ईसाइयत

ईसा मसीह का पुनरुत्थान: परमेश्वर का चमत्कार या कलीसियाई लेखकों की गढ़ी हुई कहानी?

क्या सूली पर लटकाए जाने के तीन दिन बाद वाकई जिंदा हो गये थे ईसा मसीह? जानिए पवित्र बाइबल के सुसमाचारों (Gospels) में सबसे चर्चित और महत्वपूर्ण प्रसंग- ईसा मसीह का पुनरुत्थान' में ऐसा क्या लिखा है, जो कलीसियाई दावों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करता है.

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ईसाई मिशनरियाँ दुनियाभर में प्रचार के दौरान यह दावा करती हैं कि ईसा मसीह सूली पर लटकाए जाने के तीन दिन बाद फिर से जी उठे थे. बाइबल के सुसमाचारों में इसे ‘ईसा मसीह का पुनरुत्थान’ (Resurrection of Jesus Christ) कहते हैं. मगर, इस प्रसंग में जो वर्णन है वह चारों सुसमाचारों (मत्ती, मरकुस, लूका और युहन्ना के सुसमाचारों) में एक जैसा नहीं है. घटनाक्रम और गवाह अलग-अलग हैं. यूँ कहिए कि उनमें भारी अंतर्विरोध है. फिर भी, रोम के वेटिकन से लेकर दुनियाभर के अधिकतर गिरजाघरों का यह स्पष्ट मत है कि पवित्र बाइबल के चारों सुसमाचार (Gospels) स्वयं परमेश्वर के वचन हैं, जिनमें त्रुटि या झूठ की रत्तीभर भी गुंजाइश नहीं है.

वेटिकन का यह आधिकारिक दावा कि सुसमाचारों (Gospels) का लेखक स्वयं गॉड है, रोमन कैथोलिक संप्रदाय की रीढ़ है. इसके विपरीत, प्रोटेस्टेंट और अन्य कलीसियाई समूहों का मानना है कि ये सुसमाचार परमेश्वर की प्रेरणा से (स्वयं परमेश्वर द्वारा नहीं) यीशु या ईसा मसीह के शिष्यों द्वारा लिखे गए, इसलिए इनमें गलती की कोई गुंजाइश नहीं है. यह वैचारिक अंतर बड़े मतभेद को उजागर करता है. केवल यही नहीं, पवित्र बाइबल के इन्हीं सुसमाचारों (शुभ समाचार) में वर्णित ईसा मसीह का पुनरुत्थान यानी उनके फिर से जी उठने की बुनियादी घटना का विवरण भी अंतर्विरोधों से भरा पड़ा है. यह गॉस्पेल ट्रूथ यानी यथार्थ सत्य के दावों को कठघरे में खड़ा कर देता है. आइए, पहले हम गॉस्पेल ट्रूथ को लेकर वेटिकन और कलीसियाई (शुरुआती चर्च-उसके विद्वानों के) विचारों के आतंरिक मतभेद को समझते हैं, ताकि पुनरुत्थान के वर्णनों में अंतर और उनके मायने को अच्छी तरह समझा जा सके.

1.गॉस्पेल ट्रूथ का वैधानिक संकट: वेटिकन का दावा बनाम कलीसियाई मतभेद

रोमन कैथोलिक ईसाइयत के केंद्र वेटिकन यह दावा कि ‘पुराना नियम’ और ‘नया नियम’ किसी इंसान ने नहीं, बल्कि स्वयं गॉड या परमेश्वर की रचना है, पोप की अचूकता (Papal Infallibility) को बनाये रखने का एक राजनीतिक औजार रहा है. इस थ्योरी के अनुसार, चूंकि लेखक स्वयं गॉड है, इसलिए बाइबल (Bible) की हरेक पंक्ति- हर शब्द गॉस्पेल ट्रूथ (Gospel Truth) यानी यथार्थ सत्य है. इसके विपरीत, जब प्रोटेस्टेंट (Protestant) और अन्य 50 से अधिक उप-संप्रदाय यह दलील देते हैं कि ये सुसमाचार परमेश्वर की प्रेरणा से (स्वयं परमेश्वर द्वारा नहीं) यीशु या ईसा मसीह के शिष्यों द्वारा लिखे गए हैं, तो अनजाने में ही वे वेटिकन के एकाधिकार को चुनौती दे रहे होते हैं.

