दीपावली के अवसर पर अलग-अलग जगहों पर अलग देवी-देवताओं की पूजा क्यों होती है? देवी लक्ष्मी के साथ गणेशजी विराजमान क्यों दिखाई देते हैं, जानिए
दीपावली की परंपरा पहली नज़र में विभिन्न ऐतिहासिक घटनाओं, कहानियों या मिथकों से जुड़ी लगती है, जो बुराई पर अच्छाई, अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान और निराशा पर आशा की विजय को दर्शाती है.वहीं, हिन्दू दर्शन (षड्दर्शन- सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदांत के नाम से जाने जाते हैं), क्षेत्रीय मिथकों, किवदंतियों, और मान्यताओं को देखें, तो इसका धार्मिक महत्त्व समझ आता है.

दिवाली या दीपावली ‘दीपोत्सव’ यानि, ‘दीपों के उत्सव’ के नाम से भी जानी जाती है.वास्तव में, यह दीपावली का प्राचीन नाम है.मगर, दीपों का यह उत्सव केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे पुरानी संस्कृति और धार्मिक विश्वास की पहचान भी है.यही कारण है कि इसकी मौलिकता बरक़रार है, हालांकि सभ्यता के विकासक्रम और मान्यताओं में वृद्धि के चलते आज अलग-अलग जगहों पर इसको मनाने के तौर-तरीक़े अलग हैं, जिन्हें कम ही लोग जानते हैं.

दुर्भाग्य से सनातन हिन्दू मान्यताओं और त्योहारों का सामान्य शिक्षा के पाठ्यक्रम में न तो उचित और पूर्ण विवरण है और नहीं धर्माचार्यों को इतनी फ़ुर्सत है कि वे आज की पीढ़ी को इस सबसे प्राचीन धर्म व व्यवस्था से परिचित करा सकें.ऐसे में, तरह-तरह के और सही-ग़लत सवालों का उठाना कोई अचरज की बात नहीं है.
अब दीपावली को ही देखिये, वामपंथी और धर्मान्तरण गिरोह इस मौक़े पर देश-दुनिया में अलग-अलग देवी-देवताओं के पूजे जाने वाली मान्यताओं को तो निशान बनाते ही हैं, उत्तर भारतीय हिन्दुओं से सवाल करते फिरते हैं, जैसे दीपावली पर श्रीराम के बजाय देवी लक्ष्मी की पूजा क्यों, और लक्ष्मी के साथ गणेश क्यों; और फिर उन्हें निरूत्तर देख अपना प्रवचन शुरू कर देते हैं.
इसमें रामायण का हवाला दिया जाता है, जिसमें कहा गया है कि 14 वर्षों के वनवास के बाद भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे थे.इस ख़ुशी में अयोध्यावासियों ने घर-घर दीये जलाये थे, और उनका स्वागत किया था.हिन्दू पंचांग के अनुसार यह कार्तिक मास की अमावस्या थी.तब से हर साल इस तिथि पर दीपोत्सव या दिवाली का त्यौहार मनाया जाने लगा.
लेकिन, इस मौक़े पर अधिकांश हिन्दू देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं.ऐसा क्यों है, यह पूछा जाता है.
साथ ही, यह सवाल भी किया जाता है कि प्रत्तिमाओं या चित्रों में धन और ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी के साथ शिव-पार्वती के पुत्र गणेश क्यों दिखाई देते हैं, और दीपावली पर इन दोनों की पूजा होती है, जबकि यहां तो भगवान विष्णु को होना चाहिए.इसे दूसरे शब्दों में कहें, तो लक्ष्मीजी के साथ गणेशजी का संबंध या रिश्ता क्या है, यह पूछा जाता है.
परन्तु, ये सवाल आख़िर हैं कैसे? उटपटांग और अज्ञानता से भरे क्योंकि यह ज्ञात है कि हिन्दू औरों से अलग हैं.बहुदेववादी हैं.यानि, वे अनेक देवी-देवताओं में आस्था रखते हैं, उन्हें पूजते हैं क्योंकि उनकी ऐसी मान्यता है कि अलग-अलग समय में शक्ति के स्रोत या देवी-देवता अलग अस्तित्व और रूप में सक्रिय रहते हैं.
