राजनीति

जनसंख्या नियंत्रण: भारत में आवश्यकता- क्यों और कैसे?

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जनसंख्या नियंत्रण (Population Control) का मुद्दा भारत में दशकों से राजनीतिक गलियारों और नीतिगत बहसों के केंद्र में रहा है. साल 2019 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले के प्राचीर से ‘जनसंख्या विस्फोट’ को देश के विकास और आने वाली पीढ़ियों के लिए बड़ा संकट बताया था, तो यह उम्मीद जगी थी कि भारत जल्द ही एक राष्ट्रीय कानून की दिशा में ठोस कदम बढ़ाएगा. लेकिन विडंबना देखिये कि कुछ ही समय बाद, सरकार के ही नीति-निर्माताओं और अधिकारियों ने अदालतों और टीवी डिबेट में यह स्थापित करने की कोशिश शुरू कर दी कि भारत को ऐसे किसी सख्त कानून की आवश्यकता ही नहीं है. चीन में ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ के नुकसान (रोल-बैक) का हवाला देकर इस मुद्दे पर जो नीतिगत ‘यू-टर्न’ लिया गया, वह केवल राजनीतिक हिचकिचाहट और तुष्टिकरण की ढुलमुल नीति को ही पुष्ट करता है.

विकराल होती समस्याओं का जनसंख्या नियंत्रण कानून से समाधान (सांकेतिक चित्र)

आज जब भारत अधिकारिक तौर पर चीन को पछाड़कर दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन चुका है, तब ‘बढ़ती आबादी, सिकुड़ते संसाधन’ का यह द्वंद केवल एक नारा भर नहीं रह गया है; यह हमारी अर्थव्यवस्था, रोजगार और सामाजिक ढांचे के सामने टिक-टिक करता एक ‘टाइम बम’ बन चुका है.

राजनीतिक नफे-नुकसान और विदेशी मॉडल के डर को ढाल बनाकर इस समस्या से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है. संसाधनों के असमान वितरण और विभिन्न समुदायों के बीच जनसांख्यिकीय असंतुलन (Demographic Imbalance) को देखते हुए आज नहीं तो कल, भारत को इस चुनौति से टकराना ही होगा. ऐसे में, यह समझना बहुत जरुरी हो जाता है कि आखिर जनसंख्या का वास्तविक अर्थ क्या है? एक राष्ट्र के रूप में भारत को इस नियंत्रण कानून की तत्काल आवश्यकता क्यों है, और इसे लागू किया जाये तो, बिना किसी समस्या या नुकसान के इसका व्यावहारिक स्वरुप कैसे तय होना चाहिए?

जनसंख्या क्या है और इसे नियंत्रित रखना क्यों आवश्यक है?

साधारण शब्दों में, किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में रहने वाले लोगों की कुल संख्या को ‘जनसंख्या’ कहा जाता है. अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र के नजरिये से, किसी भी देश की आबादी उसका सबसे बड़ा मानव संसाधन (Human Capital) होती है. युवा और सक्षम आबादी ही किसी राष्ट्र के विकास का पहिया घुमाती है.

तो फिर इसे नियंत्रित रखने की आवश्यकता क्यों है?

इसे समझने के लिए अर्थशास्त्र में वहन-क्षमता (Carrying Capacity) के सिद्धांत को समझना होगा. किसी भी देश की आबादी तब तक ही एक संपत्ति (Asset या Demographic Dividend) रहती है, जब तक वह वहां मौजूद प्राकृतिक और आर्थिक संसाधनों के अनुपात में हो. जब आबादी का आकार देश की ज़मीन, पानी, रोज़गार और बुनियादी ढांचे की क्षमता को पार कर जाता है, तो यह ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ रातों-रात एक ‘जनसांख्यिकीय आपदा’ (Demographic Disaster) में बदल जाता है.

जनसंख्या को नियंत्रित रखना इसलिए अपरिहार्य है क्योंकि प्रकृति द्वारा दिए गए संसाधन सीमित हैं. जब बेतहाशा जन्म दर को नियंत्रित नहीं किया जाता है, तो देश की आर्थिक विकास दर (GDP) चाहे कितनी भी तेज क्यों न हो, वह बढ़ती आबादी के पेट में समा जाती है. इसके परिणामस्वरूप, बेरोजगारी, गरीबी, अपराध, स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था का चरमराना और पर्यावरण का विनाश जैसी स्थिति पैदा होने लगती है. स्पष्ट शब्दों में कहें तो, जनसंख्या नियंत्रण का अर्थ किसी की स्वतंत्रता छीनना नहीं है, बल्कि संसाधनों और आबादी के बीच वह संतुलन बनाना है, जिससे हर नागरिक को एक गुणवत्तापूर्ण और सम्मानजनक जीवन मिल सके.