इससे ईसाइयत का आतंरिक विरोधाभास तो उजागर होता ही है, यीशु के फिर से जी उठने- ईसा मसीह का पुनरुत्थान- के दावे भी तर्क की कसौटी पर पूरी तरह बिखर जाते हैं, जब हम देखते हैं कि सुसमाचारों में एक ही घटना के विवरण एक दूसरे से मेल नहीं खाते हैं. यदि इन विवरणों में कथन या शब्द परमेश्वर के हैं या फिर उसकी प्रेरणा से कागज पर उतरे हैं, तो (दोनों ही स्थिति में) विरोधाभास का होना असंभव था.

2.ईसा मसीह का पुनरुत्थान: चार सुसमाचार- घटना के विवरण अलग-अलग

यदि चारों सुसमाचार स्वयं परमेश्वर द्वारा या उसकी प्रेरणा से लिखे गए हैं, तो एक ही ऐतिहासिक घटना के चार अलग-अलग और एक-दूसरे से टकराते विवरण कैसे संभव हैं? आइए, चारों सुसमाचारों को सामने रखकर उनका विश्लेषण करते हैं.

(1) युहन्ना की अकेली गवाह: मरियम मगदलिनी, खाली कब्र और मलमल के कपड़े

युहन्ना के सुसमाचार (अध्याय 20) में कहा गया है कि सप्ताह के पहले दिन सुबह अंधेरा रहते ही केवल मरियम मगदलिनी कब्र के पास जाती है और पत्थर हटा हुआ पाती है. वह वापस दौड़कर शमौन पतरस तथा ‘जिस चेले (शिष्य) से यीशु प्रेम करता था’ उसके पास जाती है और कहती है कि प्रभु (यीशु) का शरीर उठा लिया गया है.

यह सुनकर दोनों कब्र की ओर दौड़ते हैं. प्रिय शिष्य पहले पहुँचता है, झुककर अंदर देखता है, लेकिन प्रवेश नहीं करता है.

पतरस बाद में आकर अंदर जाता है और मलमल के कपड़े और सिर का रूमाल अलग रखा देखता है. तब प्रिय शिष्य भी अंदर जाकर देखता है और पुष्टि करता है. फिर, दोनों वापस चले जाते हैं.

लेकिन मरियम मगदलिनी रोती हुई कब्र के बाहर खड़ी रही. फिर, वह अंदर झाँकती है, तो दो स्वर्गदूतों को सफेद वस्त्रों में देखती है- एक यीशु की पूर्व में रखी गई लाश के सिर की तरफ तो दूसरा पैरों की तरफ बैठा हुआ था. वे उससे रोने का कारण पूछते हैं और वह जवाब देती है तभी यीशु प्रकट होते हैं और उनसे माली समझकर बात करती है.

(2) मत्ती का भूचाल और दैवीय दृश्य: दो मरियम, बर्फ जैसा सफेद स्वर्गदूत और थर-थर काँपते पहरेदार

मत्ती के सुसमाचार में यीशु के फिर से जी उठने- ‘ईसा मसीह का पुनरुत्थान’ के घटनाक्रम का वर्णन करते हुए कहा गया है कि सब्त (विश्राम या छुट्टी का दिन) के बाद हफ्ते के पहले दिन पौ फटते (अहले सुबह) ही मरियम मगदलिनी और दूसरी मरियम कब्र देखने जाती हैं. उससे पहले वहाँ स्वर्ग से यहोवा के दूत के उतरने से भारी भूकंप आया था. उस दूत ने कब्र के मुँह पर रखा पत्थर लुढ़का दिया था- और उस पर बैठा हुआ था. उसके बिजली जैसे रूप और बर्फ जैसे कपड़े देखकर पहरेदार बेसुध (मुर्दे जैसे) हो गए थे.