इसी प्रकार, देवी लक्ष्मी और गणेश के अस्तित्व, संबंधों और उनके विभिन्न रूप को लेकर पुराणों-उपनिषदों में वर्णन है.
जहां तक दीपावली के अवसर पर विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा का प्रश्न है तो इसको लेकर अलग-अलग युगों और विभिन्न कालखंड में हुई घटनाओं और उनसे जुड़ी मान्यताओं को समझने की ज़रूरत है.लेकिन, इससे पहले दीपावली के मायने क्या हैं, यह जानना अति आवश्यक है, ताकि मूल विषय अच्छी तरह स्पष्ट हो सके, और किसी प्रकार का भ्रम भी न रह जाए.
दीपावली के मायने क्या है, जानिए
हिन्दी का दीपावली (संस्कृत में दिपवालिः) शब्द दो शब्दों दीप (दीपक, दीया, दीवा या प्रकाशक) और आवली (संस्कृत में आवलिः अर्थात पंक्ति, पांती, कतार या लाइन) से मिलकर बना है, जिसका अर्थ होता है दीपों की पंक्ति या दीयों की कतार.
दीपावली को उड़िया में दीपावली, बंगाली में दीपाबॉली, असमी, कन्नड़, मलयालम, तमिल और तेलुगु में दीपावली, गुजराती में दिवाली, मराठी, कोंकणी और पंजाबी में दिवाळी, सिंधी में दियारी, नेपाली में तिहार और मारवाड़ी में दियाळी कहते हैं.
वैदिक प्रार्थना है- ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात (हे इश्वर) मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो.यही जलते दीयों का संदेश या यूं कहिए कि दीपावली के पर्व का उद्देश्य है.यही उपनिषदों की आज्ञा भी है.
स्कन्द पुराण में दीपावली का उल्लेख करते हुए दीपक को सूर्य के हिस्सों का प्रतिनिधित्व करने वाला बताया गया है, जो जीवन के लिए प्रकाश और उर्जा प्रदान करता है.हिन्दू कैलेण्डर के अनुसार सूर्य कार्तिक माह में अपनी स्थिति बदलता है.
दीपावली का त्यौहार जैन, बौद्ध और सिख भी मनाते हैं.जैन धर्म के लोग इसे महावीर के मोक्ष दिवस के रूप में, बौद्ध महात्मा बुद्ध के ‘अप्पो दीपो भवः’ के उपदेश के अनुसार, जबकि सिख समुदाय के लोग इसे ‘बंदी छोड़ दिवस’ के रूप में मनाते हैं.
दीपावली भारत के आलावा, पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार, मॉरिशस, गुयाना, त्रिनिदाद और टोबैगो, सूरीनाम, मलेशिया, पाकिस्तान, सिंगापूर, फ़िजी और ऑस्ट्रेलिया की बाहरी सीमा पर स्थित क्रिसमस द्वीप पर भी मनाई जाती है.इस दिन सभी जगहों पर सार्वजानिक अवकाश (पब्लिक होलीडे) रहता है.
दीपावली की शुरुआत कब और कैसे हुई, जानिए
दीपावली के उत्सव या त्यौहार की शुरुआत कब और कैसे हुई इसको लेकर पद्म पुराण, स्कन्द पुराण और कई अन्य धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है.आइए इन्हें सिलसिलेवार जानते हैं.
यक्षों और गन्धर्वों ने शुरू किया: दीपोत्सव की शुरुआती परंपरा यक्षों और गन्धर्वों से जुड़ी बताई जाती है.ऐसा वर्णन मिलता है कि यक्षों के राजा कुबेर अपनी प्रजा के साथ दीपोत्सव मनाते थे.कुछ जगहों पर यह भी कहा गया है कि यक्ष इस अवसर पर अपने राजा कुबेर की पूजा करते थे.बाद में इसे दूसरों ने भी अपना लिया, और यह एक विशेष त्यौहार के रूप में स्थापित हो गया.
लक्ष्मी के अवतरण और विष्णु से विवाह का दीपावली से संबंध: दीपावली के त्यौहार का लक्ष्मीजी से संबंध को लेकर अलग-अलग कथाएं हैं.इनमें एक कथा में कहा गया है कि दीपावली पर पहले से पूजे जा रहे कुबेर की जगह लोगों ने देवी लक्ष्मी को पूजना शुरू किया क्योंकि कुबेर की केवल यक्षों में मान्यता थी, देवी लक्ष्मी मानवों और देवों, दोनों के लिए पूजनीय थीं.
