कोचिंग माफिया: शिक्षा का काला साम्राज्य और छात्रों के सपनों का सौदा

भारत में शिक्षा कभी ‘संस्कार और ज्ञान’ का माध्यम हुआ करती थी, लेकिन आज यह ‘मुनाफे और मजबूरियों’ का एक क्रूर बाज़ार बन चुकी है. “कोचिंग माफिया: शिक्षा का काला साम्राज्य और छात्रों के सपनों का सौदा” केवल कुछ कोचिंग सेंटरों की मनमानी और हृदयहीनता की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा संगठित और अनैतिक सिंडिकेट है जिसके तार देश के नामचीन स्कूलों, राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसियों (NTA), नौकरशाही और राजनीतिक गलियारों से जुड़े हैं. जहां एक तरफ़ अख़बारों के पन्ने करोड़ों रुपये के विज्ञापनों और टॉपर्स की चमचमाती तस्वीरों से पटे होते हैं, वहीं दूसरी तरफ़ डमी स्कूलों का फर्जीवाड़ा, परीक्षा के ठीक पहले लीक होते पेपर और कोटा से लेकर दिल्ली तक हर साल टूटती मासूमों की सांसें इस व्यवस्था के ख़ूनी सच को बयान करती हैं. साल 2025-26 में ₹58,000 करोड़ का आंकड़ा पार कर चुकी और आने वाले वर्षों में ₹1.45 लाख करोड़ तक पहुंचने वाली यह सामानांतर व्यवस्था देश के 7 करोड़ से अधिक छात्रों के भविष्य को दांव पर लगाकर खड़ी है.

इस पूरे मकड़जाल को समझने के लिए हमें इसके सबसे बुनियादी और खतरनाक आर्थिक ढांचे को देखना होगा. यह- कोचिंग माफिया रातोंरात खड़ा नहीं हुआ, बल्कि इसने मध्यमवर्गीय परिवारों की ‘क्लास मोबिलिटी’ (आगे बढ़ने की चाह) और सरकारी नौकरी/मेडिकल-इंजीनियरिंग के सामाजिक रूतबे को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया है. शिक्षा के इस अंधाधुंध बाजारीकरण ने न केवल पढ़ाई को एक लग्जरी (विलासिता) बना दिया है, बल्कि छात्रों को इंसान के बजाय एक ‘रॉ-मटेरियल’ (कच्चा माल) और ‘कस्टमर’ में तब्दील कर दिया है. आइये, सबसे पहले इस पूरे खेल के इसी आर्थिक और व्यावसायिक गणित को परत-दर-परत खंगालते हैं.
1. व्यावसायीकरण और आर्थिक पक्ष: जब शिक्षा बनी ‘सपनों की मंडी’
भारत में आज कोचिंग संस्थान केवल पढ़ाई का केंद्र नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट घरानों की तरह संचालित होने वाले मल्टी-मिलियन डॉलर उद्योग हैं. नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (NSSO) के ट्रेंड्स और हालिया रिपोर्ट को देखें, तो देश में क़रीब ₹7.1 करोड़ से अधिक छात्र स्कूली शिक्षा के साथ-साथ किसी न किसी रूप में प्राइवेट ट्यूशन या कोचिंग पर निर्भर हैं. मध्यमवर्ग और ग्रामीण परिवारों की ‘सामाजिक प्रतिष्ठा’ और ‘बेहतर भविष्य’ की चाहत को इस इंडस्ट्री ने अपना सबसे बड़ा बिजनिस मॉडल बना लिया है.
अरबों का साम्राज्य: आंकड़ों में कोचिंग की ब्लैक इकोनॉमी
यह इकोनॉमी देश की जीडीपी और आम परिवारों की जेब से कितना बड़ा हिस्सा खींच रही है, इसे बाज़ार विश्लेषकों के आंकड़ों से समझा जा सकता है:
(1) 2025-26 का मौजूदा बाज़ार: अनुमान के मुताबिक़ भारत में केवल प्राइवेट कोचिंग और टेस्ट प्रिपरेशन (जांच परीक्षा या टेस्ट एग्जाम की तैयारी) का यह कारोबार ₹58,000 करोड़ का आंकड़ा पार कर चुका है.
(2) भविष्य की छलांग: जिस रफ़्तार से छात्र इस जाल में फंस रहे हैं, यह इंडस्ट्री 2028 से 2033 के बीच ₹1.34 लाख करोड़ से ₹1.45 लाख करोड़ के विशाल आकार तक पहुँचने वाली है.
यह राशि देश के कई राज्यों के कुल सालाना शिक्षा बजट से भी कहीं ज़्यादा है, जो यह साबित करने के लिए काफ़ी है कि हम किसी साधारण ट्यूशन व्यवस्था की नहीं, बल्कि एक सामानांतर ‘आर्थिक साम्राज्य’ की बात कर रहे है.
कॉर्पोरेट बांड्स और फीस का जानलेवा बोझ
इस बाज़ार पर आज Allen, Aaksh (BYJU’s), Physics Wallah (PW) और Unacademy जैसे बड़े खिलाड़ी और कुछ चुनिंदा ‘यूट्यूब इन्फ़्लुएंसर टीचर्स’ का क़ब्ज़ा है. कोटा, दिल्ली या ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर इंजीनियरिंग (JEE) मेडिकल (NEET) की तैयारी करने वाले एक छात्र की सालाना फ़ीस ₹2 लाख से ₹5 लाख तक पहुंच जाती है. इसमें अगर रहने और खाने का खर्चा जोड़ दिया जाए, तो यह आंकड़ा और बड़ा या भारी हो जाता है.