जब महिलाएँ वहाँ पहुंचीं, तो स्वर्गदूत ने उन्हें यह संदेश दिया कि यीशु फिर से जिंदा कर दिए गए हैं. उसने उन्हें वापस गलील जाने को कहते हुए बताया कि यीशु उनसे वहीं मिलेंगे.

महिलाएँ वापस जा रही थीं. रास्ते यीशु मिले और उनसे बात हुई.

युहन्ना और मत्ती के सुसमाचारों में दिए गए विवरण में अंतर्विरोध

युहन्ना और मत्ती के सुसमाचारों में दिए गए विवरण में काफी अंतर या अंतर्विरोध है, जिसे निम्नलिखित सारिणी (टेबल) के जरिए अधिक स्पष्टता के साथ समझा जा सकता है:

तुलना का बिंदुयुहन्ना-20 मुख्य विवरणमत्ती-28 मुख्य विवरण
कब्र पर जाने वाले लोगकेवल मरियम मगदलिनी का जिक्र है.मरियम मगदलिनी और दूसरी मरियम साथ जाती हैं.
भौतिक घटनाएँ और पहरेदारपत्थर पहले हटा मिलता है. भूकंप और पहरेदारों का जिक्र नहीं है.भारी भूकंप आने, स्वर्गदूत द्वारा पत्थर हटाने और डर से पहरेदारों के बेसुध होने का ब्यौरा है.
खाली कब्र की जाँचशमौन पतरस और दूसरा चेला- प्रिय शिष्य कब्र के अंदर जाकर मलमल के कपड़े- पट्टियों की जाँच करते हैं.महिलाएँ कब्र के भीतर नहीं जाती हैं, स्वर्गदूत के कहने पर बाहर से झाँककर देखती हैं.
कब्र के पास उपस्थितिचेलों के जाने के बाद, मरियम मगदलिनी को कब्र के अंदर सिरहाने और पैरों की ओर बैठे दो स्वर्गदूत दिखाई देते हैं.एक स्वर्गदूत कब्र के बाहर पत्थर लुढकाए गए पत्थर पर बैठा मिलता है.
दिया गया संदेशस्वर्गदूत कोई संदेश या निर्देश नहीं देते हैं, वे परियम से केवल उसके रोने का कारण पूछते हैं.स्वर्गदूत महिलाओं को यीशु के जी उठने का संदेश देता है और उनसे चेलों को गलील जाने को कहता है.
यीशु से मुलाकातमरियम को यीशु कब्र के बाहर मिलते हैं और उनसे बातें होती हैं.महिलाओं को यीशु रास्ते में मिलते हैं और उनसे बातें होती हैं.

(3) मरकुस के सुसमाचार में ईसा मसीह का पुनरुत्थान: तीन महिलाएँ और गुफा में बैठा नौजवान

मरकुस के सुसमाचार में ईसा मसीह के फिर से जिंदा होने की घटना का वर्णन इस प्रकार है:

सब्त का दिन बीत जाने पर मरियम मगदलिनी, याकूब की माँ और सलोमी ने यीशु के शव पर लगाने के लिए खुशबूदार मसाले खरीदे. वे हफ्ते के पहले दिन सूरज निकलते ही कब्र पर जाने के लिए निकलीं. वे रास्ते में आपस में चर्चा कर रही थीं कि कब्र के मुँह से पत्थर कौन हटाएगा, लेकिन वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा कि वह विशाल पत्थर पहले से ही हटा हुआ था.

जब वे कब्र के भीतर गईं, तो वहाँ दायीं तरफ सफेद चोगा पहने एक नौजवान को बैठा देखकर हैरान हुईं. उस नौजवान ने महिलाओं को ढाढस बँधाया और बताया कि यीशु नासरी जिंदा हो चुके हैं और वहाँ नहीं हैं. उसने कहा कि वे जाकर पतरस और बाकी चेलों से कहें कि यीशु उनसे पहले गलील जा रहे हैं, जहाँ वे सब उन्हें देख सकेंगे. यह सुनकर महिलाएँ थर-थर काँपती हुई कब्र से बाहर आकर वहाँ से भाग निकलीं. वे इस कदर डरी हुई और हैरान थीं कि उन्होंने किसी से कुछ नहीं बताया. (नोट: मरकुस का मूल सुसमाचार यहीं समाप्त हो जाता है. बाकी के छंद या आयत जोड़े गए माने जाते हैं.)

