न्यायपालिका में भ्रष्टाचार: उम्मीद का आख़िरी दरवाजा भी दीमकों की चपेट में! जानें समस्या और समाधान
न्यायपालिका में भ्रष्टाचार (Corruption in the Judiciary) की जड़ और उसके विभिन्न आयामों- कॉलेजियम के भाई-भतीजावाद से लेकर 'लॉर्डशिप' पर मंडराते घूसखोरी के साये और तारीख पर तारीख के दुश्चक्र तक- जानिए भारतीय अदालतें किस प्रकार आम आदमी के लिए एक भंवर बनती जा रही हैं? आलोचना के प्रति व्यवस्था की असहिष्णुता के बीच, न्याय की आख़िरी उम्मीदों के दरवाजे को 'भ्रष्टाचारी रूपी दीमकों' से बचाने और न्यायपालिका की शुचिता को बनाये रखने का व्यावहारिक मार्ग दिखाता आलेख...

लोकतंत्र की विशाल और भव्य इमारत में जब विधायिका (संसद) दलगत राजनीति का अखाड़ा बन जाये और कार्यपालिका (पुलिस-प्रशासन) रसूखदारों के इशारों पर चलने लगे, तब देश का आम और लाचार नागरिक जिस अंतिम उम्मीद के साथ आगे बढ़ता है, वह देश की अदालतें हैं. न्यायपालिका को लोकतंत्र का वह सबसे पवित्र और अभेद्य स्तंभ माना गया है जिसके सामने इंसाफ़ का तराजू सबके लिए बराबर होना चाहिए. लेकिन आज का सबसे कड़वा, कटु और व्यावहारिक सच यह है कि उम्मीद का यह आख़िरी दरवाजा भी कुछ भ्रष्टाचारी रूपी दीमकों की चपेट में आ चुका है. इनके चलते न्याय के इन पवित्र स्थलों पर आज बेईमानी का साया इस कदर गहरा चुका है कि आम आदमी अब इनकी सीढियाँ चढ़ने से पहले कई बार ठिठक जाता है. वह सोचता है कि पुलिस की लाठी और गुंडों की धमकी तो किसी तरह सह ली जा सकती है, लेकिन अदालतों के चक्रव्यूह में एक बार फंस गया तो उसकी ज़िंदगी और जमा-पूंजी, दोनों धीरे-धीरे ख़त्म हो सकती है. जान तो कोर्ट परिसर और पुलिस के सुरक्षा घेरे में भी ख़तरे में है.

यह कोई हवा-हवाई बात, कोरी कल्पना या महज भावुक विचार नहीं, बल्कि देश की संसद के पटल पर रखे गए सरकारी आंकड़े इस कड़वी हक़ीक़त की गवाही दे रहे हैं. लोकसभा में पेश किये गए आधिकारिक प्रशासनिक डाटा के मुताबिक़ पिछले 10 वर्षों (2016-2025) में देश की विभिन्न अदालतों और न्यायपालिका के ख़िलाफ़ 8,600 से अधिक लिखित शिकायतें मिली हैं. भ्रष्टाचार का यह ग्राफ़ साल-दर-साल कितनी तेजी से बढ़ रहा है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि केवल वर्ष 2024 में 1,170 और वर्ष 2025 में 1,102 शिकायतें सीधे संसद के रिकॉर्ड पर दर्ज की गई हैं.
जजों के ख़िलाफ़ दर्ज लिखित शिकायतों का वर्षवार विवरण (2016-2025) इस प्रकार है:
| वर्ष | शिकायतों की संख्या |
| 2016 | 729 |
| 2017 | 682 |
| 2018 | 717 |
| 2019 | 1,037 |
| 2020 | 518 |
| 2021 | 686 |
| 2022 | 1,012 |
| 2023 | 977 |
| 2024 | 1,170 |
| 2025 | 1,102 |
| कुल (2016-2025) | 8,630 |
इसके सामानांतर, इंडिया टुडे (India Today) के ‘मूड ऑफ़ द नेशन’ सर्वे की रिपोर्ट बताती है कि देश के क़रीब 85% लोग यह खुलकर मानते हैं कि हमारी न्याय व्यवस्था में भ्रष्टाचार व्याप्त है, जबकि महज 8% लोग ही इसे पारदर्शी और भ्रष्टाचार-मुक्त बताते हैं.
इसे एक रिपोर्ट कहिये या भारतीय न्यायिक व्यवस्था की शुचिता के समक्ष चुनौती, जो अचानक खड़ी नहीं हुई. मगर इसके सामने सबसे बड़ी चुनौती मार्च, 2025 में उत्पन्न हुई. दिल्ली हाईकोर्ट के तत्कालीन जज (Sitting Judge) जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास पर लगी अचानक आग के बाद मलबे से जांच एजेंसियों को मिले जले हुए और अधजले नोटों के ढेर ने इस पूरी व्यवस्था की संस्थागत गरिमा को गहरे संकट में डाल दिया. यह गंभीर प्रकरण प्रमाणित करता है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार अब महज कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहा; बल्कि यह एक व्यस्थागत चुनौती का रूप ले चुका है, जो भीतर ही भीतर लोकतांत्रिक मूल्यों की सुदृढ़ रीढ़ को प्रभावित कर रहा है. यह विश्लेषण किसी भी रूप में इस सर्वोच्च संस्था की गरिमा को कम करने के उद्देश्य से नहीं है, बल्कि यह इस व्यावहारिक सत्य की ओर ध्यान आकर्षित करने का एक प्रयास है कि यदि समय रहते कड़े सुधारात्मक क़दम नहीं उठाये गए, तो न्याय का यह पावन स्थल जनमानस की नज़रों में कुछ ‘बेईमानों के जमघट’ जैसी छवि में तब्दील होने की कगार पर पहुँच जायेगा.
