क्या वाकई धरती पर आये थे ईसा मसीह? जानिए पहली सदी के गैर-ईसाई दस्तावेजों में मिलावट का सच
क्या ईसा मसीह पौराणिक कहानियों के पात्र हैं या पहली सदी के ऐतिहासिक रिकॉर्ड उनके वजूद की गवाही देते हैं? पढ़िए कलीसियाई प्रतिलिपिकारों की सोची-समझी साहित्यिक हेराफेरी (Interpolations) और झूठ, पाखंड व संस्थागत अंधविश्वास के गिरते ग्राफ की पूरी रिपोर्ट.

झूठ, पाखंड और संस्थागत अंधविश्वास (Institutional Superstition) ही इस दुनिया की सबसे बड़ी समस्या रहे हैं. जब मजहबी तत्व और उनके संगठन अपनी विचारधारा फैलाना चाहते हैं, तो वे आधार और वैधता साबित करने के लिए इतिहास के पन्नों के साथ भी बौद्धिक हेराफेरी करने से बाज नहीं आते हैं. इस मामले में इब्राहिमी मजहब शुरुआत से ही कठघरे में रहे हैं. खासतौर से, ईसाई धर्मग्रंथ अपनी ऐतिहासिक प्रामाणिकता को लेकर अक्सर चर्चा के केंद्र में रहते हैं. उदाहरण के लिए, मत्ती और लूका के सुसमाचारों में दर्ज विरोधाभासों के कारण ईसा मसीह की वंशावली पर मतभेद खुलकर सामने आ जाते हैं. स्थिति यह है कि खुद बाइबल के पन्नों में ईसा मसीह के दादा कौन थे, इस मूल सवाल पर भी भारी ऐतिहासिक झोल दिखाई देता है. ऐसे में, अब सवाल यह उठता है कि क्या वाकई धरती पर आए थे ईसा मसीह (Did Jesus Christ Really Exist)? इसके लिए हमें आस्था के चश्मे और चर्च के उपदेशों को हटाकर, एक आधुनिक पंथनिरपेक्ष इतिहासकार (Secular Historian) और उच्चतर बाइबल समीक्षक (Higher Biblical Critic) के नजरिए से देखना और पता करना होगा कि क्या बाइबल से बाहर भी ईसा मसीह का कोई वजूद मिलता है? या फिर यूँ कहिये कि क्या पहली सदी के गैर-ईसाई या रोमन और यहूदी दस्तावेजों में ईसा मसीह का कोई ठोस प्रमाण मौजूद है?

बार्ट एरमैन (Bart Ehrman) जैसे दुनिया के शीर्ष पंथनिरपेक्ष बाइबल विद्वान और आधुनिक इतिहासकार जब पहली सदी के दस्तावेजों को खंगालते हैं, तो वे किसी चमत्कार या ‘थियोलॉजिकल डैमेज कंट्रोल थ्योरी’ पर भरोसा नहीं करते हैं. वे इतिहास को उसकी नग्न सच्चाई के साथ देखते हैं. जब हम कलीसियाई इतिहास की इन खोजी परतों को उतारते हैं, तो पहली सदी के सबसे प्रसिद्ध यहूदी इतिहासकार फ्लावियस जोसिफस (Flavius Josephus) का एक ऐसा रोमांचक मामला सामने आता है, जिसने चर्च के संस्थागत झूठ और इतिहास के साथ की गई साहित्यिक मिलावट (Interpolation) को पूरी दुनिया के सामने बेनकाब कर दिया. आइए, बिना किसी लाग-लपेट के इतिहास के उन पन्नों की फोरेंसिक और निष्पक्ष पड़ताल शूरू करते हैं.
1.जोसिफस का मामला: टेस्टीमोनियम फ्लेवियानम का बड़ा खुलासा (The Testimonium Flavianum Case)
बाइबल के बाहर ईसा मसीह के ऐतिहासिक वजूद को तलाशने वाले विद्वानों के पास सबसे बड़ा हथियार पहली सदी के प्रसिद्ध यहूदी इतिहासकार फ्लावियस जोसिफस (Flavius Josephus) के दस्तावेज रहे हैं. जोसिफस ने लगभग 93-94 ईस्वी में यहूदियों का एक व्यापक इतिहास लिखा, जिसे ‘Antiquities of the Jews’ (यहूदियों के प्राचीन ग्रंथ) कहा जाता है. इस ऐतिहासिक ग्रंथ की अठारहवीं पुस्तक (Book 18) में एक ऐसा पैराग्राफ मिलता है, जिसने सदियों से बाइबल समीक्षकों और पंथनिरपेक्ष इतिहासकारों को हैरान कर रखा है. इतिहास की दुनिया में इसे टेस्टीमोनियम फ्लेवियानम (The Testimonium Flavianum) यानी ‘जोसिफस की गवाही’ कहा जाता है.
