मध्यप्रदेश के रायसेन ज़िले में रायसेन क़िला पहाड़ी स्थित प्राचीन सोमेश्वर महादेव मंदिर साल में सिर्फ एक बार खोला जाता है- महाशिवरात्रि के अवसर पर. तय समय सीमा में श्रद्धालु दर्शन करते हैं, और फिर बंद कर दिया जाता है. यूं कहिये कि साल के 364 दिन यहां ताला लगा होता है. मगर क्यों? किसके आदेश से ऐसा होता है?
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| रायसेन क़िला पहाड़ी स्थित सोमेश्वर महादेव मंदिर |
इसका ज़वाब किसी के पास नहीं है.धर्म के स्वयंभू ठेकेदारों और उनकी सरकार के पास भी नहीं.
दरअसल, यह एक ऐसा आदेश है जो कहीं कागज़ों में नहीं मिलता है, मगर व्यव्हार में लागू है- तुगलकी फ़रमान की तरह. क्या इसे बदला नहीं जा सकता है? आस्था पर यह चोट कब तक बर्दाश्त करते रहेंगें लोग?
इसका आसान-सा ज़वाब है-हां, इसे बदला जा सकता है. पूरे साल के लिए खोला जा सकता है. मुसलमान यदि नाराज़ भी होते हैं, तो विरोध के लिए उनके पास कोई ठोस तर्क नहीं है. कोई क़ानूनी आधार नहीं है.
मंदिर का इतिहास
पुरातत्वविद बताते हैं कि 12 वीं सदी के इस सोमेश्वर महादेव मंदिर के साथ मुस्लिम शासक शेरशाह सूरी ने छेड़छाड़ कर इसे मस्ज़िद का रूप दे दिया था.मगर मुसलमानों के लिए यह उपेक्षित ही रहा.यहां कभी इबादत नहीं हुई.
आज़ादी के बाद हालात बदल गए.इस पर राजनीति होने लगी.मुसलमान दावा करने लगे तो तुष्टिकरण के कारण कांग्रेस की सरकार ने इसे पुरातत्व विभाग के हवाले कर इस पर ताला लगवा दिया.
इससे हिन्दू नाराज़ हो गए.विरोध-प्रदर्शनों से होते मंदिर खोलने की मांग ने एक बड़े आंदोलन का रूप ले लिया.नतीज़तन,प्रदेश सरकार को झुकना पड़ा.
ये साल 1974 की बात है.मंदिर संघर्ष समिति की जीत हुई.उनकी मांगें मान ली गईं.
प्रशासन और पुरातत्व विभाग की देखरेख में ताले खुले और बाक़ायदा मंदिर में शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा हुई.
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| मंदिर में शिवलिंग |
सूबे के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश चंद सेठी भी यहां पहुंचे और शिवलिंग की स्थापना में भाग लिया.
इसके साथ ही,महाशिवरात्रि के मौक़े पर मंदिर परिसर में एक विशाल मेले का आयोजन हुआ.
मगर अचानक फ़िर मंदिर को बंद कर दिया गया.साल में सिर्फ़ एक दिन शिवरात्रि के मौक़े पर मंदिर खोलने जबकि बाक़ी दिनों के लिए उसे बंद रखने का मौखिक आदेश देकर प्रशासन ने उस पर ताले जड़ दिए.
एक बार फ़िर से विरोध शुरू हुआ लेकिन अब परिस्थितियां दूसरी थीं.कांग्रेसी धुरंधर अपना तयशुदा काम कर चुके थे.वे अपने रसूख के दम पर आंदोलनकारी नेताओं को इस नए तुगलकी फ़रमान के लिए मनाने में सफल रहे.
वास्तविक परिस्थिति
यहां ये बात बिल्कुल स्पष्ट और महत्वपूर्ण है कि यदि कोई क़ानूनी अड़चन होती तो यह मंदिर एक दिन के लिए भी नहीं खुल सकता था.परन्तु न सिर्फ़ मंदिर खुला बल्कि इसमें बाक़ायदा शिवलिंग की स्थापना भी हुई.
उसके बाद,यहां हर वर्ष शिवरात्रि के दिन लगातार पूजापाठ आदि कार्यक्रम होते आ रहे हैं.ऐसे में,यह मंदिर एक दिन की बजाय सदा के लिए यानि प्रतिदिन खोला जा सकता है.
