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पर्व और त्यौहार: एक ही समझे जाने वाले एक दूसरे से कितने अलग हैं जानिए

पर्व और त्यौहार, व्रत और उपवास, पूजा की परंपरा

पर्व और त्यौहार का धर्म-संस्कृति और प्रकृति से गहरा नाता है

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पर्व और त्यौहार एक ही प्रकार के अवसर नहीं हैं.ये एक दूसरे से ऐसे भिन्न हैं जैसे एकांत और भीड़-भाड़ या सभा में फ़र्क होता है.मगर कई बार भ्रम की स्थिति दिखाई देती है.दरअसल, सभ्यता के विकासक्रम और वंश परंपरा के चलते वेदों को छोड़कर हिन्दू स्थानीय रीतिरिवाजों और विश्वासों को अधिक मानने लगा है.वह अपने मन की चलाने लगा है.कई स्थानों पर तो मांसाहार और मदिरा के सेवन के लिए भी उत्सव बना लिए गए हैं, और इन्हें त्यौहार बताया जाता है.पर्व को भी त्यौहार समझा जाता है.

कुम्भ मेला और संगम, प्रयागराज (स्रोत)

वैदिक धर्मग्रन्थ, धर्मसूत्र और आचार संहिता में पर्व और त्योहारों की बाक़ायदा चर्चा है.इनके नियम भी बताये गए हैं, जो सनातन की मूल भावना को अपने अंदर समेटे संक्रांतियों (सूर्य-चंद्रमा की स्थिति) और कुम्भ (एक राशि का मान, जो दसवीं मानी जाती है) पर आधारित हैं.सूर्य संक्रांति में मकर संक्रांति को ज़्यादा अहम माना गया है.

ऐसे पर्व-त्योहारों का उद्देश्य सीधे ईश्वर या फिर उसके साक्षात् रूप प्रकृति के विभिन्न रूपों की वंदना करना है.आकाश मंडल की स्तुति कर रोग-शोक मिटाने, धरती और आकाश की प्रार्थना कर सुख-समृद्धि पाने और ऋतू-परिवर्तन से होने वाले नुकसान से बचते हुए इसका आनंद उठाने या उत्सव मनाने का भी संदेश है.

दूसरी ओर, हिन्दू समाज में ऐसे पर्व-त्यौहार भी शामिल हो गए हैं, जो इससे भिन्न, स्थानीय परंपरा, व्यक्ति विशेष और संस्कृति की उपज हैं.हालांकि ये भी ईश्वर और प्रकृति से जुड़ाव का ही संदेश देते हैं, लेकिन इनमें भौतिकता की प्रधानता है.सांसारिकता का समावेश अधिक है.साथ ही, उत्सव को ये इस प्रकार शामिल कर लेते हैं कि कई पर्व और त्यौहार एक जैसे नज़र आते हैं.

दरअसल, पर्व और त्यौहार, दोनों की अपनी विशेषताएं हैं, जो इन्हें एक दूसरे से अलग करती हैं.व्रत, उपवास, पूजा और उत्सव इनके विभिन्न तत्व या घटक हैं, जो इन्हें विशिष्टता प्रदान करते हैं.

दूसरे शब्दों में कहें तो व्रत, उपवास, पूजा और उत्सव ही इन्हें अलग करते हैं.कोई अवसर किस प्रकार का है यह, उसमें मौजूद इन घटकों की प्रधानता तय करती है.ऐसे में, स्पष्टता के लिए पर्व और त्यौहार की तुलनात्मक चर्चा की आवश्यकता है.मगर, इससे पहले इनके वास्तविक अर्थ को समझना ज़रूरी है.

पर्व का अर्थ क्या है जानिए

पर्व का अर्थ है धर्म, पुण्यकार्य आदि करने का समय.इसे पुण्यकाल भी कह सकते हैं.पुराणों के अनुसार, चतुर्दशी, अष्टमी, अमावस्या, पूर्णिमा, संक्रांति, महाशिवरात्रि आदि पर्व हैं.

पर्युषण और क्षमावाणी जैनों के पर्व हैं.

पर्व के अन्य अर्थ भी हैं, जैसे चातुर्मास्य (हिन्दुओं के पवित्र चार माह की अवधि), प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा अथवा अमावस्या तक का समय, पक्ष, सूर्य अथवा चन्द्रमा का ग्रहण, दिवस (दिन), क्षण, अवसर.

संधिस्थान (जहां दो चीज़ें, ख़ासतौर से दो अंग जुड़े हों) या गांठ, जोड़ को भी पर्व कहते हैं, जैसे कुहनी या गन्ने की गांठ आदि.

