नाभि क्या है? नाभि के प्रकार और पुरुषों की नाभि के शुभ-अशुभ संकेत
नाभि शरीर का केंद्र बिंदु होने साथ एक बेहद संवेदनशील भाग तथा प्रभावशाली माध्यम भी है. यह कुंडली की तरह जातकों के स्वभाव, स्वास्थ्य, बुद्धि, धन-समृद्धि और भाग्य ही नहीं, बल्कि पूरे जीवन के शुभ-अशुभ संकेत या होनी अनहोनी की झलक दिखा देती है.

प्राचीन भारतीय शास्त्रों- बृहत् संहिता, गरुड़ पुराण तथा अन्य प्रामाणिक सामुद्रिक ग्रंथों में नाभि को केवल एक चिन्ह या निशान नहीं, बल्कि शरीर का केंद्र बिंदु और एक गहन सांकेतिक महत्त्व का अंग माना गया है. कहा गया है कि नाभि व्यक्ति के स्वभाव, स्वास्थ्य, बुद्धि, धन-समृद्धि और भाग्य का प्रमुख सूचक है. ज्योतिष विद्या के विशेषज्ञों का कहना है कि नाभि एक बेहद संवेदनशील तथा प्रभावशाली माध्यम है. यह कुंडली की तरह जातकों के व्यक्तित्व और भाग्य ही नहीं, बल्कि पूरे जीवन के शुभ-अशुभ संकेत या होनी अनहोनी की झलक दिखा देती है. इसीलिए कहा जाता है कि जो चेहरों के पीछे छिपा रहता है, चालढाल और रहन-सहन से भी उजागर नहीं हो पाता है, यहां तक कि हाथों की लकीरों में भी नज़र नहीं आता है वह नाभि से जाना जा सकता है. उनके अनुसार हर प्रकार की नाभि अलग-अलग संकेत देती है. समान आकार-प्रकार की महिलाओं और पुरुषों की नाभि के संकेत भी अलग-अलग होते हैं.

विज्ञान या चिकित्सकीय भाषा में अम्बिलिकस (Umbilicus) यानी नाभि पेट पर एक गहरा निशान है, जो नवजात शिशु से गर्भनाल (Umbilical cord) को अलग करने के कारण बनती है. हमारे शरीर को चलाने या जीवित रहने में इसका कोई सक्रिय जैविक कार्य नहीं है. लेकिन प्राचीन भारतीय ग्रंथों में नाभि को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है. इसे शरीर का केंद्र बिंदु ‘कुंडलिनी का मूल द्वार’ और ‘नाभि चक्र’ कहा गया है, जो शरीर और इसकी उर्जा को नियंत्रित करती है.
विशेषज्ञों के अनुसार नाभि शरीर का वह केंद्र बिंदु है, जहां मां की नाभिनाल (Umbilical cord) के माध्यम से श्रृष्टि की पहली उर्जा मिलती है. यह प्राणों का उद्गम-स्थल है, जहां से समस्त शरीर की नाड़ियां संचालित होती हैं और जहां भाग्य, स्वभाव तथा जीवन-शक्ति का गहरा रहस्य छिपा है.
यानी प्राचीन ऋषि-मुनियों ने इसे मात्र एक शारीरिक चिन्ह या निशान नहीं, बल्कि मनुष्य के सम्पूर्ण अस्तित्व का सूक्ष्म दर्पण माना है. सामुद्रिक शास्त्र में नाभि को स्त्री-पुरुष के स्वास्थ्य, बुद्धिमत्ता, धन-समृद्धि, आयु और भाग्य का सबसे स्पष्ट और विश्वसनीय संकेत बताया गया है. आइये इसे और विस्तार से समझते हैं.
नाभि वास्तव में है क्या?
नाभि मानव शरीर का वह दिव्य केंद्र बिंदु है, जहां सृष्टि की प्रथम किरण पड़ती है. वह पवित्र स्थल जहां माता की नाभिनाल के माध्यम से ब्रह्मांड की समस्त उर्जा शिशु में प्रवाहित होती है. जन्म के बाद भी, यह चिन्ह मात्र नहीं, बल्कि जीवन-शक्ति का जीवंत स्रोत बना रहता है.
प्राचीन भारतीय शास्त्रों में शरीर का मध्य बिंदु (Mid-point), प्राण का उद्गम-स्थल और शिरा-नाड़ियों का मूल माना गया है. आयुर्वेद के अनुसार नाभि शरीर का वह केंद्र है जहां से 72, 000 नाड़ियां या शिरायें पूरे शरीर में पोषण, उर्जा और प्राण का संचार करती हैं. यह उदर मर्म है, जो आमाशय (पेट) और पक्वाशय (आंतों) के बीच स्थित है और समस्त शारीरिक क्रियाओं का नियंत्रक माना जाता है.
सामुद्रिक शास्त्र में नाभि को और भी गहरे सांकेतिक महत्त्व का बताया गया है. इसे स्त्री-पुरुष के स्वभाव, स्वास्थ्य, बुद्धि, आयु और भाग्य का सबसे स्पष्ट दर्पण कहा गया है. नाभि का आकार, गहराई, दिशा और और स्थिति व्यक्ति के राजयोग, दरिद्रता, दीर्घायु या अल्पायु होने का पूर्व सूचक होती है.
महर्षि वराहमिहिर की बृहत् संहिता और गरुड़ पुराण जैसे प्रामाणिक ग्रंथों में नाभि-लक्षणों का विस्तृत वर्णन मिलता है. इन ग्रंथों के अनुसार नाभि केवल शारीरिक अंग नहीं, बल्कि कर्म और भाग्य का सूक्ष्म लेखा-जोखा है.
यानी नाभि वह रहस्यमय ब्रह्म-स्थान है, जहां भौतिक शरीर और सूक्ष्म प्राण-शक्ति का मिलन होता है. यह जन्म का प्रथम प्रमाण और जीवन भर का भाग्य-दूत, दोनों है.
