समाज

शुगर डैडी और शुगर मॉम क्या होते हैं? रिश्तों के नए कल्चर का सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और कानूनी विश्लेषण

शुगर डैडी और शुगर मॉम (Sugar Daddy & Sugar Mom) नामक रिश्तों के नए कल्चर के समर्थकों का यह तर्क होता है कि इसमें दोनों पक्षों की आपसी सहमति और वित्तीय सहायता के साथ-साथ आपसी बातचीत, मेंटरशिप और भावनात्मक जुड़ाव जैसी चीजें भी शामिल होती हैं. लेकिन सच यह है कि इस रिश्ते को चाहे जितनी भी शुगर यानी मिठास की परत चढ़ाकर पेश किया जाये, यह समाज के ताने-बाने को अंदर से खोखला कर रहा है. ऐसे में, इस कल्चर के किरदार- शुगर डैडी, शुगर मॉम और शुगर बेबी की हक़ीक़त को गहराई से जानने की ज़रूरत है.

Don't miss out!
Subscribe To Newsletter
Receive top education news, lesson ideas, teaching tips and more!
Invalid email address
Give it a try. You can unsubscribe at any time.

इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के इस दौर में इंसानी रिश्तों के मायने और तौर-तरीक़े बदल रहे हैं. आज के डिजिटल युग (Digital Age) में जहाँ लिव-इन संबंध (Live-in Relationship) और कैजुअल डेटिंग जैसे शब्द पुराने पड़ चुके हैं, वहीं एक नया और बहुत चर्चित लाइफस्टाइल ट्रेंड तेजी से पैर पसार रहा है- जिसे शुगर डेटिंग (Sugar Dating) कहा जाता है. इंस्टाग्राम रील, मीम्स और विदेशी वेब सीरीज के ज़रिए हमारे समाज में शुगर डैडी और शुगर मॉम (Sugar Daddy and Sugar Mom) जैसे शब्द आम लोगों के कानों तक भी पहुँचने लगे हैं. पहली नज़र में यह पूरी अवधारणा (Concept) आधुनिकता और चकाचौंध से भरी हुई (Glamorous) एक खूबसूरत दुनिया जैसी नज़र आती है, लेकिन इस पर चढ़ाई गई शुगर यानी मिठास की परत को हटाते ही एक कड़वी सच्चाई सामने आती है. यह कोई सामान्य या पवित्र प्रेम-प्रसंग नहीं है, बल्कि एक ऐसा समझौता है, जो अमीर उम्रदराज लोगों के अकेलेपन तथा ठरक और युवाओं की लग्जरी लाइफस्टाइल (Luxury Lifestyle) जीने की अंधी चाहत के बीच की एक कड़ी है. महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक महत्वाकांक्षी युवाओं और उच्च वर्ग के बीच इस कल्चर को लेकर जितनी उत्सुकता है, समाज में इस पर उतना ही बड़ा विवाद भी छिड़ा हुआ है.

शुगर डैडी और शुगर मॉम: शुगर बेबी से रिश्तों का क़रार

शुगर डैडी और शुगर मॉम (Sugar Daddy and Sugar Mom) नामक इस कल्चर के समर्थकों और इसके व्यावसायिक ऐप्स द्वारा अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि इस रिश्ते में दोनों पक्षों की आपसी सहमति होती है. वैश्विक रिसर्च फर्म Springer की एक विस्तृत समीक्षा (Scoping Review) भी यह बताती है कि यह वेश्यावृत्ति (Prostitution) या पारंपरिक सेक्स वर्क (Traditional Sex Work) से काफ़ी अलग है. इसमें वित्तीय सहायता के साथ-साथ आपसी बातचीत, मेंटरशिप और भावनात्मक जुड़ाव जैसी चीजें भी शामिल होती हैं. यही कारण है दुनियाभर में Seeking जैसी बड़ी एग्रीमेंट डेटिंग वेबसाइट (Agreement Dating Sites) व्यावसायिक रूप से फल-फूल रही है- करोड़ों में खेल रही है. लेकिन सच यह है कि इस रिश्ते को चाहे जितना भी शुगर कोटेड (Sugar-Coated) यानी मीठा बनाकर पेश किया जाये, यह समाज के ताने-बाने को अंदर से खोखला कर रहा है. इस आधुनिक समस्या की गहराई में जाने से पहले यह समझना ज़रूरी है कि इस त्रिकोण के मुख्य किरदार कौन हैं और इस इस अजीबोगरीब शब्दावली कहाँ और कैसे हुई थी.