मरकुस के सुसमाचार में हम देखते हैं नई तरह की बातें ही नही आई हैं, बल्कि संख्या और कब्र पर उपस्थिति के वर्णन में भी अंतर या अंतर्विरोध है. आइए, इसे सारिणी (टेबल) के माध्यम से समझते हैं, अधिक स्पष्ट हो सके.

तुलना का बिंदुयुहन्ना-20 मुख्य विवरणमत्ती-28 मुख्य विवरणमरकुस-16 मुख्य विवरण
कब्र पर जाने वाले लोगकेवल मरियम मगदलिनी का जिक्र है.मरियम मगदलिनी और दूसरी मरियम साथ जाती हैं.मरियम मगदलिनी, याकूब की माँ और सलोमी (तीन महिलाएँ) जाती हैं.
भौतिक घटनाएँ और पहरेदारपत्थर पहले से हटा मिलता है. भूकंप और पहरेदारों का जिक्र नहीं है.भारी भूकंप आने, स्वर्गदूत द्वारा पत्थर हटाने और डर से पहरेदारों के बेसुध होने का ब्यौरा है.गुफा के मुँह से पत्थर हटा मिलता है. भूकंप और पहरेदारों का जिक्र नहीं है.
खाली कब्र की जाँचशमौन पतरस और दूसरा चेला- प्रिय शिष्य कब्र के अंदर जाकर मलमल के कपड़े- पट्टियों की जाँच करते हैं.महिलाएँ कब्र के भीतर नहीं जाती हैं, स्वर्गदूत के कहने पर बाहर से झाँककर देखती हैं.महिलाएँ खुद कब्र के अंदर जाती हैं और वहाँ खाली जगह देखती हैं.
कब्र के पास उपस्थितिचेलों के चले जाने के बाद, मरियम मगदलिनी को कब्र के अंदर सिरहाने और पैरों की ओर दो स्वर्गदूत बैठे दिखाई देते हैं.एक स्वर्गदूत कब्र के बाहर पत्थर लुढकाए गए पत्थर पर बैठा मिलता है.कब्र के अंदर दायीं ओर सफेद चोगा पहने एक नौजवान बैठा मिलता है.
दिया गया संदेशस्वर्गदूत कोई संदेश या निर्देश नहीं देते हैं, वे परियम से केवल उसके रोने का कारण पूछते हैं.स्वर्गदूत महिलाओं को यीशु के जी उठने का संदेश देता है और उनसे चेलों को गलील जाने को कहता है.नौजवान महिलाओं को यीशु के जी उठने का संदेश देता है और कहता है कि वे जाकर पतरस और बाकी चेलों को गलील जाने को कहें.
यीशु से मुलाकातमरियम को यीशु कब्र के बाहर मिलते हैं और उनसे बातें होती हैं.महिलाओं को यीशु रास्ते में मिलते हैं और उनसे बातें होती हैं.यीशु से मुलाकात का जिक्र नहीं है.

(4) लूका के सुसमाचार में ईसा मसीह का पुनरुत्थान: कई औरतें और चमकीले कपड़ों में दो पुरुष

लूका के सुसमाचार में ईसा मसीह के पुनरुत्थान के घटनाक्रम का विवरण इस प्रकार दिया है:

हफ्ते के पहले दिन वे औरतें (मरियम मगदलिनी, योअन्ना, याकूब की माँ मरियम और अन्य औरतें) तैयार किए हुए खुशबूदार मसाले लेकर कब्र पर पहुंचीं. वहाँ उन्होंने देखा कि कब्र का भारी पत्थर हटा हुआ था, और अंदर यीशु (ईसा मसीह) का शव गायब था. वे उलझन में थी, तभी अचानक चमकीले कपड़ों में दो आदमी उनके पास आ खड़े हुए. यह देखकर वे डर गईं और अपने सिर झुका लिए. उनसे उन पुरुषों ने कहा- “यीशु को जिंदा कर दिया गया है, याद करो कि उसने गलील में तुमसे क्या कहा था.