संसद की फाइलों में दबी 8,600 शिकायतें और हाईकोर्ट के जजों के बंगलों से निकलते नोटों के बंडल तो महज वे हाई-प्रोफाइल सच हैं, जो रसूखदारों की आपसी जंग या जांच एजेंसियों की मुस्तैदी के कारण अख़बारों की सुर्खियां बन जाते हैं. लेकिन इस व्यवस्थागत समस्या का सबसे वीभत्स, रोजमर्रा का और व्यावहारिक रूप कहीं और नहीं, बल्कि हर सुबह देश की निचली अदालतों (Subordinate Courts) के संकरे, बदबूदार और भीड़भाड़ वाले गलियारों में देखने को मिलता है. यही वह जगह है जहाँ देश के ग़रीब, किसान, मजदूर और मध्यमवर्गीय नागरिक सबसे पहले न्याय की आस में, अपनी बेबसी के आँसू लिए क़दम रखता है. यहाँ उनका सामना किसी ‘न्याय के देवता’ या प्रवित्र न्याय प्रणाली से नहीं, बल्कि ‘तारीख पर तारीख’ के एक ऐसे अंतहीन, खर्चीले और क्रूर चक्रव्यूह से होता है, जहां इंसाफ़ बिकाऊ माल की तरह नज़र आता है. इस ज़मीनी धरातल पर निचली अदालतों के जज किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लोकसेवक नहीं, बल्कि अपनी मर्जी के मालिक, निरंकुश और तानाशाह की तरह व्यवहार करते हैं.
आइये, सबसे पहले इसी ज़मीनी स्तर के उस चक्रव्यूह को गहराई से समझते हैं, जहाँ मुवक्किल को कोर्ट की चौखट लांघते ही पहली पेशी में ही यह अहसास हो जाता है कि इंसाफ़ की चाह में उसे लेने के देने पड़ चुके हैं.
1.निचली अदालतों में अपनी ‘मर्जी के मालिक’ और तारीखों का अंतहीन दुश्चक्र
न्याय की जिस प्राथमिक या पहली चौखट पर देश का आम नागरिक सबसे पहले क़दम रखता है, वहीं उसे सबसे तीखा, वीभत्स और व्यावहारिक मानसिक उत्पीड़न झेलना पड़ता है. जिला एवं सत्र न्यायालय (Subordinate Courts) सैद्धांतिक रूप से आम आदमी के अधिकारों की रक्षा के लिए बने हैं, लेकिन व्यवहार में यहां जवाबदेही नाम की कोई चीज़ नहीं बची है. महीनों पहले मिली एक तारीख को जब कोई मुवक्किल अपने काम से छुट्टी लेकर या अपनी दिहाड़ी छोड़कर, पेट काटकर या क़र्ज़ लेकर कोर्ट परिसर में दाख़िल होता है, तो उसे पता चलता है कि ‘जज साहब आज छुट्टी पर हैं’ या ‘आज साहब किसी प्रशासनिक बैठक में व्यस्त हैं, इसलिए सीट पर बैठेंगे ही नहीं.’
कई बार तो इस मानसिक प्रताड़ना का स्तर यह होता है कि दूर-दराज के गांवों से बस या ट्रेन का किराया लगाकर आ रहे मुवक्किल को आधे रास्ते में ही वकील का एक रूखा-सा फोन या मैसेज आ जाता है- ‘आज आने की ज़रूरत नहीं, साहब छुट्टी पर हैं, अगली तारीख पड़ गई है.’ यह ‘तारीख पर तारीख’ का अंतहीन सिलसिला वादी को इस क़दर आर्थिक और मानसिक रूप से तोड़ देता है कि वह कोर्ट के चक्कर काटते-काटते सोचने पर मजबूर हो जाता है कि आखिर वह किस अनंत भंवर में आकर फंस गया है?
न्याय पाने की इस अंधी दौड़ में उसे लेने के देने पड़ जाते हैं. कईयों की तो उम्र गुजर जाती है या फिर फैसला आते-आते वे दुनिया से विदा हो जाते हैं. कुछ मामलों में फैसले उनकी संतानें सुनती हैं. भारतीय ग्रामीण समाज में यह प्रचलित कहावत- ‘दादा बरते, पोता भुगते’- आज भी देश की निचली अदालतों के तौर-तरीक़े को सौ फ़ीसदी सच साबित करती है.
मामला अगर दीवानी (Civil Case) हो, तो यह मान लिया जाता है कि फैसला आते-आते 20-25 साल तो लग ही जायेंगे. लेकिन हक़ीक़त यह है कि फौजदारी मामला (Criminal Case) भी जल्दी नहीं निपटता है; इसमें भी, कंप्लेंट केस और पुलिस केस समान गति और प्रक्रिया से ही चलते हैं.