यही वह बुनियादी सिद्धांत है, जिसे समझे बिना हम भारत के वर्तमान संकट और भविष्य के खतरों का सही आकलन नहीं कर सकते हैं.

भारत में जनसंख्या नियंत्रण की आवश्यकता क्यों?

सिद्धांतों से इतर जब हम यथार्थ के धरातल पर आते हैं, तो यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि जनसंख्या नियंत्रण भारत के लिए कोई राजनीतिक विकल्प (Political Option) नहीं, बल्कि अपना अस्तित्व बचाने की एक राष्ट्रीय अनिवार्यता है. संयुक्त राष्ट्र (UN) के आंकड़ों के अनुसार भारत अधिकारिक तौर पर चीन को पीछे छोड़कर दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बन चुका है. नई जनगणना के अभाव में भी यह अनुमान स्पष्ट है कि भारतीय 142 करोड़ के आंकड़े को पार कर चुके हैं. इस विशाल भीड़ के सामने हमारे संसाधन कैसे दम तोड़ रहे हैं, इसे निम्नलिखित तथ्यों से समझा जा सकता है:

बढ़ती आबादी, सिकुड़ते संसाधन (Growing Population, Shrinking Resources)

अगर हम वैश्विक आंकड़ों पर नज़र डालें, तो भारत के पास पूरी दुनिया का केवल 2.4 प्रतिशत भूभाग (Land Area) और मात्र 4 प्रतिशत पीने योग्य पानी है. लेकिन इन मुट्ठी भर संसाधनों के दम पर हम दुनिया की लगभग 18 प्रतिशत आबादी का बोझ उठा रहे हैं.

इसे तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो स्थिति और भी भयावह लगती है. अमरीका का कुल क्षेत्रफल भारत से लगभग तीन गुना (3x) बड़ा है, लेकिन उसकी आबादी (लगभग 34 करोड़) भारत की तुलना में एक-चौथाई (1/4) से भी कम है. यही कारण है कि भारत की आर्थिक विकास दर चाहे कितनी भी तेज हो जाये, प्रति व्यक्ति आय, अस्पताल के बिस्तर और रोजगार के अवसर हमेशा कम ही पड़ जाते हैं. यह एक छोटे से केक को हज़ारों लोगों में बांटने जैसी स्थिति है, जहां अंततः सबके हिस्से में केवल भुखमरी और कुपोषण ही आता है.

नीतिगत ढुलमुल रवैया और जनसांख्यिकीय असंतुलन

दुर्भाग्य से, भारत में इतने गंभीर और अस्तित्व से जुड़े मुद्दों को अक्सर मजहबी चश्मे और ‘वोटबैंक की राजनीति’ से देखा जाता है. राजनीतिक नफे-नुकसान और मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते ही सरकारें इस पर कोई भी बड़ा क़दम उठाने से बचती रही है.अक्सर सरकार और कुछ नीति-निर्माता राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के आंकड़ों की आड़ लेकर यह तर्क देते हैं कि भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) घटकर 2.0 पर आ गई है, इसलिए हमें कानून की कोई आवश्यकता नहीं है. लेकिन वे दो सबसे बड़े सच छिपा जाते हैं:

1.विशाल जनसंख्या आधार (Huge Base): हमारी आबादी का मूल आकार इतना विशाल है कि 2.0 की प्रजनन दर पर भी हर साल करोड़ों नए लोग इस भीड़ में जुड़ रहे हैं.

2.जनसांख्यिकीय असंतुलन (Demographic Imbalance): यह सच है कि प्रजनन दर में समग्र रूप से गिरावट आई है, लेकिन विभिन्न समुदायों (विशेषकर मुसलमानों में) और राज्यों की वृद्धि दर में आज भी भारी असमानता मौजूद है. कुछ समुदाय जहां रीप्लेसमेंट दर से नीचे आ चुके हैं, वहीं कुछ अन्य समुदायों में यह दर अब भी राष्ट्रीय औसत से अधिक है.

एक समान कानून के अभाव में यह असंतुलन भविष्य में एक बड़े समाजिक और राजनीतिक तनाव का कारण बन सकता है. ऐसे में, केवल यह मान लेना कि “जनसंख्या अपने आप स्थिर हो जाएगी”, एक आत्मघाती सोच है,

नियंत्रण कैसे हो? चीन का सबक और भारत का व्यावहारिक मॉडल

जब भी भारत में जनसंख्या नियंत्रण कानून की बात उठती है, तो अक्सर सरकार और कुछ विशेषज्ञ चीन का उदाहरण देकर क़दम पीछे खींच लेते हैं. ऐसे में, यह समझना ज़रूरी है कि हमें चीन वाली स्थिति से डरना नहीं है, बल्कि उसकी ग़लतियों से सीखना है.