विशेषज्ञों का कहना है कि बृहत् संहिता, गरुड़ पुराण तथा अन्य प्रामाणिक सामुद्रिक ग्रंथों में स्त्रियों और पुरुषों, दोनों की नाभि की चर्चा है. नाभि के अनुसार स्त्रियों और पुरुषों के लक्षण बताये गए हैं, मगर महिलाओं की नाभि को पुरुषों की अपेक्षा अधिक स्पष्ट और प्रभावशाली या लाक्षणिक बताया गया है. नाभि पर तिल के महत्त्व का भी वर्णन है.
नाभि के प्रकार
नाभि का वर्गीकरण करें, तो यह मुख्यतः दो प्रकार की होती है- बहिर्मुखी (बाहर की ओर निकली हुई) और अंतर्मुखी (अंदर की ओर, धंसी हुई). बहिर्मुखी नाभि का सिरा नाभि क्षेत्र की त्वचा (Periumbilical skin) से बाहर निकला (उभरा हुआ) होता है. ऐसी नाभि का आकार उत्तल (convex curving outward) अथवा उन्नतोदर (जिसका तल उठा हो, जैसे गोले या वृत्त का बाहरी भाग, एक सतह जो बाहर की ओर घुमावदार या गोल हो) होता है. अंग्रेजी में इसे आउटी (outie) कहते हैं.
दूसरी ओर, कोई भी नाभि, जो अवतल (concave- curving inward) या नतोदर (किसी वृत्त या गोले के आकार में, जैसे कटोरे के अंदरूनी भाग की तरह खोखला या अंदर की तरफ़ मुड़ा या धंसा हुआ) हो, अंतर्मुखी नाभि कहलाती है. अंग्रेजी में इसे इन्नी (innie) कहते हैं. अधिकांश लोगों में, या फिर यूं कहिये कि 90% लोगों में इसी प्रकार की नाभि पायी जाती है.
इन्हीं दोनों नाभि प्रकार को आगे विभिन्न प्रकार में उप-वर्गीकृत किया जाता है.
विशेषज्ञों के अनुसार शास्त्रों में सामान्य आकार के साथ कुछ विशिष्ट आकार-आकृति की नाभि और उनके फलाफल या शुभ-अशुभ संकेत का वर्णन है. आइये देखते हैं कि कौन-सी नाभि वाले पुरुष कैसे होते हैं, अथवा उनकी नाभि उनके जीवन और भाग्य के बारे क्या बताती है, यह समझते हैं.
उभरी हुई नाभि
बाहर की ओर निकली हुई या उभरी हुई नाभि (Protruding Navel) वाले पुरुषों के जीवन को सामुद्रिक शास्त्र, बृहत् संहिता और गरुड़ पुराण में मुख्य रूप से संघर्ष, उतार-चढ़ाव और कठोर परिश्रम से जोड़कर देखा गया है. प्राचीन ग्रंथों के गहन विश्लेषण के आधार पर ऐसे पुरुषों के सम्पूर्ण जीवन का विस्तृत विवरण इस प्रकार है:
बचपन और शिक्षा-दीक्षा: जिन पुरुषों की नाभि उभरी हुई होती है उनका बचपन सामान्यतः अधिक लाड़-प्यार और सुख-सुविधाओं नहीं बीतता है. शुरुआती वर्षों में इन्हें अक्सर स्वास्थ्य संबंधी छोटी-मोटी समस्याओं, विशेषकर पाचन या पेट संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है.
पढ़ाई (विद्या-अध्ययन) में इन्हें अक्सर एकाग्रता की कमी या पारिवारिक परिस्थितियों के कारण बाधाओं का सामना करना पड़ता है. अपनी शिक्षा पूरी करने और ज्ञान अर्जित करने के लिए इन्हें अन्य छात्रों की तुलना में अधिक मानसिक दृढ़ता और कठोर परिश्रम की आवश्यकता होती है.
सफलता-असफलता और आर्थिक स्थिति: इन परुषों के जवान में भाग्य से ज़्यादा कर्म और पसीने की भूमिका होती है. युवावस्था में करियर को लेकर काफ़ी भटकाव और मानसिक द्वन्द बना रहता है. ये अपनी क्षमता से अधिक मेहनत करते हैं, लेकिन अक्सर सफलता या उचित श्रेय इन्हें विलंब से प्राप्त होता है.
धन संचय में इन्हें विशेष कठिनाई होती है, क्योंकि आय से अधिक अचानक आने वाले ख़र्च लगे रहते हैं. हालाँकि, 35 से 40 वर्ष की आयु के पश्चात् इनके संघर्षों का फल मिलने लगता है और ये अपने बाहुबल या अथक प्रयास से जीवन में आर्थिक स्थिरता प्राप्त कर लेते हैं.
विवाह, दांपत्य और संतान सुख: इनका विवाह प्रायः एक सामान्य रूप-रंग और पारिवारिक पृष्ठभूमि वाली कन्या से होता है. दांपत्य जीवन में वैचारिक मतभेद (Ideological differences) और स्वभाव की भिन्नता के कारण अक्सर उतार-चढ़ाव आते रहते हैं. कई बार इनके चिड़चिड़े या जिद्दी स्वभाव के कारण रिश्तों में दूरियां आ जाती हैं इसलिए, इन्हें वैवाहिक जीवन को सुखी बनाने के लिए विशेष धैर्य की आवश्यकता होती है.
सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार उभरी हुई नाभि वाले पुरुषों को संतान-प्राप्ति में देरी और कम संतान का योग होता है. साथ ही, संतान के योग्य या गुणी होने के बावजूद, जीवन के किसी मोड़ पर पिता-पुत्र या पिता-पुत्री के बीच विचारों का भारी टकराव और संबंधों में दूरी होने का योग प्रबल होता है.
सामाजिक स्थिति: उभरी हुई नाभि वाले पुरुष समाज या अपने क्षेत्र में रातोंरात कोई बड़ी हस्ती, जननायक या अत्यधिक लोकप्रिय नहीं बन पाते हैं. इनका प्रभाव क्षेत्र अमूमन एक सीमित दायरे- जैसे इनका परिवार, मित्र-मंडली या छोटे कार्यक्षेत्र तक ही सीमित रहता है.