शुगर डैडी और शुगर मॉम कल्चर का परिचय, इतिहास और वर्तमान की झलक

इस तथाकथित मीठे रिश्ते के पीछे एक पूरा त्रिकोण काम करता है, जिसमें तीन मुख्य किरदार होते हैं. आइये, इनकी वास्तविक परिभाषा और इनके इतिहास को समझते हैं:

शुगर डैडी (Sugar Daddy): यह आमतौर पर उम्रदराज (अक्सर 40 से 60 वर्ष या इससे अधिक उम्र के), आर्थिक रूप से अत्यधिक समृद्ध और सफल पुरुष होते हैं, जो अपनी दौलत और रूतबे के दम पर ख़ुद से आधी उम्र की साथी तलाशते हैं. कुछेक मामलों में ‘साथी’ पुरुष भी होते हैं.

शुगर डैडी और शुगर बेबी

शुगर मॉम (Sugar Mom): कॉर्पोरेट जगत में महिलाओं की मजबूत आर्थिक स्थिति के बाद यह नया चलन आया है. यह ऐसी अमीर, रूतबे वाली और अधिक उम्र की महिलाएं जो अपने अकेलेपन को दूर करने या यौनेच्छा (Sexual Desire) पूरी करने के लिए युवाओं को पैसे और महंगे गिफ्ट का लालच देती हैं. यहां भी कुछेक मामलों में, साथी महिला (या महिलाएं) भी होती है.

शुगर मॉम और शुगर बेबी का रिश्ता

शुगर बेबी (Sugar Baby): यह इस दलदल का सबसे संवेदनशील हिस्सा हैं. आमतौर पर 18 से 25 वर्ष के कॉलेज और कोचिंग संस्थानों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं या करियर की शुरुआत कर रहे युवा (महिला और पुरुष, दोनों) इस जाल में फंसते हैं. ये अपनी पढ़ाई के ख़र्च या महंगे शौक पूरे करने के लिए अपनी गरिमा का सौदा करते हैं.

हालाँकि इसका दूसरा पहलू भी है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, आजकल ऐसे शुगर बेबी या कथित मुँहबोले बेटे-बेटियां भी हैं, जो ख़ुद ही इस जाल को रचते हैं और ठगी को अंजाम देकर रफूचक्कर हो जाते हैं. ऐसे मामले अक्सर सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर ऑनलाइन प्यार से शुरू होकर मेल-मुलाकातों के बाद ब्रेक-अप के अभिनय के साथ ख़त्म हो जाते हैं.

लेकिन, यह आलेख चूँकि विशेष रूप से शुगर डैडी और शुगर मॉम पर केन्द्रित है, इसलिए हम यहाँ उसी पर फोकस करेंगे.

रिश्तों के नए कल्चर वाला शब्द आया कहाँ से? (The History & Origin)

इस आकर्षक और मिठास भरे शब्द की उत्पत्ति का काल या इतिहास 115 साल पुराना है. Merriam-Webster डिक्शनरी के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, साल 1908 में अमेरिका की चीनी बनाने वाली एक बड़ी कंपनी (Sprackles Sugar Company) के मालिक एडोल्फ स्प्रैक्ल्स ने ख़ुद से 24 साल छोटी महिला अल्मा से मैरिज की थी. अल्मा अपने पति की बेहिसाब दौलत और उनकी चीनी (Sugar) की कंपनी के कारण उन्हें प्यार से शुगर डैडी कहकर बुलाती थी. धीरे-धीरे यह शब्द दुनियाभर में उन अमीर पुरुषों के लिए एक एक मुहावरा बन गया जो पैसों के दम पर युवा साथियों को अपनी उंगलियों पर नचाते हैं.

वर्तमान की कड़वी झलक

आज 21वीं सदी में यह इतिहास एक गंभीर सामाजिक समस्या का रूप ले चुका है. आज इंटरनेट पर ऐसे दर्जनों ऐप्स मौजूद हैं जो युवाओं को कॉलेज या महंगे कोचिंग संस्थानों की फीस भरने, क्रैश कोर्स और पर्सनल मेंटरशिप जैसी अतिरिक्त सुविधायें (Extra Advantage) ख़रीदने या कर्ज चुकाने के नाम पर शुगर डैडी और शुगर मॉम खोजने के लिए उकसाते हैं. वर्तमान में यह एक संगठित व्यापार बन चुका है, जहाँ युवाओं को यह सिखाया जाता है कि वे अमीर लोगों को कैसे खुश करके आसान पैसा कमा सकते हैं, जो कि हमारे समाज के नैतिक मूल्यों पर एक सीधा प्रहार है.

1.शुगर डैडी और शुगर मॉम: रिश्तों नया कल्चर- सामाजिक आयाम (Social Dimension)

शुगर डैडी और शुगर मॉम का नया कल्चर या उभरता हुआ चलन कोई साधारण व्यक्तिगत पसंद नहीं है, बल्कि हमारे समाज के नैतिक और सांस्कृतिक ताने-बाने को तेजी से प्रदूषित कर रहा है. जिसे मॉडर्न लाइफस्टाइल (Modern Lifestyle) का नाम देकर परोसा जा रहा है, वह असल में समाज के भीतर फैल रहा ऐसा प्रदूषण है जो हमारी युवा पीढ़ी के भविष्य को खोखला कर रहा है.