एक आम या निम्न-मध्यमवर्गीय माता-पिता अपने बच्चे को डॉक्टर या इंजीनियर बनाने के लिए अपना मकान या ज़मीन गिरवी रखता है, पीएफ (PF) का पैसा निकालता है या भारी ब्याज पर क़र्ज़ लेता है. वहीं दूसरी ओर संपन्न परिवारों के बच्चे महंगे क्रैश कोर्स और पर्सनल मेंटरशिप जैसी अतिरिक्त सुविधाएं (Extra Advantage) आसानी से खरीद लेते हैं, जिसने शिक्षा के क्षेत्र में अमीर और ग़रीब के बीच एक गहरी खाई पैदा कर दी है.
भ्रामक विज्ञापन और ‘टॉपर ख़रीदने’ का खेल
इस इंडस्ट्री का सबसे अनैतिक चेहरा तब सामने आता है, जब परीक्षाओं के परिणाम घोषित होते हैं. उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के तहत आने वाले केंदीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) ने अपनी जाच में पाया कि देश के लगभग सभी बड़े कोचिंग संस्थान भ्रामक विज्ञापनों (Misleading Advertisements) का सहारा ले रहे हैं.
(1) एक ही टॉपर, पांच दावेदार: जब कोई छात्र देश में रैंक-1 लाता है, तो उसका फोटो 4 से 5 अलग-अलग कोचिंग संस्थानों के फ्रंट-पेज विज्ञापनों में छप जाता है. कोई उसे अपने ‘क्लासरूम प्रोग्राम’ का बताता है, तो कोई ‘टेस्ट सीरीज’ या ‘इंटरव्यू गाइडेंस’ का.
(2) सपनों की ख़रीद-फ़रोख्त: मीडिया रिपोर्ट और खोजी जांच में यह बात साबित हो चुकी है कि ऑल इंडिया रैंक (AIR) टॉप-10 में आने वाले छात्रों को अपने पाले में करने के लिए कोचिंग संस्थान ₹10 लाख से लेकर ₹1 करोड़ तक की नक़द राशि, चमचमाती कारें और आलीशान सुविधाएं ऑफर करते हैं. यह शिक्षा नहीं, बल्कि छात्रों की कामयाबी का सीधे-सीधे सौदा है.
इस अंधाधुंध मुनाफाखोरी पर लगाम लगाने के लिए भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने 2024 में एक सख्त गाइडलाइन जारी की, जिसमें 16 साल से कम उम्र के बच्चों के कोचिंग जाने पर रोक, फीस रिफंड पॉलिसी और भ्रामक दावों पर भारी जुर्माने का प्रावधान किया गया. लेकिन ज़मीनी स्तर पर इस माफिया का रसूख इतना बड़ा है कि ये नियम आज भी केवल कागजों तक सीमित दिखाई देते हैं.
जब कोई इंडस्ट्री ₹58,000 करोड़ के साम्राज्य में बदल जाती है, तो वह अपने फ़ायदे के लिए कानून और व्यवस्था के नियमों को मरोड़ना शुरू कर देती है. कोचिंग माफिया की सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि इसने देश की मुख्य धारा की स्कूली शिक्षा व्यवस्था को ही अप्रासंगिक बना दिया है. चूंकि सीबीएसई (CBSE) या अन्य राज्य बोर्डों का पारंपरिक सिलेबस और परीक्षा पैटर्न, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) द्वारा आयोजित की जाने वाली JEE और NEET जैसी बहुविकल्पीय (MCQ) परीक्षाओं से मेल नहीं खाता है, इसलिए कोचिंग सेंटरों ने इसका फ़ायदा उठाकर स्कूलों के साथ एक अपवित्र और गुप्त समझौता कर लिया. आइये, अब उस महत्वपूर्ण बिंदु पर चलते हैं, जो देश के पारंपरिक क्लासरूम को खोखला करने वाले ‘डमी स्कूल रैकेट’ का पर्दाफाश करता है.
2. CBSE और डमी स्कूल का गठजोड़: पारंपरिक शिक्षा का पतन
कोचिंग माफिया ने वर्तमान भारत की पारंपरिक शिक्षा की सबसे बड़ी कमजोरी को भांप लिया है- वह कमजोरी है देश के स्कूल बोर्ड (जैसे CBSE या राज्य बोर्ड) के सिलेबस और नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) द्वारा आयोजित की जाने वाली प्रतियोगी परीक्षाओं (JEE/NEET) के पैटर्न में मौजूद एक बहुत बड़ा फासला. स्कूल बोर्ड जहां थ्योरी, लंबे उत्तरों और व्यावहारिक ज्ञान पर जोर देते हैं, वहीं प्रतियोगी परीक्षाएं केवल ‘स्पीड’ और बहुविकल्पीय प्रश्नों (MCQs)’ के शॉर्टकट पर चलती हैं.
इसी अंतर का फ़ायदा उठाकर कोचिंग सेंटरों ने ख़ुद को ‘असली शिक्षा का केंद्र’ घोषित कर दिया और स्कूलों को महज एक ‘सर्टिफिकेट बांटने वाले संस्थान’ में तब्दील कर दिया. इसी सोच से जन्मा देश का सबसे बड़ा संस्थागत घोटाला- डमी स्कूल का रैकेट (Dummy School Racket).
क्या है डमी स्कूल का खेल और प्रति छात्र कमीशन?
डमी स्कूल (जिन्हें नॉन अटेंडिंग स्कूल भी कहा जाता है) की व्यवस्था एक ऐसा गुप्त समझौता है, जिसमें छात्र का दाखिला तो किसी मान्यता प्राप्त स्कूल में होता है, लेकिन वह पूरे साल एक दिन भी स्कूल में क़दम नहीं रखता है. वह अपनी ज़िंदगी के कीमती 14 घंटे से 16 घंटे सिर्फ कोचिंग सेंटरों की चाहरदीवारी और उसके हॉस्टलों में गुजारता है.