उल्लेखनीय है कि यह मंदिर पुरातत्व विभाग की देखरेख में है.उस पुरातत्व विभाग का भी ये मानना है-
” जिस पुरातत्व स्थल पर मूर्ति पूजा करने की वर्षों पुरानी परंपरा रही हो,वहां पूजा करने की अनुमति दे दी जाती है. “
यहां तक़रीबन पांच दशकों (1974 से अब तक) से वार्षिक ही सही मगर पूजा-पाठ व अन्य धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम लगातार चल रहे हैं.यह एक मज़बूत आधार है.इस आधार पर मंदिर हमेशा के लिए खोलने की मांग ज़ायज़ है.
इसमें कहीं कोई अड़चन अथवा समस्या नहीं है.
सिर्फ़ एक दुविधा है.राजनीतिक दुविधा.
कठमुल्ले रूठ जाएंगें तो वोटबैंक सरक जाएगा.
परंतु क्या इससे सच बदल जाएगा?
ये साबित हो गया है कि परिस्थितियां किसी की नाराज़गी या ख़ुशी पर नहीं बल्कि सच्चाई पर निर्भर करती हैं.राम मंदिर मसला इसका सबसे बड़ा और सबसे सटीक उदाहरण सामने है.फ़िर भी,राजनेता समझने को तैयार नहीं हैं.
ऐसे में ज़रूरत है फ़िर से एक बड़े आंदोलन की जिसके लिए समर्थ संगठन आगे आते दिखाई नहीं देते.
श्रद्धालु बाहर से ही दर्शन करने को मज़बूर
इस मंदिर की ये मान्यता है कि यहां लोगों की मन्नतें पूरी होती हैं.बिगड़े काम बन जाते हैं.
ऐसे में समस्याओं से घिरे व दुखी लोग तो आते ही हैं सोमेश्वर महादेव के अनन्य भक्तों का भी साल भर यहां आना-जाना लगा रहता है.
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| बाहर दरवाज़ों पर बंधे मन्नत के धागे (प्रतीकात्मक) |
मंदिर का ताला बंद रहता है.लेकिन,भक्त दरवाज़े के बाहर से बाबा सोमेश्वर की पूजा करने आते हैं और मन्नत मांग कर चले जाते हैं.मंदिर के लोहे के दरवाज़े पर ये भक्त कलावा और कपडा बांध जाते हैं.मन्नत पूरी हो जाने पर फ़िर वे क़पड़ा/कलावा खोलने आते हैं.
महाशिवरात्रि पर लगता है मेला
महाशिवरात्रि के मौक़े पर पौ फटने से पहले ही भक्तों का हुज़ूम यहां उमड़ने लगता है.
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| मेले का दृश्य |
पूजा-पाठ के अलावा क़ाफ़ी संख्या में लोग परंपरागत मेले का आनंद उठाने के लिए भी आते हैं,जिसमें लोक कला के दर्शन के साथ अन्य धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन भी मनोहारी दृश्य उपस्थित करते हैं.
सौ बात की एक बात
किसी व्यक्ति का अपनी धरोहर से सम्बन्ध उसी प्रकार का है,जैसे एक बच्चे का अपनी मां से सम्बन्ध होता है.हमारी धरोहर हमारा गौरव हैं,धार्मिक पहचान हैं और ये हमारे इतिहास-बोध को मज़बूत करते हैं.हमारी कला और संस्कृति की आधारशिला भी हमारे विरासत स्थल ही हैं.
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| सोमेश्वर महादेव मंदिर ( ऐतिहासिक धरोहर ) |
क़िला पहाड़ी स्थित सोमेश्वर बाबा का यह प्राचीन मंदिर भी हमारी धार्मिक-सांस्कृतिक धरोहर है.सुबह उगते सूर्य की किरणें जैसे ही इस मंदिर पर पड़ती हैं,पूरा मंदिर सोने की जैसी सुनहरी रौशनी से भर उठता है.हजारों साल पुराना यह मंदिर पत्थर का बना हुआ है.इस पर किसी तरह का रंग-रोगन नहीं किया गया है.सोने से चमकते मंदिर का यह दृश्य दृश्य देखते ही बनता है.ये हमारी विकसित सभ्यता,ज्ञान-विज्ञान और तकनीक का भी परिचायक है.
और चलते चलते अर्ज़ है ये शेर…
सियासत की चाल में जो फंसते गए,
वो अपनी विरासत को ख़ाक करते गए |
और साथ ही …
हुकुमत से एज़ाज़ अगर चाहते हो,
अंधेरा है लेकिन लिखो रौशनी है |
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