राजनीति

बलोचिस्तान का दर्द: आजादी की मांग- क्यों और कैसे?

1947 में कलात की आजादी, 1948 का जबरन सैन्य कब्ज़ा, संसाधनों की लूट और जबरन गुमशुदगी का अंतहीन दौर. सीपेक (CPEC) के चक्रव्यूह में पिसते बलोचिस्तान की ऐतिहासिक जड़ों से लेकर माहरंग बलोच के अहिंसक सत्याग्रह तक- जानिए क्यों यह कौम आज पाकिस्तान से 'पूरी आजादी' मांग रही है.

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प्राकृतिक संपदा से भरपूर एक विशाल भूभाग, जिसके गर्भ में अरबों डॉलर का सोना, तांबा, प्राकृतिक गैस और खनिज छिपे हैं; जिसकी तटरेखा विश्व की सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक ‘हर्मुज की जलसंधि’ (Strait of Hormuz) के मुहाने पर खुलती है- वह भूमि एक अंतहीन चीखें, लाचार आँखों और बेनाम क़ब्रों की पहचान बन चुकी है. यह दर्द भरी दास्तान है पाकिस्तान के सबसे बड़े सूबे बलोचिस्तान की.

बलोचिस्तान का दर्द: बदहाल ज़िन्दगी और सेना की निगरानी

क्षेत्रफल के हिसाब से पाकिस्तान के कुल भूभाग का लगभग 44 प्रतिशत हिस्सा घेरने वाला बलोचिस्तान आज संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद अत्यधिक गरीबी, दमन और अस्तित्व के भीषण संकट से जूझ रहा है. इस पूरी त्रासदी का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि जिस माटी ने पूरे पाकिस्तान को दशकों तक प्राकृतिक गैस (सुई गैस) की गर्मी दी, उसी माटी के बाशिंदे आज कड़ाके की ठंड में लकड़ी जलाकर रात काटने को मजबूर हैं. इसी विरोधाभास में छिपा हुआ है बलोच समाज का असली दर्द.

अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट लगातार इस बात की पुष्टि करती हैं कि बलोचिस्तान में बुनियादी नागरिक अधिकार पूरी तरह ध्वस्त हो चुके हैं. एमनेस्टी इंटरनेशनल (Amnesty International) और ह्यूमन राइट्स वॉच (Human Rights Watch) की वैश्विक रिपोर्टों में बार-बार इस बात का उल्लेख किया गया है कि यहाँ जबरन गुमशुदगी (Forced Disappearances), मारकर फेंक देने की नीति (Kill and Dump Policy) और असैनिक नागरिकों पर सैन्य कार्रवाई कोई अपवाद नहीं, बल्कि नियमित दिनचर्या का हिस्सा बन चुकी हैं. बलोच युवाओं, शिक्षकों, डॉक्टरों और पत्रकारों का अचानक गायब हो जाना और हफ़्तों या सालों बाद उनके विकृत शवों का मिलना बलोचिस्तान की कड़वी सच्चाई है. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के मंचों पर भी बलोचिस्तान में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों का मुद्दा बार-बार गूँजता रहा है.

जहाँ एक तरफ़ बलोच समाज इसे राज्य द्वारा संचालित ‘व्यवस्थित शोषण’ और अपनी जातीय पहचान को मिटाने का प्रयास मानता है, वहीं पाकिस्तानी राज्य मशीनरी महज इसे महज एक आंतरिक सुरक्षा समस्या (Internal Security Issue) या विदेश-प्रायोजित आतंकवाद का नाम देकर अपना पल्ला झाड़ लेती है. बलोचिस्तान का दर्द अब किसी बंद कमरे में छिपाया नहीं जा सकता है. यह मुद्दा आज केवल पाकिस्तान की सीमाओं तक सीमित एक क्षेत्रीय विवाद नहीं है, बल्कि यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार, प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय लोगों के न्यायसंगत अधिकार और अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत स्व-निर्णय के अधिकार (Right to Self-Determination) का एक गंभीर वैश्विक सवाल बन चुका है.

इस विस्तृत आलेख का मुख्य उद्देश्य बलोचिस्तान के दर्द की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक परतों को गहराई से समझना है. यह लेख इस मूलभूत प्रश्न की पड़ताल करता है कि आख़िर बलोच लोग पाकिस्तान से पूरी आजादी (Freedom) क्यों मांग रहे हैं, इस मांग के पीछे कौन-कौन से ऐतिहासिक व आर्थिक कारण हैं, और इनकी यह आवाज वर्तमान में किन रास्तों से होकर वैश्विक पटल पर व्यक्त हो रही है.

बलोचिस्तान की इस वर्तमान मानवीय त्रासदी और आजादी की गूँजती मांग को समझने के लिए हमें केवल आज के राजनीतिक हालात को देखना काफ़ी नहीं होगा. इस दर्द में मूल में पहुँचने के लिए हमें उस मिट्टी की तासीर, वहाँ की बहुरंगी संस्कृति और उस कबीलाई स्वाभिमान को समझना होगा जिसने कभी किसी बाहरी हुकूमत के आगे सर झुकाना नहीं सीखा. जब तक हम यह नहीं जानेंगे कि बलोच पहचान की जड़ें कितनी प्राचीन और गहरी हैं, तब तक हम यह कभी नहीं समझ पाएंगे कि आज की युवा पीढ़ी अपनी माटी और आजादी के लिए अपने प्राणों की बाजी क्यों लगा रही है. आइये, सबसे पहले बलोच समाज की ऐतिहासिक जड़ों, उनकी भाषा और उनकी आध्यात्मिक अस्मिता के झरोखे से बलोचिस्तान को देखने की कोशिश करते हैं.

1.बलोच कौन हैं? इतिहास, पहचान और संस्कृति (Who are the Baloch? History, Identity & Culture)

बलोचिस्तान की वर्तमान त्रासदी और आजादी की निरंतर गूँजती पुकार को सही अर्थों में समझने के लिए बलोच जातीय समूह (Ethno-Linguistic Group) की ऐतिहासिक जड़ों, उनकी सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक चेतना को जानना अत्यंत आवश्यक है. बलोच एक अत्यंत प्राचीन, स्वाभिमानी और ऐतिहासिक रूप से स्वतंत्र चेतना वाला समाज है, जो वर्तमान में पाकिस्तान, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान की सरहदों में बंटें विशाल पठारी क्षेत्र में निवास करता है.

मूल, भाषा और कबीलाई स्वाभिमान

बलोच लोगों की एक विशिष्ट पहचान, अनूठी जीवनशैली और समृद्ध भाषाई विरासत है. उनकी मातृभाषा बलोची (Balochi) है, जो भाषाशास्त्रियों के अनुसार इंडो-ईरानी भाषा परिवार (Indo-Iranian Language family) की पश्चिमी शाखा से संबंधित है. एथ्नोलॉग (Ethnologue) के भाषाई विवरणों के अनुसार, बलोची भाषा का अपना एक समृद्ध मौखिक साहित्य, लोकगाथाएं और काव्य-परंपरा है, जो पीढ़ियों से इस समाज के इतिहास को जीवित रखे हुए है.