भागवत पुराण, महाभारत तथा विष्णु पुराण के अनुसार धन और ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी देवताओं और राक्षसों द्वारा दूध के लौकिक सागर या क्षीरसागर के मंथन (समुद्र मंथन, जो चाक्षुस मन्वंतर या सतयुग में हुआ था) से कार्तिक मास की अमावस्या को प्रकट हुई थीं.साथ ही, उन्होंने भगवान विष्णु को वरण किया (चुना) और इसी दिन रात्रि में दोनों का विवाह हुआ.इस अवसर पर ख़ुशी में तीनों लोकों में दीप जलाये गए थे.यहीं से दीपोत्सव की शुरुआत हुई.
भौव-संप्रदाय ने की दीपावली की शुरुआत: ऐसी मान्यता है कि भौव-संप्रदाय के लोग दीप जलाकर मां लक्ष्मी, कुबेर और गणेशजी की पूजा करते थे.बाद में, इन्हीं से प्रेरित होकर इसे बाक़ी संप्रदाय-मतों ने भी अपना लिया.
मां काली के रौद्र और शांत रूप की पूजा बनी दिवाली की परंपरा: मार्कंडेय पुराण और दुर्गा सप्तसती में कहा गया है कि चंड, मुंड, धूम्राक्ष, रक्तबीज, शुम्भ, निशुम्भ आदि राक्षसों का संहार करने के लिए भगवती (मां पार्वती जो कि दुर्गाजी का ही रूप हैं) ने महाकाली का रूप धारण किया था.मगर उनके वध के बाद भी महाकाली का क्रोध शांत नहीं हुआ, तो भगवान शिव उनके रास्ते में जाकर भूमि पर लेट गए.फिर, जैसे ही उनका पैर शिवजी की छाती पर पड़ा, वे शांत हो गईं.इसी की याद में माता के शांत रूप लक्ष्मी और रौद्र रूप काली की पूजा की परंपरा चल पड़ी.
एक दूसरी कथा में ऐसा वर्णन मिलता है कि महाकाली भी उसी दिन प्रकट हुई थीं जिस दिन समुद्रमंथन के बाद लक्ष्मी और धन्वंतरी प्रकट हुए थे.इसलिए दीपोत्सव होता है, और मां लक्ष्मी तथा काली, दोनों की पूजा होती है.
राजा बलि की याद में मनाई जाती है दीपावली: भागवत पुराण के अनुसार, वामन अवतार में भगवान विष्णु ने राजा बलि की दानप्रियता से प्रसन्न होकर उन्हें पाताललोक का राज्य दे दिया.साथ ही, यह वचन भी दिया कि पृथ्वीवासी उन्हें भूलेंगें नहीं, उनकी याद में प्रतिवर्ष दीपोत्सव मनायेंगें.तभी से इस परंपरा की शुरुआत हुई.
ऐसा भी कहा गया है कि राजा बलि पाताललोक का राजा बने तो इंद्र ने राहत की सांस ली.उन्होंने स्वर्ग का राज्य सुरक्षित जानकर ख़ुशी में दीपोत्सव मनाया.इसे पृथ्वीवासियों ने भी अपना लिया.
रावण-वध, सीता की मुक्ति और वनवास से अयोध्या वापसी से जुड़ी है दीपावली: रामायण (त्रेता युग की घटनाओं पर आधारित हिन्दू धर्मग्रन्थ) सहित अनेक ग्रंथों में श्रीराम, उनकी पत्नी सीता और भाई लक्षमण के 14 वर्ष के वनवास का वर्णन है.इस दौरान श्रीराम ने अनेक राक्षसों का अंत कर वनवासियों (आदिवासियों) और ऋषियों-तपस्वियों की रक्षा की.संसार के सबसे शक्तिशाली राक्षस व लंका के राजा रावण का वध कर श्रीराम ने सीता और लंका, दोनों को ही अधर्मी और अन्यायी सत्ता से मुक्त कराया.यह अधर्म पर धर्म की विजय थी.इसलिए, जब वे लौटे, तो ख़ुशी में लोगों ने घी के दीपक जलाये.
