समाज

जिगोलो मार्केट (Gigolo Market): बढ़ता ही जा रहा है मर्दों के जिस्म का कारोबार! जानिए कहां-कहां लगती है बोली

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– अधिकांश किटी पार्टियों में ली जाती है जिगोलो की सेवा


– मिडल क्लास आंटियों को भी लग चुकी है जिगोलो की लत


– अमीर घराने की महिलाएं लगाती हैं जिगोलो की बोली


– जिगोलो क़ारोबार बड़े शहरों के बाद अब छोटे शहरों में पनप रहा है 

भारत में जिगोलो का धंधा या जिगोलो मार्केट (Gigolo market) बढ़ता जा रहा है. पिछले दो-तीन दशकों में इसके विस्तार पर नज़र डालें तो पता चलता है कि यह तेजी से फैला है, और फैलता ही जा रहा है. फ़िलहाल भारत में जिगोलो की डिमांड और सप्लाई कहाँ-कहाँ और कितनी  है, यह जानकर आश्चर्य होगा कि हम जितना सोचते हैं, उससे कहीं व्यापक है.
जिगोलो के साथ महिलाएं
कुछ निजी संस्थानों द्वारा किए गए सर्वेक्षणों से पता चलता है कि जिगोलो मार्केट या मेल एस्कॉर्ट (Male Escort) का धंधा देश की राजधानी दिल्ली सहित मुंबई, कोलकाता, बंगलौर, जयपुर व गुडगांव में जितनी तेज़ी से पैर पसार रहा है आने वाले समय में यह फीमेल एस्कॉर्ट (Female Escort or Prostitute) यानी स्त्री वेश्या के धंधे को भी पीछे छोड़ देगा. दरअसल, यह गंदा है पर कमाई वाला धंधा है. बिना निवेश या मामूली निवेश वाला व्यवसाय-व्यापार है. इसमें आम के आम हैं, और गुठलियों के दाम हासिल करने वाला काम है. काम-क्रीडा के कुछ हुनरमंद तो हर रात पैसों में तुले जाते हैं.
मीडिया सूत्रों के मुताबिक़, दिल्ली, मुंबई, चंडीगढ़, बेंगलुरु, आदि शहरों के कई पॉश इलाक़ों में मर्दों के बाज़ार रात 10 बजे से सुबह 4 बजे तक सजते हैं जहां कुछ घंटों के लिए जिगोलो की बुकिंग 1800 से 3000 रुपए और फुल नाइट के लिए 8 हज़ार तक में डील होती है. यहीं नहीं, गठीले और सिक्स पैक्स-ऐब्स वाले मर्दों की क़ीमत ₹15,000 से शुरू होती है. इस में दो तरह के रेट होते हैं- सिंगल क्लाइंट सर्विस यानी अकेली महिला की सेवा के लिए अलग, जबकि महिलाओं के ग्रूप के लिए अलग और मुहमांगी क़ीमत होती है.
दिल्ली के सरोजिनी नगर, लाजपत नगर, पालिका मार्केट और कमला नगर समेत कई इलाक़ों में यह धंधा पुलिस की नाक के नीचे धड़ल्ले से चल रहा है. इनके अलावा, राजधानी के ही साउथ एक्सटेंशन, जेएनयू रोड़, आईएनए, अंसल प्लाजा, क्नॉट प्लेस, जनकपुरी डिस्ट्रिक्ट सेंटर, जैसे प्रमुख बाज़ारों की सड़कों पर देर रात माहौल ऐसा हो जाता है कि वहां से शरीफ़ लोगों का गुज़रना मुश्किल हो जाता है.
मुंबई के मालाबार हिल्स में जिगोलो मार्केट लगता है. इसके अलावा, डिस्को, कॉफ़ी हाउस और पब आदि में भी आजकल यह कारोबार ख़ूब फल फूल रहा है.
ज्ञात हो कि दिन के उजाले में ख़ुद को सभ्य समाज की बताने वाली कई अमीर घराने की महिलाएं यहां पुरुषों की बोली लगाती हैं. वे उन्हें किराये पर लेकर अपनी बेशक़ीमती गाड़ियों में गंतव्य स्थानों पर ले जाती हैं या किटी पार्टी के नाम पर जिगोलो पार्टी करती हैं.
 