(1) सोशल मीडिया का भ्रमजाल और फोमो (FOMO) का असर

इस सामाजिक प्रदूषण को फैलाने में आज के सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म (जैसे इंस्टाग्राम रील और टिकटॉक) सबसे बड़े उत्प्रेरक (Catalyst) साबित हुए हैं. इन प्लेटफ़ॉर्म पर चौबीस घंटे लग्जरी लाइफस्टाइल, महंगे ब्रांडेड कपड़े, फाइव-स्टार होटलों में डिनर और विदेशों की मौज-मस्ती भरी यात्राओं को रील के माध्यम से इस तरह दिखाया जाता है जैसे यही जीवन का एकमात्र उद्देश्य हो. इसे देखकर साधारण परिवारों के युवाओं में फोमो (FOMO- Fear of Missing Out) यानी ‘पीछे छूट जाने का डर’ पैदा होता है. जब उनकी वास्तविक आर्थिक स्थिति इन झूठे सपनों से मेल नहीं खाती है, तो वे शुगर डैडी और शुगर मॉम के इस चकाचौंध भरे जाल की तरफ़ आकर्षित होने लगते हैं. युवाओं को लगता है कि मेहनत करने के बजाय यह अपनी इच्छाएं पूरी करने का एक शॉर्टकट या आसान तरीक़ा है.

शुगर डैडी और शुगर मॉम: लग्जरी लाइफस्टाइल के आकर्षण में युवा

(2) पारिवारिक मूल्यों का ह्रास, विवाह संस्था में बिखराव और प्रभाव

भारतीय समाज की नींव हमेशा से मजबूत पारिवारिक मूल्यों, आपसी विश्वास और त्याग पर टिकी रही है. लेकिन लगातार वैचारिक और सांस्कृतिक हमलों ने इसे काफ़ी प्रभावित किया है. इनमें से शुगर डैडी और शुगर मॉम कल्चर ने तो समाज के अधेड़ या उम्रदराज वर्ग और युवा वर्ग, दोनों को निशाना बनाया है.

विदित हो कि समाज परिवारों से बनता है और परिवार विवाह से. अगर विवाह व्यवस्था संस्कारित और मर्यादित है, तो पति-पत्नी के साथ-साथ उनकी संतानें भी सुसंस्कृत होंगी. इसी बात को ध्यान में रखते हुए पूर्वजों ने एक विशिष्ट विवाह पद्धति बनाई, जिसे विवाह संस्था कहा जाता है. इसमें विवाह को एक-पतिव्रत और एक-पत्नीव्रत की अवधारणा के साथ एक पवित्र बंधन माना गया है, जबकि पश्चिमी और अरब संस्कृति में इसके मायने बिल्कुल अलग हैं. यूं समझ लीजिये कि विवाह, शादी और मैरिज अलग-अलग शब्द ही नहीं, इनके मायने भी अलग होते हैं. लेकिन इस शुगर कोटिंग वाले विदेशी कल्चर ने इसमें घुसपैठ कर ली है, और रिश्तों का व्यावसायीकरण (Commercialization) कर उन्हें बिकाऊ बना रहा है.

इससे युवा वर्ग बहुत अधिक प्रभावित हो रहा है, क्योंकि जब एक युवा यह सीख जाता है कि समय, सम्मान और साथ (साहचर्य, मेलजोल) को पैसों से तौला जा सकता है, तो उसका रिश्तों से भरोसा उठ जाता है.

युवा वर्ग को प्रभावित करने वाला अमीर और उम्रदराज वर्ग वैचारिक रूप से भोगवादी संस्कृति के प्रभाव में है. यह अपने अकेलेपन और ठरक के समाधान को लेकर आनंद और संतुष्टि का नया मार्ग ढूंढ रहा है. इसमें कुछ तो ऐसे हैं जो अपनी जिम्मेदारियों से भागने के लिए इस कल्चर को अपना रहे हैं. वे कोर्ट-कचहरी, घरेलू जिम्मेदारियों और वैवाहिक प्रतिबद्धता से बचने के लिए पैसों के दम पर टेंपरेरी पार्टनर या अस्थायी साथी किराये पर ले रहे हैं. नतीजतन, पारंपरिक विवाह जैसी पवित्र संस्था कमज़ोर हो रही है और परिवारों में बिखराव आ रहा है.

