ज्ञान विज्ञान

पूर्ण मानव की खोज: खूबियों और कमियों के गणित में जीवन कहीं अधूरा न रह जाए

प्रकृति में पूर्णता का नहीं, संतुलन का नियम चलता है। इसलिए अपेक्षाओं का तराजू छोड़कर- खूबियों और कमियों के गणित से परे, मानव की स्वाभाविक सीमाओं को स्वीकारें। यही जीवन का दर्शन है।

Don't miss out!
Subscribe To Newsletter
Receive top education news, lesson ideas, teaching tips and more!
Invalid email address
Give it a try. You can unsubscribe at any time.

संसार में प्रत्येक मानव जाने-अनजाने ऐसे आकर्षक और विशिष्ट व्यक्तित्व की प्रतीक्षा में भटक रहा है, जिसमें कोई दोष न हो, कोई सीमा न हो और सब कुछ मनचाहा हो। किन्तु, यथार्थ के धरातल पर ‘पूर्ण मानव की खोज’ एक ऐसी अंतहीन मृगतृष्णा सिद्ध होती है, जहाँ व्यक्ति दूसरों को समझने के बजाय उनकी खूबियों और कमियों का गणित लगाने में उलझ जाता है। जब तक हम यह नहीं समझ लेते हैं कि प्रकृति का कोई भी रूप सर्वगुण-संपन्न नहीं है, तब तक परस्पर संबंधों को तराजू पर तौलने की यह भूल हमारे अपने ही जीवन को भीतर से अधूरा बनाए रखती है।

यदि पूर्ण मानव या व्यक्ति की खोज में खूबियाँ और कमियाँ ढूँढने की इस दृष्टि से परे, समूची सृष्टि का सूक्ष्म अवलोकन किया जाए, तो एक शाश्वत सत्य उद्घाटित होता है- प्रकृति ने किसी को भी सब कुछ नहीं दिया। प्रकृति का सौंदर्य किसी एक तत्व की असीम परिपूर्णता में नहीं, बल्कि परस्पर सीमाओं और अभावों के एक अद्भुत संतुलन में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।

उदाहरण के लिए, प्रकृति ने गन्ने को अनुपम मिठास दी, लेकिन उसे किसी वृक्ष के फल जैसा रूप नहीं दिया। स्वर्ण को ऐसा स्थायी और सम्मोहक तेज सौंपा कि वह सदियों तक मलिन नहीं होता है, किन्तु उसमें चंदन जैसी सुगंध नहीं डाली। दूसरी ओर, चंदन को वह महक दी जो पूरे वन को सुवासित कर दे, किन्तु उसे पुष्पों जैसी सुकोमल और नयनाभिराम सुंदरता से वंचित रखा। कमल को जल का सबसे मनोहारी रूप दिया, किन्तु उसके खिलने के लिए कीचड़ का ही आधार चुना।

अथाह जलराशि को सीने में समेटे महासागर को असीम गहराई तो दी गई, किन्तु उसके जल को किसी प्यासे का कंठ तृप्त करने योग्य मीठा नहीं बनाया। इसके विपरीत, नदी को कल-कल बहता अमृततुल्य मीठा जल तो मिला, किन्तु उसे एक स्थान पर शांत ठहरने का अवसर नहीं प्रदान किया गया। सूर्य को समूचे ब्रह्मांड को देने वाली जीवनदायी शक्ति रूपी ऊर्जा और प्रचंड प्रकाश प्राप्त है, किन्तु उसमें चंद्रमा जैसी शीतलता नहीं है। वहीं, चंद्रमा अपनी अमृतमयी शीतलता तो बिखेरता है, किन्तु उसमें सूर्य की भाँति अंधकार मिटाने वाला तेज नहीं है।

यह चराचर जगत किसी साँचे में ढली हुई एकरस रचना नहीं है; यह सीमाओं और विशेषताओं का एक जीवंत संगीत है। प्रकृति में जिसे सांसारिक बुद्धि ‘कमी’ समझती है, वह वस्तुतः कोई निर्माण दोष नहीं, बल्कि उस तत्व के मूल स्वरूप की अपरिहार्य पहचान है। यही अटल नियम प्रत्येक मानव पर भी उसी रूप में लागू होता है। मानव भी इसी पंचमहाभूतों से रचित प्रकृति के सजीव विस्तार का हिस्सा है। फिर भी इसके मन की यह विचित्र विडंबना है कि यह बाह्य प्रकृति के अभावों को तो सहज स्वीकार कर लेता है- हम कभी गुलाब से यह शिकायत नहीं करते हैं कि उसमें काँटे क्यों हैं- किन्तु जब बात अपने निकटस्थ व्यक्ति की आती है, तो हमारी सारी समझदारी धरी रह जाती है।