जिगोलो से डील करती महिलाएं 
विदित हो कि भारत में जिगोलो (Gigolo) यानि पुरूष वेश्या (अधेड़/वृद्ध स्त्रियों पर आश्रित पुरूष ) जिन्हें मेल एस्कॉर्ट (Male Escort) भी कहते हैं, पहले महानगरों में ही इक्के-दुक्के पाए जाते थे. धीरे-धीरे ये फ़ैलते गए, जिससे एक नया पेशा उभरकर सामने आया- पुरूष वेश्यावृत्ति का पेशा, जिसमें व्यक्तिगत संपर्कों और धीरे-धीरे बढ़ने के बजाय तेजी से फैलकर छा जाने की ललक को इंटरनेट ने पंख लगा दिए. फिर, पेशा व्यापार बन गया.
दरअसल, व्यापार को बाज़ार चाहिए और बाज़ार को माल और ख़रीदार, जिसमें न्यूज़ मीडिया को महारत हासिल है. हमारी मीडिया ने इसे प्लेटफ़ॉर्म दिया, और कुकुरमुत्तों की तरह फ़ैली एनजीओ ने वैचारिक समर्थन देकर इसे कुलीन परिवारों से मध्यमवर्गीय लोगों तक पहुंचा दिया. इसका नतीज़ा यह हुआ कि जिगोलो का कारोबार अब सिर्फ़ महानगरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अन्य उन छोटे-बड़े शहरों तक पहुंच चुका है तथा अपना नेटवर्क बढ़ा रहा है, जहां अय्याश मिजाज़ व्यवसायी और कामकाजी लोग रहा करते हैं.
विभिन्न एजेंसियों की शोध टीम का नेतृत्व कर चुके एक स्वतंत्र एवं खोज़ी पत्रकार एम दिनाकरन ने जिगोलो मार्केट के विषय पर पर गहरा अध्ययन किया है. वे बताते हैं:

“शहरी महिलाओं की होने वाली पार्टियों में अधिकांश पार्टियां जिन्हें हम किटी पार्टी ही समझते हैं, वो कोई किटी पार्टी नहीं बल्कि नए ज़माने की एक ऐसी पार्टी है जिसमें औरतों के साथ-साथ कम से कम एक जवान लड़के का होना ज़रूरी है. जी हां, तीन-चार शादीशुदा आंटियों के बीच किराए का एक लड़का. दरअसल, यह एक जिगोलो पार्टी होती है जिसमें किराये पर लाया गया लड़का या युवा पुरुष वहां मौज़ूद आंटियों का दिल बहलाता है. उन्हें ख़ुश करता है और उसके बदले उसे हज़ारों रूपये बतौर मेहनताना मिलते हैं, जो तय घंटे से अधिक हो जाने पर दुगनी फ़ीस के रूप में बढ़ जाया करता है.”