बलोचों की सामजिक रीढ़ उनकी कबीलाई संरचना (Tribal Structure) है. सदियों से बलोच समाज विभिन्न कबीलों में बंटा रहा है, जिसका नेतृत्व परंपरा के अनुसार ‘सरदार’ या ‘नवाब’ करते आये हैं.

(1) मार्री (Marri)

(2) बुगती (Bugti)

(3) मेंगल (Mengal)

(4) रईसानी (Raisani)

इन कबीलों ने बलोचिस्तान के राजनीतिक और सामाजिक इतिहास को गहराई से आकार दिया है. हालाँकि, आधुनिक दौर में पाकिस्तानी दमन के ख़िलाफ़ उभरा आंदोलन केवल पारंपरिक सरदारों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसमें एक नया पढ़ा-लिखा मध्यम वर्ग, छात्र, महिलायें और बुद्धिजीवी अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं.

प्राचीन इतिहास और पारसी जड़ें

ऐतिहासिक अध्ययनों के अनुसार, बलोच जनजातियों की जड़ें अत्यंत प्राचीन हैं. इतिहासकारों का मानना है कि ईसा पूर्व और मध्यकाल के बीच बलोच समूह कैस्पियन सागर (Caspian Sea) के उत्तर-पश्चिमी तटीय क्षेत्रों और प्राचीन पारस या फारस (ईरान) के विभिन्न इलाकों से प्रवास करते हुए इस दुर्गम पठारी भूभाग में बसे थे.

बलोच संस्कृति, रीति-रिवाजों और और परंपराओं पर पारसी (Zoroastrian) संस्कृति का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है. बलोच लोक चेतना की सबसे बड़ी ख़ासियत उनका अदम्य साहस, स्वाभिमान और स्वतंत्रता-प्रियता रही है. इतिहास साक्षी है कि चाहे मुग़ल साम्राज्य हो, अफगान शासक हों या फारसी सल्तनत- बलोच कबीलों ने कभी भी किसी बाहरी सत्ता की स्थायी अधीनता को आसानी से स्वीकार नहीं किया.

माता हिंगलाज, चंद्र्कूप और सांस्कृतिक सह-अस्तित्व

बलोचिस्तान का सांस्कृतिक ताना-बाना केवल एकरूपी (Monolithic) नहीं है, इसकी जड़ों में एक बेहद गहरा, समावेशी और बहुसांस्कृतिक इतिहास समाया हुआ है. इसका सबसे सजीव और जाग्रत प्रमाण है- हिंगलाज माता का शक्तिपीठ (Hinglaj Mata Temple).

बलोचिस्तान के लसबेला जिले में हिंगोल राष्ट्रीय उद्यान (Hingol National Park) के बीच हिंगोल नदी के किनारे एक प्राकृतिक गुफा में स्थित यह मंदिर सनातन धर्म के 51 पवित्र शक्तिपीठों में से एक माना जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार यहाँ देवी सती का सिर (या ब्रह्मरंध्र) गिरा था. इस शक्तिपीठ के ठीक समीप चंद्र्कूप (Chandragup) नामक एक प्रसिद्ध मिट्टी का ज्वालामुखी (Mud Volcano) स्थित है, जिसे भगवान महादेव से जोड़ा जाता है. परंपरा के अनुसार, माता हिंगलाज के दर्शन से पहले श्रद्धालु चंद्र्कूप पर अपनी गलतियों या पापों का प्रायश्चित करते हुए नारियल और पूजा सामग्री अर्पित करते हैं.

बलोचिस्तान की अनूठी सांस्कृतिक साझी विरासत
[हिंगलाज माता शक्तिपीठ] | [ चंद्र्कूप (Mud Volcano) ]

– 51 शक्तिपीठों में से एक | भगवान महादेव से जुड़ाव

– बलोच समाज में ‘नानी पीर’ | आत्म-शुद्धि का पवित्र स्थल
बलोच मुस्लिम समाज द्वारा आदर व सुरक्षा

हिंदू मान्यताओं और लोक कथाओं के अनुसार, भगवान श्रीराम भी रावण-वध के बाद ब्रह्म-हत्या (क्योंकि रावण एक ब्राह्मण था) का प्रायश्चित करने माता सीता और लक्ष्मणजी से साथ यहाँ आये थे. इस कारण लक्ष्मणजी के वंशजों, जिनमें गुर्जर-प्रतिहार वंश के पूर्वज भी शामिल माने जाते हैं, उन्होंने माता हिंगलाज को अपनी कुलदेवी मान लिया. कालांतर में, जब मुस्लिम आक्रमणकारियों (उमय्यद खिलाफत की सेनाओं) के हमले हुए, तो कई बार उन शूरवीरों ने डटकर मुकाबला किया, हराया और उन्हें अफगानिस्तान की सीमा से भी बाहर खदेड़ आये. लेकिन बरसों तक लगातार हमलों और संघर्ष ने इन्हें कमजोर कर दिया और अंततः धर्मांतरण करना पड़ा- बलोच कहलाये.

लेकिन माता हिंगलाज के प्रति श्रद्धा में कोई कमी नहीं आई. आज भी बलोच मुसलमान इस मंदिर को नानी मंदिर या नानी पीर कहते हैं और यहाँ की यात्रा को सम्मानपूर्वक ‘नानी का हज’ पुकारते हैं. जब भी दुनियाभर से श्रद्धालु यहाँ आते हैं स्थानीय बलोच लोग बिना किसी भेदभाव के उनकी सुरक्षा, जल और मार्ग-प्रदर्शन की जिम्मेदारी सहर्ष उठाते हैं.

यह इस बात का जीवित प्रमाण है कि बलोच समाज अपनी माटी की प्राचीन आध्यात्मिक शक्ति और महादेव पर कितना अटूट विश्वास रखता है. जब एक तरफ़ पाकिस्तानी राज्य मशीनरी उन्हें एक मजहबी ढाँचे में ढालने की कोशिश करती है, तब बलोच बेटे और बेटियाँ अपनी माटी के प्राचीन शक्तिपीठ के सामने खड़े होकर अपनी अस्मिता और आजादी के लिए हुंकार भरती हैं.

स्वाभिमान और स्वतंत्रता की अटूट परंपरा

बलोच आचार-संहिता (Balochmayar) में कुछ सिद्धांत जीवन से भी अधिक मूल्यवान माने जाते हैं:

(1) मेहमाननवाजी (आतिथ्य-सत्कार): द्वार पर आये शत्रु का भी आदर करना.

(2) बाओट (शरणागत की रक्षा): अपनी शरण में आये किसी भी व्यक्ति या विचार की रक्षा के लिए अपने प्राण तक न्यौछावर कर देना.

(3) ग़ैरत (स्वाभिमान): अपनी भूमि, भाषा और आजादी से कभी समझौता न करना.

सदियों पुराना यही स्वाभिमान और अपनी माटी से अटूट लगाव आज उस ज्वाला का रूप ले चुका है, जो पाकिस्तान के केंद्रीय दमन और औपनिवेशिक रवैये को मानने से साफ़ इनकार कर रही है.