जब प्रकृति का यह शाश्वत नियम, वनस्पति, धातुओं और नक्षत्रों से निकलकर मानवीय धरातल पर उतरता है, तो यही अभाव हमारे भीतर एक गहरा अंतर्द्वंद्व बनकर खड़ा हो जाता है। जिस प्रकार हम कमल की सुंदरता देखकर उसके कीचड़ को भूल जाते हैं, ठीक उसी तरह हम किसी व्यक्ति के गुणों पर मुग्ध होकर उससे जुडते तो हैं, मगर जैसे ही उसकी स्वाभाविक कमियाँ नजर आती हैं, उसकी वह आदर्श छवि धुंधलाने लगती है।

यहीं से आरंभ होता है वह मानसिक द्वंद्व, जहाँ एक मानव दूसरे मानव को प्रेम करने के बजाय उसे अपनी अपेक्षाओं के तराजू पर तौलने लगता है। यही वह मोड़ है जहाँ से पूर्ण मानव की असंभव खोज हमारे वास्तविक जीवन और जीवंत संबंधों को धीरे-धीरे निगलना शुरू कर देती है।

1. ‘पूर्ण मानव’ की खोज- अपेक्षाओं का अंतहीन चक्र

मानव मन की सबसे त्रासद प्रवृत्ति यह है कि वह उपस्थित गुणों की सराहना करने और जीवन का आनंद लेने के बजाय दोषों पर अपना ध्यान केंद्रित कर लेता है। जब आप अपने जीवन में किसी भी श्रेष्ठ मानव को चुनते हैं, तो आरंभ में उसकी प्रतिभा, उसका ज्ञान, उसका स्नेह या आकर्षण आपको अभिभूत करता है। किन्तु, जैसे-जैसे समय बीतता है और संबंधों की दिनचर्या आरंभ होती है, उसकी कोई न कोई मानवीय सीमा या आदत आपके सामने प्रकट होने लगती है।

और फिर एक दिन, किसी नितांत शांत या तनावपूर्ण क्षण में मन के किसी कोने से एक अजीब-सा सवाल सवाल उभरता है: “आखिर मैं इस इंसान के साथ क्यों हूँ?”

यह विचार आते ही अधिकांश लोग यह निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि शायद उनका चुनाव गलत था; शायद उन्होंने गलत व्यक्ति पर भरोसा कर लिया। किन्तु, जीवन का सत्य यह है कि समस्या आपके चुनाव में नहीं थी। समस्या उस अवास्तविक और काल्पनिक धारणा में थी जिसके तहत आप एक ऐसे मानव की प्रतीक्षा कर रहे थे जो इस धरती पर अस्तित्व में है ही नहीं। आप एक पूर्ण मानव की खोज में थे, जबकि पूर्णता का भौतिक धरातल पर कोई अस्तित्व नहीं होता है।

जीवन की यह व्यावहारिक विषमता सर्वत्र स्पष्ट दिखाई देती है:

  • जिसके पास अपार धन और भौतिक संसाधन हैं, उसके पास अक्सर अपनों के साथ बैठने का समय और मानसिक शांति नहीं होती है।
  • जिसके पास समय, संवेदनशीलता और समर्पित मन है, वह प्रायः सांसारिक साधनों और धन के अभाव से जूझ रहा होता है।
  • जिसमें प्रगाढ़ प्रेम और आत्मीयता है, उसमें शायद व्यावहारिक चतुराई या निर्णय लेने की क्षमता की कमी हो सकती है।
  • और, जिसमें सांसारिक सफलता और चतुरता कूट-कूट कर भरी है, उसके भीतर शायद प्रेम की वह निश्छल कोमलता न मिले जिसकी हृदय को तलाश रहती है।