हालाँकि ये बहुत अधिक सुर्खियां नहीं बटोरते हैं, लेकिन जीवन के उत्तरार्ध में अपने अटूट संघर्ष, सच्चाई और पारिवारिक दायित्वों को जीवन भर ढोने के कारण, समाज में एक बेहद जिम्मेदार और सम्मानित व्यक्ति के रूप में अपनी एक ठोस पहचान अवश्य बना लेते हैं.
स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा (आयु): विशेषज्ञों के अनुसार उभरी नाभि वाले पुरुषों को अक्सर उदर (पेट) संबंधी विकारों की समस्या रहती है. इसलिए, इन्हें जीवन भर गैस, अपच या आंतों से जुड़ी बीमारियों के प्रति सतर्क रहना पड़ता है और अपने खानपान पर विशेष ध्यान देना होता है.
जहां तक आयु का प्रश्न है, प्राचीन आचार्यों ने इनकी जीवन प्रत्याशा मध्यम (Average) यानी 65-70 साल मानी है.
गहरी, गोल और चौड़ी नाभि
सामुद्रिक शास्त्र, बृहत् संहिता और गरुड़ पुराण में पुरुषों की गहरी, गोल और चौड़ी नाभि (Deep, Round and Broad Navel) को अत्यंत शुभ, सौभाग्यशाली और ‘राजयोग का प्रतीक’ माना गया है. उनके विश्लेषण के आधार पर ऐसी नाभि वाले पुरुषों के सम्पूर्ण जीवन की विशेषताएं इस प्रकार हैं:
बचपन और शिक्षा-दीक्षा: गोल, गहरी और चौड़ी नाभि वाले पुरुषों का बचपन प्रायः सकारात्मक, सुरक्षित और सुख-सुविधाओं से युक्त वातावरण में बीतता है. इन्हें परिवार का भरपूर प्यार और सहयोग मिलता है. बाल्यकाल से ही इनमें एक विशेष प्रकार तेज और आकर्षण देखने को मिलता है.
ये जन्म से ही कुशाग्रबुद्धि (Sharp intellect) और उत्कृष्ट स्मरण शक्ति के धनी होते हैं. शिक्षा के क्षेत्र में ये अपनी मेधा के बल पर आसानी से सफलता प्राप्त करते हैं. विद्यार्जन के दौरान आने वाली बाधाओं को ये अपनी सूझबूझ से पार कर लेते हैं और अक्सर उच्च शिक्षा या किसी विशिष्ट ज्ञान को प्राप्त कर अपने गुरुओं के प्रिय बनते हैं.
सफलता-असफलता और आर्थिक स्थिति: ऐसे पुरुषों के जीवन में भाग्य और कर्म, दोनों का अद्भुत संगम होता है. ये जिस किसी काम में हाथ डालते हैं, उसमें सफलता इनके क़दम चूमती है. विपरीत परिस्थितियों में भी ये हार नहीं मानते हैं और अपनी रणनीतिक क्षमता से उन्हें अपने अनुकूल बना लेते हैं.
धन के मामले में ये अत्यंत भाग्यशाली होते हैं. इनके पास आय के निरंतर और मजबूत स्रोत बने रहते हैं. ये जीवन में अपार धन, भूमि, भवन और वाहन का सुख भोगते हैं. इन्हें आर्थिक तंगी का सामना शायद ही कभी करना पड़ता है और ये राजा के समान ऐश्वर्यशाली (Luxurious) जीवन व्यतीत करते हैं.
विवाह, दांपत्य और संतान सुख: इनका विवाह प्रायः एक रूपवती, गुणवान और पारिवारिक मूल्यों को समझने वाली अनुकूल कन्या से होता है. पति-पत्नी के बीच उत्कृष्ट वैचारिक तालमेल (Harmony) रहता है. ये अपने दाम्पत्य जीवन को प्रेम, सम्मान और विश्वास के साथ सफलतापूर्वक निभाते हैं.
शास्त्रों के अनुसार गहरी और गोल नाभि वाले पुरुषों को स्वस्थ और योग्य संतान की प्राप्ति होती है. इनकी संतान इनके पद-चिन्हों पर चलने वाली, आज्ञाकारी और भविष्य में कुल का नाम रोशन करने वाली होती है. इन्हें जीवन में संतान पक्ष से पूर्ण सुख और संतुष्टि प्राप्त होती है.
सामाजिक स्थिति: समाज में इनकी स्थिति अत्यंत प्रभावशाली होती है. इनमें जन्मजात नेतृत्व क्षमता (Leadership qualities) होती है, जिसके कारण ये बड़ी आसानी से लोगों का मार्गदर्शन करते हैं और जनसमूह को प्रभावित करते हैं.
इनका प्रभाव क्षेत्र बहुत विस्तृत होता है. ये अपने कार्यक्षेत्र, समाज या राजनीति में उच्च पद, अपार प्रतिष्ठा और लोकप्रियता हासिल करते हैं. लोग इनके व्यक्तित्व से आकर्षित होते हैं और सम्मान की दृष्टि से देखते हैं.
स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा (आयु): नाभि शरीर का मुख्य उर्जा केंद्र है, और इसका गहरा व गोल होना उत्तम प्राण-उर्जा (Vitalty) का सूचक है. ऐसे पुरुषों का पाचन तंत्र अत्यंत मजबूत होता है और इनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) शानदार होती है. इसलिए, ये आमतौर पर गंभीर बीमारियों से बचे रहते हैं.
प्राचीन आचार्यों ने ऐसी नाभि वाले पुरुषों को निश्चित रूप से दीर्घायु (Long life) या शतायु (100 वर्ष की आयु का) माना है. शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के कारण ये अपने जीवन के अंतिम पड़ाव तक सक्रिय और उर्जावान बने रहते हैं.
छोटी, उथली या सपाट नाभि
सामुद्रिक शास्त्र, बृहत् संहिता और गरुड़ पुराण के अनुसार जिन पुरुषों की नाभि छोटी और सपाट (Small, Shallow or Flat Navel) यानी उथली (जिसका गड्ढा स्पष्ट न हो, छिछली) होती है उनका जीवन सादगी, यथार्थवाद (Realism) से भरा और औसत दर्जे का माना गया है. इसका विस्तृत विवरण इस प्रकार है:
बचपन और शिक्षा-दीक्षा: इनका बचपन बहुत ही सादगी और यथार्थ की ज़मीन पर बीतता है. ये बचपन से ही बहुत कल्पनाओं में नहीं जीते हैं. इन्हें जो भी संसाधन मिलता है, उसी में संतुष्ट रहने का प्रयास करते हैं.