चीन का डरावना सच और अपनी नीति को वापस लेना (Roll-back)

चीन ने 1980 के दशक में जबरन ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ (एक संतान नीति) लागू की थी. यह सच है कि इससे उसने आबादी की रफ़्तार पर ब्रेक लगाया, लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणाम भयावह निकले. आज चीन बुड्ढों का देश (Aging Population) की कगार पर है और वहां काम करने वाले सक्षम युवाओं (Working force) का भारी संकट खड़ा हो गया है. इसी जनसांख्यिकीय संकट (Demographic Crisis) से घबराकर चीन ने अपनी नीति को पलट (Roll-back) दिया है, और लोगों को तीन बच्चे पैदा करने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन दे रहा है. लेकिन जीवनशैली और महंगाई के कारण लोग अब इसके लिए तैयार नहीं हैं.

भारत सरकार और हमारे नीति-निर्माता चीन के इसी हश्र को देखकर डरते हैं और ‘जनसंख्या नियंत्रण’ कानून लाने से बचते हैं. लेकिन डर के कारण किसी भयानक बीमारी का इलाज ही न करना, कोई समझदारी नहीं है.

भारत के लिए समाधान- 2 या 3 बच्चों का कनून

भारत एक लोकतांत्रिक देश है, यहां चीन जैसी जबरदस्ती (Coercive Method) नहीं चल सकती है. इसलिए, भारत में एक ऐसा लचीला लेकिन प्रभावी कानून लाने की आवश्यकता है, जो 2 या अधिकतम 3 बच्चों की सीमा तय करे. इस कानून को सफल बनाने के लिए प्रोत्साहन (Incentives) और हतोत्साहन (Disincentives) का मॉडल अपनाना होगा:

हतोत्साहन (Disincentives): जो नागरिक इस नियम का उल्लंघन करे, उसके लिए पंचायत से लेकर संसद तक के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध होना चाहिए. उसे सरकारी नौकरियों और सरकार द्वारा दी जाने वाली विशेष सब्सिडी (मुफ़्त सुविधाओं) से भी वंचित किया जाना चाहिए. इसके अलावा, ऐसे लोगों की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान का रिकॉर्ड रखने या उपेक्षित श्रेणी में दिखाने की भी व्यवस्था होनी चाहिए.

प्रोत्साहन (Incentives): जो व्यक्ति या परिवार इस नीति का स्वेच्छा से पालन करे, उसे टैक्स में छूट, बच्चों की शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाओं में प्राथमिकता और सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ दिया जाना चाहिए.

निष्कर्ष

अंततः, भारत में जनसंख्या का ग्राफ़ अब उस खतरनाक बिंदु पर पहुंच चुका है, जहां यह किसी मजहब, जाति या ‘वोट बैंक’ का मुद्दा नहीं रह गया है; यह सीधे तौर पर राष्ट्र के संसाधनों, युवाओं के रोजगार और आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व का सवाल है.

केंद्र सरकार को अपनी नीतिगत दुविधा, चीन के भूत और तुष्टिकरण के दबाव से बाहर निकलना ही होगा. केवल यह मानकर हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा जा सकता है कि “आबादी प्राकृतिक रूप से स्थिर हो जाएगी”. समय की मांग है कि बिना किसी नफे-नुकसान की परवाह किए, एक स्पष्ट और दूरदर्शी ‘राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण कानून’ जल्द से जल्द लागू किया जाए. क्योंकि आज हमने अपनी बेतहाशा बढ़ती भीड़ और सिकुड़ते संसाधनों के बीच संतुलन नहीं बनाया, तो कल भारत का यह विशाल जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) एक भयानक जनसांख्यिकीय आपदा (Demographic Disaster) में बदल जायेगा.

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    रामाशंकर पांडेय

    दुनिया में बहुत कुछ ऐसा है, जो दिखता तो कुछ और है पर, हक़ीक़त में वह होता कुछ और ही है.इस कारण कहा गया है कि चमकने वाली हर चीज़ सोना नहीं होती है.इसलिए, हमारा यह दायित्व बनता है कि हम लोगों तक सही जानकारी पहुंचाएं.वह चाहे समाज, संस्कृति, राजनीति, इतिहास, धर्म, पंथ, विज्ञान या ज्ञान की अन्य कोई बात हो, उसके बारे में एक माध्यम का पूर्वाग्रह रहित और निष्पक्ष होना ज़रूरी है.khulizuban.com का प्रयास इसी दिशा में एक क़दम है.

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