हैरान-परेशान औरतें वापस लौटीं और यीशु के ग्यारह चेलों और बाकी सभी को यह बात बताई. लेकिन किसी ने उनका यकीन नहीं किया.

लेकिन, पतरस उठा और कब्र पर जा पहुँचा. उसने अंदर झाँककर देखा तो पाया कि (ईसा मसीह की लाश नहीं थी) केवल मलमल का कपड़ा पड़ा था. उसे ताज्जुब हुआ, और यही सोचता हुआ वापस घर चला गया.

इस प्रकार, लूका का सुसमाचार भी स्पष्ट तौर पर औरों से अलग दिखाई देता है. इसमें जो बातें बताई गई हैं, वह मत्ती, मरकुस और युहन्ना के सुसमाचारों के साथ किस प्रकार से मेल नहीं खाती हैं अथवा अंतर्विरोध को दर्शाती हैं उन्हें निम्नलिखित सारिणी (टेबल) के जरिए आसानी से समझा जा सकता है:

तुलना का बिंदुयुहन्ना-20 मुख्य विवरणमत्ती-28 मुख्य विवरणमरकुस-16 मुख्य विवरणलूका-24 मुख्य विवरण
कब्र पर जाने वाले लोगकेवल मरियम मगदलिनी का जिक्र है.मरियम मगदलिनी और दूसरी मरियम साथ जाती हैं.मरियम मगदलिनी, याकूब की माँ और सलोमी (तीन महिलाएँ) जाती हैं.मरियम मगदलिनी, योअन्ना, याकूब की माँ मरियम और अन्य औरतें जाती हैं.
भौतिक घटनाएँ और पहरेदारपत्थर पहले से हटा मिलता है. भूकंप और पहरेदारों का जिक्र नहीं है.भारी भूकंप आने, स्वर्गदूत द्वारा पत्थर हटाने और डर से पहरेदारों के बेसुध होने का ब्यौरा है.गुफा के मुँह से पत्थर हटा मिलता है. भूकंप और पहरेदारों का जिक्र नहीं है.पत्थर पहले से हटा मिलता है. भूकंप या पहरेदारों का जिक्र नहीं है.
खाली कब्र की जाँचशमौन पतरस और दूसरा चेला- प्रिय शिष्य कब्र के अंदर जाकर मलमल के कपड़े-पट्टियों की जाँच करते हैं.महिलाएँ कब्र के भीतर नहीं जाती हैं, स्वर्गदूत के कहने पर बाहर से झाँककर देखती हैं.महिलाएँ खुद कब्र के अंदर जाती हैं और वहाँ खाली जगह देखती हैं.महिलाएँ अंदर जाती हैं और देखती हैं कि शव गायब है. बाद में आया पतरस ने देखा कि सिर्फ मलमल का कपड़ा पड़ा था.
कब्र के पास उपस्थितिचेलों के चले जाने के बाद, मरियम मगदलिनी को कब्र के अंदर सिरहाने और पैरों की ओर दो स्वर्गदूत बैठे दिखाई देते हैं.एक स्वर्गदूत कब्र के बाहर पत्थर लुढकाए गए पत्थर पर बैठा मिलता है.कब्र के अंदर दायीं ओर सफेद चोगा पहने एक नौजवान बैठा मिलता है.कब्र के अंदर महिलाओं के सामने अचानक चमकीले कपड़ों में दो आदमी आकर खड़े हो जाते हैं.
दिया गया संदेशस्वर्गदूत कोई संदेश या निर्देश नहीं देते हैं. वे मरियम मगदलिनी से केवल उसके रोने का कारण पूछते हैं.स्वर्गदूत महिलाओं को यीशु के जी उठने का संदेश देता है और उनसे चेलों को गलील जाने को कहता है.नौजवान महिलाओं को यीशु के जी उठने का संदेश देता है और कहता है कि वे जाकर पतरस और बाकी चेलों को गलील जाने को कहें.चमकीले कपड़ों वाले दो आदमी यीशु के जिंदा हो जाने का संदेश देते हैं और उनकी गलील में कही गई बातों को याद दिलाते हैं.
यीशु से मुलाकातमरियम मगदलिनी को यीशु कब्र के बाहर मिलते हैं, और उनसे बातें होती हैं.महिलाओं को यीशु रास्ते में मिलते हैं और उनसे बातें होती हैं.यीशु से मुलाकात का जिक्र नहीं है.यीशु से मुलाकात का जिक्र नहीं है.