बलोच समाज की इस समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, स्वतंत्रता-प्रिय स्वभाव और अपनी माटी के प्रति अटूट निष्ठा को देखने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि बलोच लोग स्वभाव से ही किसी की गुलामी स्वीकार नहीं कर सकते हैं. लेकिन सवाल उठता है कि यह स्वाभिमानी कौम पाकिस्तान के नक्शे में फँसी कैसे? 1947 के बंटवारे के समय जब पूरा उपमहाद्वीप उथल-पुथल से गुजर रहा था, तब बलोचिस्तान की स्थिति क्या थी? कैसे एक स्वतंत्र रियासत को महज 227 दिनों के भीतर छल, दबाव और सैन्य ताक़त के बल पर पाकिस्तान में मिला लिया गया, और इस ऐतिहासिक मोड़ पर भारत के नेतृत्व से क्या रणनीतिक चूक हुई? आइये, अब बलोचिस्तान के उस दर्दनाक ऐतिहासिक संदर्भ की परतों को उघाड़ते हैं.

2.ऐतिहासिक संदर्भ: आजादी से जबरन विलय तक (Historical Context: From Independence to Forced Accession)

बलोचिस्तान का पाकिस्तान में विलय कोई ऐतिहासिक सहमति, लोकतांत्रिक जनमत संग्रह या स्वेच्छा का परिणाम नहीं था. बलोच इतिहासकार और विचारक आज भी 1948 की इस घटना को अपनी भूमि पर किया गया गैर-कानूनी सैन्य कब्ज़ा (Forced Accession) मानते हैं. इस ऐतिहासिक अन्याय को समझे बिना बलोचिस्तान के वर्तमान असंतोष को नहीं समझा जा सकता है.

ब्रिटिश काल और कलात की संप्रभु रियासत

अंग्रेजी हुकूमत के दौर में बलोचिस्तान की स्थिति शेष भारत की रियासतों से काफ़ी भिन्न थी. ब्रिटिश बलोचिस्तान का पूरा इलाका मुख्य रूप से चार रियासतों (Princely States) में विभाजित था:

(1) कलात (Kalat)

(2) खरान (Kharan)

(3) लसबेला (Lasbela)

(4) मकराण (Makran)

इन चारों में कलात की रियासत सबसे बड़ी, समृद्ध और केंद्रीय राजनीतिक शक्ति थी. बाकि तीनों रियासतें ऐतिहासिक और प्रशासनिक रूप से कलात के खान (Khan of Kalat) के ही आधिपत्य या प्रभाव क्षेत्र में आती थीं. इसके अतिरिक्त, कुछ सीमावर्ती इलाका ‘ब्रिटिश बलोचिस्तान’ कहलाता था, जिसे अंग्रेजों ने कलात के खान से पट्टे (Lease) पर लिया हुआ था.

सन 1876 में ब्रिटिश साम्राज्य और कलात के खान के बीच एक महत्वपूर्ण संधि (Treaty of 1876) हुई थी. इस संधि के तहत ब्रिटिश सरकार ने कलात को एक स्वतंत्र और संप्रभु राज्य के रूप में मान्यता दी थी, जिसकी स्थिति तत्कालीन भारत की अन्य देशी रियासतों से अलग एक मित्र राष्ट्र जैसी थी.

11 अगस्त 1947: कलात की पूर्ण आजादी की घोषणा

जब 1947 में ब्रिटिश भारत के विभाजन का समय आया, तब कलात के तत्कालीन शासक मीर अहमद यार खान (Mir Ahmad Yaar Khan) ने साफ़ कर दिया कि बलोचिस्तान न तो भारत का हिस्सा बनेगा और न ही मजहब के आधार पर बनने वाले पाकिस्तान का. वे कलात को एक पूर्ण स्वतंत्र और संप्रभु देश के रूप में बनाये रखना चाहते थे.

अंग्रेजों के भारत छोड़ने से ठीक तीन दिन पहले, 11 अगस्त 1947 को नई दिल्ली में एक ऐतिहासिक त्रिस्तरीय समझौता (Standstill Agreement) हुआ. इस बैठक में:

  • ब्रिटिश हुकूमत के प्रतिनिधि
  • पाकिस्तान के भावी गवर्नर जनरल मोहम्मद अली जिन्ना
  • कलात के खान (मीर अहमद यार खान)

शामिल थे. इस समझौते के तहत पाकिस्तान और ब्रिटेन, दोनों ने आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया कि ‘कलात एक स्वतंत्र और संप्रभु राज्य है, जिसका दर्जा नेपाल या अफगानिस्तान जैसा रहेगा.’

इसके ठीक चार दिन बाद, 15 अगस्त 1947 को कलात ने दुनिया के नक्शे पर एक स्वतंत्र देश के रूप में अपनी आजादी की घोषणा कर दी. कलात के खान ने शासन चलाने के लिए द्विसदनीय संसद (Dar-ul-Umra और Dar-ul-Avam) का गठन किया. इस प्रतिनिधि संसद के दोनों सदनों ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर यह स्पष्ट संदेश दिया कि बलोचिस्तान की जनता पाकिस्तान में किसी भी कीमत पर विलय नहीं चाहती है.

1947-48: बलोचिस्तान की संप्रभुता से जबरन कब्ज़े का चक्र
[11 अगस्त 1947] → स्टैंडस्टिल समझौता: जिन्ना व अंग्रेजों द्वारा कलात की आजादी स्वीकार

[15 अगस्त 1947] → कलात की पूर्ण स्वतंत्रता की घोषणा; द्विसदनीय संसद का गठन

[मार्च 1948] → कलात के खान की भारत में विलय/मदद की गुजारिश; जवाहरलाल नेहरू द्वारा ठुकराया जाना

[27 मार्च 1948] → पाकिस्तानी सेना का कलात पर हमला और बंदूक की नोक पर जबरन विलय पत्र पर हस्ताक्षर

कलात के खान की भारत से गुजारिश और नेहरू की ऐतिहासिक चूक

जैसे जैसे पाकिस्तान की नींव राखी जा रही थी, मोहम्मद अली जिन्ना और पाकिस्तानी नेतृत्व ने बलोचिस्तान पर अपना नियंत्रण बनाने के लिए कलात पर भारी कूटनीतिक और आर्थिक दबाव बना शुरू कर दिया.

इस गंभीर संकट के समय, कलात के खान (मीर अहमद यार खान) ने अपनी रियासत की संप्रभुता की रक्षा के लिए भारत के तत्कालीन भावी प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से संपर्क साधा. कलात के खान ने नेहरू को आधिकारिक रूप से पत्र भेजकर और कूटनीतिक माध्यमों से गुजारिश की कि बलोचिस्तान को भारत में शामिल कर लिया जाये या फिर उसे एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में पूर्ण कूटनीतिक, आर्थिक रणनीतिक सुरक्षा प्रदान की जाये.

पाकिस्तानी इतिहासकार और वरिष्ठ पत्रकार मजहर अब्बास की टिप्पणियों और कई अंतर्राष्ट्रीय शोध दस्तावेजों (जैसे कि Carnegie Endowment for International Peace) में इस घटनाक्रम का विस्तृत उल्लेख मिलता है.

फिर भी, जवाहरलाल नेहरू ने कलात की इस ऐतिहासिक पेशकश को यह यह कहते हुए ठुकरा दिया कि:

  • भारत और बलोचिस्तान के बीच कोई सीधी भौगोलिक सीमा नहीं लगती है (भौगोलिक दूरी का हवाला).
  • बलोचिस्तान की मदद करने या उसे भारत में मिलाने से पाकिस्तान के साथ अनावश्यक युद्ध की स्थिति पैदा हो जाएगी.