चर्च द्वारा सदियों से सहेजकर रखी गई पारंपरिक प्रतियों में जोसिफस के नाम से लिखा है:
इस समय यीशु नाम का एक बुद्धिमान व्यक्ति था, यदि उसे मनुष्य कहना वैध हो… क्योंकि वह अद्भुत काम करने वाला था… वह मसीहा (Christ) था. जब पिलातुस ने हमारे बीच के मुख्य पुरुषों के परामर्श (या आग्रह) पर उसे क्रूस पर चढ़ाने की सजा दी, तो जो उससे पहले से प्यार करते थे, उन्होंने उसे नहीं छोड़ा; क्योंकि वह तीसरे दिन पुनर्जीवित होकर उनके सामने प्रकट हुआ… और ईसाइयों का यह पंथ, जिसका नाम उसके नाम पर पड़ा है, आज तक विलुप्त नहीं हुआ है.
(1) इतिहासकारों द्वारा जाँच: चर्च की जालसाजी का पर्दाफाश (Investigation- Church’s Literary Forgery Exposed)
जब बार्ट एरमैन (Bart Ehrman) जैसे आधुनिक उच्चतर बाइबल समीक्षकों (Higher Biblical Critics) और निष्पक्ष इतिहासकारों ने इस पैराग्राफ की आधुनिक भाषाई और ऐतिहासिक जाँच की, तो चर्च का एक बहुत बड़ा झूठ और ‘साहित्यिक जालसाजी’ बेनकाब हो गई. इतिहासकारों ने इस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया कि ये शब्द जोसिफस के अपने थे. इसके पीछे के अकादमिक और तार्किक कारण बिल्कुल शीशे की तरह साफ है:
- यहूदी पहचान का विरोधाभास: फ्लावियस जोसिफस एक पारंपरिक फरीसी यहूदी (Pharisee Jew) था, जिसने बाद में रोमन सम्राट वेस्पेशियन का दरबारी इतिहासकार बनना स्वीकार किया. वह अपनी मृत्यु तक यहूदी पहचान के साथ जिया और कभी ईसाई नहीं बना. यह वैचारिक रूप से पूरी तरह असंभव है कि एक गैर-ईसाई यहूदी अपनी किताब में अधिकारिक तौर पर यह घोषणा करे कि ‘यीशु ही मसीहा था’ और वह मरने की तीन दिन बाद जी उठा.’ अगर जोसिफस सचमुच ऐसा मानता, तो वह धर्मपरिवर्तन कर यहूदी से ईसाई बन चुका होता.
- शुरुआती ईसाई विद्वानों और चर्च की खामोशी: दूसरी और तीसरी सदी के शुरुआती ईसाई विद्वान जैसे जस्टिन मार्टियर (Justin Martyr) और टरटुलियन (Tertullian), जो रोमन साम्राज्य के सामने ईसाइयत को सही साबित करे के लिए जमीन-आसमान एक कर रहे थे, उन्होंने जोसिफस के इस पैराग्राफ का अपनी किसी भी बहस में कभी जिक्र नहीं किया. यहाँ तक कि तीसरी सदी के प्रसिद्ध ईसाई इतिहासकार ओरिगन (Origen) ने स्पष्ट रूप से लिखा था कि ‘जोसिफस यीशु को मसीहा (Christ) नहीं मानता था.’ अगर यह पैराग्राफ मूल रूप से मौजूद होता, तो शुरुआती ईसाई लेखक इसे अपने सबसे बड़े ढाल की तरह इस्तेमाल करते.