पर्व का अर्थ अंश, खंड या भाग भी होता है, जैसे महाभारत के 18 पर्व (जैसे, शांति पर्व, भीष्म पर्व, द्रोण पर्व आदि) यानि, अध्याय हैं.

पर्व है बहुत पवित्र दिन.इसमें व्यक्ति लोकोत्तर (अलौकिक, पारलौकिक, विलक्षण) यानि, शरीर की सीमाओं से ऊपर ज्योतिर्मय चेतना के दिव्य लोक में पहुंचकर स्वयं में आत्म-रत, आत्म-सलग्न और आत्म-प्रिय अनुभव करता है.

यह आराधना और साधना का अवसर है, जिसमें चेतना में उत्कृष्टता का स्तर बढ़ जाता है.इससे सकारात्मकता आती है, और उत्साहवर्धन होता है.

त्यौहार के मायने क्या हैं जानिए

त्यौहार या त्योहार एक हिंदी शब्द है.इसे डिजिटल डिक्शनरी हिंदी शब्दसागर में देखें तो यह तिथि और वार (संस्कृत के शब्द तिथि+वार), दो शब्दों से मिलकर बना है, ऐसा बताया गया है.इसका अर्थ लिखा है- ‘धार्मिक अथवा जातीय उत्सव का दिन, पर्व का दिन’.ऐसा लगता है कि अंग्रेजी के ‘फेस्टिवल’ शब्द के अर्थ का हिन्दी रूपांतरण छाप दिया गया हो.

दूसरी ओर, कुछ जगहों पर ऐसा उल्लेख मिलता है कि त्यौहार वास्तव में त्यौंनार शब्द का बिगड़ा (अपभ्रंश) रूप है.पहले त्यौंनार कहा जाता था.फिर, यह त्यौंहार हुआ, और फिर त्यौहार या त्योहार (यह दोनों लिखा-बोला जाता है) हो गया.

इसके लिए तर्क यह दिया जाता है कि ‘त्यौंनार का अर्थ होता है ढंग या विधि.साथ ही, त्यों का अर्थ होता है- उसी प्रकार से या ज्यों का त्यों.इसलिए ऐसे धार्मिक कार्य या उत्सव जो पूर्ववत (पहले की तरह) अथवा पूर्व की विधि या नियमानुसार मनाया जाता हो, उसके लिए त्यौंनार शब्द उचित ही रहा होगा.लेकिन, त्यौहार और त्योहार, दोनों को भी अब ग़लत नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि ये काफ़ी प्रचलित हो गए हैं.’

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि त्यौहार में व्यवहार का भाव प्रमुख है.त्यौहार होता ही है जब कुछ व्यवहार हो जाए, जैसे कुछ खाना-खिलाना, उपहार के रूप में कपड़े आदि देना.

घरों में बहू-बेटियों और नौकरों आदि को मिलने वाला शगुन त्यौंहारी या त्योहारी कहलाता है.

बहरहाल, इतना तो स्पष्ट है कि त्यौहार एक परंपरागत और महत्वपूर्ण अवसर है.यह उत्सव का दिन है, जो धर्म या संस्कृति के कुछ विशिष्ट पहलुओं पर केन्द्रित है.इसे आमतौर पर स्थानीय या राष्ट्रीय अवकाश, मेला आदि के रूप में चिन्हित किया जाता है.भारत में स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस राष्ट्रीय त्यौहार हैं.

दूसरे शब्दों में, त्यौहार कैलेंडर या पंचांग में तय दिन अथवा एक निश्चित तिथि को प्रतिवर्ष होने वाला धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन है, जैसे दीपावली, होली, दशहरा, रक्षाबंधन, रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, हनुमान जयंती आदि.

हिन्दुओं और सनातन धर्म के अन्य पंथों-संप्रदायों के लिए यह एक सामाजिक अवसर भी है, जिसका सभी लोग मिलकर आनंद उठाते हैं, आपस में खुशियां बांटते हैं.

होली के अवसर पर देखें तो लोग अपने पड़ोसियों, मित्रों और सगे-संबंधियों के साथ मिलकर रंग-गुलाल का आनन्द लेते हैं, और एक दूसरे के यहां खाते और खिलाते हैं.दीपावली को मिठाइयां आदि बांटी जाती हैं.

पर्व और त्यौहार में क्या अंतर है?