दिनाकरन के मुताबिक़, ऐसी जिगोलो पार्टियां अब सिर्फ़ हाई प्रोफ़ाइल सोसायटी तक ही सीमित नहीं रहीं, बल्कि ये वहां भी जा पहुंची हैं जिन्हें हम मिडल क्लास घरानों के नाम से जानते हैं. वे बताते हैं-
” मिडल क्लास घरानों की आंटियां भी अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी से इस क़दर उब चुकी लगती हैं कि समाज के बनाए नियम-क़ानून तोड़कर उन्हें कुछ भी नया करने से कोई गुरेज़ नहीं है. जी हां, पहले हाई प्रोफाइल आंटियों को लगने वाली जिगोलो की लत अब मिडल क्लास घरों तक पहुंच चुकी है.
पार्टी जैसे-जैसे परवान चढ़ती है इसके सबूत मिलने लगते हैं. शराब के सुरूर में आंटियां एक दूसरे की मौज़ूदगी भूलाकर जिगोलो के ज़िस्म में अपनी जवानी ढूंढने लगती हैं. यह सिलसिला तबतक चलता रहता है जबतक जिस्म से खिलवाड़ में इनका दिल नहीं भर जाता है.
ज़िगोलो को दिया पैसा वसूलना इन आंटियों को  बख़ूबी आता है, चाहे इसके लिए सारी हदों को पार ही क्यों न करना पड़े. वैसे भी तपिश और बढ़ जाती है चंद बूंदों के बाद.
सच में, इसमें हैरान होने जैसी कोई बात नहीं क्योंकि यह धंधा अब नया नहीं रहा बड़े शहरों के लिए. छोटे शहरों में सर्वेक्षण अभी हुआ नहीं है, इसलिए वहां की आंटियों के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है, लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इंटरनेट के इस ज़माने में कुछ भी रायते की तरह फैल जाता है.”
दिनाकरन बताते हैं कि जिगोलो के इस क़ारोबार में सबसे बड़े मददगार हैं कुकुरमुत्तों की तरह उग आए छोटे-बड़े क्लब, जिनसे जुड़ने का मत्लब होता है ख़ुद में आधुनिक व प्रतिष्ठित होने का अहसास. स्टेटस सिंबल बन चुके ये क्लब मर्दों की जिस्मफरोशी यानी जिगोलो मार्केट को बढ़ा रहे हैं. वे आगे बताते हैं-
” शहरों के मिडल क्लास क्लबों में जिगोलो पार्टियों का चलन तेज़ी से बढ़ रहा है और इसकी सबसे ज़्यादा शौक़ीन हैं अधेड़ उम्र की वो शादीशुदा आंटियां जिनका दिल अपने पतियों से भर चुका होता है. पति जहाँ अपने कामकाज में व्यस्त होकर नोट छापने की मशीन बन जाते हैं, वहीं उनकी पत्नियां उन पैसों को जवानी ख़रीदने में उड़ाती फिरती हैं. दरअसल, उम्र के इस पड़ाव में उन्हें ज़रूरत महसूस होती है एक ऐसे जवान साथी की जो उन्हें जवान होने का अहसास एक बार फ़िर से दिला दे. जिगोलो ऐसी आंटियों की पहली पसंद होते हैं. 
विदित हो कि जिगोलो एक मेल प्रोस्टिच्युट या मेल एस्कॉर्ट है जिसके जिस्म की क़ीमत चुकाकर हाईप्रोफाइल औरतें मौज़-मस्ती करती हैं बिल्कुल उसी तरह जिस तरह क़ीमत चुकाकर कॉल गर्ल का इस्तेमाल मर्द किया करते हैं.   