शिक्षा के मामले में इनका दृष्टिकोण बहुत व्यावहारिक (Practical) होता है. ये केवल उतना ही पढ़ना या सीखना पसंद करते हैं, जो इनके जीवन या आजीविका के लिए सीधे तौर पर काम आए. बहुत अधिक गूढ़ ज्ञान या शोध (Research) में इनकी गहरी रूचि नहीं होती है. इनकी शिक्षा का स्तर प्रायः औसत ही रहता है.
सफलता-असफलता और आर्थिक स्थिति: इन पुरुषों का स्वभाव अक्सर थोड़ा संकोची या स्पष्टवादी होता है, जिसके कारण ये बहुत बड़े जोखिम (Risks) लेने से बचते हैं. ये जीवन में शॉर्टकट के बजाय सुरक्षित रास्ते पर चलना पसंद करते हैं. इनकी सफलता की गति धीमी होती है, और इन्हें अपनी मेहनत का औसत फल ही मिल पाता है.
धन के मामले में ये बहुत ही महत्वाकांक्षी (Ambitious) नहीं होते हैं. इनकी आय के स्रोत सीमित होते हैं और ये अपनी चादर देखकर ही पैर पसारते हैं. हालाँकि ये बहुत बड़ी संपत्ति या अपार ऐश्वर्य (Luxuries) के स्वामी नहीं बन पाते हैं, लेकिन अपनी ज़रूरतें पूरी करने लायक धन ये जीवनभर कमा लेते हैं.
विवाह, दांपत्य और संतान सुख: इनका दांपत्य जीवन रोमांस या भावुकता के बजाय ‘कर्तव्यों और जिम्मेदारियों’ पर अधिक टिका होता है. ये स्वभाव से थोड़े नीरस (Dry) या अपनी भावनाओं को व्यक्त न कर पाने वाले होते हैं. इनकी पत्नी को अक्सर यह शिकायत रहती है कि ये अपनी भावनाओं को खुलकर जाहिर नहीं करते हैं. इनका वैवाहिक जीवन सामान्य गति से चलता है.
इन्हें संतान का सुख सामान्य रूप से प्राप्त होता है. ये एक पिता के रूप में बहुत अधिक भावुक होने के बजाय एक सख्त और अनुशासित अभिभावक की भूमिका निभाना पसंद करते हैं. बच्चों के साथ इनके संबंध व्यावहारिक होते हैं.
सामाजिक स्थिति: ये दिखावा (Show-off) बिल्कुल भी पसंद नहीं करते हैं, और भीड़-भाड़ से बहुत दूर रहते हुए बहुत ही शांत, साधारण और एकांतप्रिय जीवन व्यतीत करते हैं. ये किसी के साथ बहुत अधिक घुलने-मिलने से बचते हैं.
इनकी छवि एक सीधे, स्पष्टवादी और अपने काम से काम रखने वाले व्यक्ति की होती है. ये न तो समाज में बहुत बड़ी लोकप्रियता हासिल करते हैं और न ही किसी विवाद में पड़ते हैं. इनका जीवन एक आम आदमी की तरह शुरू होकर आखिर तक आम ही बना रहता है.
स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा (आयु): सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार सपाट या उथली नाभि वाले पुरुषों की प्राण उर्जा (Vitality) और शारीरिक बल गहरी नाभि वाले पुरुषों की तुलना में कम होता है. इनका पाचन तंत्र बेहद संवेदनशील होता है. मौसम बदलने पर जल्दी बीमार होने या कमजोरी की समस्या उत्पन्न होने की संभावना बनी रहती है.
हालाँकि ये अपनी दिनचर्या और खानपान को लेकर हमेशा सतर्क रहते हैं, लेकिन चूंकि इनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) अधिक मजबूत नहीं होती है इसलिए, वृद्धावस्था आते-आते इनका शरीर कमज़ोर और लाचार हो जाता है. इनकी आयु मध्यम (Average) यानी क़रीब 70 साल की बताई गई है.
ऊपर की ओर लंबवत नाभि
सामुद्रिक शास्त्र, बृहत् संहिता और गरुड़ पुराण में लंबवत और ऊपर की ओर फैली हुई नाभि (Vertical Upward Navel) को ‘उर्ध्वमुखी नाभि’ कहा गया है. शास्त्रों में ‘उर्ध्व’ का अर्थ है ऊपर उठना या निरंतर प्रगति करना. इसे महत्वाकांक्षा, निरंतर विकास और उच्च आदर्शों का अत्यंत शुभ प्रतीक माना गया है. प्राचीन ग्रंथों के गहन विश्लेषण के आधार पर ऐसी नाभि वाले पुरुषों के सम्पूर्ण जीवन का विस्तृत विवरण इस प्रकार है:
बचपन और शिक्षा-दीक्षा: इनका बचपन अत्यंत अनुशासित और संस्कारी वातावरण में व्यतीत होता है. बाल्यकाल से ही इनके भीतर एक गहरी समझदारी और गंभीरता देखने को मिलती है. ये अपनी उम्र से अधिक परिपक्व (Mature) व्यवहार करते हैं और परिजनों के प्रिय होते हैं.
शिक्षा के क्षेत्र में ये उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हैं. इनकी रूचि केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं रहती है, बल्कि ये दर्शन (Philosophy), आध्यात्म और गूढ़ विषयों को गहराई से जानने के इच्छुक होते हैं. अपनी कुशाग्रबुद्धि और निरंतर नया सीखने की ललक के कारण ये उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं और अपने गुरुओं का मान बढ़ाते हैं.