अब यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि चारों सुसमाचारों के वर्णन या विवरण में मेल नहीं हैं. इनमें गवाहों की संख्या, कब्र पर स्वर्गदूतों और पुरुषों की संख्या और रूप, पहरेदारों की उपस्थिति, घटना का क्रम, यीशु या ईसा मसीह का मिलना और महिलाओं की प्रतिक्रिया- सब कुछ अलग-अलग हैं. यदि ये विवरण स्वयं परमेश्वर के, या उसकी प्रेरणा से दिए आए होते, तो इतने बड़े अंतर की कोई गुंजाईश नहीं होती. ये अंतर ठीक वैसे ही हैं जैसे ईसा मसीह की वंशावली में मत्ती और लूका के बीच मतभेद है. वहाँ ईसा मसीह के दादा का नाम वास्तव में क्या था, यह पता नहीं चलता है. सवाल उठता है कि एक ही स्रोत (पवित्र बाइबल) से आए वर्णन या विवरण इतने अलग कैसे हो सकते हैं?

ईसा मसीह का पुनरुत्थान- ऐतिहासिक सच या कलीसियाई लेखकों की गढ़ी हुई कहानी?

चारों सुसमाचारों में पुनरुत्थान के विवरण जब एक-दूसरे से अलग और परस्पर विरोधी दिखाई देते हैं, तो सवाल उठाना स्वाभाविक है- क्या यह वास्तविक ऐतिहासिक घटना थी या कलीसियाई लेखकों द्वारा गढ़ी गई कहानी है? आधुनिक इतिहासकारों, बाइबल आलोचकों और शोधकर्ताओं ने इस सवाल के जवाब में मुख्य रूप से चार थ्योरी पेश की हैं. आइए, इन्हें विस्तार से समझते हैं.

1.स्वून थ्योरी (Swoon Theory)

इस थ्योरी के अनुसार यीशु या ईसा मसीह सूली पर वास्तव में मरे नहीं थे. वे गहरी अचेतावस्था (Coma) में पहुँच गए थे. रोमन सैनिकों ने उन्हें मरा हुआ समझकर उतार दिया. कब्र की ठंडी और नम हवा तथा एसिन (Essene) पंथ के गुप्त सहयोगियों द्वारा उपचार में प्रयुक्त जड़ी-बूटियों या औषधियों के प्रभाव से वे होश में आए और बाहर निकल गए. शिष्यों ने उन्हें जीवित समझकर पुनरुत्थान (फिर से जी उठना) मान लिया.

इस थ्योरी के शुरुआती प्रतिपादक जर्मन विद्वान कार्ल फ्रीड्रिच बार्ट (Karl Friedrich Bahrdt, 1780 के आसपास) और कार्ल वेंटुरिनी (Karl Venturini) थे. बाद में, हाइनरिच पौलुस (Heinrich Eberhard Gottlob Paulus) ने इसे और व्यवस्थित रूप दिया. 19वीं शताब्दी में कुछ और विद्वानों ने भी इसका समर्थन किया.

हालाँकि, कई इतिहासकार इस तर्क को कमजोर मानते हैं. उनका कहना है कि रोमी (रोमन) सूली की सजा इतनी क्रूर और घातक होती थी कि उससे किसी का बच निकलना लगभग असंभव था.

2.विजन थ्योरी (Vision Theory)

यह थ्योरी आज पंथनिरपेक्ष इतिहासकारों (Secular Historians) के बीच सबसे अधिक चर्चा में है. इसके अनुसार, इस मसीह की दर्दनाक मौत ने उनके शिष्यों को गहरे सदमे, घोर निराशा और अपराध बोध में धकेल दिया था. मनोविज्ञान के स्थापित सिद्धांतों के आलोक में, ऐसी अत्यधिक तनावपूर्ण और भावुक स्थिति में इंसानी दिमाग शोकजन्य मतिभ्रम (Bereavement Hallucinations) का शिकार हो जाता है. इसी तीव्र मनोवैज्ञानिक दबाव के कारण शुरुआती शिष्यों को व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से मृत यीशु के मानसिक दर्शन (Visions) हुए, जिन्हें समय के साथ मौखिक परंपराओं को उठाकर एक ठोस शाररिक पुनरुत्थान (Physical Resurrection) की चमत्कारी कहानी का रूप दे दिया गया.