सच्चाई यही है कि संसार में किसी भी मानव के पास सब कुछ एक साथ उपलब्ध नहीं है। यदि कोई व्यक्ति यह सोचकर बैठ रहे कि उसे जब तक कोई पूर्णतः दोषमुक्त, सर्वगुणसंपन्न साथी, मित्र या सहकर्मी नहीं मिलेगा तब तक वह संबंधों में समर्पित नहीं होगा, तो जीवन की संध्या आ जाएगी मगर प्रतीक्षा कभी समाप्त नहीं होगी।

मानव जीवन की सार्थकता वास्तव में किसी दोषरहित व्यक्ति को खोज निकालने में नहीं है, बल्कि एक अपूर्ण व्यक्ति के भीतर छिपे गुणों का आदर करने और उसकी स्वाभाविक सीमाओं को समझने के विवेक में है।

2. भारतीय दर्शन (षड्दर्शन) की कसौटी पर मानव

जब हम किसी व्यक्ति से समस्त दुर्गुणों से मुक्त होने की अपेक्षा करते हैं, तो हम अनजाने में सृष्टि के मूलभूत नियमों को ही चुनौती दे रहे होते हैं। भारतीय मनीषा ने सहस्राब्दियों पूर्व मानव स्वभाव, देह और चेतना का जो गहरा मनोवैज्ञानिक व तात्विक विश्लेषण किया था, वह आज के आधुनिक विमर्श से कहीं अधिक स्पष्ट और वैज्ञानिक है। भारतीय षड्दर्शन (छह प्रमुख दार्शनिक संप्रदाय) स्पष्ट उद्घोष करते हैं कि इस नश्वर जगत में किसी भी मानव का शत-प्रतिशत ‘दोषरहित’ होना तात्विक रूप से असंभव है।

सांख्य दर्शन: त्रिगुण सिद्धांत और प्रकृति की सीमाएँ

महर्षि कपिल द्वारा प्रतिपादित सांख्य दर्शन सृष्टि को दो मूल तत्वों में विभाजित करता है- ‘पुरुष’ (शुद्ध, साक्षी चेतना) और ‘प्रकृति’ (भौतिक एवं मानसिक जगत)। सांख्य के अनुसार, प्रकृति का समूचा अस्तित्व तीन मूल गुणों (गुणत्रय) के संघटन और परस्पर संघर्ष पर टिका है:

  • 1.सत्त्व (Purity/Harmony): ज्ञान, प्रकाश, शांति और विवेक प परिचायक।
  • 2.रजस् (Passion/Activity): कर्म, इच्छा, गतिशीलता और तृष्णा का स्रोत।
  • 3. तमस् (Inertia/Darkness): आलस्य, अज्ञान, प्रमाद और स्थिरता का आधार।

सांख्य कारिका का आधारभूत नियम है कि जब तक कोई सत्ता इस दृश्य जगत (प्रकृति) में अवस्थित है, तब तक ये तीनों गुण एक साथ मौजूद रहेंगे। कोई भी देहधारी मानव कभी केवल ‘सत्त्वगुणी’ नहीं हो सकता है। जब तक श्वास चलती है, रजस् और तमस् अपना प्रभाव दिखाएंगे ही।

यदि किसी व्यक्ति में सत्य, करुणा और सौम्यता (सत्त्व) प्रबल है, तो यह संभव है कि सांसारिक निर्णयों में उसमें गतिशीलता (रज) या व्यावहारिक कठोरता की कमी हो। इसके विपरीत जो मानव जीवन में अत्यंत सफल, कर्मठ और महत्वाकांक्षी है (प्रबल रजोगुण), उसके स्वभाव में उतावलापन, क्रोध या अधीरता का होना अपरिहार्य है।

अतः किसी व्यक्ति से यह अपेक्षा करना कि उसमें कर्मठता तो हो किन्तु कभी क्रोध न आए, या उसमें सरलता हो किन्तु वह सांसारिक घात-प्रतिघात में कभी भ्रमित न हो- सांख्य दर्शन की दृष्टि में घोर अज्ञान है। गुण अपनी सीमाओं के साथ ही प्रकट होते हैं।