विदित हो कि आपराधिक मामलों में शिकायतकर्ता द्वारा दर्ज कराया गया कंप्लेंट केस भी आगे चलकर ‘पुलिस केस’ की तरह ही जटिल प्रक्रिया से गुजरता है. कानूनी प्रक्रियाओं की दुश्वारियां और अदालती रवैया ऐसा है कि एक निजी व योग्य वकील तथा पर्याप्त वित्तीय संसाधनों के बिना मुक़दमे को तार्किक निर्णय तक पहुँचाना लगभग असंभव है.
हालाँकि कानून में मुफ़्त कानूनी सहायता (Free Legal Aid) का प्रावधान है, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर लीगल एड डिफेंस काउंसिल (LADC) के वकीलों की निष्पक्षता हमेशा संदेह के घेरे में रहती है; अक्सर उन पर विपक्षी दल के साथ मिलीभगत, मामले को लटकाने कमजोर करने के आरोप लगते हैं.
व्यावहारिक प्रमाण (दीप राय मामला): भारतीय न्यायिक व्यवस्था का सबसे असंवेदनशील और जीवंत उदाहरण बिहार के 85 वर्षीय बुजुर्ग दीप राय हैं. साल 1992 में हुए एक मामूली ज़मीन विवाद और आपसी मारपीट का फैसला अदालत ने 34 साल बाद यानी साल 2026 में सुनाया. जीवन के अंतिम पड़ाव पर खड़े इस 85 वर्षीय बुजुर्ग को अदालत ने 3 साल की सजा दी. जिस व्यक्ति ने अपनी पूरी जवानी और अपनी बची-खुची पूँजी सिर्फ अदालत की सीढियाँ चढ़ने और तारीखें भुगतने में गँवा दी हो, उसे 34 साल बाद सजा सुनाना न्याय की कुशलता नहीं, बल्कि इस पूरी न्यायिक व्यवस्था के दीमक चाट चुके चरित्र का सबसे बड़ा सबूत है.
इस तरह की न्यायिक सुस्ती और जजों की मनमर्जी के कारण आम जनता के मन में अदालतों के प्रति अब वह सम्मान नहीं रह गया है, जो कभी हुआ करता था. न्यायाधीश लोकतांत्रिक न्याय प्रणाली को लोकसेवा के बजाय विशेषाधिकार प्राप्त निजी व्यवस्था समझने की भूल कर बैठते हैं, जिससे इस पवित्र संस्था की गरिमा को स्वयं उनके ही रवैये से गहरी ठेस पहुँच रही है.
जज आजकल फैसलों से ज़्यादा टिप्पणियां करने लगे हैं. उनमें विषय से जुड़े तथ्य कम और मीडिया के लिए मसाला ज़्यादा होता है. इससे एक नया ही विवाद शुरू हो जाता है, और केस पीछे रह जाता है. न्यायधीशों की यह प्रचार-उन्मुख मानसिकता न केवल न्यायिक अनुशासन को तार-तार करती है, बल्कि अदालती कार्यवाही और त्वरित न्याय की प्रक्रिया को बाधित कर जनता के उस विश्वास को ख़त्म कर देती है जो उन्हें निष्पक्ष और न्याय की मूर्ति या प्रतीक मानता था.
2.सरकार बनाम अदालत- कॉर्पोरेट घूसखोरी और विकास कार्यों पर ‘स्टे’ का खेल
न्यायपालिका में में भ्रष्टाचार केवल आम नागरिकों के दीवानी या फौजदारी मुकदमों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका एक और बेहद खतरनाक और व्यापक रूप तब सामने आता है जब सरकार और अदालतों में अक्सर तलवारें खिंची रहती हैं. यह टकराव केवल संवैधानिक या वैचारिक वर्चस्व का नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरा प्रशासनिक, राजनीतिक और सबसे बढ़कर ‘कॉर्पोरेट वित्तीय भ्रष्टाचार’ छिपा हुआ है.
अदालतें अक्सर ‘न्यायिक सक्रियता’ (Judicial Activism) की आड़ लेकर सरकार के नीतिगत फैसलों और देश के बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में बेजा रोड़ा अटकाती हैं. इस कड़वे सच को किसी और ने नहीं, बल्कि ख़ुद देश के केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नीति गडकरी ने बेहद बेबाकी और तल्खी से सार्वजानिक मंच पर उजागर किया था. उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा था कि ”देश के आधे से ज़्यादा विकास कार्य और बुनियादी ढांचे से जुड़े प्रोजेक्ट सिर्फ इसलिए लंबित पड़े हैं क्योंकि अदालतों ने उनपर बिना किसी ठोस तकनीकी आधार के ‘स्टे’ (स्थगन आदेश) दे रखा है.” इस तरह के न्यायिक हस्तक्षेप के कारण राष्ट्रीय राजमार्गों और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में होने वाली भारी देरी और उससे होने वाले नुकसान को लेकर सरकार समय-समय पर संसद और सार्वजनकि मंचों पर अपनी चिंता जता चुकी है.
व्यावहारिक धरातल पर इस पूरे खेल के पीछे भ्रष्ट जजों और कॉर्पोरेट घरानों का एक बहुत बड़ा सिंडिकेट काम करता है, जिसे समझना बेहद ज़रूरी है.
