राजनीति

एससी-एसटी एक्ट (SC-ST Act) का दुरुपयोग- क्यों और कैसे? जानिए क्या है इसका समाधान

एससी-एसटी एक्ट के प्रावधान सुरक्षा कवच हैं या वसूली के विधायी हथियार? जानिए कैसे वोट-बैंक की राजनीति और नियम 12 की विसंगतियों ने इस कानून को ब्लैकमेलिंग का धंधा बना दिया है।

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किसी भी वस्तु, व्यक्ति या कार्य की स्वीकार्यता उसके गुणों के आधार पर होती है। दोष की स्थिति में उसे नकार दिया जाता है। यही मानदंड नियम या कानून पर भी लागू होता है। यानी जब उसका दुरुपयोग होने लगता है, तो या तो उसे खत्म कर दिया जाता है या फिर उसमें कुछ ऐसे सुरक्षात्मक प्रावधान जोड़ दिए जाते हैं, जो उसके गलत इस्तेमाल को रोक सकें। ठीक ऐसी ही स्थिति और आवश्यकता एससी-एसटी एक्ट में स्पष्ट दिखाई देती है। आज एससी-एसटी एक्ट का दुरुपयोग (Misuse of the SC-ST Act) इतना आसान और आम हो गया है कि बेवजह कोई कहीं भी और किसी के भी खिलाफ केस दर्ज कराने लगा है। शोषित कहा जाने वाला वर्ग इस कानून की आड़ में दूसरों का शोषण कर रहा है। आपराधिक मानसिकता वाले लोगों के लिए तो यह कानून वसूली का सबसे बड़ा और वैधानिक हथियार बन गया है। मगर विडंबना देखिए कि इस गंभीर विषय पर उठ रहे सवालों का कहीं से भी कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिल रहा है।

एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग पर उठ रहा सवाल आज देश के हर उस नागरिक के मस्तिष्क में चिंगारी की तरह सुलग रहा है, जो कानून के राज और न्याय में विश्वास रखता है। न्याय का मूलमंत्र होता है- ‘जब तक अपराध सिद्ध न हो, तब तक हर नागरिक निर्दोष है।’ उसके खिलाफ अपराधी जैसी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। लेकिन एससी-एसटी एक्ट का वर्तमान और व्यावहारिक स्वरूप ऐसा हो गया है कि इस संतुलन को बिगाड़ता और न्याय व्यवस्था की दोहरी तस्वीर प्रदर्शित करता हुआ दिखाई दे रहा है। बिना प्राथमिक जाँच के सीधे गिरफ्तारी की असीमित शक्ति, अग्रिम जमानत पर रोक और दोषसिद्धि से पहले- केवल एक एफआईआर के आधार पर सरकारी खजाने से लाखों रुपयों की रेवड़ियाँ- यह सुरक्षा कवच नहीं, बल्कि एक सुनियोजित वसूली और निर्दोषों को तबाह करने का खुला हथियार बन चुका है। इस आलेख में हम फर्जी शिकायतों के कारण उजड़ते परिवारों, तबाह होते करियर और कानून की आड़ में फलते-फूलते करोड़ों के कथित ‘मुआवजा उद्योग’ की निष्पक्ष पड़ताल कर सच्चाई सामने रखते हुए इस विधायी संकट का समाधान भी बताएंगे।

एससी-एसटी एक्ट यानी अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (The Scheduled Castes and Scheduled Tribes- Prevention of Atrocities Act, 1989) बनाया गया था यह सोचकर कि कमजोर और हाशिए पर रहने वाले वर्गों के खिलाफ जाति-आधारित भेदभाव, अपमान, हिंसा और अत्याचारों को रोक जा सके। लेकिन सुरक्षा और राहत देने वाली इस विशेष व्यवस्था में फायदा नजर आने लगा। फायदे की सोच ने दुरुपयोग का मार्ग खोल दिया।

वास्तव में, किसी कानून का लोककल्याणकारी उद्देश्य से भटककर ब्लैकमेलिंग के सिंडीकेट में बदल जाना कोई संयोग नहीं, बल्कि दशकों पुरानी विभाजनकारी नीति और चुनावी जोड़-तोड़ की सुनियोजित परिणति है। जब संसद में राजनीतिक नफे-नुकसान के लिए न्यायिक सुरक्षा घेरे को दरकिनार किया जाने लगे और प्रशासनिक स्तर पर बिना सच जाने केवल कागजी आरोपों पर खजाने के मुँह खोल दिए जाएँ, तो व्यवस्था का पटरी से उतरना स्वाभाविक है। जमीनी स्तर पर जीवन तबाह करने वाली इस व्यवस्थागत विसंगति को समझने और इसके तार्किक समाधान तक पहुँचने के लिए सबसे पहले हमें उस ऐतिहासिक और विभाजनकारी नैरेटिव और उसके पीछे छिपी सोच को जानना होगा, जिसके तहत आज की पीढ़ी से संस्थागत प्रतिशोध लिया जा रहा है।