रणनीतिक विरोधाभास: यह निर्णय भारत की तत्कालीन विदेश नीति का एक बड़ा विरोधभास माना जाता है. जब भारत सरकार ने तत्कालीन पूर्वी बंगाल (जो पूर्वी पाकिस्तान और फिर बांग्लादेश बना) पाकिस्तान का अभिन्न अंग स्वीकार कर लिया था- जो मुख्य पश्चिमी पाकिस्तान से 1500 किलोमीटर से भी अधिक दूर था और भारत के पेट से होकर गुजरता था- तब बलोचिस्तान के लिए केवल ‘भौगोलिक दूरी’ का तर्क देकर हाथ पीछे खींच लेना एक रणनीतिक चूक साबित हुई.

इतना ही नहीं, ऑल इंडिया रेडियो (AIR) पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान नेहरू ने कलात खान के द्वारा भेजे गए संदेशों की बात भी सार्वजनिक कर दी. हालाँकि कुछ लोगों का कहना है कि यह गलती से हुआ था, जैसा कि अक्सर कहा जाता रहा है या सच छुपाया जाता रहा है. जो भी हो- नेहरू की गलती थी या कुछ और, इस ख़बर के सार्वजनिक होते ही जिन्ना और पाकिस्तानी सेना को कूटनीतिक संकेत मिल गया कि भारत बलोचिस्तान के मामले में कोई सैन्य या राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं करने वाला है.

27 मार्च 1948: सैन्य हमला और जबरन कब्ज़ा

भारत की ओर से मदद न मिलने की पुष्टि होते ही, मोहम्मद अली जिन्ना ने बिना किसी देरी के सैन्य बल के प्रयोग करने का आदेश दे दिया. 27 मार्च 1948 को पाकिस्तानी थल सेना और तोपों ने कलात रियासत को चारों तरफ़ से घेर लिया.

पाकिस्तानी सेना ने कलात के महल पर हमला बोला और खान (मीर अहमद यार खान) को बंदूक की नोक पर विलय पत्र (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर करने के लिए विवश कर दिया. इस प्रकार, एक स्वतंत्र और संप्रभु देश (227 दिनों तक) को जबरन और असंवैधानिक तरीक़े से पाकिस्तान का हिस्सा बना लिया गया. हालाँकि, बलोच संसद ने इस विलय को तुरंत खारिज़ कर दिया, लेकिन बंदूक की ताक़त के आगे लोकतंत्र को कुचल दिया गया.

शुरुआती विद्रोहों का सिलसिला (1948 – 1970 का दशक)

पाकिस्तानी कब्ज़े के पहले दिन से ही बलोचिस्तान में विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी. बलोच अवाम ने इस विलय को कभी भी स्वीकार नहीं किया. इसके बाद बलोचिस्तान में दमन और बगावत के कई दौर आये:

(1) पहला विद्रोह (1948): कलात के खान के छोटे भाई शहजादा अब्दुल करीम ने इस जबरन विलय के ख़िलाफ़ बगावत का परचम लहराया. उन्होंने अपने समर्थकों के साथ अफगानिस्तान की पहाड़ियों में शरण ली और पाकिस्तान के ख़िलाफ़ पहला छापामार युद्ध (Guerilla Warfare) शुरू किया.

(2) दूसरा विद्रोह (1958-59): जब पाकिस्तान के राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्जा और जनरल अयूब खान ने प्रांतीय पहचान मिटाने के लिए ‘वन यूनिट योजना’ (One Unit Scheme) लागू की, तब नवाब नौरोज खान के नेतृत्व में बलोच युवाओं ने हथियार उठा लिए. बाद में पाकिस्तानी सेना ने कुरान पाक की कसम देकर नौरोज खान और उनके साथियों को पहाड़ियों से नीचे बातचीत के लिए बुलाया, लेकिन उनके साथ विश्वासघात करते हुए नौरोज खान के बेटों और साथियों को हैदराबाद जेल में फाँसी पर लटका दिया गया.

(3) तीसरा विद्रोह (1962-63): ‘जनरल शेरो ‘ के नाम से मशहूर शेर मोहम्मद मार्री के नेतृत्व में बलोच विद्रोहियों ने पाकिस्तानी सैन्य शिविरों और रसद आपूर्ति मार्गों पर भीषण हमले किये. यह दरअसल, विशेषकर पाकिस्तानी सेना द्वारा बलोच महिलाओं को जबरन उठाकर सैन्य शिविरों में उनके साथ हैवानियत करने और ‘सेक्स स्लेव’ बनाकर हीरामंडी में बेचने को लेकर उपजे गुस्से का परिणाम था.

(4) चौथा विद्रोह (1973-77): पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने बलोचिस्तान की चुनी हुई नेशनल अवामी पार्टी (NAP) की प्रांतीय सरकार को गैर-कानूनी तरीक़े से बर्खास्त कर दिया. इसके विरोध में पूरे बलोचिस्तान में जनविद्रोह फैल गया. इस विद्रोह को कुचलने के लिए पाकिस्तानी सेना ने ईरान से मिले हेलीकॉप्टर गनशिप का इस्तेमाल किया और पूरे बलोचिस्तान में भारी बमबारी की, जिसमें 5000 से अधिक बलोच नागरिक और विद्रोही मारे गए.

1948 का वह जबरन विलय और उसके बाद कुरान पाक की कसम देकर बलोच देशभक्तों को फाँसी के फंदे पर लटकाने जैसे छल-कपट ने बलोच मानस में राज्य के प्रति अविश्वास की एक ऐसी खाई खोद दी जो कभी नहीं भर सकी. लेकिन सवाल यह उठता है कि आख़िर 7 से अधिक दशक (लगभग 7.8 दशक- 78 वर्ष) बीत जाने के बाद भी यह विद्रोह शांत क्यों नहीं हुआ? आखिर कौन सी ऐसी वज़हें हैं जिन्होंने बलोचिस्तान की नई पीढ़ी को भी अपनी कलम छोड़कर हाथ में हथियार उठाने या सड़कों पर अपने गुमशुदा लोगों की तस्वीरें लेकर भटकने पर मजबूर कर दिया है? आइये, अब उन मूल कारणों (Root Causes) की गहराई में उतरते हैं जो बलोच समाज को आजादी की मांग करने के लिए मजबूर करते हैं.

3.संघर्ष के मूल कारण: आजादी की मांग क्यों? (Root Causes of the Conflict: Why Freedom is Demanded?)

बलोचिस्तान का असंतोष और वहाँ की आजादी की मांग केवल एक भावनात्मक उफ़ान नहीं है. इसके पीछे दशकों से चला आ रहा आर्थिक शोषण, सुनियोजित मानवाधिकार उल्लंघन और स्थानीय बलोच आबादी को उनकी ही माटी पर बेगाना बना देने की एक गहरी साजिश काम कर रही है. बलोच समाज आज जिन मुख्य वज़हों से पाकिस्तान से पूरी तरह अलग होना चाहता है, उनके मूल कारण निम्नलिखित हैं:

बलोच असंतोष और आजादी की मांग के चार मुख्य स्तंभ
[1. आर्थिक शोषण] → प्राकृतिक गैस, सोना-तांबा (रेको डिक) का दोहन;
स्थानीय आबादी बुनियादी सुविधाओं से वंचित.