(3) समाज को दोहरा नज़रिया और बढ़ता असंतुलन

इस प्रदूषण का एक कड़वा सच समाज का दोहरा मापदंड भी है. समाजशास्त्रीय शोध पत्रिका Taylor & Francis Group के अध्ययनों में यह स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया है कि पैसे की तंगी के कारण इस दलदल में क़दम रखने वाले युवा शुगर बेबी की तो कड़ी आलोचना करता है और उन्हें चरित्रहीन मानता है, लेकिन अपनी दौलत और रसूख के बल पर उनका मानसिक और शारीरिक शोषण करने वाले अमीर पुरुषों या महिलाओं के प्रति उतना सख्त नज़रिया नहीं रखता है, और नहीं उनकी खुले तौर आलोचना ही करता है. यह असमान दृष्टिकोण या दोहरा रवैया समाज में प्रदूषण के फैलने में कहीं न कहीं सहायता ही करता है.

यह सामाजिक प्रदूषण केवल बाहरी समाज या पारिवारिक ढाँचे को ही नष्ट नहीं कर रहा है, बल्कि इसका सबसे गहरा और घातक हमला उस युवा के अपने दिमाग पर होता है जो इस दलदल में उतरता है. पैसे के लालच और अकेलेपन के इस खेल में इंसान का मानसिक संतुलन किस कदर बिगड़ जाता है, इसे समझना बेहद ज़रूरी है. आइये, इस खेल के उस हिस्से की ओर बढ़ते हैं, जो इसके मनोवैज्ञानिक आयाम और मानसिक प्रभावों (Psychological Dimensions) को उजागर करता है.

2.शुगर डैडी और शुगर मॉम: रिश्तों का नया कल्चर- मनोवैज्ञानिक आयाम (Psychological Dimension)

बाहर से आकर्षक दिखने वाली इस दुनिया का सबसे काला और डरावना सच इसके मनोवैज्ञानिक प्रभाव (Psychological Impact) हैं. शुगर डैडी और शुगर मॉम के साथ दिखने वाले युवा भले ही तस्वीरों में मुस्कुराते नज़र आयें, लेकिन मानसिक रूप से वे ऐसे आतंरिक संघर्ष से गुजर रहे होते हैं जो अंततः उन्हें डिप्रेशन (Depression) के मुहाने पर ला खड़ा कर देता है. इसे निम्नलिखित बिंदुओं के द्वारा बेहतर समझा जा सकता है:

(1) शक्ति समीकरण और मानसिक शोषण (Power Dynamics & Mental Harassment)

इस तथाकथित ‘अरेंजमेंट’ का सबसे बुनियादी नियम यह है कि जिसके पास पैसा है, उसी के पास ताक़त (Power) है. जब कोई अमीर उम्रदराज व्यक्ति की युवा (युवक या युवती) की कॉलेज-ट्यूशन फीस, किराया या अन्य खर्चे उठाता है, तो वह अनकहे तौर पर उसके जीवन, समय और यहाँ तक कि उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर भी अपना अधिकार मान लेता है. मनोवैज्ञानिक शोध पत्रिका sciencedirect.com में प्रकाशित अध्ययनों के अनुसार, वित्तीय रूप से असमान रिश्तों में रहने वाले युवाओं को लगातार मानसिक नियंत्रण, छलावा या गैसलाइटिंग (Gaslighting) और इमोशनल ब्लैकमेलिंग का सामना करना पड़ता है. अपनी वित्तीय ज़रूरतों (Financial Needs) के कारण ये युवा खुलकर विरोध नहीं कर पाते हैं, जो उनके आत्मसम्मान (Self-esteem) को धीरे-धीरे कुचल डालता है.

(2) भावनात्मक खोखलापन (Emotional Emptiness) और अभिनय की ज़िन्दगी

एक सामान्य मानवीय रिश्ते में भावनाएं, सच्चा प्यार और एक दूसरे के प्रति सम्मान होता है. लेकिन शुगर डैडी या शुगर मॉम और शुगर बेबी कल्चर वाले रिश्ते में हर मुस्कराहट और यहाँ तक कि हर बातचीत भी पहले से तय वित्तीय समझौते (Financial Agreement) के तहत होती है.

दिखावे का डिप्रेशन: शुगर डैडी और शुगर मॉम चाहते हैं कि शुगर बेबी हमेशा उनकी आँखों के सामने या आसपास रहे. उनका ध्यान रखे- उनके नाज़ नखरे उठाये. ज़रूरत के वक़्त वह सेवक या सेविका बन जाये. इसके लिए ये लोग ख़ुद को शारीरिक-मानसिक रूप से असामान्य या डिप्रेशन (अवसाद) की स्थिति में होने का दिखावा भी करते हैं. ऐसी स्थिति में विशेषज्ञों के अनुसार, शुगर बेबी को लगातार खुश रहने, तारीफ़ करने और आकर्षित दिखने का अभिनय (Acting) करना पड़ता है.

सच्चे रिश्तों से दूरी: जब भावनाएं बिकाऊ हो जाती हैं, तो युवा अपने वास्तविक जीवन में किसी भी सच्चे रिश्ते (चाहे वह दोस्ती हो या प्यार) पर भरोसा नहीं कर पाता है. वह चाहकर भी किसी से भावनात्मक रूप से जुड़ नहीं पाता है, जिससे उसके भीतर एक गहरा खालीपन (Internal Emptiness) घर कर जाता है.