न्यू टेस्टामेंट के प्रसिद्ध विद्वान और इतिहासकार बार्ट डी. एरमैन (Bart D. Ehrman) इस संभावना को ऐतिहासिक और वैज्ञानिक रूप से प्रासंगिक मानते हैं. उनका तर्क है कि इतिहास में यीशु नाम के एक वास्तविक व्यक्ति का अस्तित्व और उसकी मृत्यु तो प्रामाणिक रूप से सत्य है, परंतु उसके पुनरुत्थान का दावा किसी वास्तविक भौतिक साक्ष्य पर नहीं टिका है. एरमैन के अनुसर, यह धारणा ऐतिहासिक प्रमाणों के बजाय पूरी तरह से शुरुआती अनुयायियों के गहरे विश्वास, उनकी अटूट श्रद्धा और विशिष्ट मनोवैज्ञानिक अनुभवों के समाजिक संचरण पर आधारित है.

3.क्राइस्ट मिथ थ्योरी (Christ Myth Theory)

यह सीधे ईसा मसीह के अस्तित्व को चुनौती देती एक ऐसी तीखी व्याख्या है, जिसके समर्थक यह मानते हैं कि ‘नाजरेथ के यीशु’ नाम का कोई ऐतिहासिक व्यक्ति कभी था ही नहीं. इस सिद्धांत के अनुसार, यीशु का सम्पूर्ण चरित्र वास्तव में प्राचीन मूर्तिपूजक (Pagan) संस्कृतियों और मिस्र के ओसिरिस, ग्रीक के डायोनिसस, फ्रीजियन के एटिस तथा फारसी-रोमन संस्कृति के मिथ्रास जैसे देवताओं की पौराणिक कथाओं का एक मिश्रित रूप (Syncretism) है. इन सभी प्राचीन देवताओं की कथाओं में मृत्यु, तीन दिन बाद पुनरुत्थान और अनुयायियों को अलौकिक दर्शन देने जैसे जो तत्व मिलते हैं, कलीसियाई (ईसाई) लेखकों ने उन्हीं की नकल करके ईसा मसीह का पौराणिक ताना-बाना बुना है.

आधुनिक समय में डॉ. रिचर्ड कैरियर (Dr. Richard Carrier) जैसे शोधकर्ता इस थ्योरी के सबसे प्रमुख पैरोकार हैं. कैरियर सांख्यकीय और ऐतिहासिक विश्लेषण के आधार पर यह तर्क देते हैं कि प्रारंभिक ईसाई साहित्य (जैसे सेंट पॉल के शुरुआती पत्र) में यीशु मूल रूप से एक ‘स्वर्गीय या ब्रह्मांडीय आकृति’ (Celestial Being) के रूप में मौजूद थे, जिनका मानव रूप में कोई अस्तित्व नहीं था. बाद के समय में, चर्च के वैचारिक प्रचार और गॉस्पेल (सुसमाचारों) के लेखन के दौरान इस रूपक या पौराणिक चरित्र को एक ऐतिहासिक रूप (Historicization) दे दिया गया, ताकि आम लोगों के बीच इस नए पंथ की स्वीकार्यता को बढ़ाया जा सके.

