इतिहास

गुंडाधुर: भूमकाल विद्रोह के महानायक क्यों गुमनामी के अंधेरे में धकेल दिए गए?

आजादी की लड़ाई के इतिहास में 1910 का भूमकाल विद्रोह बहुत महत्वपूर्ण था, लेकिन न केवल इसे जनजाति विद्रोह तक सीमित कर दिया गया, बल्कि इसके महानायक गुंडाधुर को भी गुमनामी के अंधेरे में धकेल दिया गया। आखिर क्यों, और कैसे- इस लेख में विस्तार से जानिए।

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भारत की आजादी की लड़ाई में जहाँ पूरा देश शामिल था, वहीं लोगों का नेतृत्व करने वाले या नायक भी अनेक थे। मगर उनमें कुछ ऐसी हस्तियाँ भी थीं जिनकी सूझबूझ, क्षमता और अभूतपूर्व योगदान को देखते हुए उन्हें जीवित या मरणोपरांत, महानायक की श्रेणी में रखकर या स्थान देकर सम्मानित किया गया, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ उन्हें जाने और याद रखे। ऐसे ही एक महानायक थे गुंडाधुर, जिन्हें बस्तर का माटीपुत्र कहा जाता है। इस महान स्वतंत्रता सेनानी ने अपने साथियों के साथ मिलकर भीषण संघर्ष कर अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी थी। मगर विडंबना देखिए कि भूमकाल विद्रोह के इस महानायक को उचित स्थान व सम्मान देने के बजाय उन्हें गुमनामी के अंधेरे में धकेल दिया गया।

यह कोई भूल नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित और संगठित षड्यंत्र था स्वतंत्रता के उन सेनानियों के विरुद्ध जो अंग्रेजों से सीधा लोहा लेकर भारत से उनकी हुकूमत को खत्म कर देना चाहते थे, या इस दिशा में जिन्होंने संघर्ष किया। गुंडाधुर भी देश की माटी के लिए लड़े थे और माटीपुत्र कहलाए, मगर इतिहास ने उनके साथ इंसाफ नहीं किया। यह क्यों और कैसे- हम इसी विषय पर पड़ताल करेंगे और तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष तक पहुँचेंगे, मगर उससे पहले भूमकाल विद्रोह और उसमें गुंडाधुर की भूमिका को जान लेना जरूरी है, ताकि सब कुछ पूरी तरह स्पष्ट हो जाए।

भूमकाल विद्रोह की नींव दो दशक पहले ही पड़ गई थी

भूमकाल विद्रोह की नींव साल 1891 में ही पड़ गई थी जब अंग्रेजों ने बस्तर में मनमानी शुरू कर दी थी। फिर, हालात ऐसे बनते गए कि आदिवासी एकसूत्र में बंधकर एक संगठित सेना के रूप में उठ खड़े हो गए।

लोककथाओं, लोकगीतों और जनश्रुतियों में संकलित जानकारी के अनुसार, बस्तर के राजा रूद्र प्रताप देव तो अंग्रेजों के हाथों की कठपुतली थे, मगर दीवान पद पर तैनात उनके चाचा कालेन्द्र सिंह बड़ी सुझबुझ से काम करने वाले व्यक्ति थे। वे जनहित के बारे में सोचते थे और उनका लोगों से बहुत जुड़ाव था। खासतौर से, आदिवासी समाज में उनका बड़ा आदर था।

इसलिए जब अंग्रेजों ने उन्हें हटाकर उनकी जगह पंडा बैजनाथ को बस्तर का प्रशासन सौंपा, तो लोगों की नाराजगी और बढ़ गई।

फिर, आदिवासियों से उनका जंगल छीनने-बेदखल करने के प्रयास और ईसाई मिशनरियों द्वारा उनके धर्मांतरण की घटनाओं ने आग में घी का काम किया।