(3) पहचान का संकट और मानसिक आघात (Identitiy Crisis & Mental Trauma)

मुफ़्त में मिली लग्जरी लाइफस्टाइल की आदत बहुत जल्दी लग जाती है, लेकिन यह लंबे समय के लिए नहीं होती है. जैसे ही शुगर डैडी या शुगर मॉम किसी नए या कम उम्र के शुगर बेबी की तलाश में पुराने शुगर बेबी को छोड़ देते हैं, या फिर यूँ कहिये कि पुराने वाले से दिल भर जाने पर नया शुगर बेबी रख लेते हैं, पुराने वाले के सामने एक बड़ा मानसिक संकट खड़ा हो जाता है. राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों की केस स्टडी बताती है कि इस अचानक आये बदलाव के कारण युवा पहचान के संकट (Identity Crisis) के साथ गंभीर एंग्जायटी (Anexiety) और घबराहट के दौरों (Panic Attacks) का शिकार हो जाते हैं. उन्हें लगता है कि बिना किसी अमीर पार्टनर के उनका समाज में कोई अस्तित्व ही नहीं है. यह खोखलापन कई बार उन्हें नशे की लत या आत्महत्या जैसे आत्मघाती क़दमों की ओर भी धकेल देता है.

मानसिक स्तर पर इस क़दर टूट जाने के बाद भी समस्या ख़त्म नहीं होती है. जब बात कानून की चौखट पर पहुंचती है, तो अच्छे-अच्छों के पैर उखड़ जाते हैं. वित्तीय लेन-देन, गोपनीयता का हनन और कानूनी पचड़े इस रिश्ते को एक गंभीर कानूनी विवाद में तब्दील कर देते हैं. आइये, अब इसके कानूनी पहलुओं को गहराई से समझते हैं.

3.शुगर डैडी और शुगर मॉम: रिश्तों का नया कल्चर- कानूनी आयाम (Legal Dimensions & Risks)

शुगर डैडी और शुगर मॉम के इस कल्चर को भले ही इंटरनेट पर एक सामान्य समझौते या लाइफस्टाइल चॉइस (Lifestyle Choice) की तरह पेश किया जाता हो, लेकिन कानून की नज़र में इसकी सीमाएं बेहद धुंधली और जोखिम भरी हैं. जब इस चकाचौंध से जुड़ा मसला कानून की चौखट पर पहुँचता है, तो इसमें शामिल दोनों पक्षों के लिए मुसीबतें खड़ी हो जाती हैं.

(1) वेश्यावृत्ति और भारतीय कानून (Prostitution & Indian Law)

भारत में दो वयस्कों (Adults) के बीच आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बनाना और उसके बदले वित्तीय सहायता या उपहार लेना सीधे तौर पर गैर-कानूनी नहीं है, बशर्ते कि इसमें कोई नाबालिग (Minor) शामिल न हो. हालाँकि भारतीय कानून के तहत संगठित वेश्यावृत्ति या इसके लिए किसी भी तरह की व्यावसायिक दलाली (Pimping) करना पूरी तरह प्रतिबंधित है.

कानून की बारीक़ रेखा: यदि कोई व्यक्ति या ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म व्यावसायिक रूप से दो लोगों को पैसे के बदले शारीरिक संबंध बनाने के लिए मिला रहा है, तो इसे अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम (Immoral Traffic Prevention Act- ITPA) के तहत अपराध माना जा सकता है. कानूनी परिभाषाओं के अनुसार, यदि रिश्ते में वित्तीय लेन-देन का मुख्य उद्देश्य केवल और केवल शारीरिक संबंध (Sex Work) है, तो यह कानूनी रूप से वेश्यावृत्ति के दायरे में आ सकता है.

(2) वित्तीय लेन-देन, जबरदस्ती और ब्लैकमेलिंग का ख़तरा

इस रिश्ते में शक्ति का संतुलन हमेशा अमीर पार्टनर के हाथ में होता है, जो कई बार गंभीर अपराध को जन्म देता है.

जबरदस्ती और शोषण: जब एक बार शुगर बेबी भारी-भरकम राशि (धन) या महंगे गिफ्ट ले लेता है, तो शुगर डैडी या शुगर मॉम उसे अपनी हर बात मानने के लिए मजबूर करने लगते हैं. अगर शुगर बेबी किसी बात के लिए मना करता है, तो उसे पैसे वापस करने या केस में फंसाने की धमकी दी जाती है. भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत इसे जबरन वसूली और मानसिक प्रताड़ना माना जाता है.