4.शव चोरी की थ्योरी (Stolen Body Theory)

यह, ईसा मसीह का पुनरुत्थान यानी यीशु के फिर से जी उठने की दलील को खारिज करने वाला सबसे पुराना और ऐतिहासिक रूप से दर्ज सिद्धांत है, जिसका वर्णन स्वयं बाइबल के मत्ती के सुसमाचार (28:11:15) में भी मिलता है. इस थ्योरी के अनुसार, यीशु की क्रूस पर मृत्यु पूरी तरह वास्तविक थी, परंतु उनको दफनाने के बाद उनके शिष्यों या किसी अज्ञात समूह ने गुप्त रूप से कब्र पर पहरा दे रहे रोमी पहरेदारों की आँखों में धूल झोंककर उनके शव को वहाँ से चुरा लिया था. इसके बाद अनुयायियों ने चारों तरफ यह प्रचार कर दिया कि मसीहा अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार जीवित होकर स्वर्ग चले गए हैं. रीमारस (Reimarus) के ऐतिहासिक शोध के अनुसार, शिष्य यीशु की मृत्यु के बाद अपने राजनीतिक और धार्मिक प्रभुत्व को खोना नहीं चाहते थे, इसलिए इस आंदोलन को जीवित रखने के लिए उन्होंने ‘खाली कब्र’ और ‘पुनरुत्थान’ का यह ताना-बाना बुना था.

निष्कर्ष: सूली पर यीशु की हताशा- पुनरुत्थान कथा का सबसे बड़ा आंतरिक विरोधाभास

ईसाई धर्मशास्त्र जिस पुनरुत्थान को अपनी सबसे बड़ी विजय बताता है, सूली पर यीशु का अंतिम आर्तनाद उसी की बुनियाद को हिला देता है. यह स्थिति निर्णय बताने को मजबूर करती है कि विजय है या पराजय.

विदित हो कि मत्ती और मरकुस दोनों के सुसमाचारों (27:46 और 15:34) के अनुसार यीशु जोर से चिल्लाते हैं-

“एली, एली, लमा शबक्तिनी?”

अर्थात- “हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?

यह कोई सामान्य रुदन नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से घोर हताशा, पराजय और परमेश्वर द्वारा त्याग दिए जाने की चरम मनोवैज्ञानिक स्वीकारोक्ति प्रतीत होती है. तर्क का सीधा नियम है: यदि यीशु स्वयं को परमेश्वर का पुत्र या उसका अवतार मानते थे और उन्हें अपनी मृत्यु के तीसरे दिन जीवित हो जाने का अचूक पूर्वज्ञान था, तो अंतिम क्षण में परमेश्वर से यह सवाल पूछना तार्किक रूप से असंभव है. प्रसिद्ध इतिहासकार और न्यू टेस्टामेंट के विद्वान बार्ट डी. एहरमैन (Bart D. Ehrman) के अनुसार, यह प्रसंग ईसा मसीह के भीतर की वास्तविक असहायता और मोहभंग को दर्शाता है, जो बाद की चमत्कारी पुनरुत्थान कथाओं के विपरीत खड़ा है.

अंततः, जब हम चारों सुसमाचारों के अंतर्विरोधी बयानों, ऐतिहासिक साक्ष्यों का अभाव और चारों थ्योरी का निष्पक्ष विश्लेषण करते हैं, तो पर्दा पूरी तरह से उठ जाता है. ईसा मसीह का पुनरुत्थान कोई ऐतिहासिक या दैवीय चमत्कार नहीं, बल्कि कलीसियाई (शुरुआती चर्च के) लेखकों द्वारा एक पराजित और मृत आंदोलन में जान फूँकने के लिए गढ़ी और प्रचारित की गई एक सोची-समझी धार्मिक कथा (Theological Myth) अधिक प्रतीत होती है.

जब किसी मत के सबसे बुनियादी दावे ही इस कदर खोखले और परस्पर विरोधी हों, तो लोगों में अविश्वास का पैदा होना स्वाभाविक है. यही कारण है कि ईसाइयत के गढ़- यूरोप और अमेरिका में इस संस्थागत मत का ग्राफ तेजी से गिरता जा रहा है. वहाँ बड़ी संख्या में लोग नास्तिक बनते जा रहे हैं- चर्च खाली हो रहे हैं. ऐसे में, एशियाई और अफ्रीकी देशों में चालाकी और धन के सहारे ईसाइयत का हो रहा प्रचार इसके विस्तार के बजाय अस्तित्व बचाने की कवायद से ज्यादा कुछ नहीं है.

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    रामाशंकर पांडेय

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