कालेन्द्र सिंह आगे आए, और उन्होंने आदिवासियों को अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संगठित होने का आह्वान किया। संदेश था जल, जमीन और जंगल को बचाने का। बताया जाता है कि उनके बुलावे पर एक बड़ी सभा हुई, जिसमें चल रहे भूमकाल आंदोलन के साथ-साथ सशस्त्र संघर्ष- भूमकाल विद्रोह का निर्णय हुआ। लड़ाकों का एक संगठन बनाया गया जिसकी कमान गुंडाधुर को सौंपी गई और क्रांति का बिगुल फूँक दिया गया।

क्रांति का संदेश- आम की टहनियाँ और लाल मिर्च

1857 की क्रांति के प्रतीक चिन्ह रोटी और कमल की तरह भूमकाल विद्रोह में डारा मिरी (आम की टहनी और सूखी लाल मिर्च) को संदेश सूचक बनाया गया था। कुछ लोगों का कहना है कि बस्तर के गांवों में आम की टहनियाँ, लाल मिर्च और मिट्टी के धनुष-बाण भेजे जाते थे। जिनके घर पर ये चीजें टंग जाती थीं वे समझ जाते थे कि संगठन का बुलावा आया है- समाज और देश के लिए बलिदान देने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।

विशेषकर गुंडाधुर पर लोगों में अटूट श्रद्धा थी। वे उन्हें दिव्य शक्ति-संपन्न मानते थे, और उनके इशारे पर अपने प्राणों की आहूति देने को तैयार रहते थे।

गुंडाधुर के सबसे करीबी साथी एलंगनार निवासी डेबरीधुर लोगों के सीधे संपर्क में रहते थे। वे रणनीतिक निर्णयों की जानकारी सैन्य टुकड़ियों रूपी समूहों को भिजवाते थे।

अंग्रेजों ने घुटने टेके, मिट्टी की कसम खाई

भूमकाल विद्रोह जल, जंगल और जमीन को लेकर एक सशस्त्र संघर्ष था, जिसमें आदिवासी समाज ने अल्पकालिक ही सही मगर, महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की थी। इसमें अंग्रेजों को पराजय का सामना ही नहीं करना पड़ा था, बल्कि बड़ी शर्मिंदगी भी झेलनी पड़ी थी।

2 फरवरी 1910 को विद्रोह की शुरुआत पुलिस चौकियों, सरकारी कार्यालयों पर हमले और बाजारों की लूट के रूप में हुई। मगर, देखते ही देखते विद्रोहियों ने जगदलपुर शहर को छोड़ बस्तर के अधिकांश क्षेत्रों से अंग्रेजी सेना को खदेड़कर वहां कब्जा कर लिया।

इसको लेकर एक साथ कई मोर्चों पर युद्ध हुआ, जिसमें आदिवासी वीरों ने अपना पराक्रम दिखाया।

कुछ लेखकों के अनुसार, नेतानार के करीब अलनार के जंगलों में 26 मार्च को हुए भयानक युद्ध में आदिवासी लड़ाकों ने अंग्रेजी टुकड़ियों पर इतने तीर चलाए थे कि चारों ओर तीर ही तीर नजर आ रहे थे।

इन तीर, कुल्हाड़ी-फरसाधारी आदिवासियों ने ब्रिटिश शासन की आग उगलने वाले हथियारों वाली सेना को भागने पर मजबूर कर दिया था।

अब ब्रिटिश हुकूमत परेशान हो गई थी। उसे महसूस हो चुका था कि गुंडाधुर के कुशल नेतृत्व में विद्रोहियों से सीधी लड़ाई में पार पाना बहुत मुश्किल है। इसलिए, उन्होंने चाल चली- समझौते का नाटक किया।

अंग्रेज अफसर गेयर ने घुटनों पर बैठकर हाथ में मिट्टी लेकर कसम खाई कि भूमकाल विद्रोही संगठन के लोग लड़ाई जीत गए हैं, और अब शासन का कामकाज उन्हीं के मुताबिक चलेगा।