सहमति (Consent) का विवाद: कई मामलों में जब सौदा या क़रार (Agreement) टूटता है, तो युवा साथी या शुगर बेबी द्वारा अमीर पार्टनर पर धोखाधड़ी या सहमति के बिना संबंध बनाने के गंभीर आरोप लगा दिए जाते हैं, जिससे अमीर पार्टनर को अदालतों और जेल के चक्कर काटने पड़ते हैं.

(3) साइबर सुरक्षा जोखिम और डॉक्सिंग (Doxing)

चूँकि यह पूरा व्यापार इंटरनेट और मोबाइल ऐप्स के ज़रिए संचालित होता है, इसलिए इसमें साइबर अपराध का ख़तरा सबसे ज़्यादा होता है.

निजी डाटा लीक होना: इस रिश्ते में अक्सर लोग एक दूसरे के साथ बेहद निजी तस्वीरें, वीडियो और वित्तीय जानकारी साझा कर लेते हैं. ऐसे में, रिश्ता ख़राब होने पर इन सामग्री के आधार पर ब्लैकमेल करना (Sextortion) बहुत आसान होता है. भारत में ऐसे मामले लगातार बढ़ रहे हैं.

डिजिटल पहचान का ख़तरा: इंटरनेट पर किसी की निजी जानकारी उसकी मर्जी के बिना सार्वजानिक कर देना (Doxing) सूचना प्रोद्योगिकी अधिनियम (IT Act) के तहत एक दंडनीय अपराध है, जिसमें जेल और जुर्माने का प्रावधान है.

कानूनी और सुरक्षा के इन बड़े जोखिमों के बावजूद, इंटरनेट की दुनिया में इस कल्चर के नाम पर एक और भी ज़्यादा खतरनाक खेल खेला जा रहा है. वह खेल है- ऑनलाइन शुगर स्कैम (Online Sugar Scams), जिसमें सोशल मीडिया पर बैठे शातिर जालसाज युवाओं को निशाना बना रहे हैं और उन्हें अमीर बनाने के सपने दिखाकर कंगाल कर रहे हैं. आइये, अब इस इंडस्ट्री की इस सबसे बड़ी आर्थिक धोखाधड़ी और उससे सुरक्षित रहने के उपायों को विस्तार से समझते हैं.

4.ऑनलाइन शुगर स्कैम (Online Sugar Scams) और उनसे बचाव के उपाय

इस शुगर इंडस्ट्री का सबसे खतरनाक और तेजी से बढ़ता हुआ पहलू है- डिजिटल धोखाधड़ी (Digital Fraud). आज इंटरनेट और सोशल मीडिया पर एक ऐसा बड़ा गिरोह सक्रिय है, जो ख़ुद को अमीर शुगर डैडी या शुगर मॉम बताकर युवाओं को जाल में फंसाता है. हक़ीक़त में, स्क्रीन के पीछे कोई अमीर व्यक्ति नहीं, बल्कि नाइजीरियाई गैंग या स्थानीय साइबर अपराधी बैठे होते हैं, जिनका एकमात्र मक़सद लोगों के बैंक खाते ख़ाली करना होता है.

ऑनलाइन शुगर स्कैम के प्रकार और बचाव के तरीक़े

शुगर स्कैम के विभिन्न मुख्य हथकंडे

(1) एडवांस फीस स्कैम (Advance Fee Scam)

यह इस दलदल का सबसे आम और पुराना तरीक़ा है. जालसाज सोशल मीडिया पर युवाओं से संपर्क करते हैं और उन्हें हर हफ़्ते 2,000 से 5,000 डॉलर (लाखों रुपये) का अलाउंस देने का झूठा वादा करते हैं.

खेल कैसे खेला जाता है: अपराधी युवाओं को एक फर्जी बैंक ट्रांसफर या पेपाल (PayPal) की रसीद (Screenshot), भेजते हैं, जिसमें दिखाया जाता है कि पैसे ट्रांसफर हो चुके हैं. लेकिन उन्हें पहले 2,000 रुपये ‘प्रोसेसिंग फीस’ या ‘अकाउंट एक्टिवेशन चार्ज’ के रूप में देने होंगे. जैसे ही युवा लालच में आकर वह फीस दे देता है, स्कैमर उसे ब्लॉक करके गायब हो जाता है.

(2) बैंक क्रेडेंशियल चोरी और मनी लॉन्डरिंग (Money Laundering)

कुछ शातिर अपराधी सीधे पैसे नहीं मांगते हैं, बल्कि वे युवाओं का विश्वास जीतने के लिए कहते हैं, “मैं तुम्हें अपने बैंक खाते या क्रेडिट कार्ड की जानकारी दे रहा हूँ, तुम इससे अपना क़र्ज़ चुका लो.”