(1) प्रतिद्वंद्विता और जजों की सांठगांठ: जब भी सरकार देशहित में कोई बड़ा हाइवे, एक्सप्रेसवे, पावर प्लांट या एयरपोर्ट का टेंडर निकालती है, तो दौड़ में पिछड़ चुकी प्रतिद्वंद्वी कॉर्पोरेट कंपनियां, ब्लैकलिस्टेड ठेकेदार या माफिया तत्व तुरंत कोर्ट का दरवाजा खटखटा देते हैं.
(2) घूस लेकर विकास को बाधित करना: आरोप के अनुसार कुछ भ्रष्ट जज इन बड़ी-बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों से मोटी रक़म (घूस) लेकर या उनके रसूख और लॉबिंग के प्रभाव में आकर बिना सोचे-समझे उन प्रोजेक्ट पर ‘स्टे आर्डर’ जारी कर देते हैं. जनहित याचिकाओं (PIL) का इस्तेमाल आज जनहित के लिए कम, बल्कि कॉर्पोरेट दुश्मनी भुनाने और जजों की जेबें भरने के लिए ज़्यादा होने लगा है.
(3) देश का भारी आर्थिक नुकसान: इसका नतीजा यह होता है कि हज़ारों करोड़ रुपये के राष्ट्रीय प्रोजेक्ट सालों-साल लटके रहते हैं. समय बीतने के साथ प्रोजेक्ट की निर्माण लागत (Project Cost) दोगुनी-तिगुनी हो जाती है, जिससे अंततः देश की जनता के टैक्स का पैसा पानी की तरह बह जाता है.
जजों (कुछ जजों) का यह रवैया दुर्भाग्यपूर्ण एवं काफ़ी चिंताजनक है, जहाँ व्यक्तिगत स्वार्थ के चक्कर में पूरे देश के आर्थिक विकास और प्रगति को रोक दिया जाता हैं. यह भी एक बड़ा कारण है कि आज सरकार और न्यायपालिका के बीच अक्सर तलवारें खिंची रहती हैं, क्योंकि कार्यपालिका जहां देश को आगे ले जाना चाहती है वहीं न्यायिक भ्रष्टाचार राह में रोड़ा बनकर विकास की गति को धीमा कर देता है.
3.कॉलेजियम व्यवस्था: लोकतंत्र के प्रांगण में ‘भाई-भतीजावाद’
निचली अदालतों की प्रशासनिक अराजकता और विकास कार्यों को रोकने वाले कॉर्पोरेट गठजोड़ (Corporate Nexus) की जड़ें कहीं न कहीं ऊपर बैठी उच्च न्यायपालिका की बंद कमरों वाली नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़ी हैं. भारतीय न्यायपालिका दुनिया की इकलौती ऐसी अनूठी व्यवस्था है, जहाँ जजों की नियुक्ति किसी स्वतंत्र और पारदर्शी संवैधानिक व्यवस्था या खुली प्रतियोगिता परीक्षा से नहीं होती है, बल्कि जज ही जजों को चुनते हैं. इस अपारदर्शी व्यवस्था को ‘कॉलेजियम प्रणाली’ (Collegium System) कहते हैं.
यह बंद कमरों में होने वाली नियुक्तियां सीधे तौर पर भाई-भतीजावाद और परिवारवाद को बढ़ावा देती हैं, जिससे आम और योग्य वकीलों का हक़ मारा जाता है. देश में यह कड़वी हक़ीक़त किसी से छिपी नहीं है कि कैसे कुछ चुनिंदा परिवारों की पीढियां ही हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की कुर्सियों पर काबिज रहती हैं.
(1) अंकल जजों का नेटवर्क: भारत के विधि आयोग (Law Commission) ने अपनी 230 वीं रिपोर्ट में इस चौंकाने वाले सच से पर्दा उठाया गया था. रिपोर्ट में साफ़ तौर पर आगाह किया गया था कि विभिन्न हाईकोर्ट में ‘अंकल जजों’ (Uncle Judges) का एक पूरा नेटवर्क सक्रिय है. होता यह है कि किसी रसूखदार सीटिंग या रिटायर्ड जज के बेटे, भतीजे, पोते या दामाद उसी अदालत में वकालत शुरू करते हैं. बार और बेंच (Bar and Bench) के इसी आपसी आतंरिक गठजोड़ के कारण उन्हें रातोंरात बड़े कॉर्पोरेट या मलाईदार केस सौंप दिए जाते हैं. बाद में, जब जजों की नियुक्ति की बारी आती है, तो कॉलेजियम की बंद कमरों वाली सिफारिश के ज़रिए उन्हीं ‘अपनों’ (वंशज वकीलों) को जज की कुर्सी पर बैठा दिया जाता है. बिना किसी गॉडफादर के दिन-रात मेहनत करने वाले ज़मीनी और क़ाबिल वकीलों की योग्यता इस बंद कमरे की भाई-भतीजावादी या पारिवारिक विरासत (Feudal Mindset) वाली व्यवस्था की भेंट चढ़ जाती है.