[2. मानवाधिकार हनन] → जबरन गुमशुदगी (Enforced Diappearances)
और मारकर फेंकने (Kill and Dump) की नीति.


[3. सीपेक (CPEC)] → ग्वादर पोर्ट प्रोजेक्ट; बलोच भूभाग में चीनी हस्तक्षेप
और जनसांख्यिकी (Demography) का ख़तरा.


[4. पहचान पर हमला] → बलोची भाषा व संस्कृति को दबाने और पंजाब-केंद्रित
अधिकार थोपने की औपनिवेशिक नीति

(1) संसाधनों का दोहन और आर्थिक असमानता (Exploitation of Natural Resources)

बलोचिस्तान को प्रकृति ने बेशुमार खजाने से नवाजा है, लेकिन यही खजाना आज बलोच लोगों के लिए अभिशाप बन चुका है:

  • सुई गैस की कड़वी सच्चाई: सन 1952 में बलोचिस्तान के डेरा बुगती जिले में सुई (Sui) नामक स्थान पर प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार मिले. इस गैस ने पूरे पाकिस्तान के उद्योगों को रफ़्तार दी और पंजाब व सिंध के बड़े शहरों के घरों को रोशन किया. लेकिन विडंबना देखिये, जिस सुई शहर से गैस निकली, वहाँ के स्थानीय बलोच नागरिकों को 1980 के दशक तक रसोई गैस कनेक्शन तक नसीब नहीं हुआ. आज भी बलोचिस्तान का अधिकांश हिस्सा कड़ाके की ठंड में लकड़ी जलाकर गुजर-बसर करने पर मजबूर है.
  • रेको डिक और सैंदक (Saindak) की खदानें: बलोचिस्तान के चागी जिले में स्थित रेको डिक (Reko Diq) और सैंदक (Saindak) की खदानें दुनिया के सबसे बड़े तांबे और सोने भंडारों में शुमार हैं. करोड़ों-अरबों डॉलर की इस प्राकृतिक खनिज संपदा का मुनाफ़ा इस्लामाबाद (केंद्रीय सरकार) और विदेशी कंपनियों (जैसे चीनी कंपनियों) के खातों में जाता है, जबकि स्थानीय बलोच आबादी आज भी भुखमरी, बेरोजगारी और दूषित पेयजल जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रही है.

बलोच अवाम इसे सीधे तौर पर पाकिस्तानी राज्य मशीनरी द्वारा किया जा रहा आंतरिक औपनिवेशिक शोषण (Internal Colonial Exploitation) मानती है.

(2) भयानक मानवाधिकार उल्लंघन: ‘जबरन गुमशुदगी’ और ‘Kill and Dump’ नीतियां

पाकिस्तान में मानवाधिकारों की स्थिति दुनिया के सबसे काले पन्नों में दर्ज हो चुकी है. यहाँ पिछले दो दशकों में पाकिस्तानी सैन्य बलों (विशेष रूप से फ्रंटियर कोर और गुप्तचर संस्था ISI) द्वारा एक भयानक अभियान चलाया जा रहा है:

  • जबरन गुमशुदगी (Enforced Disappearances): जब भी कोई बलोच छात्र, शिक्षक, पत्रकार, डॉक्टर या सामाजिक कार्यकर्त्ता देश की नीतियों पर सवाल उठाता है, तो उसे सुरक्षा बलों द्वारा बिना किसी न्यायिक वारंट के उठाकर अज्ञात स्थानों पर ले जाया जाता है. ‘वॉयस फॉर बलोच मिसिंग पर्सन्स (Voice for Baloch Missing Persons- VBMP) जैसे स्थानीय संगठनों के अनुसार, अब तक हजारों बलोच नागरिक गायब किये जा चुके हैं.
  • मारकर फेंक देने की नीति (Kill and Dump Policy): उठाये गए या जबरन गुमशुदा किये किये बलोच युवाओं के हफ्तों, महीनों या सालों बाद क्षत-विक्षत, यातनाओं के निशान वाले शव सुनसान सड़कों, नालों या बीहड़ों में पड़े मिलते हैं.
  • सामूहिक कब्रें (Mass Graves): 2014 में बलोचिस्तान के तोताक (Khuzdar) इलाके से मिली सामूहिक कब्रों ने दुनिया को हिलाकर रख दिया था, जहाँ से दर्जनों बलोच युवाओं के कंकाल मिले थे.

एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्युमन राइट्स वॉच जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने अपनी विभिन्न खोजी रिपोर्टों में इस बात की पुष्टि की है कि पाकिस्तान बलोच विरोध दबाने के लिए न्यायशास्त्र और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की धज्जियाँ उड़ा रहा है.

(3) सीपेक (CPEC) और ग्वादर पोर्ट: बलोचिस्तान पर चीनी कब्ज़ा

CPEC (China-Pakistan Economic Corridor) यानी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा और अरब सागर के मुहाने पर स्थित गवादर पोर्ट (Gwadar Port) का विकास बलोच असंतोष का सबसे बड़ा बारूद बन चुका है:

  • जनसांख्यिकी में बदलाव (Demographic Threat): बलोच लोगों को डर है कि CPEC परियोजनाओं के बहाने चीन और पाकिस्तान अन्य प्रान्तों (विशेषकर पंजाब) से लाखों गैर-बलोच लोगों को ग्वादर में बसाया जा रहा है, जिससे बलोच अपनी ही सरजमीं पर अल्पसंख्यक बनकर रह जायेंगे.
  • मछुआरों की आजीविका पर हमला: ग्वादर के स्थानीय बलोच मछुआरे सदियों से समुद्र में मछली पकड़कर अपना पेट पालते थे. अब सुरक्षा और चीनी जहाजों (Trawlers) के द्वारा उन्हें समुद्र में जाने से रोका जा रहा है, जिससे उनकी आजीविका पूरी तरह तबाह हो चुकी है.
  • सैन्य किलेबंदी: ग्वादर को बलोच जनता के लिए एक ‘नो गो जोन’ बना दिया गया है, जहाँ हर मोड़ पर चेक-पोस्ट और कंटीले तार लगे हैं. बलोच अवाम का मानना है कि सीपेक उनके विकास का नहीं, बल्कि चीनी गुलामी और उनकी ज़मीन के सौदे का ज़रिया है.

(4) सांकृतिक और भाषाई पहचान पर सीधा हमला

पाकिस्तान के गठन के बाद से ही वहाँ की केंद्रीय सत्ता ने ‘एक मजहब, एक भाषा’ (उर्दू) के सिद्धांत पर देश चलाने की कोशिश की. इसके तहत बलोची भाषा, बलोच साहित्य और उनके अनूठे कबीलाई इतिहास को हाशिये पर धकेल दिया गया. बलोच युवाओं को अपनी ही संस्कृति से काटने के प्रयास किये गए. जब किसी कौम को लगता है कि उसकी आनेवाली नस्लों की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान मिटाई जा रही है, तो उसकी रक्षा का अंतिम रास्ता आजादी ही रह जाता है.