भोले-भाले बस्तरिए झाँसे में आ गए, और बदले में उन्होंने भी यह मिट्टी की कसम खाई कि जब तक बातचीत की प्रक्रिया चलेगी वे आक्रमण नहीं करेंगें।

इससे अंग्रेजों को मौका मिल गया अगली और एक ठोस रणनीति तैयार करने का । उन्होंने कई क्षेत्रों से सेना इकट्ठी की और फिर से हमले की योजना बनाने लगे।

इस बार उनका मुख्य निशाना गुंडाधुर और उनके करीबी साथी थे। मगर उनके बारे में सटीक जानकारी नहीं मिल रही थी। तभी एक व्यक्ति संपर्क मे आया।

बताया जाता है कि सोनू मांझी नामक एक गद्दार ने अपने समूह के उस महत्वपूर्ण ठिकाने जहाँ गुंडाधुर और उनका दायाँ हाथ माने जाने वाले डेबरीधुर भी मौजूद थे, और उसकी स्थिति की जानकारी एक अंग्रेज अफसर को दे दी। इसका लाभ उठाकर सेना ने रात में अचानक हमला कर दिया और सोये हुए लड़ाकों की हत्या करने लगे।

इससे वहाँ अफर-तफरी मच गई। फिर भी, लड़ाकों ने मोर्चा संभाला। मगर संख्या बल में बहुत कम और तैयारी न होने के कारण अंग्रेज उन पर भारी पड़ रहे थे। यह देखकर गुंडाधुर को वहाँ से निकाल दिया गया, ताकि वे जीवित रह सकें और संगठन की कमान संभालते रहें।

इस सूझबूझ के साथ ही लड़ाकों ने अपने अदम्य साहस का परिचय भी दिया। वे संघर्ष करते रहे और मरते दम तक मोर्चा नहीं छोड़ा। मगर भोर की पहली किरण के साथ डेबरीधुर समेत कई साथी पकड़े गए। उन्हें जगदलपुर के गोलबाजार चौक पर स्थित इमली के पेड़ पर उल्टा फाँसी पर लटका दिया गया।

उसके बाद, अंग्रेजों ने बहुत प्रयास किए प्रयास किए। गुंडाधुर को खोजने के लिए सारी ताकत झोंक दी, मगर कामयाबी नहीं मिली।

गुंडाधुर को अंग्रेज न मार पाए और न ही पकड़ सके।

बस्तरिये मानते हैं कि गुंडाधुर आज भी जीवित हैं और जंगलों में विचरते हैं। इसी विश्वास के साथ बस्तर के लोकगीतों में उनकी गाथा गाई और सुनाई जाती है। जब भी रात के अंधेरे में भूमकाल के गीत कोई छेड़ता है, तो लोगों के पाँव ठहर जाते हैं.

भूमकाल विद्रोह के महानायक गुंडाधुर क्यों गुमनामी के अंधेरे में धकेल दिए गए?

भूमकाल विद्रोह के महानायक गुंडाधुर ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। उनकी रणनीति और नेतृत्व में अंग्रेजी सेना को हार के साथ भारी जलालत का सामना करना पड़ा था। यूँ कहिए कि ब्रिटिश हुकूमत के लिए गुंडाधुर अपमान का विषय बन गए थे। लेकिन, लाख प्रयास के बावजूद वे न तो मारे जा सके और न ही पकड़े गए। इसलिए, हुकूमत ने गुंडाधुर के नाम को दफन करने की कोशिश की, जिसमें उन्हें वामपंथी इतिहासकारों का भरपूर सहयोग मिला। दूसरी वजह थी- गाँधीवादी-नेहरूवादी छाप जो अंग्रेजों द्वारा बनाई गई भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Indian National Congress) की सोच पर आधारित थी। उसका उद्देश्य था- इतिहास में उन्हीं लोगों जगह मिले या महिमामंडन हो, जो गाँधी-नेहरू की मंडली में सीधे शामिल हों या उसके इर्द-गिर्द रहते हुए स्वतंत्रता आंदोलन को भटकाने-लटकाने में सहयोगी की भूमिका में हों। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का पूरा इतिहास इसी मानसिकता या नीति प्रतिमान (Policy Paradigm) के आधार पर लिखा गया।

भूमकाल विद्रोह के महानायक का असली नाम क्या था?