वैशेषिक और न्याय दर्शन: ‘विशेष’ और ‘अभाव’ का यथार्थ

महर्षि कणाद का वैशेषिक दर्शन अस्तित्व को समझने के लिए पदार्थों (Categories of Reality) का विश्लेषण करता है। वैशेषिक का एक प्रमुख स्तंभ है ‘विशेष’- अर्थात वह विशिष्टता जो एक वस्तु या व्यक्ति को दूसरे से अलग करती है। प्रत्येक मानव अपने विशिष्ट संस्कारों, परमाणुओं और प्रवृत्तियों के कारण अनूठा है।

इसके साथ ही न्याय वैशेषिक में ‘अभाव’ को भी एक स्वतंत्र सत्ता माना गया है। किसी भी रूप या सत्ता की पहचान केवल इस बात से नहीं होती है कि उसमें क्या ‘है’, बल्कि इस बात से भी होती है कि उसमें किस चीज का अभाव या कमी है। दिन की पहचान रात्रि के अभाव से है, और पुष्प का कोमल होना इस बात पर निर्भर करता है कि उसमें पत्थर जैसी कठोरता का अभाव है।

जब हम किसी मानव के व्यक्तित्व को स्वीकार करते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि उसकी खूबियाँ ही कुछ कमियों को जन्म देती हैं। उसकी कमियाँ कोई बाहरी दोष नहीं, बल्कि उसके विशिष्ट होने की अनिवार्य शर्त है।

अद्वैत वेदांत: नाम-रूप का प्रपंच और भ्रम

आदि शंकराचार्य द्वारा व्याख्यायित अद्वैत वेदांत इस विमर्श को चरम बिन्दु पर ले जाता है। उपनिषदों की वाणी कहती है- ‘पूर्णमदः पूर्णमिदं’। अर्थात पूर्णता केवल उस निर्गुण, निराकार परब्रह्म (सर्वव्यापी चेतना) का स्वभाव है।

जैसे ही चेतना ‘नाम’ और ‘रूप’ (Name and Form) धारण कर किसी भौतिक देह में बँधती है, वह अपूर्णता और द्वंद्व (Dualism) के अधीन हो जाती है। यह संसार ही द्वंद्व का खेल है- जहाँ सुख है वहाँ दुख की छाया है, जहाँ राग है वहाँ विराग है। वेदांत स्पष्ट करता है कि नाम-रूप के इस संसार में किसी ‘पूर्ण मानव’ को खोजना बालू से रेत निकालने जैसा व्यर्थ प्रयास है।

3. वैश्विक विमर्श: वाबी-साबी और किंतसुगी- अपूर्णता का उत्सव

भारतीय मनीषा ने जहाँ त्रिगुणों के माध्यम से मानवीय सीमाओं को तात्विक धरातल पर सिद्ध किया, वहीं विश्व के अन्य कोनों में भी संवेदनशील विचारकों ने इस सत्य को गहराई से अनुभव किया है। विशेष रूप से जब हम जापानी संस्कृति की ओर देखते हैं, तो हमें जीवन की अपूर्णता को स्वीकार करने का एक अत्यंत कोमल और जादुई दृष्टिकोण मिलता है। वास्तव में, जापानी चिंतन का भारतीय दर्शन से एक अत्यंत गहरा और ऐतिहासिक संबंध रहा है, जिसका मुख्य सेतु बौद्ध धर्म बना। भारत की मिट्टी से उपजा ‘ध्यान’ चीन में ‘चान’ बना और यही यात्रा जब जापान पहुँची, तो ‘ज़ेन’ (Zen) कहलाया। इसी ज़ेन दर्शन की प्रज्ञा-कोख से जापान की दो सबसे खूबसूरत जीवन-शैलियाँ और दार्शनिक विचार प्रस्फुटित हुए- वाबी-साबी (Wabi-Sabi) और किंतसुगी (Kintsugi)।

वाबी-साबी का केंद्रीय भाव यह है कि इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है, कुछ भी समाप्त नहीं होता है, और सबसे महत्वपूर्ण- कुछ भी पूर्ण नहीं है। यह दर्शन अपूर्णता, असंतुलन और समय के साथ पड़ने वाली झुर्रियों व दरारों में जीवन के सच्चे सौंदर्य को तलाशता है।