इस खेल के पीछे का आर्थिक गणित बहुत घिनौना है:
(1) दलाली का फिक्स रेट: कोचिंग सेंटर प्रति छात्र ₹15,000 से ₹20,000 (या कई मामलों में इससे भी ज़्यादा) का सीधा कमीशन इन डमी स्कूलों को पहुंचाते हैं.
(2) फर्जीवाड़ा ऑन रिकॉर्ड: इस मोटी रक़म के बदले स्कूल प्रबंधन छात्र की 75% अनिवार्य अटेंडेंस (हाजिरी) की फर्जी एंट्री करता है, उसके स्कूल के आतंरिक प्रोजेक्ट, असाइंमेंट और यहां तक कि बोर्ड के प्रैक्टिकल एग्जाम में भी घर बैठे पूरे नंबर चढ़ा देता है. छात्र सिर्फ एक ही बार स्कूल आता है- सालाना बोर्ड परीक्षा देने.
नागपुर स्टिंग और CBSE की हालिया कार्रवाई
इस नापाक गठजोड़ को सबसे बड़ा और पुख्ता सबूत तब सामने आया जब मीडिया द्वारा नागपुर (महाराष्ट्र) और देश के कुछ अन्य हिस्सों में बड़े स्तर पर ‘स्टिंग ऑपरेशन’ किये गए. इन ऑपरेशन में देश के कई प्रतिष्ठित और बड़े स्कूलों के प्रिंसिपल और मालिक को ऑन-कैमरा कोचिंग सेंटरों के साथ ‘डमी स्टूडेंट’ की डीलिंग करते और रिश्वत के पैसों पर मोल-तोल करते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया.
इस चौतरफा बदनामी और मीडिया के दबाव के बाद, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) हरकत में आया. सीबीएसई ने देशभर में सैकड़ों स्कूलों में औचक निरीक्षण (Surprise Inspections) शुरू किए.
(1) स्कूलों की मान्यता रद्द: जांच में पाया गया कि कई स्कूलों के कमरों में धूल उड़ रही थी, बेंच ख़ाली थीं, लेकिन रजिस्टर में सैकड़ों छात्रों की उपस्थिति दर्ज़ थी. इसके बाद सीबीएसई ने कड़ी कार्रवाई करते हुए दर्ज़नों स्कूलों की मान्यता (Affiliation) को तुरंत प्रभाव से रद्द कर दिया.
(2) कमजोर क्रियान्यवन (Weak Enforcement): हालाँकि, बोर्ड की इस कार्रवाई के बावजूद यह गठजोड़ (Nexus) रुका नहीं है. कोचिंग माफिया ने इसका तोड़ निकाल लिया है- वे बड़े शहरों के स्कूलों को छोड़कर अब छोटे कस्बों या ग्रामीण इलाकों के स्कूलों के साथ टाई-अप (जुड़ाव, गठजोड़) कर रहे हैं, जहां सीबीएसई या शिक्षा विभाग के अधिकारियों की नज़रें आसानी से नहीं पहुंच पाती हैं.
परिणाम: एक पूरी पीढ़ी की मानसिक और सामाजिक क्षति
इस डमी स्कूल कल्चर ने देश की भावी पीढ़ी को एक ऐसी ‘फैक्ट्री’ में झोंक दिया है जहां सिर्फ रट्टा मारना सिखाया जाता है. स्कूली जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा- खेलकूद (Sports), कला (Arts), वाद-विवाद, दोस्तों के साथ सामाजिक मेलजोल और जीवन के बुनियादी मूल्य (Life Skills)- पूरी तरह से शून्य हो चुके हैं. बच्चे सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक सिर्फ फ़ॉर्मूले और इक्वेशन के जाल में उलझे रहते हैं, जिससे उनका सर्वांगीण विकास (Holistic Development) पूरी तरह रुक गया है.
जब कोई व्यवस्था इतनी खोखली हो जाये कि देश के स्कूल ही फर्जीवाड़े के अड्डे में तब्दील होने लगें, तो अपराध की दुनिया को जड़ें जमाने के लिए सबसे उपजाऊ ज़मीन मिल जाती है. डमी स्कूलों के ज़रिए छात्रों को क्लासरूम से दूर करने बाद, इस माफिया का अगला क़दम यह सुनिश्चित करना होता है कि जो छात्र लाखों रुपये की फीस दे रहे हैं, उनका ‘सिलेक्शन’ किसी भी कीमत पर हो, चाहे उसके लिए देश के कानून की धज्जियां ही क्यों न उड़ानी पड़ें. यहीं से शुरुआत होती है शिक्षा या कोचिंग माफिया के सबसे खूंखार और घिनौने रूप की, जहां करोड़ों रुपये की लेन-देन सीधे ‘अंडरवर्ल्ड और क्राइम सिंडिकेट’ से जुड़ जाता है. आइये, अब उस सबसे सनसनीखेज बिंदु पर चलते हैं, जो पर्दाफाश करता है देश की सबसे पवित्र परीक्षाओं के ‘पेपर लीक और अपराध जगत के कनेक्शन’ का.
3. पेपर लीक और अपराध जगत का कनेक्शन: जब परीक्षा बन गई संगठित अपराध का अवसर
शिक्षा माफिया का सबसे खतरनाक रूप तब सामने आता है जब कोचिंग का यह ‘सफेदपोश’ धंधा सीधे अंडरवर्ल्ड, हैकर्स और पेशेवर अपराधियों के ‘क्राइम सिंडिकेट’ से हाथ मिला लेता है. अब यह खेल ज़्यादा से ज़्यादा फीस वसूलने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक ऐसी सामानांतर व्यवस्था में बदल चुका है जो पैसों के दम पर देश की सबसे बड़ी और प्रतिष्ठित परीक्षाओं की शुचिता को सरेआम नीलाम करती है.