(2) संविधान और संसद की उपेक्षा: जब देश की संसद ने साल 2014 में देश की 125 करोड़ जनता की भावना का आदर करते हुए, दलगत राजनीति से ऊपर उठते हुए लगभग सर्वसम्मति से राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) कानून पास किया था, तो सुप्रीम कोर्ट ने साल 2015 में इसे असंवैधानिक बताकर सिरे से खारिज़ कर दिया. कोर्ट (Apex Court) ने यह दलील दी कि इससे उसकी स्वतंत्रता ख़तरे में पड़ जाएगी. लेकिन व्यावहारिक धरातल पर कड़वा सच यही है कि स्वायत्तता की इस आड़ में न्यायपालिका अपनी जवाबदेही, अपारदर्शिता और भाई-भतीजावाद के इस किले को बचाये रखना चाहती थी.
जब तक जजों को नियुक्त करने का पैमाना योग्यता और निष्पक्षता न होकर ‘पारिवारिक रसूख और आपसी संबंध’ बना रहेगा, तब तक न्याय के मंदिर में आम नागरिक को न्याय मिलना असंभव है. यह व्यवस्था ‘बेईमानों के जमघट’ को संरक्षण देने वाली प्रतीत होती है.
4.’लॉर्डशिप’ पर घूसखोरी का साया- नोटों के ढेर और दागदार दामन
न्यायपालिका अक्सर जनता के बीच यह धारणा बनाकर ख़ुद को पाक-साफ़ बताने की कोशिश करती है कि भ्रष्टाचार केवल निचली अदालतों में निचले स्तर के बाबुओं या मुंशियों तक सीमित है और उच्च न्यायपालिका पूरी तरह दूध की धुली है. लेकिन हालिया सनसनीखेज घटनाओं और न्यायिक इतिहास के काले पन्नों ने इस दावे को पूरी तरह चुनौती दे दी है. आरोप है कि बेईमानी का साया अब हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आलीशान, वातानुकूलित इमारतों तक भी पहुंच चुका है, जहाँ बंद कमरों के भीतर हितों के टकराव और निष्पक्षता को प्रभावित करने के प्रयासों के गंभीर आरोप लग रहे हैं.
जस्टिस यशवंत वर्मा मामला (मार्च 2025): इस व्यवस्थागत समस्या का सबसे ताजा और सनसनीखेज मामला मार्च 2025 में सामने आया. दिल्ली हाईकोर्ट के तत्कालीन जज (Sitting Judge) यशवंत वर्मा के सरकारी आवास पर लगी आग ने न्यायपालिका के भीतर छिपी उन चुनौतियों को उजागर कर दिया जिसन पर अक्सर पर्दा डाला जाता रहा है. आग बुझाने पहुंचे दमकल कर्मियों और जांच एजंसियों को मलबे से जले हुए और अधजले नोटों के जो विशाल ढेर मिले, उसने न्यायपालिका की साख के सामने एक अभूतपूर्व संकट खड़ा कर दिया. एक सिटिंग जज के घर में नोटों का यह अंबार इन गंभीर आशंकाओं को जन्म देता है कि न्याय के ऊँचे शिखर पर भ्रष्टाचार के आरोप अब महज अपवाद नहीं रहे, बल्कि एक गहरी संस्थागत बीमारी का रूप ले चुके हैं.
उच्च न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के आरोपों का सामने आना कोई पहली घटना नहीं है. यदि हम इतिहास के पन्नों को पलटें, तो ऐसे कई मामले दर्ज हैं जहाँ न्याय के सर्वोच्च पर पर बैठे व्यक्तियों के दामन पर घूसखोरी के गहरे दाग पाए गए हैं.
मेडिकल कॉलेज रिश्वत घोटाला (जस्टिस आई. एम. कुद्दुसी): ओडिशा हाईकोर्ट के पूर्व जज आई. एम. कुद्दुसी को सीबीआई (CBI) ने भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में गिरफ्तार किया था. उन पर आरोप था कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में लंबित एक प्रतिबंधित मेडिकल कॉलेज के मामले को रफा-दफा करने और फैसला पक्ष में कराने के लिए करोड़ों रुपये की रिश्वत की डील की थी और बिचौलिए की भूमिका निभाई थी.
जस्टिस शमित मुखर्जी मामला (दिल्ली): दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज शमित मुखर्जी को सीबीआई ने दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) के बड़े ज़मीन घोटाले के मुख्य आरोपियों के साथ सांठगांठ करने के आरोप में गिरफ्तार लिया था. जांच और बयानों में यह सनसनीखेज सच सामने आया कि जज साहब दलालों के माध्यम से रिश्वत लेकर अपराधियों के मनमाफ़िक फैसले अपने घर पर बैठकर टाइप करवाते थे.
जस्टिस सी. एस. कर्नन मामला (कोलकाता): कोलकाता हाईकोर्ट के सीटिंग जज रहे सी. एस. कर्नन का मामला तो न्यायिक इतिहास का एक अभूतपूर्व और अत्यंत विवादित घटनाक्रम है. उन्होंने सुप्रीम कोएर के मुख्य न्यायाधीश समेत कई जजों पर खुलेआम भ्रष्टाचार और जातिगत भेदभाव के आरोप लगाये थे. अंततः सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अदालत की अवमानना का दोषी मानते हुए 6 महीने की जेल की सजा सुनाई थी. वे जेल जाने वाले देश के पहले सिटिंग जज थे.