1.ऐतिहासिक नैरेटिव का सच: औपनिवेशिक विभाजन बनाम सामाजिक समरसता

जब भी एससी-एसटी एक्ट की विसंगतियों, इसके दुरुपयोग से उत्पन्न सामाजिक समस्याओं और उनमें अपेक्षित सुधारों पर गंभीर बहस होती है, तो तुरंत एक खास तरह का नैरेटिव आगे कर दिया जाता है। यूँ कहिए कि इस कानून के एकतरफा और असंतुलित स्वरूप को सही ठहराने के लिए एक ऐसी घिसी-पिटी दलील पेश की जाती है, जिसकी समूची वैचारिक बुनियाद ही ऐतिहासिक फर्जीवाड़े और सुनियोजित दुष्प्रचार पर टिकी है।

एससी-एसटी एक्ट के समर्थकों का दावा और उसका ऐतिहासिक सच

इस कानून के अंध-समर्थकों का मुख्य दावा यह है कि भारत का पारंपरिक समाज सदियों से छुआछूत, शोषण और उत्पीड़न की एकतरफा व्यवस्था पर आधारित था, इसलिए वर्तमान पीढ़ी पर दंडात्मक शिकंजा कसना जायज है। लेकिन औपनिवेशिक काल से पूर्व का वास्तविक भारतीय इतिहास इस कपोल-कल्पित दावे को पूरी तरह खारिज कर देता है। स्वयं डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर ने अपनी पुस्तक ‘शूद्रों की खोज’ में स्पष्ट किया है कि भारत के दलित प्राचीन या वैदिक काल के नहीं हैं और न ही वे कभी उपेक्षित थे। प्राचीन भारतीय समाज में आपसी निर्भरता और पारस्परिक आदर की जड़ें इतनी गहरी थीं कि नवजात शिशु के जन्म पर उसे जीवन का पहला पोषण (स्तनपान) कराने वाली चँवरवंशी धात्री (चमाइन माता) को समाज में ‘प्रथम माता’ का सर्वोच्च दर्जा प्राप्त था। जिस समाज में एक वंचित कही जाने वाली महिला को परिवार के कुलदीपक की जीवन-रक्षक और माता मानकर शीश नवाया जाता रहा हो, उस संस्कृति को अत्याचारी करार देना एक बौद्धिक बेईमानी के सिवाय कुछ नहीं है।

इस स्वाभाविक सामाजिक समरसता में जहर घोलने के काम मध्यकालीन मुस्लिम शासकों और उसके बाद 19वीं सदी में औपनिवेशिक ब्रिटिश हुकूमत ने किया। अंग्रेजों ने भारत के आत्मनिर्भर ताने-बाने को तोड़ने के लिए अपनी कुख्यात ‘फूट डालो और राज करो’ (Divide and Rule) की नीति के तहत कानूनी और प्रशासनिक हथकंडे अपनाए। इसके दो सबसे प्रामाणिक दस्तावेजी सबूत ब्रिटिश लाइब्रेरी अभिलेखागार (British Library Archives) में दर्ज हैं। पहला, द क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट, 1871 (Act XXVII of 1971) जिसके तहत अंग्रेजों ने श्रम और कौशल पर आधारित विभिन्न जातियों को जन्मजात अपराधी (Criminals by Birth) घोषित कर दिया। दूसरा, 1881 की इम्पीरियल सेंसस रिपोर्ट (Imperial Census Report) जिसे विलियम चिचेले प्लोडन (William Chichele Plowden) द्वारा संकलित किया गया था, उसके जरिए भारतीय समाज को स्थायी, कृत्रिम और वैमनस्यपूर्ण जातिगत खाँचों में आधिकारिक रूप से वर्गीकृत कर दिया गया। इन दोनों औपनिवेशिक चालों का एकमात्र उद्देश्य यही था कि जातियों को आपस में लड़ाकर खड़ा कर दिया जाए, ताकि औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ कोई साझा भारतीय मोर्चा न बन सके।

विडंबना यह रही कि 1947 में आजादी मिलने के बाद औपनिवेशिक मानसिकता को समाप्त करने के बजाय अंग्रेजी-वामपंथी इतिहासकारों और नीति निर्माताओं ने उसी विभाजनकारी नैरेटिव को और अधिक हवा दी। स्वाधीन भारत मे चुनावी वोट-बैंक की राजनीति ने समाज की इस कृत्रिम खाई को पाटने के बजाय इसे कानूनी रूप देना शुरू कर दिया। इसी क्रम में 11 सितंबर 1989 को एससी-एसटी एक्ट अधिनियमित हुआ और 30 जनवरी 1990 से लागू किया गया।