NEET (2024 और 2026) के महाघोटाले और डार्क वेब/सोशल मीडिया का जाल
हालिया वर्षों में, विशेषकर NEET 2024 और इस साल 2026 में हुए बड़े राष्ट्रीय स्तर के परीक्षा घोटालों ने इस बात पर मुहर लगा दी है कि पेपर लीक अब किसी एक सेंटर की ढिलाई नहीं, बल्कि एक बहुत हाई-टेक और संगठित नेटवर्क है.
(1) ‘Private Mafia’ ग्रूप का सच: जांच एजेंसियों की चार्जशीट और खोजी रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है कि पेपर लीक के आका अब किसी कोने में छिपकर पर्चे नहीं बांटते हैं. डार्क वेब (Dark Web) और एनक्रिप्टेड सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म, जैसे WhatsApp और Telegram पर ‘Private Mafia’ नाम के सीक्रेट ग्रूप बनाये जाते हैं, जिनमें 400 से अधिक सक्रिय मेंबर होते हैं.
(2) अंदरूनी सांठगांठ: इस नेटवर्क में सिर्फ सड़कछाप दलाल नहीं होते हैं; बल्कि इसमें परीक्षा कराने वाली एजेंसी (NTA) के अंदरूनी संविदा कर्मचारी, प्रश्नपत्र (क्वेश्चन पेपर) सेट करने वाले यूनिवर्सिटी के भ्रष्ट प्रोफ़ेसर, प्रिंटिंग प्रेस के मालिक और बड़े कोचिंग संस्थानों के प्रमोटर शामिल होते हैं. परीक्षा से ठीक 24 से 48 घंटे पहले, प्रश्नपत्रों की तस्वीरें इन गूप में शेयर की जाती हैं और उत्तरों (Answers) को रटवाने के लिए छात्रों को गुप्त ठिकानों (Safe Houses) पर ले जाया जाता है.
लीक का हॉटस्पॉट और करोड़ों का टर्नओवर
इस क्राइम सिंडिकेट ने देश के कुछ शहरों को बाक़ायदा अपना ‘ऑपरेशनल हब’ या हॉटस्पॉट बना लिया है. सीकर (राजस्थान), पुणे और लातूर (महाराष्ट्र), गुरुग्राम (हरियाणा) और पटना (बिहार)- ये ऐसे केंद्र हैं जहां पेपर लीक की कड़ियां सबसे ज़्यादा जुड़ती हैं. यहां एक-एक उम्मीदवार से प्रश्न-पत्र और ‘कन्फर्म सिलेक्शन’ के बदले ₹30 लाख से लेकर ₹60 लाख तक की वसूली की जाती है. यह पूरा लेन-देन कैश (नक़द) या हवाला नेटवर्क के ज़रिए होता है, जिसका कोई टैक्स रिकॉर्ड नहीं होता है.
इतिहास का सबसे ख़ूनी सच: व्यापम घोटाला और 70+पेपर लीक
जब हम भारत में शिक्षा से जुड़े अपराधों की बात करते हैं, तो मध्यप्रदेश का व्यापम घोटाला (Vyapam Scam) इस सिंडिकेट का सबसे वीभत्स और ख़ूनी चेहरा बनकर सामने आता है.
(1) भयावहता: इस घोटाले ने 13 अलग-अलग प्रवेश और भर्ती परीक्षाओं को अपनी चपेट में लिया, जिससे 32 लाख से उम्मीदवारों का भविष्य अंधकार में डूब गया.
(2) रहस्मयी मौतें: यह मामल सबसे ज़्यादा दहलाने वाला था क्योंकि इसकी जांच के दौरान गवाहों, डॉक्टरों, पत्रकारों और आरोपियों समेत 40 से ज़्यादा लोगों की रहस्मय हालात में मौत हो गई थी. इसने साबित किया कि यह माफिया अपने रास्ते में आने वाले किसी भी रोड़े को हटाने के लिए हत्या जैसे जघन्य अपराधों से भी पीछे नहीं हटता है.
आंकड़े गवाह हैं कि पिछले 7 से 10 सालों में देश के 15 से अधिक राज्यों में 70 से ज़्यादा बड़े पेपर लीक के मामले दर्ज़ किये गए हैं, जिसने देश की पूरी सरकारी भर्ती और प्रवेश परीक्षा प्रणाली को वेंटिलेटर पर लाकर खड़ा कर दिया है. प्रिंटिंग प्रेस से लेकर परीक्षा केंद्र के इनविजिलेटर और पुलिस महकमे के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों तक फैला यह जाल एक ‘संगठित अपराध’ (Organized Crime) की हर परिभाषा को पूरा करता है.
लाखों-करोड़ों की फीस का खेल, डमी स्कूलों की धोखाधड़ी और पेपर लीक का यह ख़ूनी खेल अंततः किसके खून से खेला जा रहा है? इस पूरी व्यवस्था की सबसे दर्दनाक और भयावह कीमत कोई राजनेता, कोचिंग मालिक या अपराधी नहीं चुकाता है- वह कीमत चुकाता है देश का अदना-सा मासूम छात्र. जब एक 17 साल का बच्चा दिन-रात एक करने के बाद ख़ुद को इस भ्रष्टाचार और अंधी दौड़ के बीच असहाय पाता है, तो मानसिक रूप से इस क़दर बिखर जाता है कि वह अपनी ज़िंदगी का सबसे आत्मघाती क़दम उठा लेता है. आइये अब उस बिंदु पर चलते हैं जो इस पूरे माफिया साम्राज्य की ‘मानवीय कीमत’ (Human Cost) को आंकड़ों और आंसुओं से साथ बयां करता है.