ये सारे हाई-प्रोफाइल मामले इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि उच्च न्यायपालिका का पुराना औपनिवेशिक सिद्धांत- ‘King can do no Wrong’ (राजा कभी ग़लत नहीं हो सकता है) अब पूरी तरह अप्रासंगिक और ध्वस्त हो चुका है. जब न्यायपालिका में शीर्ष पदों पर बैठे लोगों पर ही गंभीर आरोप लगें, और सही साबित होने लगें, तो देश का आम नागरिक इंसाफ़ की उम्मीद लेकर आखिर किस दरवाजे पर जाये?
5.भाषाई दीवार और वकीलों का सिंडिकेट- अदालती परिसर या बिचौलियों और ‘बेईमानों का जमघट’
भारतीय न्याय प्रणाली में भ्रष्टाचार का एक और ऐसा पहलू है जो सीधे तौर पर आम आदमी की अज्ञानता और मज़बूरी का फ़ायदा उठाता है- वह है भाषाई दीवार (Language Barrier). भारतीय संविधान के अनुच्छेद 348 (1) के तहत यह अनिवार्य है कि सुप्रीम कोर्ट और देश के सभी हाईकोर्ट की याचिका और कार्यवाही (Petition and Proceeding) केवल और केवल अंग्रेजी भाषा में होंगे. यह स्थिति उस देश में है जहाँ की बहुसंख्यक आबादी हिंदी या क्षेत्रीय भाषाओँ में जीवनयापन करती है.
यह भाषाई ‘अभिजात्यवाद’ (Elitism) न्यायपालिका के भीतर वकीलों और मुंशियों के उस सिंडिकेट के लिए वरदान बन गया है, जो मुवक्किल की लाचारी को अपनी काली कमाई का जरिया बनाता है:
(1) गुमराह करने का खेल और धोखाधड़ी: जब एक कम पढ़ा-लिखा या हिंदी भाषी मुवक्किल अपनी ज़मीन या परिवार का केस लेकर वकील के पास जाता है, तो उसे कानूनी बारीकियों या कोर्ट में क्या बहस हो रही है समझ से बाहर होती है. विधि आयोग (Law Commission) ने अपनी कई रिपोर्ट में इस बात पर चिंता जताई है कि अदालतों की भाषा आम जानता के अनुकूल न होने के कारण न्याय की पहुंच सीमित हो जाती है. वकील साहब अंग्रेजी में जटिल कानूनों और लैटिन शब्दों का ऐसा मायाजाल बुनते हैं कि मुवक्किल डरकर सब कुछ उनपर छोड़ देता है. वकीलों के मिन्शी और बाबू इस अज्ञानता का फ़ायदा उठाकर मुवक्किल से कोर्ट की फीस के नाम पर मनमाना पैसा वसूलते हैं और कई बार धोखाधड़ी करके फर्जी दस्तावेज तक थमा देते हैं.
(2) बेईमानों का जमघट: अपनी भाषा में न हो रही सुनवाई के कारण मुवक्किल अदालती कार्यवाही और फैसले को समझने के लिए पूरी तरह वकील पर निर्भर करता है. इस भाषाई दीवार के कारण अदालतों के गलियारों में वकीलों, उनके मुंशियों दलालों और भ्रष्ट बाबुओं का ऐसा चक्रव्यूह बन गया है जिसे आम आदमी भेद ही नहीं सकता है. यहां फाइलों को आगे बढ़ाने और तारीख (Date of Hearing) को प्रभावित करने का पूरा खेल चलता है. यदि आप पैसा ख़र्च करने को तैयार हैं, तो वकील साहब ऐसे-ऐसे तर्क ढूंढ लायेंगे कि केस आपके मनमाफ़िक या समय से निपट जाये, या फिर अगले 10 साल और खिंच जाये. यह प्रशासनिक व्यवस्था अब न्याय की सहायक बनने के बजाय ‘बेईमानों का जमघट’ बनती जा रही है, जहाँ मुवक्किल को इंसाफ़ दिलाने से ज़्यादा उसकी जेब ख़ाली करना प्राथमिकता बन चुका है.
6.आलोचना के प्रति असहिष्णुता- जब व्यवस्था को आईना देखना गवारा न हुआ!
न्यायपालिका कई बार लोकतांत्रिक न्याय प्रणाली को लोकसेवा के दायरे से ऊपर मान बैठती है, जिससे इस पवित्र संस्था की गरिमा को स्वयं उसके ही अनुदार दृष्टिकोण से सबसे गहरी ठेस पहुँचती है. न्यायपालिका अक्सर यह दावा करती है कि वह लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी (Freedom of Speech) की सबसे बड़ी रक्षक है, लेकिन जब बात ख़ुद उसके भीतर की विसंगतियों और व्याप्त भ्रष्टाचार की आलोचना करने की आती है, तो यह तार्किक समीक्षा भी बर्दाश्त नहीं की जाती है. ऐसे मौकों पर तुरंत ‘न्यायालय की अवमानना’ (Contempt of Court) की असाधारण शक्तियों का सहारा लेकर उठने वाली आवाज को नियंत्रित करने या दबाने का प्रयास किया जाता है.