सफलता-असफलता और आर्थिक स्थिति: जिस प्रकार इनकी नाभि ऊपर की ओर उठी होती है, ठीक उसी प्रकार इनके जीवन और करियर का ग्राफ़ भी हमेशा ऊपर की ओर ही जाता है. इनमें ग़ज़ब की महत्वाकांक्षा (Ambition) और दृढ निश्चय होता है. ये शून्यता से शुरुआत करके भी शिखर तक पहुँचने (जीरो से हीरो बनने) की क्षमता रखते हैं. असफलताएं इन्हें तोडती नहीं, बल्कि और अधिक मजबूत बनाती हैं.
ये अत्यंत भाग्यशाली और धनवान होते हैं. अपने करियर या व्यापार में ये निरंतर प्रगति करते हैं. अपनी मेहनत, दूरदर्शिता और सही निवेश के बल पर ये विपुल संपत्ति, भूमि और भवन का निर्माण करते हैं. जीवन के मध्य भाग तक आते-आते ये पूर्ण रूप से आर्थिक स्वतंत्रता और ऐश्वर्य प्राप्त कर लेते हैं.
विवाह, दांपत्य और संतान सुख: इनका विवाह एक ऐसी कन्या से होता है जो न केवल रूपवती होती है, बल्कि बौद्धिक स्तर पर भी इनके समान होती है. विवाह के पश्चात इनके भाग्य में और अधिक वृद्धि होती है. इनका दांपत्य जीवन आपसी सम्मान, विश्वास और गहरे आध्यात्मिक जुड़ाव (Spiritual connection) पर आधारित होता है.
शास्त्रों के अनुसार उर्ध्वमुखी नाभि वाले पुरुषों अत्यंत श्रेष्ठ और भाग्यशाली संतान की प्राप्ति होती है. इनकी संतान संस्कारवान होती है और भविष्य में शिक्षा या करियर के क्षेत्र में बहुत ऊँचे मुकाम हासिल करती है. इन्हें अपनी संतान की उपलब्धियों पर गर्व करने का पूरा अवसर मिलता है.
सामाजिक स्थिति: समाज में इनकी स्थिति एक दूरदर्शी (Visionary) और न्यायप्रिय व्यक्ति के रूप में होती है. इनमें नेतृत्व के अद्भुत गुण होते हैं और लोग मार्गदर्शन के लिए इनकी ओर देखते हैं. ये अपनी बातों और आदर्शों से बड़े जनसमूह को प्रेरित की क्षमता रखते हैं.
इनका सामाजिक दायरा बहुत विस्तृत और उच्च स्तर का होता है. समाज के प्रतिष्ठित और विद्वान लोगों के बीच इनका उठाना-बैठना होता है. ये केवल अपने लिए नहीं जीते हैं, बल्कि परोपकार और समाज कल्याण के कार्यों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं, जिससे इन्हें व्यापक यश और कीर्ति प्राप्त होती है.
स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा (आयु): नाभि में प्राण उर्जा (Vitality) का उर्ध्व प्रवाह होने के कारण ये शारीरिक और मानसिक रूप से अत्यंत मजबूत होते हैं. इनका उर्जा स्तर हमेशा ऊंचा रहता है और चेहरे पर एक विशेष तेज (Glow) दिखाई देता है. लेकिन इनकी महत्वाकांक्षाएं कभी-कभी इनमें मानसिक तनाव या अनिद्रा की स्थिति भी पैदा कर देती है.
ये अपनी संयमित जीवनशैली और सकारात्मक सोच के कारण ये बुढ़ापे में भी शारीरिक रूप से सक्रिय और स्वस्थ रहते हैं. इनकी जीवन प्रत्याशा 90 साल से अधिक बताई गई है.
नीचे की ओर लंबवत नाभि
सामुद्रिक शास्त्र, बृहत् संहिता और गरुड़ पुराण में नीचे की ओर लंबवत नाभि (Vertical Downward Navel) को ‘अधोमुखी नाभि’ कहा गया है. ऊपर की ओर उठी नाभि जहां आध्यात्मिक और उच्च आदर्शों का प्रतीक है वहीं, नीचे की ओर झुकी या फैली हुई नाभि को मुख्य रूप से भौतिकवाद (Materialism), यथार्थवाद, सुख-सुविधाओं की चाह और सांसारिक आनंद (Worldly pleasures) से जोड़कर देखा गया है. इन ग्रंथों के विश्लेषण के आधार पर इस प्रकार की नाभि वाले पुरुषों के संपूर्ण जीवन का विवरण इस प्रकार है:
बचपन और शिक्षा-दीक्षा: इनका बचपन बहुत लाड़-प्यार और सुख-सुविधाओं के बीच बीतता है. ये बचपन से ही भौतिक वस्तुओं (जैसे अच्छे कपड़े, खिलौने और स्वादिष्ट भोजन) के प्रति विशेष आकर्षण रखते हैं. इनका स्वभाव थोड़ा चंचल और मस्तमौला होता है.
शिक्षा के मामले में इनका दृष्टिकोण पूरी तरह से व्यावहारिक (Practical) होता है. ये दर्शन, आध्यात्म या गहरे शोध (Research) में ज़्यादा समय नष्ट नहीं करते हैं. ये उसी विषय की पढ़ाई करना पसंद करते हैं जिससे इन्हें भविष्य में अच्छी नौकरी या व्यापार में सीधा लाभ और धन मिल सके. वाणिज्य (Commerce), व्यवसाय या तकनीकी शिक्षा में इनकी रूचि अधिक होती है.
सफलता-असफलता और आर्थिक स्थिति: ये स्वभाव से बहुत बड़े दूरदर्शी या आदर्शवादी नहीं होते हैं, बल्कि पूरी तरह व्यावहारिक होते हैं. जीवन में इनका मुख्य लक्ष्य किसी भी प्रकार से सुख-सुविधाएं हासिल करना होता है. ये अपने काम में माहिर होते हैं, और धन कमाने के लिए किसी भी अवसर को हाथ से नहीं जाने देते हैं. कई बार जल्दबाजी में या शॉर्टकट अपनाने के चक्कर में इन्हें असफलताओं का सामना भी करना पड़ता है या मुसीबतों में पड़ जाते हैं.