यह धंधा अब इतना बढ़ चुका है कि बाक़ायदा एक नेटवर्क के ज़रिए लड़कों को जिगोलो बनाया जा रहा है और उन्हें ट्रेनिंग दी जा रही है, ताकि महिलाओं के बीच जाने से पहले ये तौर-तरीक़े, बोली, उठने-बैठने का तरीक़ा और उन्हें ख़ुश करने का हुनर अच्छी तरह समझ जाएं.”
जिगोलो मार्केट का सच जानिए जिगोलो की जुबानी
जिगोलो मार्केट में 4 साल का अनुभव रखने वाले एक युवा या जिगोलो ने बताया कि एमटेक की पढ़ाई के बाद वह एक अच्छी नौकरी करता था. लेकिन एक लड़की के चक्कर में उसे जेल हो गई थी, और फिर उसकी ज़िन्दगी पटरी से उतर गई. वह एक बोनाफाइड व होनहार युवा से जिगोलो बन गया. मगर उसने अपना नाम व पहचान गुप्त रखने की शर्त पर ही अपना अनुभव साझा किया तो हमने भी उसका पालन किया है, और उसका एक काल्पनिक नाम रखा है- अनुभव कुमार (जिसने आज के आधुनिक जीवन और समाज की कड़वी सच्चाई का अनुभव किया है). मगर उसका जो अनुभव है वह बहुत चौंकाने वाला है. यक़ीन तो नहीं होता है, परंतु जो कुछ भी उसने बताया, वह जानने के साथ ही उसका विलेषण भी करते चलते हैं. उसने बताया:
” बहुत मुश्किल दिनों में साउथ दिल्ली के एक पार्क में मुझे एक बुज़ुर्ग व्यक्ति मिले. पता नहीं कैसे पर वे एक नज़र में ही भांप गए कि मैं दुखी व किसी मुश्किल में हूं. उन्होंने ढाढस बंधाया और मदद का भरोसा देकर अपने घर ले गए. वहां उन्होंने मुझे अच्छा खाना खिलाया और थोड़े पैसे भी दिए. उन्होंने कहा कि मैं जबतक चाहूं उनके घर में रह सकता हूं, एक रिश्तेदार की तरह. पड़ोसियों की नज़र में एक दूर का रिश्तेदार. इस तरह, मुझे अब भोजन और जेबखर्च (Pocket Money) के साथ रहने को घर भी मिल गया था. एक पल के लिए वे मुझे देवदूत लगे और मैंने उन्हें सम्मानपूर्वक अंकल कहकर संबोधित किया. लेकिन मैं उस वक़्त हैरान और परेशान हो गया जब उन्होंने इस सबके एवज में ख़ुश करने यानी शारीरिक संबंध बनाने की पेशकश की. यह अच्छा तो नहीं लगा, मगर मेरे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था, और न ही निर्णय लेने क्षमता ही बची थी. इसलिए, मुझे अंकल की बात माननी पड़ी, और वह किया जो कुछ उन्होंने कहा. ऐसा मैंने पहली बार किया था, लेकिन उसके बाद तो यह मेरे लिए रोज़मर्रा की बात हो गई थी. उस पर भी, अब उनके कुछ दूसरे बुजुर्ग साथी भी वहां आने लगे.”   
मैंने सुना था कि मर्द अपनी हवस मिटाने हिज़ड़ों के पास जाते हैं. हिज़ड़े उन्हें संतुष्ट करने के बदले पैसा वसूल करते हैं. यह उन की कमाई का ज़रिया है. मगर यहां उल्टा हो रहा था. अंकल अपना पैसा ख़र्च कर मुझसे वह करा रहे थे जो हिजड़े पैसा कमाने के लिए कराते हैं. बहुत अज़ीब थे अंकल! उनमें न मर्दों जैसी चाह थी न वे हिजड़ा ही थे!”
  