संसाधनों की लूट, अपनी ही माटी पर अपनों के शवों का बोझ और चीनी हस्तक्षेप के कारण अपनी पहचान खोने के इस चौतरफा खौफ़ ने बलोच समाज के धैर्य का बांध तोड़ दिया है. लेकिन बलोच कौम ने इस अत्याचार को चुपचाप सहन नहीं किया है. अपनी आजादी और वजूद को बचाने के लिए बलोच समाज दो मोर्चों पर एक साथ लड़ रहा है- एक तरफ़ जहाँ सड़कों पर माहरंग बलोच जैसी वीरांगनाओं के नेतृत्व में सत्याग्रह और अहिंसक प्रतिरोध का सैलाब उमड़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ बीएलए (BLA) जैसे सशस्त्र संगठन पहाड़ियों में पाकिस्तानी सैन्य ताक़तों को कड़ी चुनौती दे रहे हैं. आइये, अब बलोच आजादी के इस बहुआयामी आंदोलन की संरचना और उनकी रणनीतियों को क़रीब से समझते हैं.

4.बलोच स्वतंत्रता आंदोलन: अहिंसक प्रतिरोध और सशस्त्र संघर्ष (The Baloch Freedom Movement: Peaceful Resistance & Armed Struggle)

बलोच का स्वतंत्रता आंदोलन आज केवल किसी एक वर्ग, कबीले या विचारधारा तक सीमित नहीं है. पाकिस्तान के दमन के ख़िलाफ़ यह संघर्ष मुख्य रूप से दो अलग-अलग मगर सामानांतर रास्तों पर चल रहा है- एक तरफ़ जहाँ न्यायप्रिय कानून और सत्याग्रह का जरिये जन-आंदोलन खड़ा किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर बंदूकों के दम पर आजादी की जंग लड़ी जा रही है.

बलोच स्वतंत्रता आंदोलन- अहिंसक एवं जन-प्रतिरोधबलोच स्वतंत्रता आंदोलन- सशस्त्र संघर्ष (Armed Resistance)
नेतृत्व: डॉ. माहरंग बलोचसंगठन: BLA (बलोच लिबरेशन आर्मी), BRAS, BLF आदि
मंच: बलोच यकजेहती कमेटी (BYC)
तरीक़ा: शांतिपूर्ण मार्च, धरना, अंतर्राष्ट्रीय अपीलतरीक़ा: सैन्य ठिकानों, CPEC प्रोजेक्ट व चीनी नागरिकों पर लक्षित हमले

(1) शांतिपूर्ण जन-आंदोलन: बलोच यकजेहती कमेटी और माहरंग बलोच की भूमिका

पिछले कुछ वर्षों में बलोच संघर्ष का सबसे शक्तिशाली और परिवर्तनकारी पहलू महिलाओं और युवाओं का अभूतपूर्व नेतृत्व बनकर उभरना है:

  • डॉ. माहरंग बलोच और BYC: बलोच यकजेहती कमेटी (Baloch Yakjehti Committee- BYC) के बैनर तले डॉ. माहरंग बलोच (Dr. Mahrang Baloch) जैसी युवा महिला नेताओं ने पूरे बलोच समाज को एकजुट कर दिया है. माहरंग बलोच ख़ुद ‘जबरन गुमशुदगी’ की पीड़ा झेल चुकी हैं- उनके पिता गफ्फार बलोच को अपहरण कर यातनाएं दी गई और बाद में उनका शव फेंक दिया गया था.
  • ऐतिहासिक लॉन्ग मार्च (Long March): कड़ाके की ठंड में बलोचिस्तान के तुर्बत से इस्लामाबाद तक निकाला गया हजारों महिलाओं और बच्चों का ‘लॉन्ग मार्च’ पाकिस्तान की नींव हिला देने वाला साबित हुआ. हाथों में अपने गायब पिताओं, भाइयों और बेटों की तस्वीरें लिए जब बलोच बेटियां राजधानी इस्लामाबाद की सड़कों पर बैठीं, तो दुनिया का ध्यान इस मानवीय संकट की ओर गया.
  • शांतिपूर्ण सत्याग्रह: यह धड़ा पूरी तरह संविधान, मानवाधिकारों और अंतर्राष्ट्रीय अदालतों के दायरे में रहकर अपनी आवाज उठाता है. इसमें शामिल लोग मुख्य रूप से ‘जबरन गुमशुदगी’ पर रोक, Kill and Dump’ नीति की समाप्ति और बलोचिस्तान के स्वायत्त अधिकारों की मांग करते हैं.

(2) सशस्त्र समूह: बीएलए (BLA) और अन्य विद्रोही संगठन

दूसरी ओर, जब शांतिपूर्ण आंदोलनों को भी सेना द्वारा गोलियों और लाठियों से कुचला गया, तो बलोच युवाओं का एक बड़ा वर्ग हथियार उठाने को मजबूर हो गया:

  • बलोच लिबरेशन आर्मी (Baloch Liberation Army – BLA): यह बलोचिस्तान का सबसे बड़ा और प्रभावी सशस्त्र विद्रोही समूह है. BLA का स्पष्ट उद्देश्य पाकिस्तान से बलोचिस्तान से पूर्ण स्वतंत्रता (Complete Independence) हासिल करना है.
  • मजीद ब्रिगेड (Majeed Brigade): BLA का यह विशेष आत्मघाती दस्ता (Suicide Squad) पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों, ख़ुफ़िया एजेंसियों और विशेष रूप से चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) की परियोजनाओं को अपना निशाना बनाता है. हाल के वर्षों में ग्वादर पोर्ट कॉम्प्लेक्स, कराची यूनिवर्सिटी में चीनी शिक्षकों पर हमले और सेना के काफिलों पर बड़े हमलों की जिम्मेदारी BLA ने ली है.
  • अन्य संगठन: BLA के अलावा बलोच लिबरेशन फ्रंट (BLF) और कई अन्य छोटे समूह मिलकर ब्रास (BRAS) नामक एक साझा मोर्चा बनाकर पाकिस्तानी सेना को चुनौती दे रहे हैं.

(3) बलोच प्रवासी (Diaspora) और अंतर्राष्ट्रीय मंच

पाकिस्तान के भीतर सेना-सरकार (दरअसल दुनियाभर में जहाँ देश की एक सेना होती है, वहीं पाकिस्तानी सेना ऐसी है जिसके पास एक देश है- सरकार वही चलाती है) के कड़े सेंसरशिप और मीडिया पाबंदियों के कारण, विदेशों (यूरोप, ब्रिटेन, अमेरिका और कनाडा) में रहने वाले बलोच प्रवासियों (Diaspora) ने वैश्विक स्तर पर मोर्चा संभाल रखा है. बलोच नेशनल मूवमेंट (BNM) जैसे संगठन संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के जेनेवा सम्मेलनों में नियमित रूप से बलोचिस्तान में हो रहे अत्याचारों की डिजिटल प्रदर्शनी लगाते हैं और दुनिया की अंतरात्मा को जगाने का प्रयास करते हैं.