इसका सबसे बड़ा, व्यावहारिक और हालिया उदाहरण NCERT पाठ्यक्रम विवाद के रूप में सामने आया:
मामला क्या था: राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने देश के युवा नागरिकों को जागरूक करने के उद्देश्य से कक्षा 8वीं के सामाजिक विज्ञान (Social Science) के पाठ्यक्रम में एक नया अध्याय जोड़ने का प्रयास किया था, जिसका शीर्षक था- ‘The Role of Judiciary in our Society’. इस अध्याय के एक उप-विषय में लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए न्यायिक पारदर्शिता, मुकदमों के बढ़ते बोझ और ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ (Corruption in Judiciary) पर व्यावहारिक विमर्श शामिल किया गया था.
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रूख: जैसे ही यह मामला उच्च न्यायपालिका के संज्ञान में आया, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर बेहद सख्त रूख अपनाया. अदालत ने इसे ‘कोमल और संवेदनशील मस्तिष्क’ में न्यायपालिका की ग़लत छवि डालने और प्रभावित करने का प्रयास बताते हुए, इस पूरे हिस्से को सिलेबस से तुरंत हटाने और किताबों के वितरण पर पूर्ण प्रतिबंध (Blanket Ban) लगाने का सख्त प्रशासनिक आदेश दे दिया.
प्रशासनिक तंत्र पर अवमानना का नोटिस: अदालत के कड़े रूख का स्तर यह था कि सिर्फ चैप्टर हटाने पर ही बात नहीं रुकी, बल्कि सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी के निदेशक और शिक्षा मंत्रालय के सचिव को आपराधिक अवमानना का कारण बताओ नोटिस तक जारी कर दिया कि इस ‘आपत्तिजनक’ सामग्री को शामिल करने के लिए उनके ख़िलाफ़ दंडात्मक कार्रवाई क्यों न की जाये.
यह घटना इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि न्यायपालिका ख़ुद को किसी भी प्रकार की सार्वजनिक समीक्षा या अकादमिक विमर्श से परे रखना चाहती है. जब लोकतांत्रिक व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ ख़ुद से जुड़ी विसंगतियों या भ्रष्टाचार की चर्चा पर इस तरह असाधारण शक्तियों का उपयोग करने लगे, तो तंत्र में सुधार और पारदर्शिता की उम्मीदें कमजोर होने लगती हैं.
7.समाधान के व्यावहारिक सुझाव: ‘आशा की किरण’
निराशा के इस वातावरण में भी सुधार की उम्मीद अभी बाक़ी है. यदि ईमानदारी से राजनीतिक और न्यायिक इच्छाशक्ति दिखाई जाये, तो व्यवस्था में लगी भ्रष्टाचार रूपी इस दीमक को पूरी तरह साफ़ कर इसे पारदर्शी बनाया जा सकता है. इसके लिए निम्नलिखित व्यावहारिक क़दम उठाने जरुरी हैं:
(1) अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (All India Judicial Service- AIJS) का गठन
कॉलेजियम व्यवस्था के भाई-भतीजावाद और ‘अंकल जजों’ के नेटवर्क को समाप्त करने का एकमात्र और सबसे अचूक उपाय अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS) की शुरुआत करना है.
क्या है उपाय: जिस तरह देश में आईएएस (IAS) और आईपीएस (IPS) की नियुक्तियों के लिए संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) एक अत्यंत पारदर्शी और देशव्यापी परीक्षा आयोजित करता है, ठीक उसी तर्ज पर भारतीय न्यायपालिका के लिए भी एक केंद्रीय परीक्षा प्रणाली होनी चाहिए.
लाभ: इससे निचली अदालतों से लेकर उच्च न्यायपालिका में जजों का चयन केवल और केवल मेरिट (योग्यता) के आधार पर होगा. देश के ग़रीब, पिछड़े, किसान और मजदूर वर्ग के प्रतिभावान युवाओं को भी बिना किसी ‘पारिवारिक रसूख या गॉडफादर’ के जज बनने का समान अवसर मिलेगा. इस क्रांतिकारी सुधार की मांग विधि आयोग और ख़ुद सरकार समय-समय पर करती रही है.
(2) अनिवार्य संपत्ति घोषणा और तारीखों की समय सीमा
नयापलिका में पारदर्शिता लाने और ‘तारीख पर तारीख’ की संस्कृति ख़त्म करने के लिए यह एक क्रांतिकारी क़दम साबित हो सकते हैं.
वित्तीय पारदर्शिता: सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और सभी निचली अदालतों के जजों के लिए यह कानूनन अनिवार्य होना चाहिए कि वे अपनी और अपने परिवार की चल-अचल संपत्ति का ब्यौरा हर साल सार्वजनिक डोमेन में (अदालत की वेबसाइट पर) घोषित करें. जब कार्यपालिका (नेताओं और अफसरों) के लिए ऐसा नियम है, तो न्यायपालिका इससे अछूती क्यों रहे?
जवाबदेही: निचली अदालतों में प्रक्रियागत मनमर्जी पर लगाम कसने के लिए एक कड़ा प्रशासनिक ढांचा बनना चाहिए. यदि कोई जज बिना किसी पूर्व सूचना या आपातकालीन चिकित्सा कारण के अचानक छुट्टी पर जाता है या अपनी सीट पर नहीं बैठता है, तो उस पर अनुशासनात्मक कार्यवाही होनी चाहिए. मुकदमों में दी जाने वाली तारीखों की एक अधिकतम सीमा (जैसे 3 से ज़्यादा बार स्थगन नहीं) तय होनी चाहिए, ताकि जल्दी केस निपटे और लोगों को राहत मिले.