विश्लेषण: हमने क्या देखा? हमने यहाँ देखा कि जिगोलो विकृत मानसिकता वाली महिलाओं के साथ-साथ कुछ मर्दों की चाहत भी हैं, जो उम्र के उस पड़ाव में जहाँ उन्हें चौथेपन का धर्म निभाना चाहिए वहाँ जवानी का मज़ा ले रहे हैं. साथ ही, जिगोलो मार्केट और उसके कारोबार या चलन बढ़ता जा रहा है, और यह एलिट (कुलीन) सोसायटियों से निकलकर शहरों के मध्यमवर्गीय लोगों की बंद गलियों और घरों तक पहुंच चुकी है.
अनुभव कुमार आगे कहता है:

“इस तरह कुछ महीने बीत गए. रोज़-रोज़ अंकल और उनकी बुजुर्ग मंडली को ख़ुश करते हुए मैं उब चुका था. तभी एक दिन मेरा एक महिला से संपर्क हुआ और जब मैं उनके घर गया तो अच्छा लगा. मैंने देखा कि वह अधेड़ थीं, मगर सुंदर थीं और साथ ही सेक्स के ज्ञान में निपुण भी. वास्तव में, उनके साथ मज़ा आया और ऐसा लगा कि अंकल की कृत्रिम दुनिया से निकलकर मैं फ़िर से प्राकृतिक जीवन में लौट आया हूं. उन्होंने न सिर्फ़ अच्छे पैसे दिए, बल्कि जो तकनीक ज्ञान दिया वह मुझे एक अच्छे जिगोलो बनने व ‘अंकल की दुनिया’ से दूर जाने में सहायक सिद्ध हुई. उनके संपर्क से मुझे एक पूरा बाज़ार मिला- जिसमें क्लबों-किटी पार्टियों के अलावा सीधे लोगों के घरों तक संपर्क बन गया है. आज यहाँ मेरी डिमांड है, और अच्छी कमाई भी है. आज़ मैं प्रोफेशनल और समर्थ हूँ तो उन्हीं की बदौलत. दरअसल, वे मेरी गुरू हैं, और मैं उनका बहुत सम्मान करता हूँ.”