शुरुआत में जहाँ इस कानून का दायरा केवल 21 अपराधों तक सीमित था, वहीं राजनीतिक दलों में खुद को सबसे बड़ा मसीहा साबित करने की होड़ ने 2015 के संशोधनों के जरिए इसके प्रावधानों को बढ़ाकर 47 तक पहुँचा दिया। बिना किसी प्राथमिक जाँच के सीधे गैर-जमानती गिरफ्तारी और अग्रिम जमानत के पूर्ण निषेध (18A) जैसे प्रावधान जोड़कर इस कानून को एकतरफा विधायी हथियार बना दिया गया। नतीजा यह हुआ कि ऐतिहासिक न्याय की आड़ में गढ़ा गया एससी-एसटी एक्ट आज निर्दोष नागरिकों के मौलिक अधिकारों के हनन, पारिवारिक तबाही और सामाजिक ताने-बाने के विखंडन का सबसे बड़ा कारण बन चुका है।

यह कितनी अजीब बात है कि इतिहास के आधार पर वर्तमान का मूल्यांकन किया जा रहा है। पूर्वजों की कथित गलतियों के बहाने आज की पीढ़ी को दंडित किया जा रहा है। क्यों? क्या यही तर्क भारत को गुलाम बनाने और इस पर अत्याचार करने वाले मुस्लिम और ईसाई शासकों के वंशजों पर जुल्म ढाने की इजाजत देगा? उन्हें देश से निकाल देना कानून सम्मत होगा? जाहिर है, यह अनुचित और न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध भी होगा। लेकिन इस पर बुद्धिजीवियों का मुँह नहीं खुलेगा, क्योंकि निशाना एक खास वर्ग है, और सारा खेल वोटबैंक और मुआवजे- सरकारी खजाने से वसूली का है।

सरकारी खजाने से वसूली: एफआईआर दर्ज होते ही शुरू हो जाता है धंधा

एससी-एसटी एक्ट के व्यावहारिक क्रियान्वयन का सबसे चिंताजनक और विकृत पहलू वह वित्तीय ढाँचा है, जो वास्तविक न्याय के सिद्धांतों को ही उलट देता है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) नियमावली के नियम 12 के अंतर्गत पीड़ित को आर्थिक राहत राशि प्रदान करने का प्रावधान है। सैद्धांतिक रूप से यह व्यवस्था पीड़ितों के पुनर्वास के लिए की गई थी, लेकिन इसके तकनीकी नियमों ने इसे फर्जी मुकदमों के एक संगठित उद्योग में बदल दिया है।

नियम 12 की सबसे बड़ी खामी यह है कि राहत राशि का 25% से 50% हिस्सा अदालत मे दोषसिद्धि (Conviction) होने से पहले, केवल औपचारिक एफआईआर (FIR) दर्ज होते ही जारी कर दिया जाता है। आधुनिक अपराध न्यायशास्त्र का मूल सिद्धांत है: ‘प्रत्येक व्यक्ति तब तक निर्दोष है जब तक कि अदालत में उसका अपराध सिद्ध न हो जाए।’ परंतु, एससी-एसटी एक्ट के तहत लागू यह वित्तीय मॉडल आरोपी को सुने बिना और साक्ष्यों की सत्यता जाँचे बिना सरकारी खजाने से लाखों रुपए का भुगतान कर देता है। आरोप झूठा निकले, अदालत में खारिज हो जाए, या समझौता हो जाए- इस वितरित राशि की वसूली का कोई व्यावहारिक और सख्त तंत्र नहीं है।

यह वित्तीय प्रलोभन किस प्रकार संगठित सिंडिकेट का रूप ले चुका है, इसके प्रमाण खुद न्यायपालिका के रिकार्ड मे दर्ज है:

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी और राज्यव्यापी जाँच: हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट की पीठ के समक्ष जब यह तथ्य सामने आया कि एक संगठित गिरोह द्वारा एक ही परिवार के नाम पर दर्जनों फर्जी मुकदमे दर्ज कराकर लगभग ₹23 लाख की सरकारी राहत राशि ऐंठ ली गई, तो गंभीर चिंता व्यक्त की। हाईकोर्ट ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए उत्तरप्रदेश सरकार को राज्य स्तर पर इस पूरे मुआवजा वितरण की व्यापक जाँच के निर्देश दिए, ताकि यह सामने आ सके कि खजाने की इस लूट के खेल में कितने प्रभावशाली सिंडिकेट सक्रिय हैं।
  • अलीगढ़ का संगठित रैकेट: उत्तरप्रदेश के अलीगढ़ में सामने आया चंद्रवती देवी का मामला इस कानून के दुरुपयोग की पराकाष्ठा है। इस गिरोह ने पिछले एक दशक में 15 से अधिक फर्जी मुकदमे दर्ज कराए और विभिन्न प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत से लगभग ₹46 लाख का सरकारी मुआवजा हड़प लिया। यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि जब बिना जाँच के वित्तीय लाभ तय किए जाते हैं, तो वह कानून न्याय का माध्यम नहीं, बल्कि ब्लैकमेलिंग का पेशा बन जाता है।

विडंबना यह है कि इस गंभीर वित्तीय और नैतिक रिसाव को रोकने के बजाय, इस राहत राशि को उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के आधार पर लगभग 40% तक और बढ़ाने के नीतिगत प्रस्ताव चर्चा में रहते हैं। जब एक सामान्य नागरिक अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई से टैक्स भरता है, और उसी टैक्स के पैसे का इस्तेमाल निर्दोष नागरिकों को ही फर्जी मामलों में फँसाकर सरकारी मुआवजा बाँटने के लिए होने लगे, तो यह किसी भी लोकतांत्रिक देश के संवैधानिक ढाँचे पर सबसे बड़ा सवालिया निशान लगाता है।

जमीनी हकीकत और केस अध्ययन: जीवन तबाह करने वाली व्यवस्था- अराजकता

जब कोई कानून न्यायशास्त्र के मूलभूत सिद्धांतों- साक्ष्य, निष्पक्ष जाँच, और आत्मरक्षा के अधिकार- को दरकिनार कर केवल एकतरफा आरोप और गिरफ्तारी की शक्ति पर आधारित हो जाता है, तो वह समाज में किस प्रकार की त्रासदी रचता है, इसकी पुष्टि देश की विभिन्न अदालतों के अभिलेख करते हैं। एससी-एसटी एक्ट के बेजा इस्तेमाल के प्रमाण केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह बेकसूर नागरिकों के जीवन, परिवारों और प्रशासनिक व्यवस्था को भीतर से खोखला कर रहे हैं।

1.विष्णु तिवारी का मामला: 20 की जेल और उजड़ा हुआ परिवार

उत्तरप्रदेश के ललितपुर जिले का विष्णु तिवारी मामला आधुनिक भारतीय न्याय प्रणाली के माथे पर बहुत बड़ा धब्बा है। केवल एक बीघा जमीन और मवेशी के मामूली विवाद को लेकर विष्णु तिवारी के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट और दुष्कर्म की संगीन धाराओं में फर्जी मुकदमा दर्ज कराया गया। बिना किसी निष्पक्ष प्राथमिक जाँच के उसे सलाखों के पीछे भेज दिया गया, जहाँ उसने अपने जीवन के बेशकीमती 20 साल कालकोठरी में काट दिए।

वर्ष 2021 में जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सभी साक्ष्यों की समीक्षा के बाद विष्णु तिवारी को पूरी तरह निर्दोष मानते हुए बरी किया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। जेल में बिताए दो दशकों के दौरान सामाजिक कलंक, अवसाद और कानूनी लड़ाई के आर्थिक बोझ तले उसके पिता और दो भाइयों की असामयिक मृत्यु हो चुकी थी। जब विष्णु जेल से बाहर आया, तो न उसका घर बचा था और न ही परिवार। सवाल यह उठता है कि केवल एक शिकायत पर किसी नागरिक के 20 वर्ष छीन लेने वाली इस विधायी व्यवस्था में झूठा केस दर्ज कराने वालों के लिए कोई जवाबदेही तय है?

2.उच्च न्यायालयों की मुहर: जब अदालतों ने पकड़ा राष्ट्रव्यापी दुरुपयोग

विष्णु तिवारी का मामला कोई अपवाद नहीं है। देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों ने लगातार यह रेखांकित किया है कि कैसे एससी-एसटी एक्ट का उपयोग पेशेवर ईर्ष्या, अकादमिक विवादों और निजी रंजिशों को लेकर किया जा रहा है।