(3) ई-कोर्ट्स (e-Courts) और तकनीकी ऑडिट
अदालतों के बाबुओं, मुंशियों और क्लर्कों द्वारा की जाने वाली रोजमर्रा की मैन्युअल रिश्वतखोरी को रोकने का सबसे प्रभावी हथियार पूर्ण डिजिटलाइजेशन (पूरी तरह से डिजिटल करना) है.
ऑटोमेटेड लिस्टिंग: सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत देश में ई-कोर्ट्स (e-Courts) योजना के चरणों को तेजी से लागू किया जा रहा है. मामलों की फाइलिंग, लिस्टिंग और तारीखों का आवंटन पूरी तरह से एक कंप्यूटर-जनित एल्गोरिदम के जरिये होना चाहिए, ताकि कोई भी बिचौलिया या वकील पैसे देकर अपनी मनपसंद बेंच या तारीख न लगवा सके. पूरी न्यायिक प्रक्रिया का एक स्वतंत्र तकनीकी और वित्तीय ऑडिट होना ज़रूरी है.
(4) अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग और डिजिटल रिकॉर्डिंग
उपाय: देश की सभी अदालतों (विशेषकर जिला एवं सत्र न्यायालयों) की कार्यवाही का सीधा प्रसारण (Live Streaming) होनी चाहिए. जहां सीधा प्रसारण संभव न हो, वहां हर सुनवाई की वीडियो और ऑडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य की जानी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने ख़ुद इसकी मंजूरी दी है.
लाभ: जब अदालत की हर बात जनता के सामने शीशे की तरह साफ़ होगी, तो किसी भी प्रकार की मिलीभगत या सांठगांठ की रोक लग जाएगी.
लाइव स्ट्रीमिंग या ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग होने से अदालत के अंदर की हर बात जनता के सामने शीशे की तरह साफ़ होगी. ऐसे में, वहाँ किसी प्रकार की मिलीभगत या सांठगांठ की गुंजाईश ही नहीं रहेगी, और कार्यवाही के दौरान लोगों का व्यवहार भी मर्यादित और जवाबदेह रहेगा.
(5) क्षेत्रीय भाषाओं में कामकाज और वकीलों की जवाबदेही
भाषाई दीवार को तोड़कर ही न्याय प्रणाली में लोगों का भरोसा बढ़ाया जा सकता है, और वकीलों की जवाबदेही तय करके इस पूरी व्यवस्था को भ्रष्टाचार मुक्त बनाया जा सकता है.
जनता की भाषा में न्याय: अदालतों की कार्यवाही और विशेषकर अंतिम फैसलों की प्रति मुवक्किल की अपनी मातृभाषा (हिंदी, तमिल, मराठी, बांग्ला, आदि) में तुरंत और अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराई जानी चाहिए.
धोखाधड़ी पर लगाम: बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया (BCI) को मुवक्किलों के साथ धोखाधड़ी करने वाले, फर्जी दस्तावेज बनाने वाले या केस को जानबूझकर लटकाने वाले बेईमान वकीलों के ख़िलाफ़ दोषी पाए जाने पर जुर्माना या अस्थाई निलंबन जैसी दंडात्मक कार्रवाई करनी चाहिए, तथा बार-बार ऐसा करने पर उनका लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द कर देना चाहिए.
निष्कर्ष: न्यायपालिका में सुधार की पुकार
न्यायपालिका में भ्रष्टाचार संस्थागत मर्यादा को प्रभावित करते हैं, और देश के करोड़ों नागरिकों के उस लोकतांत्रिक विश्वास को खंडित करते हैं जो वे इस व्यवस्था पर रखते हैं. जब आम आदमी का अंतिम संबल-न्यायलय भी संदेह के घेरे में आने लगता है, तब समाज में न्याय के प्रति निराशा फैलती है और कानून को हाथ में लेने की प्रवृत्ति पनपने लगती है.
हालाँकि हम पूरी न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगा सकते हैं. आज भी देश के अनेक न्यायाधीश हैं जो सीमित संसाधनों और अत्यधिक दबाव के बावजूद पूरी निष्ठा और ईमानदारी से अथक परिश्रम करते हुए आम आदमी को न्याय दिलाने के लिए समर्पित हैं. परंतु, जनमानस में उम्मीदों के इस आख़िरी दरवाजे की विश्वसनीयता इसे भीतर से खोखला करने वाले भ्रष्टाचारी रूपी दीमकों को यहाँ से चुन-चुनकर बाहर निकालना ही होगा. यूं कहिये कि पूरी टोकरी को सड़ने से बचाने के लिए कुछ सड़े हुए सेबों को बाहर फेंकना ही होगा.
मगर यह तभी संभव है जब देश की संसद, कार्यपालिका और ख़ुद न्यायपालिका के शीर्ष नेतृत्व साथ मिलकर काम करें. यही भारत में लोकतंत्र को स्वस्थ और दीर्घायु बनाने का एकमात्र और आख़िरी रास्ता है.
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