(2) ईसाई प्रतिलिपिकारों की बौद्धिक हेराफेरी (The Cristian Interpolations)
तो फिर यह चमत्कारी पैराग्राफ जोसिफस की किताब में आया कहाँ से? आधुनिक पंथनिरपेक्ष इतिहासकारों का स्पष्ट और अकादमिक निष्कर्ष है कि यह ‘ईसाई मिलावट’ (Christian Interpolations) का एक क्लासिक उदाहरण है. चौथी सदी के आसपास, जब ईसाइयत रोमन साम्राज्य का राजधर्म बन रही थी, तब कलीसियाई प्रतिलिपिकारों (Church Scribes) जोसिफस की मूल पांडुलिपियों की नकल तैयार करते समय खुद से ये जाली लाइनें जोड़ दीं.
मशहूर इतिहासकार बार्ट एरमैन अपनी पुस्तक Did Jesus Exist? में इस बात को रेखांकित करते हैं कि जोसिफस ने मूल रूप से केवल इतना लिखा होगा कि फिलिस्तीन में यीशु नाम का एक शिक्षक था जिसे पिलातुस ने सूली पर चढ़ाया था. लेकिन चर्च के प्रतिलिपिकारों ने ‘थियोलोजिकल डैमेज कंट्रोल’ और यीशु को ईश्वर सिद्ध करने के उन्माद में, एक निष्पक्ष यहूदी इतिहासकार के मुँह में जबरन अपने शब्द ठूँस दिए.
2.याकूब (James) का प्रसंग: मिलावट से परे असली ऐतिहासिक गवाही (The Authentic Case of James)
जहाँ एक तरफ ‘टेस्टीमोनियम फ्लेवियानम’ में चर्च की साहित्यिक हेराफेरी पकड़ी जाती है, वहीं इसी ग्रंथ में आगे चलकर एक ऐसा प्रसंग आता है जिसे बार्ट एरमैन (Bart Ehrman) सहित दुनिया के लगभग सभी आधुनिक पंथनिरपेक्ष इतिहासकार 100% प्रामाणिक और ऐतिहासिक रूप से अकाट्य मानते हैं.
यहूदी इतिहासकार फ्लावियस जोसिफस ने अपनी पुस्तक Antiquities of the Jews के 20वें खंड (Book 20, Chapter 9) में यरूशलेम के एक क्रूर महायाजक (High Priest) अनानुस (Ananus) की राजनीतिक सनक का ब्यौरा दिया है. लगभग 62 ईस्वी की एक घटना का वर्णन करते हुए जोसिफस लिखता है:
अनानुस ने न्यायाधीशों की एक परिषद बुलाई और उनके सामने याकूब (James) नामक एक व्यक्ति को खड़ा किया, जो उस यीशु का भाई था जिसे मसीहा (Christ) कहा जाता था, और कुछ अन्य लोगों को भी; और उन पर कानून के उल्लंघन के आरोप लगाकर उन्हें पत्थर से मार डालने के लिए सौंप दिया.
इतिहासकार इसे अकाट्य प्रमाण क्यों मानते हैं? (Why Scholars Trust It)
उच्चतर बाइबल आलोचक (Higher Biblical Critics) इस प्रसंग को चर्च की मिलावट से पूरी तरह मुक्त मानते हैं. इसके पीछे के तीन सबसे बड़े इतिहासिक कारण निम्नलिखित हैं:
- महिमा-मंडन का अभाव (No Theological Flattery): यहाँ जोसिफस यीशु का महिमा-मंडन नहीं कर रहा है, न ही वह उन्हें ‘परमेश्वर का पुत्र’ या चमत्कारी कह रहा है. वह केवल यरूशलेम की अदालती कार्यवाही- सजा का ब्यौरा दे रहा है.
- पहचान का पंथनिरपेक्ष तरीका: पहली सदी के यहूदी समाज में यीशु (Yeshua) एक बहुत आम नाम था. इसलिए, जोसिफस ने केवल पहचान स्पष्ट करने के लिए लिखा कि यह वही याकूब है, जिसके भाई यीशु को कुछ लोग मसीहा मानते थे. ध्यान देने योग्य बात यह है कि जोसिफस खुद यीशु को मसीहा नहीं मान रहा है, बल्कि वह लिखता है- “जिसे मसीहा कहा जाता था (Who was Called Christ),” यह बारीक अंतर साबित करता है कि यह किसी ईसाई प्रतिलिपिकार की मिलावट नहीं, बल्कि एक निष्पक्ष यहूदी इतिहासकार के अपने मूल शब्द हैं.