आर्थिक रूप से ये बहुत समृद्ध (Prosperous) होते हैं, क्योंकि धन कमाना इनकी प्राथमिकता होती है. लेकिन इनमें पैसे बचाने से ज़्यादा उसे ख़र्च करने की प्रवृत्ति (Spending habbit) होती है. ये अपने रहन-सहन, ब्रांडेड कपड़ों, महंगे शौक और सुख-सुविधाओं (Luxuries) या अय्याशी पर ख़ूब धन लुटाते हैं. फिर भी, अपनी चतुराई से ये अपना बैंक बैलेंस बनाये रखने में सफल रहते हैं.
विवाह, दांपत्य और संतान सुख: इनका वैवाहिक जीवन रोमांस से भरा होता है. फिर भी ये घरवाली और बाहरवाली, दोनों को एकसाथ लेकर चलने की प्रवृत्ति रखते हैं. इनके मन की प्यास कभी बुझती नहीं है.
दरअसल, ऐसी नाभि वाले पुरुष शारीरिक और भौतिक सुख (Physical and material comforts) को बहुत अधिक महत्त्व देते हैं. रिश्ते-नाते में प्रगाढ़ता (घनिष्ठता या गंभीरता) कम मनोरंजन, शान और अय्याशी का दृष्टिकोण अधिक होता है.
ये चाहते हैं कि इनकी पत्नी रूपवती हो, और घर को बहुत सलीके से सजाकर रखे. इसलिए, ये उन्हें हर संभव सुख-सुविधा उपलब्ध कराते हैं, और उपहार आदि भी देते रहते हैं. इससे इनका दांपत्य जीवन प्रायः अच्छी तरह चलता रहता है, लेकिन मन में एक खालीपन हमेशा बना रहता है.
ये अपने बच्चों से बहुत प्रेम करते हैं और उन्हें दुनिया की हर ख़ुशी और भौतिक सुख देने का प्रयास करते हैं. हालाँकि अत्यधिक लाड़-प्यार और हर जिद पूरी करने के कारण कभी-कभी इनकी संतान थोड़ी बिगडैल और खर्चीले स्वभाव की हो जाती है. संतान से इनका रिश्ता एक दोस्त और ‘सब कुछ उपलब्ध कराने वाले’ जैसा होता है.
सामाजिक स्थिति: समाज में इनकी पहचान एक रईस, व्यावहारिक और जीवन का भरपूर आनंद लेने वाले (Enjoyer of life) व्यक्ति के रूप में होती है. इनका नेटवर्क बहुत बड़ा होता है, लेकिन इनके अधिकांश संबंध व्यापारिक या आपसी लाभ (Mutual benefits) पर टिके होते हैं.
लोग इन्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखते हैं जो दुनियादारी बहुत अच्छी तरह समझता है. ये किसी भी माहौल में ढल जाने वाले और ‘महफ़िल की जान’ होते हैं. ये समाज कल्याण या परोपकार से ज़्यादा अपने और अपने परिवार के सुख पर ध्यान केन्द्रित करते हैं.
स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा (आयु): स्वास्थ्य के मामले में ऐसी नाभि वाले पुरुषों को कई प्रकार की समस्याओं से घिर जाने का योग प्रबल होता है. चूंकि इन्हें स्वादिष्ट व गरिष्ठ भोजन, मीठा और आराम-पसंद जीवनशैली बहुत प्रिय होती है इसलिए, इन्हें मोटापा (Obesity), कॉलेस्ट्रोल, शुगर (Diabetes) या लीवर से जुड़ी जीवनशैली जनित बिमारियों (Lifestyle diseases) का ख़तरा अधिक रहता है.
इनकी आयु प्रायः मध्यम से दीर्घ (Average to Long) यानी 75-80 साल की बताई गई है, लेकिन अंत तकलीफदेह ही माना गया है.
कमल पुष्प जैसी नाभि
सामुद्रिक शास्त्र, बृहत् संहिता और गरुड़ पुराण में कमल पुष्प यानी कमल के फूल जैसी नाभि (Lotus-like Navel) या ‘पद्म नाभि’ को सभी नाभि में सर्वश्रेष्ठ, अत्यंत दुर्लभ और ‘परम राजयोग’ का प्रतीक माना गया है.
विदित हो कि हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को भी ‘पद्मनाभ’ कहा जाता है, जिनकी नाभि से सृष्टि की रचना करने वाले ब्रह्मा जी का कमल उत्पन्न हुआ था. इसलिए कमल के आकार या उसकी कर्णिका (मध्य भाग) जैसी नाभि वाले पुरुष को साक्षात ईश्वरीय कृपा पात्र और एक विशेष ब्रह्मांडीय उर्जा से युक्त माना जाता है. प्राचीन ग्रंथों के आधार पर ऐसे पुरुष के सम्पूर्ण जीवन का विस्तृत वर्णन इस प्रकार है:
बचपन और शिक्षा-दीक्षा: इनका बाल्यकाल अत्यंत विलक्षण और संस्कारवान वातावरण में व्यतीत होता है. बचपन से ही इनके मुखमंडल पर एक विशेष प्रकार का तेज (Aura) और शांति दिखाई देती है. ये सामान्य बच्चों की तुलना में कहीं अधिक गंभीर, समझदार और सात्विक प्रवृत्ति के होते हैं.
ये कुशाग्र बुद्धि के धनी होते हैं. विद्यार्जन के क्षेत्र में इनकी ग्रहण क्षमता (Grasping power) अद्भुत होती है. पारंपरिक शिक्षा से साथ-साथ वेद, पुराण, दर्शनशास्त्र (Philosophy) और गूढ़ आध्यात्मिक विषयों में इनकी गहरी रूचि होती है. ये अपने गुरुओं के अत्यंत प्रिय होते हैं और जीवन में बहुत उच्च कोटि का ज्ञान प्राप्त करते हैं.
सफलता-असफलता और आर्थिक स्थिति: ‘कमल नाभि’ वाले पुरुषों का जन्म ही मानो कोई बड़ा कार्य करने के लिए होता है. ये जीवन के जिस भी क्षेत्र में क़दम रखते हैं, वहां शीर्ष (Top) तक पहुँचते हैं. इनके जीवन में संघर्ष बहुत कम होता है और ईश्वरीय कृपा से इन्हें सफलता बड़ी सहजता से प्राप्त हो जाती है.