4. छात्रों पर विनाशकारी असर: सपनों की बलि और मासूमों का लहू
कोचिग माफिया के इस पूरे क्रूर तंत्र का सबसे भयानक और दर्दनाक पहलू यह है कि इसकी सबसे बड़ी कीमत देश के मासूम बच्चे चुका रहे हैं. जिसे कोचिंग संस्थान अपनी ‘सफलता की फैक्ट्री’ कहते हैं, वह असल में देश के सबसे मेधावी छात्रों के मानसिक क़त्लगाह में तब्दील हो चुकी है. 16-17 साल के बच्चे, जिनकी उम्र दुनिया को तलाशने और अपने व्यक्तित्व को निखारने की होती है, उन्हें एक ऐसे दबाव तंत्र (Pressure Cooker Environment) में डाल दिया जाता है जहां से निकलने का रास्ता कई बार सिर्फ मौत से होकर गुजरता है.
कोटा का सुसाइड सिंड्रोम और NCRB के डरावने आंकड़े
राजस्थान का कोटा (Kota) शहर, जो कभी देश की शिक्षा की काशी कहलाता था, आज छात्रों की आत्महत्याओं के वैश्विक हब के रूप में कुख्यात हो चुका है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आधिकारिक डाटा और स्थानीय प्रशासन की रिपोर्ट के मुताबिक़ छात्रों की आत्महत्या का ग्राफ़ हर साल नया और डरावना रिकॉर्ड बना रहा है:
(1) आंकड़ों की ख़ूनी गवाही: कोटा में साल 2023 में 26 छात्रों ने आत्महत्या की, साल 2024 में यह आंकड़ा 17 रहा और साल 2025 में भी दर्जन भर से अधिक छात्रों ने फांसी का फंदा चूम लिया. अगर पिछले दशक (2015-2024) की बात करें, तो 127 से अधिक छात्र अकेले कोटा के हॉस्टलों में अपनी जान गंवा चुके हैं.
(2) NCRB की Accidental Deaths and Suicide in India Report: यह रिपोर्ट साफ़ दर्शाती है कि देश में 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण परीक्षाओं में असफलता का डर और मानसिक तनाव है.
12-18 घंटे की अंधी दौड़ और ‘वीकली टेस्ट’ का खौफ़
इन आत्महत्याओं के पीछे कोई एक दिन की हताशा नहीं होती है, बल्कि महीनों तक चलने वाला मानसिक उत्पीड़न होता है. 17 साल के जिन बच्चों ने अभी ठीक से दुनिया नहीं देखी है, उन्हें:
(1) दैनिक दिनचर्या: रोज़ाना 12 से 18 घंटे की अंधी पढ़ाई के चक्रव्यूह में फंसा दिया जाता है.
(2) वीकली (साप्ताहिक) टेस्ट का दबाव: हर हफ़्ते होने वाले मॉक टेस्ट और उसके बाद पूरे संस्थान के नोटिस बोर्ड और अभिभावकों के मोबाइल पर भेजी जाने वाली ‘रैंक लिस्ट’ दिमाग पर असर डालती है. यह छात्रों के बीच ऐसा सामाजिक अलगाव (Social Isolation) पैदा करती है, जहां कम नंबर आने पर उन्हें अपराधी जैसा महसूस कराया जाता है.
(3) सपनों का बोझ: मध्यमवर्गीय माता-पिता द्वारा लिए गए कर्ज़ का वितीय बोझ बच्चों के दिमाग पर चौबीसों घंटे दिमाग पर हावी रहता है. उन्हें लगता है कि उनका सिलेक्शन नहीं हुआ, तो उनके पूरे परिवार का भविष्य तबाह हो जायेगा.
असमानता की गहरी खाई: ग्रामीण और ग़रीब बच्चे रेस से बाहर
इस माफिया ने भारत के संविधान द्वारा दिए गए ‘समान शिक्षा के अधिकार’ की धज्जियां उड़ा दी हैं. आज JEE और NEET जैसी परीक्षाओं में चयन दर (Selection Rate) उन छात्रों की सबसे ज़्यादा है जो लाखों रुपये ख़र्च करके इन नामी कोचिंग सेंटरों में पढ़ रहे हैं.
इसके विपरीत, देश के ग्रामीण इलाकों के ग़रीब और सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे- जो इन कोचिंग की फीस नहीं भर सकते हैं वे इस रेस में शुरुआत से ही पिछड़ जाते हैं. शिक्षा, जो कभी गरीबी से बाहर निकलने का रास्ता हुआ करती थी, अब अमीर और ग़रीब के बीच खाई को और चौड़ा करने का एक कॉर्पोरेट टूल बन चुकी है.
जब कोई व्यवस्था इतनी घातक हो जाये कि हर महीने मासूमों की लाशें हॉस्टलों के कमरों से निकलने लगे, तो किसी भी लोकतांत्रिक देश की सरकार और तंत्र को हिल जाना चाहिए. लेकिन भारत का यह शिक्षा माफिया इतना बेख़ौफ़ इसलिए है क्योंकि इसे केवल पैसों का सहारा नहीं है; इसके पीछे सत्ता और व्यवस्था का वरदहस्त भी शामिल है. परीक्षा कराने वाली सरकारी एजेंसियों की ढिलाई और नेताओं की इस अरबों रुपयों की लॉबी के साथ सांठगांठ दीर्घजीवी बना देती है. आइये अब उस बिंदु की तरफ़ बढ़ते हैं, जो बेनकाब करता है इस पूरे खेल के ‘राजनीतिक और व्यवस्थागत पक्ष (Politics and Systemic Failure) को.
5.राजनीतिक और व्यवस्थागत पक्ष: जब रक्षक ही बन गए भक्षक
कोचिंग माफिया का यह सामानांतर साम्राज्य सिर्फ अपनी तिजोरियों के दम पर नहीं चल रहा है, बल्कि इस देश के राजनीतिक वर्ग और प्रशासनिक तंत्र की घोर नाक़ामी- और कई मामलों में सीधे संरक्षण- वरदहस्त प्राप्त है. जब देश की संसद से लेकर परीक्षा आयोजित करने वाले कमरों तक जवाबदेही शून्य हो जाये, तभी ऐसा महापाप पनपता है.