- पारिवारिक कड़ियों का मिलान: यह मिलान नए नियम (New Testament) के उन प्रसंगों से मेल खाता है जहाँ याकूब को यीशु का भाई बताया गया है. हालाँकि, कई खोजी विद्वानों का मानना है कि यह मिलान त्रुटिपूर्ण है, और काल्पनिक कहानियों को वैधता देता प्रतीत होता है.
3.रोमन इतिहासकारों की गवाही: टैसिटस और कलीसिया का दावा (Roman Records & Tacitus)
यहूदी स्रोतों के अलावा, ईसा मसीह के ऐतिहासिक अस्तित्व का दूसरा सबसे बड़ा गैर-ईसाई प्रमाण रोमन साम्राज्य के दस्तावेजों को बताया जाता है. इनमें सबसे प्रमुख नाम आता है दूसरी सदी के रोमन इतिहासकार पब्लियस कॉर्नेलियस टैसिटस (Publius Cornelius Tacitus) का.
टैसिटस ने लगभग 116 ईस्वी में रोमन साम्राज्य का इतिहास लिखा, जिसे ‘Annals’ कहा जाता है. इसके 15वें खंड यानी Book 15, Chapter 44 में, टैसिटस ने 64 ईस्वी में रोम में लगी उस भीषण आग का जिक्र किया है, जिसका आरोप क्रूर सम्राट नीरो (Nero) ने ईसाइयों पर मढ़ दिया था. इस घटना का विवरण देते हुए टैसिटस के नाम से दर्ज प्रतियों में लिखा है:
इस सम्प्रदाय का नाम क्रिस्तस (Christus) से पड़ा था, जिसे सम्राट तिबेरियस (Tiberius) के शासन काल में हमारे एक प्रांतीय गवर्नर पोंटियस पिलातुस (Pontius Pilatus) द्वारा मृत्युदंड दिया गया था. इस विनाशकारी अंधविश्वास को कुछ समय के लिए दबा दिया गया, लेकिन यह फिर से न केवल जुडिया (Judea) में भड़क उठा, जहाँ से यह बुराई शुरू हुई थी, बल्कि रोम में भी फैल गया.
एक रोमन इतिहासकार के शब्दों का फोरेंसिक विश्लेषण (The Roman Analysis)
मुख्यधारा के उच्चतर बाइबल समीक्षक इस संदर्भ को पूरी तरह निष्पक्ष और ऐतिहासिक मानते हैं, क्योंकि टैसिटस ईसाइयों का घोर विरोधी था. वह ईसाइयत को एक ‘विनाशकारी अंधविश्वास’ (Mischievous Superstition) कह रहा था. इन इतिहासकारों का तर्क है कि एक ईसाई-विरोधी रोमन इतिहासकार कभी भी ईसाइयों के पक्ष में कोई फर्जी कहानी नहीं गढ़ेगा.
चर्च और इन इतिहासकारों के अनुसार, यह रोमन रिकॉर्ड दो बहुत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्यों को प्रमाणित करता है:
1.पहली सदी में क्रिस्तस (ईसा मसीह) नाम का एक वास्तविक व्यक्ति मौजूद था.
2.उसे यहूदिया के रोमन गवर्नर पोंटियस पिलातुस द्वारा मृत्युदंड दिया गया था.
मुख्यधारा के इतिहासकार और चर्च के पैरोकारों के लिए टैसिटस का यह बयान ईसा मसीह के ऐतिहासिक वजूद पर अंतिम मुहर जैसा है. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती है. जब हम इसी रोमन रिकॉर्ड की बारीक परतों को आधुनिक विज्ञान और निष्पक्ष फोरेंसिक नजर से उतारते हैं- खंगालते हैं, तो इस ‘अकाट्य प्रमाण’ की बुनियाद भी हिलती हुई दिखाई देती है. पश्चिम के ही खोजी विद्वानों ने इस रोमन गवाही में कुछ ऐसे प्रशासनिक झोल और कलीसियाई खेल पकड़े हैं, जो पूरे इतिहास को एक बिल्कुल नया और चौंकाने वाला मोड़ दे देते हैं. कोलंबिया यूनिवर्सिटी से प्राचीन इतिहास में पीएचडी प्राप्त, विद्वान और इतिहासकार डॉ. रिचर्ड कैरियर अपने शोध हाउ हिस्टोरियंस ट्राई टू रेस्क्यू जीसस में इस बात का विस्तार से खुलासा करते हैं कि मुख्यधारा के इतिहासकार कलीसियाई दावों को बचाने के लिए कैसी तार्किक कलाबाजियां खाते हैं.