  • कलकत्ता हाईकोर्ट (अकादमिक विवाद बनाम जातिगत अत्याचार): फरवरी 2026 में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने संस्कृत कॉलेज एवं विश्वविद्यालय की विभागाध्यक्ष (संस्कृत प्रोफेसर) के खिलाफ दर्ज एससी-एसटी एक्ट की कार्यवाही को रद्द करते हुए ऐतिहासिक टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट किया कि कार्यस्थल पर होने वाले पेशेवर मतभेद, प्रशासनिक निर्णय या सामान्य विवाद स्वतः ही जातिगत अत्याचार नहीं बन जाते हैं। जब तक सार्वजनिक रूप से स्पष्ट जातिगत दुर्भावना सिद्ध न हो, तब तक धारा 3 (1) (r) के तहत आपराधिक मुकदमा चलाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
  • बॉम्बे हाईकोर्ट (16 साल तक प्रोफेसर का उत्पीड़न): मार्च 2026 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने 74 वर्षीय विधि प्रोफेसर वीरेंद्रनाथ बी. तिवारी के खिलाफ दर्ज 16 साल पुराने मामले को रद्द करते हुए शिकायतकर्ता की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए। आरक्षित पद की योग्यता पर सवाल उठाने के प्रतिशोध में प्रोफेसर के खिलाफ एक ही तरह के आरोपों पर लगातार तीन बार एफआईआर दर्ज कराई गई थी। पीठ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि एक ही आधार पर बार-बार कार्यवाही शुरू करना केवल एक वरिष्ठ नागरिक को अपमानित और प्रताड़ित करने का दुर्भावनापूर्ण प्रयास है।
  • इलाहाबाद हाईकोर्ट (विश्वविद्यालय में ₹15 लाख का जुर्माना): फरवरी 2024 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की एक सहायक प्रोफेसर द्वारा अपने तीन वरिष्ठ सहयोगियों के खिलाफ दर्ज कराई गई एससी-एसटी एक्ट के तहत एफआईआर को न केवल रद्द किया, बल्कि शिकायतकर्ता पर झूठे आरोपों को लेकर ₹15 लाख रुपए का भारी जुर्माना भी ठोका। अदालत ने माना कि केवल कक्षाएँ ठीक से लेने के निर्देश देने पर वरिष्ठ प्रोफेसरों को 8 वर्षों तक झूठे मुकदमे और सामाजिक बदनामी की आग में झोंक दिया गया।
  • कर्नाटक हाईकोर्ट (रोजगार और सेवा विवादों में ढाल): फरवरी 2026 में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने बेंगलुरु नॉर्थ यूनिवर्सिटी से जुड़े एक मामले में एफआईआर निरस्त करते हुए दो-टूक कहा कि किसी भी सामान्य रोजगार या सेवा विवाद को केवल इसलिए जातिगत अत्याचार का रूप नहीं दिया जा सकता है क्योंकि दूसरा पक्ष गैर-एससी-एसटी समुदाय से है।

3.प्रशासनिक और शैक्षणिक रीढ़ पर चोट: प्रतिशोध का विधायी हथियार

अदालती फैसलों से परे, जमीनी धरातल पर यह कानून अब कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों और शिक्षकों के खिलाफ एक दबाव समूह का काम कर रहा है।

  • शैक्षणिक जवाबदेही का पतन: देश के प्रतिष्ठित संस्थानों, जैसे आईआईटी बॉम्बे तक में जब नकल रोकने या अकादमिक मानकों को बनाए रखने का प्रयास किया जाता है, तो शिक्षकों पर तुरंत जातिगत दुर्भावना के आरोप मढ़ दिए जाते हैं। छात्र के व्यक्तिगत अवसाद या अनुशासनहीनता पर होने वाली सामान्य कार्रवाई को एससी-एसटी एक्ट के तहत आपराधिक रंग देकर शैक्षणिक वातावरण को आतंकित किया जा रहा है।
  • अपराधियों का रक्षा कवच: उत्तरप्रदेश और हरियाणा सहित कई राज्यों में ऐसे मामले भी सामने आए हैं जहाँ चोरी या लूटपाट करते रंगे हाथों पकड़े गए अपराधियों ने थाने में पीड़ितों के खिलाफ ही एससी-एसटी एक्ट के तहत जवाबी शिकायत कर दी। यहाँ तक कि दबाव बनाने के लिए पुलिस अधिकारियों को कार्रवाई न करने पर अंजाम भुगतने की धमकियाँ दी जाने लगीं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या लोग अपने साथ हुए अपराध की शिकायत भी करना छोड़ दें? जब अपराध रोकने वाले ही गैर-जमानती धाराओं में जेल जाने के खतरे में पड़ जाएँ, तो कानून के शासन का अर्थ ही क्या रह जाता है?