महर्षि वराहमिहिर के अनुसार ऐसा पुरुष ‘राजा के समान’ जीवन व्यतीत करता है. इनके पास अपार धन, संपदा और ऐश्वर्य होता है, लेकिन ये कभी भी धन के प्रति लोभी या अहंकारी नहीं होते हैं. ये अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा परोपकार, धर्म-कर्म और समाज कल्याण के कार्यों में लगाते हैं.
विवाह, दांपत्य और संतान सुख: इनका विवाह एक अत्यंत गुणवान, भाग्यशाली और आध्यात्मिक प्रकृति वाली कन्या से होता है. इनका दांपत्य जीवन आदर्श होता है, जो भौतिक सुखों से ऊपर उठकर आत्मा से जुड़ाव (Soul connection) पर आधारित होता है.
शास्त्रों के अनुसार इन्हें अत्यंत श्रेष्ठ, संस्कारी और भाग्यशाली संतान की प्राप्ति होती है. इनकी संतान माता-पिता के उच्च आदर्शों को आगे ले जाने वाली होती है और कुल का नाम पूरे विश्व में रोशन करती है.
सामाजिक स्थिति: समाज में इनकी स्थिति किसी भी चक्रवर्ती सम्राट, महान आध्यात्मिक गुरु (ऋषि-मुनि) या किसी बड़े जननायक जैसी होती है. लोग इनके व्यक्तित्व से चमत्कृत रहते हैं और जीवन के हर मोड़ पर इनसे मार्गदर्शन प्राप्त करने के इच्छुक रहते हैं.
ये गुमनाम जीवन नहीं जीते हैं. इनकी कीर्ति और यश बहुत दूर-दूर तक फैलता है. अपने परोपकारी कार्यों, न्यायप्रियता और ज्ञान के कारण ये समाज में एक महान आदर्श के रूप में स्थापित होते हैं और मृत्यु के पश्चात भी इतिहास में लंबे समय तक याद किये जाते हैं.
स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा (आयु): नाभि शरीर का मूल केंद्र है, और कमल जैसी नाभि को प्राण-उर्जा के उत्तम प्रवाह का स्रोत माना गया है. ऐसे पुरुषों का शरीर निरोगी और आभायुक्त (Radiant) होता है. इनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता असाधारण होती है और ये गंभीर बीमारियों से हमेशा सुरक्षित रहते हैं.
ये आजीवन शारीरिक और मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ रहते हैं और बुढ़ापे में भी इनकी उर्जा में कोई कमी नहीं आती है. प्राचीन आचार्यों के अनुसार ये 100 वर्षों से अधिक जीते हैं.
दक्षिणावर्त और वामावर्त नाभि
सामुद्रिक शास्त्र, बृहत् संहिता और गरुड़ पुराण में घुमावदार नाभि (Spiral Navel) का बहुत गहरा अर्थ बताया गया है. नाभि का घुमाव मूल रूप से शरीर के भीतर बहने वाली प्राण उर्जा (Vital Energy) की दिशा को दर्शाता है.
जिस प्रकार शास्त्रों में ‘दक्षिणावर्ती शंख’ साक्षात लक्ष्मी का वास और अत्यंत शुभ माना जाता है, ठीक उसी प्रकार ‘दक्षिणावर्त नाभि’ सकारात्मक उर्जा का प्रतीक है. इसके विपरीत, ‘वामावर्त नाभि’ उर्जा के उल्टे प्रवाह और जीवन के संघर्षों को दर्शाती है.
आइये इन दोनों प्रकार की नाभि का एकसाथ, तुलनात्मक और विस्तृत विवरण देखे:
भाग-1: दक्षिणावर्त नाभि (Clockwise- Right-turning Navel)
– शुभत्व, सकारात्मकता और प्रबल राजयोग का प्रतीक –
बचपन और शिक्षा-दीक्षा: इनका बचपन बहुत ही शांत, अनुशासित और सकारात्मक वातावरण में बीतता है. ये बचपन से ही बहुत सुलझे हुए और आज्ञाकारी होते हैं.
इनकी एकाग्रता (Focus) ग़ज़ब की होती है. ये जो भी पढ़ते हैं, वह इन्हें लंबे समय तक याद रहता है. शिक्षा के क्षेत्र में ये बिना किसी बड़े भटकाव के अपने लक्ष्य को प्राप्त करते हैं और उच्च कोटि का ज्ञान अर्जित करते हैं.
सफलता-असफलता और आर्थिक स्थिति: इनमें जन्मजात सकारात्मक उर्जा होती है, जो अच्छे अवसरों को इनकी ओर आकर्षित करती है. जीवन में इन्हें धक्के नहीं खाने पड़ते हैं ये जिस भी कार्य में हाथ डालते हैं, भाग्य इनका पूरा साथ देता है और ये आसानी से सफलता के शिखर पर पहुँचते हैं.
ये अपार धन-संपत्ति के स्वामी होते हैं. देवी लक्ष्मी की इन पर विशेष कृपा होती है. ये न केवल धन कमाते हैं, बल्कि उसे बहुत सही जगह निवेश (Invest) करके अपने ऐश्वर्य में निरंतर वृद्धि करते हैं.
विवाह, दांपत्य और संतान सुख: इनका वैवाहिक जीवन अत्यंत मधुर और सुखमय होता है. जीवनसाथी के इनका तालमेल बेहतरीन होता है और घर में हमेशा शांति व उल्लास का वातावरण बना रहता है.
इन्हें संस्कारी व आज्ञाकारी संतान का सुख मिलता है. इनकी संतान अपने कुल का नाम रोशन करने वाली और माता-पिता का सम्मान करने वाली होती है.
सामाजिक स्थिति: समाज में इनकी स्थिति एक प्रतिष्ठित, सम्मानित और विश्वसनीय व्यक्ति की होती है. लोग इनके पास सलाह लेने आते हैं. ये अपनी सकारात्मकता से पूरे समाज को दिशा देने की क्षमता रखते हैं.
स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा (आयु): दक्षिणावर्त घुमाव के कारण इनके शरीर के चक्र (Chakras) बहुत संतुलित रहते हैं. इनका पाचन तंत्र बहुत मजबूत होता है और चेहरे पर एक स्वाभाविक तेज (Glow) रहता है.