असली ख़तरा: इसके बदले वे युवा से उसका बैंक यूज़र नेम और पासवर्ड मांग लेते हैं या फिर उसके खाते को अवैध पैसों (Black Money) को इधर-उधर करने के लिए इस्तेमाल करते हैं. अमेरिकी संघीय जांच ब्यूरो (FBI) के साइबर क्राइम डिविजन और वैश्विक सुरक्षा मंचों की चेतावनियों के अनुसार, अनजाने में ऐसे खातों का इस्तेमाल करने वाले युवा मनी लॉन्डरिंग और साइबर फ्रॉड के मामलों में सीधे तौर पर सह-आरोपी बन जाते हैं और उन्हें जेल जाना पड़ता है.

(3) सेक्सटॉर्शन और ब्लैकमेलिंग (Sextortion & Blackmailing)

इस स्कैम में अपराधी पहले दोस्ती या प्यार का नाटक करते हैं. धीरे-धीरे वे युवा को विश्वास में लेकर उनकी बेहद निजी या संवेदनशील तस्वीरें (Private Photos or Videos) हासिल कर लेते हैं. जैसे ही तस्वीरें/वीडियो उनके हाथ लगती हैं, वे विलेन का रूप धारण कर लेते हैं. वे पीड़ित को धमकी देते हैं कि यदि उन्हें तुरंत भारी-भरकम रक़म नहीं दी गई, तो वे इन तस्वीरों को इंटरनेट और उनके परिवार के साथ साझा कर देंगे.

ऑनलाइन स्कैम से बचाव के अचूक उपाय (Safety Tips)

अगर कोई व्यक्ति इस डिजिटल दुनिया में सक्रिय है, तो वैश्विक साइबर सुरक्षा मंच Norton द्वारा सुझाये गए इन नियमों का पालन या तरीकों का इस्तेमाल कर वह ख़ुद को पूरी तरह सुरक्षित रख सकता है:

पैसे पाने के लिए कभी पैसे न दें: यदि कोई कथित शुगर डैडी या शुगर मॉम आपसे पैसे भेजने से पहले किसी भी तरह की फीस (Tax, Processing Fee) मांगे, तो समझ जायें कि वह 100% स्कैमर है.

वित्तीय क्रेडेंशियल कभी साझा न करें: अपने बैंक खाते का पासवर्ड, ओटिपी (OTP) या इंटरनेट बैंकिंग की लॉग-इन जानकारी किसी को भी न दें, चाहे वह कितना भी अमीर होने का दावा क्यों न करे.

ऑनलाइन परिचित से आमने-सामने पहली मुलाकात: यदि आप किसी ऑनलाइन परिचित से पहली बार आमने-सामने मिल रहे हैं, तो हमेशा दिन के उजाले में किसी भीड़भाड़ वाली और सार्वजानिक जगह (जैसे मशहूर कैफे या मॉल) का चुनाव करें. अपनी निजी गाड़ी में जाने से बचें.

डिजिटल फुटप्रिंट पर नियंत्रण: इंटरनेट पर किसी भी अनजान व्यक्ति के साथ अपनी संवेदनशील तस्वीरें या घर का पता साझा न करें. डिजिटल दुनिया में गोपनीयता (Privacy) ही सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है.

निष्कर्ष

शुगर डैडी और शुगर मॉम नामक रिश्तों के रखैल कल्चर (Concubinage Culture) के उभरते हुए चलन का गहराई से सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और कानूनी विश्लेषण से करने के बाद यह साफ़ हो जाता है कि यह कोई आधुनिक प्रगतिशील जीवनशैली (Modern Progressive Lifestyle) नहीं, बल्कि बर्बादी के साथ नैतिक मूल्यों के पतन और एक गौरवमयी समाज की छवि पर लगा बदनुमा दाग है. शुगर यानी चीनी की मीठी परत चढ़ाकर जिस व्यापार को ‘अरेंजमेंट डेटिंग’ का मोहक (Glamorous) नाम दिया जा रहा है, वह अंततः युवाओं को एक ऐसे दलदल में धकेलता है जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं होता है. रातों-रात अमीर बनने की चाहत और सोशल मीडिया का झूठा दिखावा युवाओं के आत्मसम्मान, मानसिक स्वास्थ्य और उनकी सामाजिक गरिमा को पूरी तरह नष्ट कर देता है. डिजिटल दुनिया की इस चकाचौंध के पीछे छिपे कानूनी पचड़े, साइबर अपराध और ब्लैकमेलिंग के जोखिम इस रास्ते को तकलीफदेह और जानलेवा भी बना देते हैं. एक जागरूक समाज के रूप में हमारा यह कर्तव्य है कि हम शॉर्टकट के इस भ्रमजाल को पहचानें और अपनी युवा पीढ़ी को मेहनत, स्वाभिमान और सच्चे मानवीय रिश्तों की अहमियत सिखाएं, क्योंकि जीवन में गरिमा और मानसिक शांति से बढ़कर कोई भी दौलत या लग्जरी (विलासिता) नहीं हो सकती है.