इसी चिंतन से उपजी है जापान की विख्यात कला- किंतसुगी (Kintsugi)। जब मिट्टी का कोई मूल्यवान पात्र टूट जाता है, तो जापानी कारीगर उसे फेंकने या दरारों को छिपाने का प्रयास नहीं करते हैं। वे शुद्ध सोने के चूर्ण और लाख के लेप से उन टूटे हुए हिस्सों या टुकड़ों को जोड़ते हैं। इसके बाद वह पात्र अपनी मूल अवस्था से भी अधिक सुंदर, मूल्यवान और गरिमापूर्ण दिखने लगता है। सोने की वे चमकीली लकीरें मानो चीख-चीखकर कहती हैं कि इसका टूटना और इसका अधूरापन कोई लज्जा का विषय नहीं, बल्कि इसके इतिहास और अनूठे अस्तित्व का गौरव है।

मानव भी इस किंतसुगी पात्र जैसा ही है। उसके भीतर जो कमियाँ, घाव, संकोच या व्यावहारिक सीमाएँ दरअसल उसके व्यक्तित्व की वे ही दरारें है, जो उसे अद्वितीय बनाती हैं. जब हम किसी व्यक्ति से प्रेम करते हैं, तो उस प्रेम का सच्चा स्वरुप सोने के उस लेप की तरह होना चाहिए जो उन कमियों को ढँकने के बजाय उन्हें सम्मान और आत्मीयता से स्वीकार कर ले।

अपूर्णता की यह यथार्थपरक स्वीकृति केवल पूरब तक सीमित नहीं रही। पश्चिम के स्टोइक (Stoic) दर्शन में भी सम्राट मार्कस ऑरेलियस ने अपनी डायरी ‘मेडिटेशन्स’ में ठीक इसी सत्य को रेखांकित किया था। उन्होंने लिखा था कि जब आप प्रातःकाल उठें, तो स्वयं को स्मरण कराएँ कि आज आपका सामना ऐसे लोगों से होगा जो स्वार्थी, अधीर या क्रोधी हो सकते हैं। यह कोई निराशावाद या नकारात्मक सोच नहीं थी, बल्कि मानव स्वभाव की सहज और यथार्थपरक स्वीकारोक्ति थी। जब हम किसी से यह अपेक्षा ही नहीं करते हैं कि वह एक फरिश्ता बनकर हमारे सामने आए, तो उसकी कमियाँ हमें भीतर से आहत या विचलित नहीं कर पाती हैं।

4. संबंधों का गणित- खूबियों और कमियों का तराजू

आज के आधुनिक युग में संबंधों के बिखरने की सबसे बड़ी वजह यही है कि हमने आत्मीयता को एक वाणिज्यिक सौदे (Commercial Deal) में बदल दिया है। हम मन-मस्तिष्क में खूबियों और कमियों का बहीखाता खोलकर बैठ जाते हैं।

प्राचीन काल में जब दो अपरिचित युवक और युवती बिना एक-दूसरे को जाने-परखे वैवाहिक बंधन में बँधते थे, तो उनका यह संबंध जीवन की अंतिम साँस तक क्यों निभ जाता था? क्या तब मानव में कमियाँ नहीं होती थीं? क्या तब मतभेद नहीं होते थे?

वे संबंध इसलिए टिकते थे क्योंकि उस समय का समाज यह गहरी समझ रखता था कि दो अपूर्ण जीव मिलकर ही एक संपूर्ण गृहस्थी का निर्माण करते हैं। वहाँ अपेक्षा यह नहीं थी कि सामने वाला मेरी हर इच्छा की प्रतिमूर्ति हो; वहाँ मूल भाव ‘स्वीकार्यता’ (Acceptance) का था। वे जानते थे कि यदि साथी में कोई अभाव है, तो वह अभाव उसका व्यक्तिगत दोष नहीं, बल्कि मनुष्य होने की स्वाभाविक परिणति है।

किन्तु, आज जब व्यक्ति महीनों या वर्षों के परिचय के बाद पूर्ण सहमति से भी एक-दूसरे को चुनता है, तब चंद वर्षों में- यहाँ तक कि कुछ महीनों में ही रिश्ते दम तोड़ने लगते हैं। इसका मूल कारण प्रेम की कमी नहीं, बल्कि अपेक्षाओं का असीमित बोझ है। हम सामने वाले मानव में अपने सपनों के ‘देवदूत’ को आरोपित कर देते हैं। और जैसे ही समय बीतने पर उसकी मानवीय दुर्बलताएँ- उसका उतावलापन, उसकी थकावट, उसकी चुप्पी, उसकी वित्तीय या भावनात्मक सीमाएँ सामने आती हैं- हमारा मोहभंग हो जाता है।