हिन्दू धर्म में जिस तरह हज़ारों समाज, अनेक मत और विचारधाराएं हैं उसी तरह इनको मानने वालों के अपने बहुत सारे पर्व और त्यौहार भी हैं.सैकड़ों की संख्या में.लेकिन, सब का उद्देश्य विकास और कल्याण ही है.सम्पूर्ण मानव जाति का कल्याण.इनमें एक मानव को एक साधक की तरह ईश्वर के साथ एकाकार होने की ओर प्रेरित करता है तो दूसरा भक्तिभाव के साथ-साथ सामाजिक जीवन में मिल-जुलकर रहने और खुशियां बांटने का संदेश भी देता है.

पर्व में साधना-आराधना का भाव, त्यौहार में उत्सव का वातावरण: पर्व होता है परम पवित्र दिवस.इस दिन ईश्वर की साधना-आराधना में लीन होने का सर्वोत्तम अवसर होता है, जबकि त्यौहार का दिन हर्ष-उल्लास और आमोद-प्रमोद का होता है.इस अवसर पर ईश्वर के साक्षात रूप प्रकृति को धन्यवाद करना होता है क्योंकि यह शरीर का पोषण कर उसे निरोग व सुखी बनाये रखती है.साथ ही, धन-धान्य से भी परिपूर्ण करती है.

दूसरी ओर, पर्व के दिवस को की गई साधना-आराधना हमें लोकोत्तर यानि, शरीर की सीमाओं से ऊपर ज्योतिर्मय चेतना के दिव्यलोक में पहुंचाकर सीधे ईश्वर से जोड़ देती है.सरल शब्दों में कहें तो त्यौहार लौकिक होते हैं और पर्व लोकोत्तर यानि, शरीर और संसार की सीमाओं से परे.

यही कारण है कि पर्व के साथ व्रत, उपवास और पूजा भी जुड़ी है.हालांकि पूजा का विधान त्यौहार में भी है, पर यहां सांसारिकता या भौतिकता का समावेश है.

पर्व है दान-पुन्य व सेवा का दिन, त्यौहार खान-पान और उपहारों से जुड़ा है: पर्व के अवसर पर व्रत, उपवास और पूजा के साथ दान-पुन्य का भी विधान है.सुपात्र को दान देना परम कर्तव्य माना गया है.दीन-दुखियों की सेवा से ईश्वर प्रसन्न होते हैं, और परलोक संवरता है.दूसरी ओर, त्यौहार में व्यवहार है.खाना-खिलाना, एक दूसरे को मिठाइयां व उपहार देना और साथ मिलकर खुशियां मनाना, इत्यादि इसमें प्रमुख हैं.

उदाहरण के लिए, नवरात्र में कलश स्थापित कर हिन्दू नौ दिनों व्रत, उपवास और पूजा निष्ठापूर्वक करते हैं.कालरात्रि (सप्तमी), महाष्टमी (दुर्गा अष्टमी), महानवमी आदि पर्व मनाते हैं.इनमें सादगी के भाव होते हैं.

फिर, दसवें दिन यानि, विजयादशमी (दशहरा) को उत्सवधर्मिता आ जाती है.ख़ुशी में मिठाइयां बंटती हैं, आतिशबाजी होती है और नए कपड़े पहनकर मेले घूमने आदि के व्यवहार के साथ यह त्यौहार हो जाता है.

पर्व पूर्ण धार्मिक अवसर है, त्यौहार में सामाजिकता भी है: पर्व पूर्ण धामिक अवसर है.इसमें जप-तप ही ध्येय है.इसे आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का संकल्प दिवस भी कह सकते हैं.

इसमें एकाग्रचित्तता है यानि, एकांत भाव है तो त्यौहार में चंचलता है.वाह्य प्रदर्शन है.सामूहिकता का भाव है, जो मनुष्य से मनुष्य को जोड़ता है, और यह बताता है कि सुख आपस में बांटने से बढ़ता है.यह अपनेपन को और मजबूत करता है, और ग़ैरों को भी क़रीब लाता है.

पर्व पूर्ण शुचिता से संबंधित है.इसमें तन और मन, दोनों को पवित्र रखना होता है.पर्व के दिन शारीरिक संबंध यानि, स्त्रीप्रसंग करना, मांसाहार, मदिरा (शराब) सेवन आदि वर्जित है.ऐसा करने वाला विसमूत्रभोजन नामक नरक में जाता है.इस अवसर पर प्रातः नदी में स्नान कर उपवास रखते हुए पूजापाठ, जप, श्राद्ध, दान आदि करने की बात कही गई है.

त्यौहार में भी शुद्धता और शालीनता की बाते हैं.तभी इसके रंगों की सुंदरता और लोकप्रियता बनी रह सकती है.

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