(4) ईरानी बलोचिस्तान (सिस्तान-बलोचिस्तान) का पहलू

बलोच संघर्ष केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं है. सीमा पार ईरान के सिस्तान-बलोचिस्तान (Sistan-Baluchestan) प्रांत में भी लाखों बलोच निवास करते हैं. वहाँ भी शिया बहुल ईरानी हुकूमत द्वारा सुन्नी बलोच आबादी के साथ सांस्कृतिक और आर्थिक भेदभाव किया जाता रहा है. यद्यपि, ईरान और पाकिस्तान, दोनों ही बलोच राष्ट्रवाद को अपने वजूद के ख़तरा मानते हैं, तथापि दोनों देश एक दूसरे के विद्रोही समूहों पर एक दूसरे की सीमा का इस्तेमाल करने का आरोप भी लगाते रहते हैं.

5.भू-राजनीतिक आयाम और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया (Geopolitical Dimensions & International Response)

बलोचिस्तान का मुद्दा केवल एक आंतरिक विवाद नहीं है; यह दक्षिण एशिया की सबसे संवेदनशील कूटनीतिक और रणनीतिक बिसात बन चुका है.

(1) चीन-पाकिस्तान की जुगलबंदी (China-Pakistan Axis)

चीन के लिए बलोचिस्तान उसकी महत्वाकांक्षी योजना ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) की रीढ़ है. CPEC के जरिये चीन हिंद महासागर और अरब सागर तक सीधी पहुँच हासिल करना चाहता है, ताकि उसका मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) पर अपनी निर्भरता को कम कर सके.

चीन ने बलोचिस्तान के विकास के नाम पर वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों को हथियाने का काम किया है. यही वजह है कि बलोच स्वतंत्रता सेनानी अब पाकिस्तानी सेना के साथ-साथ चीनी नागरिकों और चीनी निवेश को भी अपनी आजादी का दुश्मन मानते हैं और उन पर लगातार हमले कर रहे हैं.

(2) भारत की भूमिका और रणनीतिक ख़ामोशी

बलोचिस्तान के संदर्भ में भारत का रुख ऐतिहासिक रूप से बहुत सतर्क रहा है:

  • पुराना ढर्रा- दूरी का बहाना: 1948 में जवाहरलाल नेहरू द्वारा मदद ठुकराये जाने के बाद भारत दशकों तक बलोच मुद्दे पर शांत रहा.
  • 2016 का लाल किला भाषण: 15 अगस्त 2016 को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले के प्राचीर से बलोचिस्तान, गिलगित-बाल्टिस्तान और पाक-अधिकृत कश्मीर के लोगों के प्रति आभार जताया और उनके अधिकारों का समर्थन किया. यह नेहरू-गाँधी नीति के विपरीत या समावेशी सोच का संकेत था.
  • पाकिस्तान का प्रोपेगैंडा: पाकिस्तान भारत पर लगातार बलोच विद्रोहियों को वित्तीय और सैन्य मदद देने का आरोप लगाता है (जिसमें वह कुलभूषण जाधव का नाम घसीटता है). हालाँकि भारत ने हमेशा इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज किया है और इसे पाकिस्तान की अपनी नाकामियों को छुपाने की साजिश बताया है. सच्चाई भी यही है- भारत की किसी भी सरकार ने आज तक बलोच लोगों के लिए जमीनी स्तर पर कुछ भी नहीं किया है, जबकि भारतीय जनमानस का बलोचिस्तान और उसकी जनता से गहरा भावनात्मक जुड़ाव है.

(3) अमेरिका और वैश्विक शक्तियों का रुख

  • अमेरिका: अमेरिका के लिए बलोचिस्तान हमेशा से एक दोधारी तलवार रहा है. वॉर ऑन टेरर (War on Terror) के दौर में अमेरिका को पाकिस्तान की सेना की जरूरत थी, इसलिए उसने बलोच मुद्दे पर आंखें मूंदे रखीं. यहाँ तक कि अमेरिका ने BLA को विदेशी आतंकी संगठन (FTO) घोषित कर रखा है. लेकिन चीन के बढ़ते दबदबे को रोकने के लिए अमेरिकी रणनीतिकार भी बलोचिस्तान के महत्त्व को भली-भांति समझते हैं.
  • वैश्विक ख़ामोशी: दुर्भाग्य से, चीन के आर्थिक प्रभाव और पाकिस्तान के परमाणु शक्ति से संपन्न देश होने के कारण अधिकांश बड़े देश बलोचिस्तान में हो रहे गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों पर केवल जुबानी हमदर्दी जताते हैं, लेकिन कोई ठोस कूटनीतिक क़दम उठाने से बचते हैं.

(4) अंतर्राष्ट्रीय कानून और ‘स्व-निर्णय का अधिकार’

अंतर्राष्ट्रीय कानून (International Law) और संयुक्त राष्ट्र के चार्टर (UN Charter) के तहत दुनिया के हर नागरिक समूह को अपनी राजनीतिक स्थिति चुनने और स्व-निर्णय (Right to Self-Determination) का अधिकार प्राप्त है. ह्यूमन राइट्स वॉच (Human Rights Watch) की विभिन्न जांचों में यह बात स्पष्ट रूप से आई है कि जब किसी राज्य (देश) द्वारा अपने ही नागरिकों के ख़िलाफ़ सैन्य बल का अनियंत्रित प्रयोग किया जाता है, तो उस राज्य (देश) की नैतिक और संवैधानिक वैधता समाप्त हो जाती है. बलोच विचारक इसी अंतर्राष्ट्रीय कानून के आधार पर जनमत संग्रह (Referendum) या पूर्ण आजादी की मांग कर रहे हैं.

बड़ी शक्तियों के भू-राजनीतिक स्वार्थों और वैश्विक ख़ामोशी के बीच पिसती बलोच जनता के लिए यह लड़ाई केवल आंकड़ों या खबरों का हिस्सा नहीं है- यह उनके दैनिक जीवन की खौफनाक हकीकत है. जब कोई माँ सुबह अपने बेटे को कॉलेज भेजती है, तो उसे यह डर सताता है कि कहीं शाम को उसका बेटा ‘गुमशुदा’ लोगों की सूची में न शामिल हो जाये.

राजनीतिक बिसात से परे, आखिर जमीनी स्तर पर बलोच परिवारों, महिलाओं और बच्चों को इस संघर्ष की क्या कीमत चुकानी पड़ रही है? आइये, बलोचिस्तान की इस मर्मस्पर्शी मानवीय कीमत (Human Cost) को महसूस करने की कोशिश करते हैं.

6.मानवीय कीमत: जमीनी हकीकत (Human Cost: Ground Reality)

राजनीतिक बयानों, कूटनीतिक दांव-पेचों और सैन्य छावनियों से परे बलोचिस्तान की असली तस्वीर वहाँ के आम अवाम की रोजमर्रा की ज़िन्दगी में दिखाई देती है. पिछले दो दशकों से बलोचिस्तान एक ऐसा ‘बंद क्षेत्र’ (No-Go Zone) बन चुका है, जहाँ अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारों और स्वतंत्र मानवाधिकार जांच कार्यकर्ताओं के जाने पर पाकिस्तानी सेना का कड़ा पहरा रहता है.