हम यह भूल जाते हैं कि जीवन का गणित कभी सीधा नहीं बैठता है:

  • 1. जो व्यक्ति अत्यंत विचारशील, दार्शनिक और शांत होगा, हो सकता है कि वह उत्सवों में बहुत मुखर या सामाजिक रूप से बहुत चतुर न हो।
  • 2. जो व्यक्ति दुनियादारी में बेहद निपुण और प्रभावशाली होगा, संभव है कि वह एकांत के क्षणों में उतना भावुक या संवेदनशील न रह पाए।
  • 3. जिसके पास आपको देने के लिए अथाह समय और निश्चल समर्पण है, हो सकता है कि वह भौतिक ऐश्वर्य के शिखर पर न खड़ा हो।

कमियों की निरंतर गिनती करने का सबसे घातक परिणाम यह होता है कि हम उन खूबियों का मूल्य भी भूल जाते हैं, जिन्हें देखकर हमने उस व्यक्ति का हाथ थामा था। गणित का तराजू जब रिश्तों के बीच आ जाता है, तो प्रेम का रस सूखने लगता है।

5. ‘बदलने की जिद’ से ‘समझने के विवेक’ तक

अधिकांश मानवीय कष्ट इस एक अहंकार से जन्म लेते हैं कि ‘मैं इस व्यक्ति को सुधार दूंगा’ या ‘समय के साथ मैं इसे अपनी इच्छानुसार बदल लूँगा।’

किसी दूसरे मानव को बदलने का प्रयास करना वस्तुतः उस पर अपनी सत्ता थोपने की एक सूक्ष्म हिंसा है। जब आप किसी को बदलने की जिद पकड़ लेते हैं, तो अनजाने में आप उसे यह संदेश दे रहे होते हैं कि वह जैसा है, वैसा आपके प्रेम के योग्य नहीं है। यह भाव किसी भी संबंध की आत्मा को घायल कर देता है।

यहाँ यह समझना आवश्यक है कि स्वीकार्यता (Acceptance) का अर्थ कोई लाचारी या मूक समझौता (Compromise) नहीं है। समझौता वह होता है जहाँ मन में कड़वाहट और असंतोष दबा रह जाए। इसके विपरीत, वास्तविक स्वीकार्यता एक गहरा दार्शनिक विवेक है। यह इस समझ से पैदा होती है कि जैसे नदी का स्वभाव बहना है और पत्थर का स्वभाव स्थिर रहना है, वैसे ही सामने वाले का स्वभाव भी उसके संचित संस्कारों, अनुभवों और त्रिगुणों के मेल से बना है।

जीवन का अर्थ किसी ऐसे मानव को गढ़ना नहीं है जिसमें कोई खोट न हो, बल्कि उस व्यक्ति के मूल स्वभाव को समझना है। प्रेम का वास्तविक प्रमाण यह नहीं है कि हमने सामने वाले को बदलने या सुधारने का कितना प्रयास किया, और अपने हिसाब से उसमें कामयाबी भी पाई; प्रेम की पराकाष्ठा तो यह है कि हमने उसकी कमियों को जानते हुए भी उसके साथ चलने का साहस दिखाया।

उपसंहार- अपूर्णता ही जीवन का रस और संभावना है

यदि सृष्टि के रचयिता ने किसी मानव को पूर्ण बना दिया होता- जिसमें न कोई दुर्बलता होती, न कोई संकोच, न कोई अभाव और न कोई त्रुटि- तो विचार कीजिए कि यह संसार कैसा होता?