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

गूगल पर इस विषय को लेकर अक्सर पूछे जाने वाले सवालों के सटीक और प्रामाणिक जवाब यहाँ दिए गए हैं:

प्रश्न 1. क्या भारत में शुगर डैडी या शुगर मॉम कल्चर कानूनी रूप से वैध है?

उत्तर: भारत में दो वयस्क (Adults) व्यक्तियों की आपसी सहमति से बनने वाले संबंध को सीधे तौर पर अपराध नहीं माना गया है, बशर्ते कि उसमें कोई नाबालिग शामिल न हो. हालाँकि, भारतीय कानून (ITPA) के तहत यदि इस व्यवस्था का मुख्य और एकमात्र उद्देश्य पैसों के बदले शारीरिक संबंध (Sex Work) बनाना है, तो यह वेश्यावृत्ति के दायरे में आ सकता है, जो दंडनीय अपराध है.

प्रश्न 2. क्या शुगर डैडी की साथी केवल महिला और शुगर मॉम का साथी केवल पुरुष होता है?

उत्तर: नहीं, ऐसा बिल्कुल ज़रूरी नहीं है. शुगर डैडी या शुगर मॉम का साथी कौन होगा, यह पूरी तरह उस व्यक्ति की पसंद और लैंगिक रुझान पर निर्भर करता है. शुगर डैडी अगर समलैंगिक (Gay or Homosexual) है, तो उसका साथी या रखैल (शुगर बेबी) महिला के बजाय कोई पुरुष हो सकता है. इसी प्रकार, शुगर मॉम अगर समलैंगिक (Lesbian) है, तो पुरुष के बजाय किसी महिला को अपने साथी या रखैल (शुगर बेबी) के रूप में चुन सकती है. इसके अलावा, उभयलिंगी (Bisexual) लोग महिला या पुरुष, किसी को भी अपना पार्टनर चुन सकते हैं. सक्षेप में, यह आधुनिक डेटिंग व्यवस्था केवल महिला-पुरुष के पारंपरिक रिश्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सभी लैंगिक पहचान (LGBTQ+) शामिल हैं.

प्रश्न 3. क्या बिना शारीरिक संबंध (Physical Relationship) के भी शुगर डेटिंग संभव है?

उत्तर: कुछ लोग ऐसा तर्क देते हैं. कुछ वेबसाइट भी शुगर डेटिंग को प्लेटोनिक रिलेशनशिप (Platonic Relationship) यानी बिना किसी शारीरिक संबंध के केवल दोस्ती, सलाह (Mentorship) और साथ घूमने तक सीमित रखने का दावा करती हैं. लेकिन व्यावहारिक और जमीनी स्तर पर साइबर सुरक्षा रिपोर्टों और मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, अधिकांश मामलों में वित्तीय दबाव के कारण यह धीरे-धीरे शारीरिक और मानसिक शोषण में तब्दील हो ही जाता है.

प्रश्न 4. अगर कोई (कथित) शुगर डैडी या शुगर मॉम एडवांस फीस के रूप में पैसे भेजने को कहे (मांगे), तो क्या करना चाहिए?

उत्तर: यह 100% ऑनलाइन फ्रॉड (Cyber Scam) है. अगर कोई व्यक्ति पैसे देने का वादा करके आपसे प्रोसेसिंग फी, अकाउंट एक्टिवेशन या टैक्स के नाम पर एडवांस पैसे मांगता है, तो उसे तुरंत ब्लॉक कर दें. साइबर अपराध सूचना मंचों के दिशानिर्देशों के अनुसार, ऐसे मामलों की शिक़ायत तुरंत अपने नजदीकी साइबर सेल या राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर दर्ज़ करानी चाहिए.

    Support us for the Truth

    Information platforms that spread lies never lack funding. They have a well-organised international network that keeps their business running. We need your support to fight them. Please contribute whatever you can afford.

    Pay

    Show More

    रामाशंकर पांडेय

    दुनिया में बहुत कुछ ऐसा है, जो दिखता तो कुछ और है पर हक़ीक़त में वह होता कुछ और ही है. इसीलिए कहा गया है कि चमकने वाली हर चीज़ सोना नहीं होती है. यही ध्यान में रखते हुए, हमारा यह दायित्व बनता है कि हम लोगों तक स्पष्ट और सही जानकारी पहुंचाएं. खासतौर से, समाज, संस्कृति, राजनीति, इतिहास, धर्म, ज्ञान-विज्ञान, आदि से जुड़ी जानकारी को लेकर एक माध्यम का पूर्वाग्रह रहित और निष्पक्ष होना ज़रूरी है. khulizuban.com का प्रयास इसी दिशा में एक क़दम है.

    Leave a Reply

    Back to top button

    Discover more from KHULIZUBAN

    Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

    Continue reading

    Enable Notifications OK No thanks