विश्लेषण: यहाँ हमने देखा कि जिगोलो मार्केट का नेटवर्क बढ़ने के साथ-साथ अनुभव कुमार जैसों की घुसपैठ अब सीधे घरों तक भी हो चुकी है. यानी उन्हें ग्राहक ढूँढने कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि पड़ोस में ही शिक्षक-प्रशिक्षक के साथ अंकल-आंटी उन्हें हाथोंहाथ लेने को तैयार बैठे हैं.  
ज़िगोलो बाज़ार,फ़ैल रहा है,शहर दर शहर
जिगोलो मार्केट: घरों में भी जिगोलो का इंतज़ार 
अनुभव कुमार ने अपना अनुभव साझा करते हुए और विस्तार से बताया:
“अब मैं (गुरू या जिगोलो जगत की दलाल से संपर्क और साथ मिलने के बाद) बहुत व्यस्त रहने लगा था. एक्ज़ाम की तैयारी के दिनों से भी ज़्यादा. रोज़ रात नई महिलाएं या महिलाओं के ग्रूप में नए अंदाज़ और एनर्जी के साथ अपनी क़ाबिलियत साबित करना आसान नहीं था. कहीं प्रशंसा मिली तो कहीं बेइज्ज़ती भी हुई, मगर कमाई बढ़ती गई. अनुभव के साथ धंधे का विकास हुआ और जीवन में स्थायित्व तथा सुरक्षा के भाव बढ़े.
हालात बदल गए.
  
कुछ एजेंसियों से जुड़ने के बाद से तो अब मुझे वीवीआइपी की भी सेवा के मौक़े मिलते हैं, जैसे दूतावासों और कॉर्पोरेट जगत के लोगों को खुश करने का काम. इनमें औरतें होती हैं और मर्द भी. कपल्स भी. इनसे पहले परिचय करवाया जाता है. उसके बाद तय स्थान व समय पर ‘मेरी सप्लाई’ दी जाती है. ऐसे ग्राहक हमें ज़्यादातर होटलों या फ़ार्महाउसों में बुलाते हैं. मगर कुछ ऐसे भी होते हैं जो सरकारी या निज़ी आवास के लिए भी डिमांड करते हैं. समय कोई भी हो सकता है- रात में और दिन में भी. मनमाफ़िक सेवा से ख़ुश ये लोग अलग से टीप भी देते हैं. एजेंसियां 20 पर्सेंट कमीशन लेती हैं, लेकिन हमारी फ़ीस भी बहुत अच्छी होती है.
    
अकेली महिला की ‘सिंगल सर्विस डिमांड’ कम ही आती है. ज़्यादातर कॉल पार्टियों के लिए आते हैं-शादीशुदा अधेड़ महिलाओं की पार्टियां जिनमें कुछ जवान औरतें भी शामिल होती हैं. ऊँचे घराने की महिलाओं की पार्टियों में आमतौर पर समस्या नहीं आती है, लेकिन मिडल क्लास महिलाओं की ज़्यादातर पार्टियों में तय संख्या से ज़्यादा महिलाएं पहुंच जाती हैं, जिन्हें संभालना मुश्किल होता है. कुछ नखरे वाली औरतें भी होती हैं, जो ज़्यादा वक़्त तक उलझाए रखती हैं. इससे ग्रूप की दूसरी सदस्यों को पूरा वक़्त नहीं मिलता है और वे ‘एक्स्ट्रा टाइम की डिमांड’ रख देती हैं. मगर पेमेंट के वक़्त मसला खड़ा हो जाता है. वे मुझसे तो लडती ही हैं आपस में भी झगड़ने लगती हैं. ऐसे में, हमें डर सताता रहता है कि कोई हमारी शिक़ायत न कर दे. दरअसल,शिकायतों के कारण हमारी रेटिंग पर फर्क़ पड़ सकता है जो रेपो (साख) के लिए ठीक नहीं समझी जाती है. एक्स्ट्रा कमाई तो इनसे शायद ही कभी होती है.
        