एक पूर्ण मानव को किसी दूसरे के सहारे की आवश्यकता ही न होती। जहाँ कोई अभाव नहीं, वहाँ सहयोग का कोई स्थान नहीं रह जाता है। यदि कोई व्यक्ति अपने आप में शत-प्रतिशत परिपूर्ण होता, तो उसमें न प्रेम की प्यास होती, न किसी के सानिध्य की लालसा। क्षमा का जन्म केवल तभी होता है जब कोई भूल करे; करुणा की सार्थकता तभी है जब कोई अशक्त हो; और धैर्य का परीक्षण तभी संभव है जब सामने वाले की सीमाएँ हमारे अनुकूल न हों।

सच्चाई यह है कि अपूर्णता कोई अभिशाप नहीं, बल्कि इस चराचर जगत में मानवीय संबंधों को आपस में गूँथने वाला सबसे कोमल धागा है। दो अपूर्ण मानव जब एक-दूसरे की सीमाओं को समझते हुए साथ चलते हैं, तभी वे एक-दूसरे के पूरक बनते हैं। किसी की चंचलता को दूसरे का धैर्य संभालता है, तो किसी के अवसाद को दूसरे का उल्लास दूर करता है।

प्रकृति ने गन्ने को फल नहीं दिया, सोने को खुशबू नहीं दी, और सागर को मीठा पानी नहीं दिया- क्योंकि प्रकृति जानती है कि विविधता और परस्पर निर्भरता ही इस ब्रह्मांड का मूल संगीत है। जब नदी सागर में मिलती है, तो वह उसके खारेपन को नहीं देखती है; वह केवल उसके अगाध विस्तार में स्वयं को समर्पित कर देती है।

जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी किसी गलत व्यक्ति से जुड़ना नहीं है। सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि एक अत्यंत सुंदर, संवेदनशील और सच्चे व्यक्ति के साथ रहते हुए भी, हम निरंतर उन कमियों का हिसाब लगाते रहें जो प्रकृति ने उसके भीतर सहज रूप से रच दी हैं। इस अंतहीन जोड़-घटाव में साल बीत जाते हैं, बाल सफेद हो जाते हैं, और एक दिन जब वह व्यक्ति चला जाता है, तब समझ आता है कि हम एक ऐसे काल्पनिक ‘देवदूत’ की प्रतीक्षा में बैठे रहे जो कभी था ही नहीं- और इस प्रतीक्षा में हमने उस जीवित, धड़कते हुए मानव को खो दिया जो हमारे लिए सर्वस्व न्यौछावर करने को तत्पर था।

खूबियों और कमियों का यह गणित बुद्धि का खेल है, जबकि जीवन हृदय की साधना है। गणित केवल वस्तुओं का हिसाब रख सकता है, आत्माओं का नहीं।

अतः, इस व्यर्थ की खोज को विराम दीजिए। किसी ऐसे मानव की प्रतीक्षा में अपना वर्तमान मत गँवाइए जिसमें कोई खोट न हो। इसके स्थान पर, अपने सामने उपस्थित व्यक्ति की दुर्बलता को आत्मीयता से स्वीकारिए, उसके गुणों को संजोइए, और उसके साथ मिलकर इस अपूर्ण संसार में एक सुंदर और समावेशी जीवन का निर्माण कीजिए। क्योंकि यदि जीवन भर केवल तराजू पर ही तौलते रहे, तो एक दिन खूबियों और कमियों के इसी गणित में यह अनमोल जीवन सदा के लिए अधूरा छूट जाएगा।

    Support us for the Truth

    Information platforms that spread lies never lack funding. They have a well-organised international network that keeps their business running. We need your support to fight them. Please contribute whatever you can afford.

    Pay

    Show More

    रामाशंकर पांडेय

    दुनिया में बहुत कुछ ऐसा है, जो दिखता तो कुछ और है पर हक़ीक़त में वह होता कुछ और ही है. इसीलिए कहा गया है कि चमकने वाली हर चीज़ सोना नहीं होती है. इसी बात को ध्यान में रखते हुए, एक माध्यम का यह दायित्व है कि पूर्वाग्रहरहित एवं निष्पक्ष रहते हुए लोगों तक स्पष्ट और सही जानकारी पहुंचाए. khulizuban.com का प्रयास इसी दिशा में एक क़दम है. यह खुले विचारों वाला मंच है, जहाँ समाज, संस्कृति, राजनीति, इतिहास, धर्म, ज्ञान-विज्ञान, आदि से जुड़ी सभी प्रकार की विशिष्ट एवं सटीक जानकारी उपलब्ध है. इन पर भरोसा किया जा सकता है.

    Leave a Reply

    Back to top button

    Discover more from KHULIZUBAN

    Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

    Continue reading

    Enable Notifications OK No thanks