भीमकाल विद्रोह के महानायक का असली नाम बागा धुरवा था। उनका जन्म वर्तमान छतीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के गाँव नेतानार में हुआ था। अंग्रेजी हुकूमत ने उनके खिलाफ क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट (Criminal Tribes Act, 1871) के तहत अपराध की जो फाइल बनाई थी उसमें उनके नाम के साथ गुंडाह (Gundah) यानी गुंडा शब्द का प्रयोग तो किया ही, इसे (नाम को) बिगाड़कर गुंडाधुर (बागा धुरवा से गुंडाधुर) कर दिया। बाद में, यह फाइल इस टिप्पणी के साथ बंद कर दी कि ‘कोई यह बताने में समर्थ नहीं है कि गुंडाधुर कौन है, और कहाँ है।’

ज्ञात हो कि बागा धुरवा पहले भारतीय थे, जिनके लिए गुंडा शब्द प्रयोग हुआ। उसके बाद, यह शब्द यहाँ शब्दकोशों में शामिल होकर प्रचलित हो गया। यहाँ तक कि गुंडा एक्ट (Gunda Act) भी उसी शब्द से प्रेरित है।

निष्कर्ष

जो हाथ में झंडा लिए सबसे आगे होता है जीत का सेहरा उसी के सिर बँधता है। इतिहास का उसूल भी कुछ ऐसा ही है। इसमें जिसका जितना उल्लेख या महिमामंडन होता है वह उतना ही जाना जाता है। भूमकाल विद्रोह का उल्लेख यदि व्यापक रूप से होता, तो गुंडाधुर उर्फ बागा धुरवा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलती, जिसके वे हकदार थे। लेकिन अंग्रेजी, वामपंथी और गाँधीवादी सोच ने भूमकाल आंदोलन को जहाँ आजादी का हिस्सा न मानते हुए इसे जनजाति विद्रोह तक सीमित कर दिया, वहीं गुंडाधुर की भूमिका को गौण कर दिया।

यह सर्वविदित है कि गाँधीजी को चमकाने और देश का हीरो बनाने के लिए किस तरह टाट पर मखमल के पैबंद लगाए गए। जवाहरलाल नेहरू के पूर्वजों की फर्जी कहानियाँ गढ़ी गईं। यूँ कहिए कि जो जेल में बैठकर किताबें लिखते थे, लड़कियों और महिलाओं संग नहाते और नंगे सोते थे- ब्रह्मचर्य के प्रयोग करते थे उन्हें ‘देश का चाचा’ और ‘बापू’ बना दिया गया, जबकि गंभीर यातनाएँ झेलने वाले और अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले लोग परिचय के मोहताज हो गए।

गुंडाधुर के लिए स्वतंत्रता संग्राम कोई पोलिटिकल टूर (राजनीतिक यात्रा) नहीं था, बल्कि यह वह सशस्त्र संघर्ष था, जिसमें उनके नेतृत्व में पूरा समाज कूद पड़ा था। यह ऐसी लड़ाई थी, जिसमें करीब 25 हजार लोगों ने अपना बलिदान दिया था।

इसमें एक ओर बंदूकें और तोपें थीं तो दूसरी ओर पारंपरिक हथियार, जैसे कुल्हाड़ी, तीर-धनुष और भाले थे। फिर भी, आदिवासी रणबांकुरे फिरंगियों पर भारी पड़े थे। अपने पराक्रम से उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी थी, और उसकी सेना को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था।

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    रामाशंकर पांडेय

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