क्या महज एक मिथक थे यीशु? पश्चिम के ‘क्राइस्ट मिथ’ विद्वानों का तर्क (The Christ Myth Theory)
इतिहास की परतों को जब हम और गहराई से उतारते हैं, तो आधुनिक बाइबल समीक्षा में एक और बड़ा और तीखा मोड़ आता है. पश्चिम के कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों और अकादमिक हल्कों में एक गंभीर वैचारिक आंदोलन चल रहा है, जिसे ‘क्राइस्ट मिथ थ्योरी’ (Christ Myth Theory) या ‘मिथिसिज्म’ (Mythicism) कहा जाता है. इस सिद्धांत को मानने वालों का सीधा तर्क है कि ईसा मसीह नामक कोई वास्तविक व्यक्ति कभी पैदा नहीं हुआ; वे महज एक पौराणिक चरित्र (Mythological Character) हैं, जिन्हें बाद में लेखकों ने ऐतिहासिक रूप दे दिया.

कोलंबिया यूनिवर्सिटी (Columbia University) से प्राचीन इतिहास में पीएचडी धारक डॉ. रिचर्ड कैरियर (Dr. Richard Carrier) और न्यू टेस्टामेंट स्टडीज के विशेषज्ञ डॉ. रॉबर्ट एम. प्राइस (Dr. Robert M. Price) जैसे आधुनिक पंथनिरपेक्ष विद्वान इस थ्योरी के सबसे बड़े चेहरे हैं. इतिहास की कसौटी पर अपनी बात साबित करने के लिए ये विद्वान तीन बड़े मुख्य तर्क पेश करते हैं:
- 1.समकालीन स्रोतों का पूर्ण सन्नाटा (The Argument from Silence): ईसा मसीह के अनुमानित जीवनकाल (1 से 30 ईस्वी) के दौरान फिलिस्तीन, मिस्र और रोम में दर्जनों दार्शनिक और दरबारी लेखक मौजूद थे. यदि ईसा मसीह नाम का कोई चमत्कारी पुरुष वास्तव में मौजूद था, तो उस दौर के किसी भी समकालीन पंथनिरपेक्ष दस्तावेज में उनका एक बार भी जिक्र क्यों नहीं मिलता है? सारे प्रमाण उनकी मौत के दशकों बाद के हैं, जो केवल सुनी-सुनाई बातों पर आधारित हैं.
- 2.प्राचीन मूर्तिपूजक देवताओं की नकल (The Pagan Copycat Theory): इन विद्वानों का दावा है कि यीशु का चरित्र मिस्र के देवता ‘होरस’ (Horus) और फारस के ‘मित्रा’ (Mithras) जैसी प्राचीन पैगन लोककथाओं का एक संकलन है. ‘कुँआरी से जन्म’, ’25 दिसंबर की तारीख’ और ‘मौत के बाद दोबारा जिंदा होना’ जैसे तत्व इन प्राचीन देवताओं की कहानियों में सदियों पहले से मौजूद थे.
- 3.शुरुआती पत्रों का रहस्य (The Secret of Early Epistles): सेंट पॉल के सबसे पुराने पत्रों में यीशु को कभी धरती पर रहने वाले किसी सामान्य बढ़ई के रूप में नहीं, बल्कि एक ‘आध्यात्मिक या स्वर्गीय प्राणी’ (Celestial Being) के रूप में दर्शाया गया था. बाद में ‘मरकुस के समाचार’ के लेखकों ने कलीसियाई राजनीति के तहत उसे जमीन पर लाकर ऐतिहासिक जामा पहना दिया.