4.विश्वविद्यालयों में ब्लैकमेलिंग का नया कल्चर

विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव-विरोधी नियमों यानी यूजीसी एक्ट (UGC Act) और एससी-एसटी एक्ट के घालमेल ने एक खतरनाक स्थिति पैदा कर दी है। कैंपस के भीतर सामान्य आपसी नोंकझोंक, निजी विवादों या छात्राओं द्वारा प्रेम प्रस्ताव ठुकराए जाने जैसी स्थितियों में इस कानून को एक धौंस और ब्लैकमेलिंग के साधन के रूप में इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। सामान्य वर्ग के मेधावी छात्र और संकाय सदस्य इस भय में रहने लगे हैं कि एक छोटी सी असहमति भी उनका करियर, डिग्री और सामाजिक सम्मान नष्ट कर सकती है।

5.सामाजिक पलायन और राजनीतिक हथियार बनता कानून

इस कानून की विसंगतियाँ अब केवल अदालतों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह पूरे सामाजिक ढाँचे को उजाड़ रही हैं:

  • गाँवों से पलायन (फिरोजाबाद प्रकरण): उत्तरप्रदेश के फिरोजाबाद जिले के गोथुआ गाँव में एससी-एसटी एक्ट के फर्जी मुकदमों और लगातार धमकियों से तंग आकर सामान्य और पिछड़े वर्ग के ग्रामीणों ने अपने घरों पर ‘मकान बिकाऊ है’ लिखकर सामूहिक पलायन तक का रास्ता चुना।
  • खुला राजनीतिक दुरुपयोग: केरल में कांग्रेस नेता द्वारा राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ महिलाओं को एससी-एसटी एक्ट का इस्तेमाल करने के खुले प्रोत्साहन जैसी घटनाएँ यह साबित करती हैं कि यह कानून अब सामाजिक न्याय का माध्यम नहीं, बल्कि राजनीतिक और व्यक्तिगत प्रतिशोध का अचूक हथियार बन चुका है।

विधायी अतिवाद बनाम न्यायालयों की लक्ष्मण रेखा

संसद ने हमेशा राजनीतिक नफे-नुकसान या वोटबैंक को ध्यान में रखते हुए सुरक्षात्मक उपायों को बार-बार निष्प्रभावी करने का कार्य किया है। इससे समाज में गलत संदेश गया है। विद्वेष की भावना पनपी है- अराजकता को बढ़ावा मिला है। यही नहीं, मोदी सरकार ने तो मार्च 2018 के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को ही पलट दिया, जिसमें एससी-एसटी एक्ट के गलत और अन्यायपूर्ण प्रावधानों में सुधार- आरोपों की प्राथमिक जाँच, तुरंत गिरफ्तारी पर रोक और पूर्व अनुमति के साथ अग्रिम जमानत की भी बातें थीं। हद तो यह हो गई कि इस झूठी और घटिया सोच- ‘तुमने मुझे पानी नहीं पीने दिया, पढ़ने नहीं दिया, मौका मिल जाए तो…’- के साथ धारा 18ए जोड़कर न्याय के सारे रास्ते बंद कर दिए गए। हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे (2020 के पृथ्वीराज चौहान के मामले में) मान लिया, फिर भी इस कानून के अनियंत्रित दुरुपयोग को कम करने के लिए मरहम जैसे कुछ उपाय या ‘सुरक्षात्मक लक्ष्मण रेखाएँ’ (Judicial Safeguards) अवश्य खींची हैं:

  • सार्वजनिक दृश्य (Within Public View): सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों में यह स्पष्ट किया है कि केवल जातिगत शब्दों के प्रयोग का आरोप लगना ही अपराध नहीं बन जाता है। धारा 3(1) (r) और 3(1) (s) के तहत अपराध तभी माना जाएगा जब कथित घटना किसी सार्वजनिक स्थान पर, किसी स्वतंत्र गवाह की उपस्थिति में घटी हो। चारदीवारी के भीतर, निजी केबिन में या बंद कमरों में हुए आपसी विवादों को एससी-एसटी एक्ट के तहत आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता है।
  • निजी रंजिशों में फर्जी एफआईआर को निरस्त (Quash) करने का अधिकार: अदालतों ने बार-बार रेखांकित किया है कि दीवानी विवादों (Civil Disputes), संपत्ति के झगड़ों या निजी प्रतिद्वंद्विता के चलते इस कानून का इस्तेमाल एक ‘दबाव बनाने की रणनीति’ के तहत किया जा रहा है। ऐसे मामलों में उच्च न्यायालयों ने संविधान के अनुच्छेद 226 और आपराधिक प्रक्रिया संहिता (अब BNSS) की धारा 482 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए दुर्भावनापूर्ण एफआईआर को सीधे रद्द करने का रुख अपनाया है।

एससी-एसटी एक्ट में बदलाव की जरूरत- क्यों और कैसे? (समाधान)