कोचिंग लॉबी का राजनीतिक रसूख और संरक्षण
आज देश के कई राज्यों (विशेषकर राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार और उत्तरप्रदेश) में कोचिंग संस्थानों के मालिक और प्रमोटर सीधे तौर पर राजनीति में सक्रिय हैं. कई बड़े कोचिंग घराने चुनावों में राजनीतिक पार्टियों को भारी-भरकम चंदा (Political Funding) देते हैं.
(1) सुरक्षा कवच: इस पैसे और रसूख के बदले इन संस्थानों को एक ऐसा अदृश्य ‘सुरक्षा कवच’ मिलता है कि सरकारें इनके ख़िलाफ़ कोई भी सख्त क़दम उठाने से कतराती हैं. कोटा या दिल्ली में जब भी कोई हादसा या सुसाइड की घटना होती है, तो प्रशासन सिर्फ दिखावे के लिए कुछ कमेटियां बना देता है, लेकिन इस ₹58,000 करोड़ की लॉबी के मुख्य बिजनिस मॉडल पर कभी आंच नहीं आती है.
NTA की व्यवस्थागत नाक़ामी और ‘नॉन-स्टैच्यूटरी’ होने का फ़ायदा
देश की सबसे बड़ी प्रवेश परीक्षाएं (जैसे NEET, JEE, NET) आयोजित करने वाली संस्था नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) इस पूरी व्यवस्थागत असफलता का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरी है.
(1) कानूनी जवाबदेही की कमी: NTA कोई संवैधानिक या वैधानिक संस्था (Statutory Body) नहीं है, बल्कि इसे एक सोसायटी के रूप में रजिस्टर किया गया था. इसका मतलब यह है कि संसद के प्रति इसकी सीधी जवाबदेही कैग (CAG) या अन्य संवैधानिक संस्थाओं जैसी मजबूत नहीं है.
आउटसोर्सिंग का खेल: परीक्षाओं के आयोजन में देरी, आंसर-की (Answer Key) में गड़बड़ी और पेपर लीक जैसी बार-बार होने वाली घटनाओं के बावजूद NTA का शीर्ष नेतृत्व हमेशा बच निकलता है. परीक्षा केंद्रों का निजी कंपनियों और थर्ड-पार्टी वेंडर्स को आउटसोर्स (Outsource) किया जाना ही इस माफिया को सेंधमारी का सबसे आसान रास्ता देता है.
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) में बड़े-बड़े दावे किये गए कि देश को ‘कोचिंग कल्चर’ से मुक्त कराया जायेगा, लेकिन सरकारें आज तक सरकारी स्कूलों और कॉलेजों के बुनियादी ढांचे को इतना मजबूत नहीं कर पाई कि बच्चों को कोचिंग के इस नरक में क़दम ही न रखना पड़े.
कानून बना, लेकिन क्रियान्यवन कहाँ है?
छात्रों और जनता के भारी आक्रोश के बाद केंद्र सरकार ने साल 2024 में एक ऐतिहासिक और कड़ा कानून लागू किया- ‘सार्वजानिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 (The Public Examinations Prevention of Unfair Means Act).
इस कानून में शिक्षा-परीक्षा संबंधी महापाप से निपटने के लिए बेहद सख्त कानूनी प्रावधान और दंड निर्धारित किये गए हैं:
(1) अधिकतम 10 साल की जेल: यदि कोई व्यक्ति या सिंडिकेट संगठित रूप से पेपर लीक या परीक्षा में धांधली में लिप्त पाया जाता है, तो उसे 5 से 10 वर्ष के कठोर कारावास की सज़ा का प्रावधान है.
(2) ₹1 करोड़ का आर्थिक दंड: सेवा प्रदाताओं (Service Providers) या संस्थानों की संलिप्तता पर 1 करोड़ तक भारी-भरकम जुर्माना और परीक्षा का पूरा ख़र्च वसूलने का नियम है.
(3) संपत्ति कुर्की: अपराधियों की संपत्ति कुर्क (Seize) करने का भी प्रावधान है.
कानून सख्त, सरकार सुस्त
कानून बहुत सख्त और आक्रामक है, लेकिन उसका पालन कराने वाले ढीले और सुस्त हैं. इसलिए यह किताबों तक ही सीमित है, जबकि जमीनी हक़ीक़त यह है कि इतने कड़े प्रावधानों के बावजूद पेपर लीक और डमी स्कूलों का धंधा धड़ल्ले से चल रहा है. दरअसल, जब तक निचले स्तर पर पुलिस, नोडल अधिकारी और जांच एजेंसियां राजनीतिक प्रभाव से मुक्त होकर काम नहीं करेंगी, तब तक 10 साल की जेल का यह डर केवल कागजों पर सिमटा ‘कागजी शेर’ ही बना रहेगा.
इस पूरे काले साम्राज्य, राजनीतिक सांठगांठ और कानूनी लाचारी के बीच, क्या हमें मान लेना चाहिए कि पूरी कोचिंग व्यवस्था ही अभिशाप है? नहीं. इसलिए, आवश्यक है कि हम सिक्के के दूसरे पहलू को भी देखें. दरअसल, डिजिटल क्रांति के इस दौर में जहां कुछ मगरमच्छों ने शिक्षा को अपनी जागीर बना ली है, वहीं कुछ ऐसे भी प्रयास हुए हैं जिन्होंने सुदूर गांवों में बैठे बच्चों तक ज्ञान की रौशनी पहुंचाई है. आइये अब उस बिंदु की तरफ़ बढ़ते हैं, जो इस घुप्प अँधेरे और तूफ़ान में भी जल रहे उम्मीद के दीये को दिखाता है.