कलीसिया का गिरता ग्राफ और आधुनिक सच (The Modern Shift)
टैसिटस और जोसिफस के ये गैर-ईसाई दस्तावेज यह तो साफ कर देते हैं कि पहली सदी में ईसाइयत को एक ‘विनाशकारी अंधविश्वास’ के रूप में देखा जाता था, जिसे रोमन सत्ता ने दबाने का प्रयास किया. लेकिन चर्च के अलौकिक, जादुई और ईश्वरीय दावों के विपरीत, इतिहासकार इस आंदोलन के प्रसार को की दैवीय चमत्कार के बजाय एक शुद्ध राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल के रूप में देखते हैं. सदियों तक सत्ता और अंधविश्वास के गठजोड़ से फला-फूला यह कलीसियाई साम्राज्य आज आधुनिक युग में शिक्षा, विज्ञान और तर्कशक्ति के प्रसार के बाद अपने सबसे बड़े संकट के दौर से गुजर रहा है.
विशेषकर पश्चिमी देशों में, जो कभी ईसाइयत के सबसे मजबूत गढ़ थे, वहाँ पिछले 100 वर्षों का इतिहास चर्च के पतन की कहानी बयां करता है. विश्वप्रसिद्ध एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी प्रेस के सांख्यिकीय आंकड़े (जिन्हें प्यू रिसर्च सेंटर ने भी अपनी रिपोर्ट में संकलित किया है), यह साबित करते हैं कि यूरोप और अमरीका में चर्च जाने वाले लोगों की संख्या में ऐतिहासिक गिरावट आई है. आधुनिक पीढ़ी तेजी से संस्थागत रिलिजन को छोड़कर खुद को नास्तिक या अधार्मिक (Nones) घोषित कर रही है. सदियों पुराना वह कलीसियाई तंत्र, जिसने कभी इतिहास के पन्नों के साथ बौद्धिक हेराफेरी की थी, आज आधुनिक समाज में पूरी तरह बेनकाब हो चुकी है. अब यह चर्चा का विषय यह है कि एशियाई और अफ्रीकी देशों में पैसा पानी की तरह क्यों बहाया जा रहा है- वहाँ बड़े पैमाने पर ईसाइयत के प्रचार का उद्देश्य रिलिजन का विस्तार है या वजूद बचाने की कवायद?
निष्कर्ष: सच बनाम संथागत झूठ (The Final Verdict)
आस्था के रंगीन चश्मे और कलीसिया (Church) की हेराफेरी को हटाकर जब हम निष्पक्ष इतिहास की चर्चा की मेज पर बैठते हैं, तो सच के दो पहलू हमारे सामने होते हैं. एक तरफ बार्ट एरमैन (Bart Ehrman) जैसे इतिहासकार हैं, जो जोसिफस और टैसिटस के आधार पर यीशु को एक वास्तविक लेकिन आम इंसान मानते हैं, जिसके दस्तावेजों में बाद में चर्च ने जमकर साहित्यिक मिलावट (Interpolation) की. दूसरी तरफ, रिचर्ड कैरियर जैसे ‘क्राइस्ट मिथ’ विद्वान हैं जो समकालीन सबूतों के पूर्ण अभाव में यीशु या ईसा मसीह के पूरे वजूद को ही एक पौराणिक कल्पना करार देते हैं.
एक स्वतंत्र, निर्भीक और आधुनिक दृष्टिकोण से हम किसी एक पक्ष का अंधानुकरण नहीं कर सकते हैं. लेकिन एक बात पूरी तरह आईने की तरह साफ है- चाहे यीशु इतिहास के एक साधारण मनुष्य रहे हों या महज एक साहित्यिक कल्पना, कलीसियाई संगठनों और चर्च के पैरोकारों ने अपनी राजनीतिक-धार्मिक सत्ता को स्थापित करने के लिए इतिहास के पन्नों को प्रदूषित करने और अंधविश्वास फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.
दुनिया की सबसे बड़ी समस्या यही है कि संस्थागत पंथ या रिलिजन हमेशा सच की कब्र पर अपने झूठ का महल खड़ा करना चाहता है. लेकिन हमारी वेबसाइट ‘खुलीजुबान डॉट कॉम’ का यह दायित्व है कि हम पाठकों के सामने सारे तथ्य पूरी स्पष्टता के साथ रख दें, क्योंकि वैचारिक गुलामी और झूठ की बुनियाद पर खड़े होने से बेहतर है सच के साथ दफन हो जाना.
और चलते-चलते इस आलेख- विषय पर यही शेर मौजूं है:
जब तक वो झूठ कहता रहा सर पे ताज था,
सच कह दिया तो ताज ही क्या सर नहीं निकला|
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