इसमें कोई दो राय नहीं है कि अदालतों की पहल अच्छी है, लेकिन सवाल उठता है कि किसी निर्दोष के लुट-पिट जाने या बर्बाद होने के बाद यदि कोई निर्णय आता भी है- एफआईआर रद्द होती है, तो उसका क्या अर्थ रह जाता है? विभिन्न निर्णयों में ही देखें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि एससी-एसटी एक्ट के झूठे केस में फँसाए लोग वर्षों तक अपमान और प्रताड़ना झेलते रहे, मगर कहीं से कोई राहत नहीं मिली। अंत में उन्हें न्याय अवश्य मिला पर ऐसा न्याय घाव पर मरहम से ज्यादा कुछ नहीं है।

विडंबना यह है कि अब न्याय प्राप्त करना भी आसान नहीं रह गया है। न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से स्थिति ऐसी बन गई कि आज अदालतों में मुकदमे लड़ना सीमा पर जंग लड़ने जैसा प्रतीत होता है। इसलिए, पहले समस्या पैदा होने देने, फिर उसका हल निकालने की व्यर्थ प्रक्रिया के बजाय सीधे समस्या के मूल पर ही प्रहार करने यानी एससी-एसटी एक्ट में निम्नलिखित चार अपरिहार्य और संरचनात्मक सुधार या बदलाव करना अनिवार्य है:

1.मुआवजे के नियम 12 में तत्काल संशोधन: ‘एफआईआर स्टेज’ पर भुगतान बंद हो

वर्तमान में एफआईआर होते ही 25% से 50% राहत राशि जारी करने की व्यवस्था ही इस कानून के दुरुपयोग की मुख्य वजह है।

  • दोषसिद्धि से जुड़ाव: वित्तीय सहायता केवल और केवल तभी जारी की जानी चाहिए जब मुकदमा अदालत में पूरी सुनवाई के बाद साबित हो और आरोपी को सक्षम न्यायालय द्वारा दोषी (Convicted) ठहराया जाए।
  • वसूली व जब्ती तंत्र: यदि कोई शिकायत अदालत में झूठी, मनगढ़ंत या उगाही के उद्देश्य से की गई पाई जाती है, तो शिकायतकर्ता से सरकारी खजाने से ली गई राशि ब्याज सहित वसूली जानी चाहिए। यदि वह इसका भुगतान करने में विफल रहता है, तो उस राशि को भू-राजस्व के बकाए (Arrears of Land Revenue) की तरह उसकी संपत्ति कुर्क करके वसूली जानी चाहिए।

2.राजपत्रित अधिकारी द्वारा प्राथमिक जाँच अनिवार्य हो

किसी भी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को केवल एकतरफा आरोप के आधार पर छीना नहीं जा सकता है।

  • न्यूनतम समय-सीमा में जाँच: बिना डीएसपी (DSP) या उससे उच्च स्तर के राजपत्रित अधिकारी (Gazetted Officer) द्वारा कम से कम 7 से 14 दिनों की प्राथमिक जाँच के किसी भी नागरिक की यांत्रिक गिरफ्तारी (Mechanical Arrest) पर पूर्ण रोक लगे।
  • साक्ष्यों का सत्यापन: जाँच अधिकारी को सबसे पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कथित घटना किसी सार्वजनिक स्थान पर हुई या निजी संपत्ति या फिर किसी रंजिश के कारण विवाद को जातिगत रंग दिया गया है। झूठी शिकायत पाए जाने पर एफआईआर दर्ज करने से पूर्व ही उसे खारिज करने का स्पष्ट कानूनी अधिकार पुलिस को मिले।

3.धारा 18A की समीक्षा और अग्रिम जमानत की तार्किक बहाली

वर्ष 2018 में संसद द्वारा जोड़ी गई धारा 18A, जो आपराधिक प्रक्रिया संहिता के तहत अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) के अधिकार को पूरी तरह छीन लेती है, संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) की मूल भावना पर चोट करती है।

  • न्यायिक विवेक की स्वतंत्रता: दुर्भावनापूर्ण और झूठे मुकदमों के मामलों में सत्र न्यायालय और उच्च न्यायालयों को प्रथम दृष्ट्या साक्ष्यों के आधार पर अग्रिम जमानत देने का अधिकार पुनः बहाल किया जाना चाहिए। इससे निर्दोष नागरिकों को जेल जाने, सामाजिक कलंक झेलने और करियर बर्बाद होने से बचाया जा सकेगा।

4.झूठी शिकायत दर्ज कराने वालों पर बीएनएस (BNS) के तहत गैर-जमानती कार्रवाई

जब तक कानून का दुरुपयोग करने वालों के मन में कठोर दंड का भय नहीं होगा, तब तक फर्जी मुकदमों का यह धंधा बंद नहीं हो सकता है।

