज्ञान (Psychology) इस तथ्य पर पूरी तरह सहमत हैं कि मानव शरीर में सबसे बड़ा और मुख्य यौन अंग त्वचा या जननांग नहीं, बल्कि मानव मस्तिष्क (Human Brain) है. जब तक मस्तिष्क किसी क्रिया के लिए पूरी तरह तैयार, तनावमुक्त और सहज नहीं होता है, तब तक शरीर की कोई भी तंत्रिका आनंद के संकेतों को ग्रहण नहीं कर सकती हैं. गुदा मैथुन जैसे संवेदनशील विषय में यह मनोवैज्ञानिक पहलू और भी अधिक निर्णायक हो जाता है.

वर्तमान समय में इंटरनेट और पोर्नोग्राफिक फिल्मों (Pornography) के अति-प्रसार ने समाज में एक अत्यंत विकृत मानसिकता को जन्म दिया है. इन अवास्तविक दृश्यों में गुदा मैथुन को एक अत्यंत सहज और अनिवार्य क्रिया के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जो वास्तविकता से कोसों दूर है. इस काल्पनिक विमर्श के प्रभाव में आकर कई पुरुष अपनी महिला साथियों पर इस क्रिया के लिए मानसिक दबाव बनाते हैं. चिकित्सा विज्ञान स्पष्ट करता है कि भय, संकोच, या अनिच्छा की स्थिति में पेल्विक फ्लोर (श्रोणी तल) की मांसपेशियां (Pelvic Muscles) अत्यधिक सिकुड़ जाती हैं. यदि इस स्थिति में जबरदस्ती प्रयास किया जाये, तो यह महिलाओं के लिए न केवल अत्यधिक कष्टप्रद होता है, बल्कि उनके मानस पटल पर एक गहरा मानसिक आघात (Trauma) छोड़ जाता है, जो उनके भविष्य के वैवाहिक और यौन जीवन को पूरी तरह नष्ट कर सकता है.

यौन स्वास्थ्य की वैश्विक संहिताओं के अनुसार, इस क्रिया की पहली और अनिवार्य शर्त है ‘उत्साही और निरंतर आपसी सहमति’ (Enthusiastic and Ongoing Consent). दोनों ही साथियों का मानसिक रूप से पूरी तरह तैयार होना, एक दूसरे पर गहरा विश्वास होना और संवाद (Communication) की स्थिति का होना अनिवार्य है. यदि मैथुन क्रिया के दौरान महिला को थोड़ा भी दर्द या असहजता महसूस हो, तो पुरुष साथी का यह नैतिक और शारीरिक कर्तव्य है कि वह क्रिया को तुरंत रोक दे. यौन आनंद कभी भी किसी एक साथी की संतुष्टि के लिए दूसरे को पीड़ा देने का माध्यम नहीं हो सकता है.

निष्कर्ष (Conclusion)

प्राचीन भारतीय कामशास्त्रों के पारंपरिक विचारों से लेकर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के सूक्ष्म प्रयोगशाला अध्ययनों तक का गहन विश्लेषण करने के पश्चात्, इंटरनेट पर विकिपीडिआ (Wikipedia) और अन्य डिजिटल पृष्ठों पर तैरता हुआ यह दावा कि ‘महिलाओं को योनि से अधिक गुदा मैथुन में आनंद आता है’ वैज्ञानिक, शारीरिक और ऐतिहासिक रूप से पूरी तरह असत्य, अतार्किक और भ्रामक सिद्ध होता है.

मानव शरीर विज्ञान ने यह अकाट्य रूप से प्रमाणित किया है कि प्रकृति ने स्त्री शरीर की रचना इस प्रकार की है कि उसके आनंद, संतुष्टि और वंश-वृद्धि का स्वाभाविक और प्राथमिक केंद्र केवल योनि मार्ग (Vaginal Canal) और भगशेफ (Clitoris) ही हैं. गुदा मार्ग में प्राकृतिक चिकनाई की अनुपस्थिति और वहाँ प्रोस्टेट जैसी किसी स्वतंत्र आनंद-ग्रंथि का न होना यह साफ़ करता है कि यह मार्ग जैविक रूप से मुख्य संभोग के लिए निर्मित नहीं है.

प्राचीन काल में महर्षि वात्सयायन ने भी कामसूत्र में इन वैकल्पिक क्रियाओं को केवल मानवीय इच्छाओं की एक विशिष्ट विविधता के रूप में दर्ज किया था, न कि मुख्य संभोग के विकल्प या उससे श्रेष्ठ रूप में. आधुनिक विज्ञान भी यही कहता है कि यह क्रिया कुछ जोड़ों की अत्यंत व्यक्तिगत अभिरुचि या प्राथमिकता (Personal Preference) हो सकती है, लेकिन इसे पूरी स्त्री जाति का पैमाना नहीं बनाया जा सकता है.

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    रामाशंकर पांडेय

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