6. सिक्के का दूसरा पहलू: ‘उम्मीद की डिजिटल किरण’ बनाम ‘कॉर्पोरेट गिद्ध’
इस पूरे काले साम्राज्य की काली परतों को उघाड़ने के बाद, यह सवाल उठाना लाज़मी है कि क्या पूरी कोचिंग व्यवस्था ही अभिशाप है? क्या इस व्यवस्था ने देश को कुछ भी सकारात्मक नहीं दिया? पत्रकारिता का यह तकाज़ा है कि हम इस पूरी तस्वीर को बिना चश्मे (पूर्वाग्रह) के देखें. सच यह है कि इस बदनाम हो चुके इकोसिस्टम के भीतर एक ऐसा पहलू भी मौजूद है, जिसने भारत के सुदूर और पिछड़े इलाकों के लाखों बच्चों को सपनों के पंख दिए हैं.
डिजिटल क्रांति: जब ‘यूट्यूब’ और ‘सस्ते ऐप्स’ बने गरीबों का सहारा
कोचिंग के इस पूरे दौर में पिछले कुछ वर्षों में एक बड़ा सकारात्मक बदलाव तकनीक और इंटरनेट क्रांति के कारण आया है.
(1) भौगोलिक सीमाओं से परे: एक समय था जब देश के किसी सुदूर गांव, जैसे बिहार के खगड़िया और उड़ीसा (ओडिशा) के कालाहांडी के किसी ग़रीब किसान के बेटे के लिए कोटा या दिल्ली जाकर पढ़ना एक नामुमकिन सपना था. लेकिन ऑनलाइन कोचिंग (Online Coaching) और सस्ते ऐप्स की वज़ह से आज वही बच्चा अपने घर बैठकर, देश के बेहतरीन शिक्षकों से नाममात्र की फीस (या यूट्यूब पर मुफ़्त में) पढ़ पा रहा है.
(2) लोकतांत्रीकरण (Democratizaion of Education): इंटरनेट ने शिक्षा के इस गढ़ को कुछ हद तक तोड़ा है. कई ऐसे इमानदार और जुनूनी शिक्षक भी सामने आये हैं, जिन्होंने शिक्षा को व्यापार नहीं बनाया, बल्कि बेहद कम कीमत पर उच्च गुणवत्ता वाली अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराई. इस वज़ह से कई ऐसे बच्चों का भी सिलेक्शन हुआ जो कभी बड़े शहरों (दिल्ली, कोटा) में जाकर रहने और महंगी कोचिंग पर ख़र्च करने की सोच भी नहीं सकते थे.
समस्या कहाँ शुरू होती है? जब छात्र बना ‘कस्टमर’
तकनीक का यह वरदान तब अभिशाप में बदलने लगता है, जब ऑनलाइन के ये ‘स्टार्टअप्स’ भी बड़े होकर उसी कॉर्पोरेट और रेंट-सीकिंग (Rent-seeking) मॉडल का हिस्सा बन जाते हैं. समस्या कोचिंग करने या ऑनलाइन पढ़ने से नहीं है, समस्या तब शुरू होती है जब:
(1) मुनाफा सर्वोपरि हो जाये: जब किसी संस्थान का एकमात्र लक्ष्य ‘ज्ञान देना’ नहीं, बल्कि वेंचर कैपिटलिस्ट (VC) से करोड़ों की फंडिंग लेना और छात्रों की संख्या बढ़ाकर अपनी वैल्यूएशन चमकाना बन जाये.
(2) शॉर्टकट और रट्टा प्रणाली (Rote Learning): जब कोचिंग बच्चों की सोचने और समझने की क्षमता विकसित करने के बजाय, सिर्फ परीक्षा पास करने के ‘शॉर्टकट और ट्रिक्स’ रटाने लगें.
(3) मानवीय संवेदनाओं का अंत: जब एडमिशन काउंटर पर बैठा व्यक्ति किसी बच्चे को भविष्य के एक डॉक्टर या इंजीनियर के रूप में नहीं, बल्कि अपनी कंपनी के ‘रेवेन्यू टारगेट’ (Revenue Target) को पूरा करने वाले एक ‘कस्टमर’ या ‘प्रोडक्ट’ के रूप में देखने लगे.
सीधे शब्दों में कहें तो, जब तक कोचिंग संस्थान स्कूलों के ‘पूरक’ (Supplement) के रूप में काम करते हैं, तब तक वे छात्रों की मदद करते हैं. लेकिन जैसे ही वे स्कूलों को निगलकर एक ‘सामानांतर सरकार’ की तरह काम करने लगते हैं, तो वे शिक्षा के मूल ढांचे के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बन जाते हैं.
समस्या का आर्थिक गणित साफ़ है डमी स्कूलों का फर्जीवाड़ा सामने है, पेपर लीक का क्रूर सच और छात्रों की आत्महत्याओं के आंकड़े हमारे सामने चीख-चीखकर गवाही दे रहे हैं. यहां तक कि हमने इस व्यवस्था के अच्छे और बुरे, दोनों पहलुओं को भी तौल लिया है. लेकिन एक खोजी और जिम्मेदार लेख तब तक अधूरा रहता है, जब तक वह सिर्फ कमियां न गिनाये, बल्कि इस दलदल से बाहर निकलने का रास्ता भी न दिखाए. अब समय आ गया है कि हम इस पूरे महापाप के अंत की बात करें और उन ठोस, व्यावहारिक क़दमों को रेखांकित करें जो हमारी आने वाली पीढ़ी को इस नरक से बचा सकते हैं. आइये, अब ‘समाधान की दिशा और निष्कर्ष’ की ओर बढ़ते हैं.
7.समाधान की दिशा और निष्कर्ष: कैसे ढहेगा यह काला साम्राज्य?
इस पूरे मकड़जाल, आपराधिक सिंडिकेट और मासूमों की बलि के आंकड़ों को देखने के बाद यह साफ़ है कि भारत की शिक्षा व्यवस्था इस वक्त ‘इमरजेंसी’ (आपातकाल) के दौर से गुजर रही है. हम सिर्फ समस्याएं बताकर और लोगों को कोसकर शांत नहीं बैठ सकते हैं. यदि हमें देश का भविष्य और बच्चों की मुस्कान बचानी है, तो सरकार, न्यायपालिका और समाज को मिलकर कुछ बेहद कड़े और क्रन्तिकारी क़दम उठाने होंगे.