  • सख्त कानूनी प्रावधान: भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत झूठे साक्ष्य गढ़ने, सरकारी तंत्र को गुमराह करने और निर्दोषों को प्रताड़ित करने वाले ब्लैकमेलरों के खिलाफ स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेकर गैर-जमानती धाराओं में मुकदमा दर्ज होना चाहिए।
  • समान दंड का सिद्धांत: फर्जी केस दर्ज कराने वाले व्यक्ति और उसके षड्यंत्रकारी सहयोगियों को कम से कम उतनी ही सजा का प्रावधान होना चाहिए जितनी सजा उस धारा के तहत निर्दोष आरोपी को हो सकती थी।

निष्कर्ष (Conclusion)

भारत आज बाहर से कम, अंदर से अधिक असुरक्षित दिखाई देता है। इसके अनेक कारण हैं। लेकिन इनके मूल में जाएँ, तो दो सबसे बड़े कारण स्पष्ट दिखाई देते हैं- पहला, औपनिवेशिक कानून और दूसरा, दलित-मुस्लिम वोट-बैंक की नीति, जो मीम-भीम के नारे के रूप में सुनाई-दिखाई देती है। भारतीय भाषा-शब्दों के आवरण में स्थापित औपनिवेशिक कानून ‘बाँटो और राज करो’ (Divide and Rule) की नीति पर चलता है तो जाति और मजहब आधारित दलित-मुस्लिम वोट-बैंक का समीकरण समाज और कानून दोनों से खेलता है। मुस्लिम तुष्टीकरण के कारण तो पूरा भारत खतरे में नजर आता है।

न्यायपालिका का भी अपना नेरेटिव और नीति प्रतिमान (Policy Paradigm) है। यह भी संगठित लोगों या दबाव समूहों के रुख के हिसाब से ही चलती है। बँटे हुए लोगों के तो भगवान भी अदालतों में अपमानित होते हैं। ऐसे में, यह अपेक्षा करना कि एससी-एसटी एक्ट में सुधार या इसके दुरुपयोग को लेकर संसद बड़ा दिल दिखाएगी, या न्यायपालिका दिल दरिया कर स्वतः संज्ञान लेते हुए कोई ऐतिहासिक निर्णय दे सकती है, यह खयाली पुलाव पकाने जैसा ही है।

सवाल यह भी है कि खुद जातियों में बँटा सामान्य वर्ग, जिसे सवर्ण समाज भी कहा जाता है, क्या यह चुनौती बन सकता है? जवाब है- हाँ। इतिहास गवाह है कि जब भी देश और समाज संकट में दिखा, यही वर्ग सबसे पहले आगे आया, और संघर्षों में सबसे अधिक नेतृत्व भी इसी ने दिए। आज तो महज वोट की लड़ाई है- इसका एकमुश्त वोट किसी भी राजनीतिक दल का समीकरण बिगाड़ सकता है। संगठित होकर यह न्यायपालिका पर भी दबाव बना सकता है।

हालात बिगड़ते जा रहे हैं, इसलिए असहमति या आलोचना से आगे बढ़कर अब सरकार के वैचारिक दोगलेपन का कड़ा विरोध करना होगा। यह पूछना होगा कि सात दशक बाद भी आरक्षण व्यवस्था जारी क्यों है- क्या अयोग्य भारत को विकसित राष्ट्र बना सकते हैं? एससी-एसटी एक्ट (SC-ST Act) के बजाय एक कास्ट न्यूट्रल एक्ट (Caste Neutral Act) क्यों नहीं हो सकता है, क्योंकि अपमानित तो ब्राह्मण भी होते हैं? भेदभाव आज सबसे अधिक सामान्य वर्ग के साथ हो रहा है।

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    रामाशंकर पांडेय

    दुनिया में बहुत कुछ ऐसा है, जो दिखता तो कुछ और है पर हक़ीक़त में वह होता कुछ और ही है. इसीलिए कहा गया है कि चमकने वाली हर चीज़ सोना नहीं होती है. इसी बात को ध्यान में रखते हुए, एक माध्यम का यह दायित्व है कि पूर्वाग्रहरहित एवं निष्पक्ष रहते हुए लोगों तक स्पष्ट और सही जानकारी पहुंचाए. khulizuban.com का प्रयास इसी दिशा में एक क़दम है. यह खुले विचारों वाला मंच है, जहाँ समाज, संस्कृति, राजनीति, इतिहास, धर्म, ज्ञान-विज्ञान, आदि से जुड़ी सभी प्रकार की विशिष्ट एवं सटीक जानकारी उपलब्ध है. इन पर भरोसा किया जा सकता है.

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