ये बुढ़ापे तक निरोगी और सक्रिय जीवन जीते हैं. प्राचीन आचार्यों ने इन्हें शतायु (100 वर्षों तक जीने वाला) बताया है.
भाग-2: वामावर्त नाभि (Anti-clockwise or Left-turning Navel)
-भटकाव, कठोर संघर्ष और मानसिक द्वन्द का प्रतीक –
बचपन और शिक्षा-दीक्षा: इनका बचपन थोड़ी मानसिक अस्थिरता या चंचलता में बीतता है. ये अक्सर बिना वज़ह अड़ जाते हैं या जिद्द कर बैठते हैं, और परिजनों को इन्हें संभालने में काफ़ी मशक्कत करनी पड़ती है.
उर्जा का प्रवाह विपरीत होने के कारण पढ़ाई में इनका मन आसानी से नहीं लगता है. इनकी शिक्षा में कई बार ब्रेक (Break) आते हैं या ये बार-बार अपनी शिक्षा की दिशा (Stream) बदलते रहते हैं. विद्यार्जन के लिए सामान्य से दोगुना प्रयास करना पड़ता है.
सफलता-असफलता और आर्थिक स्थिति: ‘शॉर्टकट’ इनके लिए कभी काम नहीं आते हैं. युवावस्था में इन्हें करियर में भारी भटकाव, निराशा और असफलताओं का सामना करना पड़ता है.इन्हें हर छोटी सफलता के लिए अपनी एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ता है.
धन कमाने के मामले में इनका जीवन उतार-चढ़ाव भरा होता है. कभी अचानक धन आ जाता है, तो कभी लंबे समय तक आर्थिक तंगी बनी रहती है. 40 वर्ष की आयु के बाद, अपने कटु अनुभवों से सीखकर ही ये आर्थिक रूप से स्थिर हो पाते हैं.
विवाह, दांपत्य और संतान सुख: वामावर्त नाभि वाले पुरुषों का दांपत्य जीवन अक्सर तनावपूर्ण रहता है. छोटी-छोटी बातों पर जीवनसाथी से गलतफहमियां (Misunderstandings) पैदा हो जाती हैं. दरअसल, ये अपने क्रोध और शंकालु स्वभाव पर नियंत्रण नहीं रख पाते हैं, जिससे विवाद सुलझने के बजाय बढ़ जाता है. यहां तक कि रिश्ते टूटने की भी स्थिति बन जाती है.
इन्हें संतान सुख में देरी का प्रबल योग होता है. संतान प्राप्ति के बाद भी, पिता और बच्चों के बीच वैचारिक मतभेद और दूरियां बनी रहने की संभावना अधिक होती है. विशेषज्ञों के अनुसार इनके बच्चे अक्सर विद्रोही स्वभाव (Rebellious mentality) के होते हैं.
सामाजिक स्थिति: ये बहुत प्रतिभाशाली होने के बावजूद कम आंके जाते हैं. समाज में इन्हें वह पहचान और सम्मान नहीं मिल पाता है, जिसके ये वास्तव में हकदार होते हैं. अक्सर लोग इन्हें ग़लत समझ लेते हैं, जिसके कारण ये समाज या समूह से अलग और अकेला महसूस करते हैं.
स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा (आयु): इन्हें हमेशा मानसिक तनाव (Stress), एंग्जायटी और अनिद्रा की शिक़ायत रहती है. नाभि के उल्टे घुमाव के कारण इनका पाचन तंत्र अक्सर बिगड़ता है और नाभि खिसकने (Navel displacement) की समस्या भी इन्हें बार-बार परेशान करती है.
मानसिक चिंताओं और अनियमित दिनचर्या के कारण इनका शरीर समय से पहले ही बीमारियों की चपेट में आ जाता है. शास्त्रों में आचार्यों द्वारा इनकी आयु मध्यम (Average) यानी 65-70 वर्ष बताई है.
निष्कर्ष
हमने देखा कि प्राचीन शास्त्रों में नाभि के महत्त्व के साथ उनके पक्ष में तर्क भी बहुत महत्वपूर्ण हैं. विभिन्न प्रकार की नाभि में कोई शुभ फल का संकेत देती है तो कोई जीवन में चुनौतियों की ओर इशारा भी करती है. मगर इन्हीं ग्रंथों में आचार्यों का यह भी कहना है कि सर्वोत्तम फलादेश के लिए अन्य अंगों के लक्षणों पर भी विचार करना चाहिए. उदाहरण के लिए, नकारात्मक संकेत देने वाली किसी नाभि प्रकार के साथ यदि जातक का वक्षस्थल (छाती) चौड़ा, मस्तक उन्नत (माथा का ऊंचा होना), भुजाएं लंबी (आजानबाहु, जिसके हाथ घुटने तक लंबे हों) और नेत्र तेजस्वी हों, तो नकारात्मक या संघर्षपूर्ण फल स्वतः ही निष्प्रभावी हो जाते हैं. इसलिए, इसे यूं समझें कि नाभि संकेत है, नियति नहीं है. स्वस्थ जीवनशैली, अच्छे विचार और निरंतर प्रयास भी सफलता के लिए बहुत मायने रखते हैं.
अस्वीकरण: इस लेख में कही गई बातें आध्यात्म और दर्शन के क्षेत्र में सुविख्यात एवं मान्यताप्राप्त प्राचीन भारतीय ग्रंथों- सामुद्रिक शास्त्र, बृहत संहिता और गरुड़ पुराण में दी गई नाभि के लक्षणों के विश्लेषण पर आधारित जानकारी का निचोड़ हैं. खुलीज़ुबान.कॉम अथवा इसके लेखक इनकी सौ फ़ीसदी (100%) प्रामाणिकता का दावा नही करते हैं. इसलिए, इन्हें संक्षिप्त जानकारी मानकर पाठक अपने विवेक का प्रयोग करें.
Support us for the Truth
Information platforms that spread lies never lack funding. They have a well-organised international network that keeps their business running. We need your support to fight them. Please contribute whatever you can afford.
Pay