संस्थागत और तकनीकी सुधार: परीक्षा प्रणाली का शुद्धिकरण
(1) NTA को वैधानिक संस्था (Statutory Body) बनाना: सबसे पहला क़दम यह होना चाहिए कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) को संसद के कानून के तहत एक वैधानिक और स्वायत्त संस्था बनाया जाये. इसकी सीधी जवाबदेही कैग (CAG) और संसद के प्रति तय हो, ताकि गड़बड़ी होने पर शीर्ष अधिकारियों को सीधे बर्खास्त किया जा सके और जेल भेजा जा सके.
(2) मल्टी-स्टेज और डिजिटल पेपर सुरक्षा: प्रश्न-पत्रों के लीक होने की संभावना को पूरी तरह ख़त्म करने के लिए भौतिक (Physical) प्रिंटिंग प्रेस के बजाय ‘एनक्रिप्टेड डिजिटल क्वेश्चन पेपर’ मॉडल को अपनाना चाहिए, जो परीक्षा शुरू होने से ठीक 15 मिनट पहले सीधे परीक्षा केंद्र के कंप्यूटर पर एक सुरक्षित ओटिपी (OTP) के ज़रिए ही खुले.
डमी स्कूल रैकेट पर सर्जिकल स्ट्राइक
(1) बायोमेट्रिक अटेंडेंस और औचक निरीक्षण: सरकार को देश के सभी सरकारी और प्राइवेट स्कूलों में छात्रों के साथ-साथ शिक्षकों के लिए भी ‘आधार लिंक्ड बायोमेट्रिक अटेंडेंस’ अनिवार्य कर देनी चाहिए. इस डाटा को सीधे शिक्षा मंत्रालय के केंद्रीय सर्वर से जोड़ा जाये.
(2) कड़ा जुर्माना और जेल: जो स्कूल डमी छात्रों को संरक्षण देते पाए जायें, उन पर केवल मान्यता रद्द करने की नरम कार्रवाई न हो, बल्कि उनके मालिकों पर धोखाधड़ी (BNS की धाराओं के तहत) का मुकदमा दर्ज़ कर उन्हें जेल भेजा जाये.
स्कूल और एंट्रेंस सिलेबस का एकीकरण (Alignment)
जब तक स्कूलों की पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं के पैटर्न में ज़मीन-आसमान का अंतर रहेगा, तब तक कोचिंग माफिया फलता-फूलता रहेगा. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत सीबीएसई (CBSE) और सभी राज्य बोर्ड के ग्यारहवीं और बारहवीं के सिलेबस को इस तरह री-डिजाइन किया जाये कि बोर्ड परीक्षा के अंक और और एंट्रेंस एग्जाम के कांसेप्ट्स (अवधारणाएं) आपस में मेल खाएं. अगर स्कूल की पढ़ाई ही एंट्रेंस के लिए पर्याप्त होगी, तो ₹58,000 करोड़ की यह कोचिंग इंडस्ट्री अपने आप घुटनों पर आ जाएगी.
फीस कैपिंग और अनिवार्य मेंटल हेल्थ विंग
(1) फीस की अधिकतम सीमा तय हो: प्राइवेट स्कूलों की तर्ज पर देशभर के कोचिंग संस्थानों की फीस की एक ऊपरी सीमा (Cap) तय होनी चाहिए. कोई भी संस्थान मनमानी फीस नहीं वसूल सकता है.
(2) मेंटल हेल्थ विंग अनिवार्य हो: हर कोचिंग हब और संस्थान में चौबीस घंटे सक्रिय रहने वाले पेशेवर काउंसलर की नियुक्ति अनिवार्य हो, जो साप्ताहिक टेस्ट के दबाव को कम कर सकें और बच्चों को ‘रैंक’ के बजाय उनके स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना सिखाएं.
निष्कर्ष: सपनों का व्यापार बंद होना ही चाहिए
शिक्षा किसी भी देश की आत्मा होती है और छात्र उस आत्मा का प्रतिबिंब (Reflection). जब देश के स्कूल फर्जीवाड़े के अड्डे बन जायें, जब देश की सबसे बड़ी परीक्षाओं के पेपर टेलीग्राम ग्रूप पर बिकने लगें, और जब 17 साल के मासूमों की लाशें हॉस्टलों के पंखों पर लटकने लगें, तो यह मान लेना चाहिए कि समाज के रूप में हम पूरी तरह असफल हो रहे हैं.
“कोचिंग माफिया: शिक्षा का काला साम्राज्य और छात्रों के सपनों का सौदा” केवल एक लेख नहीं है, बल्कि यह इस सड़ी-गली व्यवस्था के ख़िलाफ़ एक चार्जशीट है. हम भारत को विश्वगुरु बनाने का दावा तक नहीं कर सकते हैं, जब तक हमारी शिक्षा व्यवस्था का मॉडल ‘मेहनत और मेधा’ के बजाय ‘कनेक्शन और करोड़ों के डोनेशन’ पर आधारित रहेगा. अब समय आ गया है कि सरकारें अपनी नींद से जागें, कानून की 10 साल की जेल और ₹1 करोड़ के जुर्माने की तलवार को कागजों से निकालकर अपराधियों की गर्दन तक पहुंचाएं. शिक्षा को ‘बाज़ार’ और छात्रों को ‘कस्टमर’ समझने की इस क्रूर सोच को जड़ से उखाड़ना ही होगा, ताकि देश का कोई और नौजवान अपनी ज़िंदगी की कीमत पर किसी परीक्षा को पास करने की अंधी दौड़ का हिस्सा न बने.
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