सबसे मुश्किल और ज़ोखिम भरा काम होता है कपल्स की डिमांड पर उनके घर जाना. दरअसल,ये वे बेमेल जोड़े होते हैं जो एक दूसरे को ख़ुश नहीं कर पाते हैं, लेकिन एकसाथ रहते हैं और एक दूसरे की ज़रूरतों को समझते हैं. इसके अलावा, वैसे सक्षम दंपत्ति भी हमें बुलाते हैं, जो पश्चिमी सभ्यता को पसंद करते हैं और जिन्हें अलग-अलग देह में अलग-अलग गंध और स्वाद की अनुभूति करने की लत लग चुकी है वैसे ही जैसे घर के खाने के अलावा बाज़ार का भी स्वाद लोग लेते हैं.
अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले इनमें कुछ ऐसे मशहूर लोग भी हैं जो टीवी चैनलों पर और अख़बारों में भारतीय सभ्यता-संस्कृति, संस्कार और शुचिता की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं और सम्मान पाते हैं.
ये तय वक़्त से ज़्यादा वक़्त तक रोके रखते हैं, शराब पीने का दबाव बनाते हैं और आख़िर में पेमेंट को लेकर अक्सर मोलभाव करते हैं. कई बार तो ये नशे में ज़िन्दगी बर्बाद कर देने की धमकियां भी देते हैं. इनसे डर लगता है और यही कारण है कि अब मैं ऐसे लोगों के कॉल को अक्सर इग्नोर कर देता हूं. 
जब पहली बार मुझे एक नए शादीशुदा जोड़े को उनके हनीमून पर अटेंड करने का मौक़ा मिला, तो मुझे अपनी आंखों पर यक़ीन नहीं हो रहा था. मेरे मन में सवाल उठ रहा था कि आख़िर ये लोग शादियां ही क्यों करते हैं जब इन्हें मुझ जैसों की सेवा की ज़रूरत है. पर उन्हें सन्तुष्ट करने के बाद समझ आया कि यह ‘समथिंग डिफरेंट’ (कुछ हटके) करने और एक्स्ट्रा एंजॉयमेंट (अतिरिक्त आनंद) के लिए अनुभव प्राप्त करने का प्रयास है. बहुत ही विचित्र. दरअसल, मुझे यह बिल्कुल भी जायज़ नहीं लगता है, जबकि मैं ख़ुद नाजायज़ हो गया हूं.
आज मेरे पास वह सबकुछ है, जो शायद उस ह्वाईट कॉलर जॉब में हासिल नहीं कर सकता था. लेकिन अकेलापन महसूस करता हूँ- बिल्कुल अकेला. कभी-कभी ख़ुद से नफ़रत भी होने लगती है, टूटने भी लगता हूँ, मगर पता नहीं कौन सी शक्ति मुझे थामे हुए है! “
विश्लेषण: यह स्पष्ट है कि जिगोलो मार्केट का विस्तार उतना हो चुका है और वहाँ तक हो चुका है जहाँ की बातें या ख़बरें हमें कुछ वर्षों तक अविश्वसनीय लगती थीं. यूं कहिये कि जिगोलो जीवन के उस क्षेत्र में भी प्रवेश कर चुका है या उस दायरे को भी तोड़ चुका है जिसे समाज का अन्तःपुर और मूल्यों-संस्कार का सबसे सुरक्षित स्थान माना जाता है.
विदित हो कि पतन की नई परंपरा वाला जिगोलो मार्केट भारत में अन्य सामजिक प्रदूषण की तरह पश्चिमी सभ्यता से आया जहां यौन विकृति समाज का हिस्सा है. महिलाओं को योनि से अधिक गुदा मैथुन में आनंद मिलने वाली सोच या आधुनिक विमर्श भी वहीं से आया है. पश्चिमी लोगों की मानसिकता के साथ चलते हुए भारत में भी युवा वर्ग इस मार्केट से जुड़ने लगा क्योंकि उसे इस काम में ज्यादा मेहनत कम कमाई ज़्यादा नज़र आती है. अय्याशी अलग से है. लेकिन जब कड़वी सच्चाई सामने आती है तो पैरों तले ज़मीन खिसक जाती है. कई लोगों से शारीरिक और असुरक्षित संबंध बनाने के चक्कर में एड्स और अन्य एसटीडी (यौन संक्रमित रोग ) इन्हें हो जाता है और जहन्नुम बन चुकी ज़िन्दगी में हर पल सामने मौत खड़ी नज़र आती है. सिर्फ जिगोलो ही नहीं, वे तमाम लोग भी जो उसके संपर्क में आ चुके होते हैं, जबतक समझ पाते हैं तबतक बहुत देर हो चुकी होती है.
ज़िगोलो बाज़ार,फ़ैल रहा है,शहर दर शहर
एड्स का मरीज
मगर दुर्भाग्य यह है कि देश की बिकाऊ मीडिया और शासन-न्याय तंत्र का लिव इन रिलेशनशिप, समलैंगिकता और वेश्यावृत्ति को वैचारिक समर्थन प्राप्त है. अनैतिक कृत्यों को लगाम लगाने वाली 377 और 497 आदि कानूनी धाराएं पहले ही समाप्त की जा चुकी हैं. ज़िन्दगी को व्यापार के रूप में देखने वाले तथाकथित समाजसेवी और बुद्धिजीवि मानव स्वतंत्रता का उद्घोष करते नज़र आते हैं और इस आड़ में अपने छिपे अनैतिक कृत्य को पूरा करने की सोच रखते हैं. क्या हम इतने लाचार और कमज़ोर हैं कि ऐसे भटके हुए और समाज विरोधियों  के सामने घुटने टेक देंगे और अपनी गौरवमयी परंपराओं और संस्कृति को ख़त्म होते होते हुए देखेंगे?
ध्यान रहे, हमें स्वयं कठोर निर्णय लेना होगा, और इस तरह विरोध दर्ज़ कराना होगा कि सरकार और अदालतें इस मुद्दे पर नीतिगत और व्यवस्थागत बदलाव करने साथ-साथ उचित क़दम उठाने के लिए मज़बूर हो जायें.
और चलते चलते अर्ज़ है ये शेर…
         ऐ काफ़िले वालों,तुम इतना भी नहीं समझे,
         लूटा है तुम्हें रहज़न ने,रहबर के इशारे पर |
और साथ ही…
        जिसके क़िरदार पर शैतान भी शर्मिंदा है,
        वो भी आए हैं यहां करने नसीहत हमको | 

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    रामाशंकर पांडेय

    दुनिया में बहुत कुछ ऐसा है, जो दिखता तो कुछ और है पर हक़ीक़त में वह होता कुछ और ही है. इसीलिए कहा गया है कि चमकने वाली हर चीज़ सोना नहीं होती है. यही ध्यान में रखते हुए, हमारा यह दायित्व बनता है कि हम लोगों तक स्पष्ट और सही जानकारी पहुंचाएं. खासतौर से, समाज, संस्कृति, राजनीति, इतिहास, धर्म, ज्ञान-विज्ञान, आदि से जुड़ी जानकारी को लेकर एक माध्यम का पूर्वाग्रह रहित और निष्पक्ष होना ज़रूरी है. khulizuban.com का प्रयास इसी दिशा में एक क़दम है.

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