(1) महिलाओं, बच्चों और परिवारों पर प्रभाव

बलोच संघर्ष की सबसे भारी कीमत वहाँ की महिलाओं और बच्चों को चुकानी पड़ रही है:

  • आधी-विधवा (Half-Widows) और अनाथ बच्चे: बलोचिस्तान में ऐसी हजारों महिलायें हैं जिनके पति सालों से गुमशुदा हैं. उन्हें यह भी नहीं मालूम है कि उनके जीवनसाथी जीवित हैं या मार दिए गए हैं. कानून और समाज की नज़र में वे न तो पूरी तरह सुहागिन हैं और न ही विधवा. ऐसी माओं के बच्चों की स्थिति और पीड़ा को शब्दों में बयान करना बहुत कठिन है.
  • सड़कों पर बीतती जवानी: जो उम्र बलोच बेटियों की पढ़ाई-लिखाई और अपने सपनों को सजाने की होती है, उस उम्र में वे अपने गायब भाइयों और पिताओं की तस्वीरें सीने से चिपकाये सैकड़ों किलोमीटर पैदल यात्रायें (Long March) करने और कड़ाके की धूप-ठंड में प्रेस क्लबों के बाहर विरोध-प्रदर्शन करने पर मजबूर हैं.
  • मानसिक प्रताड़ना: बलोच परिवारों पर अपनी ही ज़मीन पर लगातार हो रही सैन्य छापेमारी, रात के अंधेरे में घरों में तोड़-फोड़ और युवाओं को घसीटकर ले जाने की घटनाओं ने पूरी पीढ़ी को एक गहरे मानसिक तनाव (PTSD- Post Traumatic Stress Disorder) में धकेल दिया है.

(2) शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं का बदहाल स्तर

प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद बलोचिस्तान आज भी मध्ययुगीन स्थिति-गरीबी का शिकार है:

विकास सूचकांक (Development Index)बलोचिस्तान की स्थिति (पाकिस्तानी औसत की तुलना में)
साक्षरता दर (Literacy Rate)पूरे पाकिस्तान में सबसे कम (विशेषकर ग्रामीण महिलाओं में साक्षरता 20% से भी कम)
मातृ एवं शिशु मृत्यु दरपाकिस्तान के अन्य प्रांतों (पंजाब/सिंध) की तुलना में सर्वाधिक
शुद्ध पेयजल (Clean Drinking Water)80% से अधिक आबादी दूषित जल पीने को मजबूर
रोजगार एवं उद्योगस्थानीय बलोच युवाओं को तकनीकी नौकरियों से बाहर रखा जाता है

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की विभिन्न बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) रिपोर्टों के अनुसार, बलोचिस्तान के अधिकतर ग्रामीण जिले घोर विपन्नता और भुखमरी जैसी स्थिति का सामना कर रहे हैं. जिस विश्वविद्यालय या कॉलेज में बलोच युवा पढ़ने जाते हैं, उसे पाकिस्तानी सुरक्षा बल ‘संभावित विद्रोहियों की नर्सरी’ मानकर हर वक्त निगरानी (Surveillance) में रखते हैं.

निष्कर्ष- आगे का मार्ग (Conclusion and Way Forward)

बलोचिस्तान का दर्द केवल एक भौगोलिक क्षेत्र या विशिष्ट जातीय समूह का असंतोष नहीं है; यह 21वीं सदी के सभ्य समाज के चेहरे पर लगा एक ऐसा दाग है, जहाँ बंदूक और दमन के बल पर लाखों लोगों के स्वाभिमान और और आजादी की पुकार को खामोश करने की कोशिश की जा रही है.

क्या हो सकता है समाधान? (Way Forward)

1.अपहरण या ‘जबरन गुमशुदगी’ की तत्काल समाप्ति: पाकिस्तान को सबसे पहले ‘Kill and Dump’ की नीति को पूरी तरह बंद करना होगा. गायब किये गए सभी नागरिकों को सार्वजानिक अदालतों के समक्ष पेश किया जाये और उन पर पारदर्शी तरीके से कानूनी प्रक्रिया चलाई जाये.

2.सैन्य बल का हटना और संवाद: बलोचिस्तान को एक सैन्य छावनी बनाने के बजाय सेना को बैरकों में वापस बुलाया जाये. शांतिपूर्ण सत्याग्रह कर रहे जन-नेताओं (जैसे डॉ. माहरंग बलोच और BYC के प्रतिनिधियों) से बिना किसी शर्त के गंभीर राजनीतिक वार्ता शुरू की जाये.

3.संसाधनों पर स्थानीय अधिकार: बलोचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों (सुई गैस, रेको डिक) और ग्वादर पोर्ट का पहला हक वहाँ के स्थानीय निवासियों को मिलना चाहिए. CPEC परियोजनाओं में बलोच लोगों की सहमति और उनकी आजीविका की गारंटी अनिवार्य की जाये.

4.अंतर्राष्ट्रीय हस्तक्षेप और जनमत संग्रह (Referendum): चूँकि पाकिस्तानी राज्य मशीनरी पिछले 78 वर्षों में बलोच अवाम का भरोसा पूरी तरह खो चुकी है, इसलिए संयुक्त राष्ट्र (UN) और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार निकायों की देखरेख में बलोचिस्तान में एक निष्पक्ष जनमत संग्रह की व्यवस्था की जानी चाहिए, ताकि बलोच लोग स्व-निर्णय के अधिकार के तहत अपनी राजनीतिक नियति स्वयं तय कर सकें.

एक अंतिम संदेश

बलोचिस्तान की कहानी आँसू और मातम की कहानी नहीं है; यह हर प्रकार के दमन के सामने अडिग खड़े रहने वाले बलोच स्वाभिमान और अदम्य जीवटता की महागाथा है.

चाहे पहाड़ियों में आजादी की जंग लड़ते विद्रोही हों, या फिर हिंगलाज माता के प्रांगण में खड़ी होकर ‘हर हर महादेव’ के उद्घोष के साथ अपनी जन्मभूमि की रक्षा की गुहार लगाती बलोच बेटियाँ- यह स्पष्ट संदेश देती हैं कि चेतना और विश्वास की ज्वाला को तोपों और बंदूकों से नहीं बुझाया जा सकता है.

इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब कोई कौम अपनी पहचान, भाषा, माटी और आजादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने पर आमादा हो जाती है, तो दुनिया की बड़ी से बड़ी औपनिवेशिक ताकतें भी उसके हौसले को नहीं तोड़ सकती हैं. बलोचिस्तान का दर्द आज दुनिया की अंतरात्मा को पुकार रहा है- और इस पुकार को अनसुना करना मानव अधिकारों, न्याय और शांति के बुनियादी सिद्धांतों के साथ विश्वासघात होगा.

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    रामाशंकर पांडेय

    दुनिया में बहुत कुछ ऐसा है, जो दिखता तो कुछ और है पर हक़ीक़त में वह होता कुछ और ही है. इसीलिए कहा गया है कि चमकने वाली हर चीज़ सोना नहीं होती है. इसी बात को ध्यान में रखते हुए, एक माध्यम का यह दायित्व है कि पूर्वाग्रहरहित एवं निष्पक्ष रहते हुए लोगों तक स्पष्ट और सही जानकारी पहुंचाए. khulizuban.com का प्रयास इसी दिशा में एक क़दम है. यह खुले विचारों वाला मंच है, जहाँ समाज, संस्कृति, राजनीति, इतिहास, धर्म, ज्ञान-विज्ञान, आदि से जुड़ी सभी प्रकार की विशिष्ट एवं सटीक जानकारी उपलब्ध है. इन पर भरोसा किया जा सकता है.

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