कहा गया है कि बड़ा ही अद्भुत दृश्य था.अयोध्या नगरी में कार्तिक मास की सघन काली अमावस की रात दीयों की रौशनी से जगमगा उठी थी.अतः यह मनोहारी दृश्य इतिहास से जुड़कर परंपरा बन गया.
नरकासुर-वध से दीपावली का संबंध: भागवत पुराण के अनुसार भगवान कृष्ण ने कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध कर देवताओं और संतों को उसके आतंक व अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी.इस ख़ुशी में दूसरे दिन यानि, अमावस्या को गोकुलवासियों ने अपने घरों में दीपक जलाकर उत्सव मनाया.तभी से नरक चतुर्दशी तथा दीपावली का त्यौहार मनाया जाने लगा.एक अन्य घटना श्रीकृष्ण द्वारा पारिजात वृक्ष लाने से संबंधित है.
पौराणिक कथाओं के अनुसार, श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पूजा के रूप में अन्नकूट (अनाज का पहाड़ जैसा ढेर) उत्सव की परंपरा भी शुरू की गई थी, जो दीपावली के अगले दिन मनाया जाता है.
पांडवों के वनवास-अज्ञातवास से वापसी से दीपावली का संबंध: प्राचीन हिन्दू महाकाव्य महाभारत के अनुसार द्यूत क्रीडा (चौसर या पासे का खेल) में हारने के कारण पांडवों को 12 वर्षों के वनवास व 1 वर्ष के अज्ञातवास का जीवन व्यतीत करना पड़ा था.इसके बाद, वे लौटे तो इंद्रप्रस्थ (खांडवप्रस्थ वन-क्षेत्र में निर्मित नगर, जो आजकल दिल्ली के नाम से जाना जाता है) वालों ने ख़ुशी में दीपक जलाकर पूरे नगर को सजाया था.यहीं से, या यूं कहिए कि द्वापर युग के इस कालखंड में दीपोत्सव या दीपावली की शुरुआत हुई.
इस प्रकार, स्पष्ट है कि दीपोत्सव या दीपावली की परंपरा के आधार के रूप स्थापित कोई एक नहीं, बल्कि अनेक मान्यताएं हैं जो समय-समय पर, अलग-अलग कालखंड में अलग दैवी शक्तियों के साथ-साथ प्रकृति और उच्च मानवीय गुणों से भी प्रेरित या प्रभावित रही है.ऐसे में, दीपक के माध्यम से हमें इस ज्ञान, प्रकाश और उर्जा के कोष के साथ जोड़ने वाले पर्व में कोई एक प्रतिमान होने का सवाल ही नहीं बनता है.सनातन हिन्दू सभ्यता-संस्कृति भी तो यही दर्शाती है, जो आदिकाल से ही रहस्यों को जान-समझकर संसार को आलोकित व पथ प्रदर्शित करती आई है.
वैसे भी कोई परपरा जितनी पुरानी होती है उतना ही उसमें विस्तार होता जाता है, यह हमें इतिहासकार, वैज्ञानिक और पुरातत्ववेत्ता बताते हैं.आजकल तो कार्बन डेटिंग से कई रहस्यों से पर्दा उठता जा रहा है.किसी भी चीज़ की उम्र बताई जा रही है.
दिवाली भी कितनी पुरानी है यह 8000 साल से भी ज़्यादा पुराने मिट्टी के पके हुए दीये बता रहे हैं.ये रामायण काल से भी पहले के यानि, ईसा से 6000 साल पहले की सिन्धु घाटी सभ्यता के हैं, जो खुदाई में मिले हैं.
3500 ईसा पूर्व की मोहनजोदड़ो सभ्यता के उत्खनन (खुदाई) में प्राप्त भवनों में दीयों को रखने के लिए बने ताख, मुख्य द्वार पर रौशनी करने के लिए आलों की क़तार और मातृदेवी के दोनों ओर जलते दीये हमारी आधुनिक बुद्धि को यह समझाने के लिए काफ़ी हैं कि उस वक़्त भी दिवाली मनाई जाती थी.साथ ही, वहां रहने वाले लोग हिन्दू ही थे, जो अपने पूर्वजों द्वारा चलाई गई परंपरा को निभा रहे थे.
पर्वों का समूह है दीपावली
दीपावली पांच दिवसीय (पांच दिनों तक मनाया जाने वाला) है, जिसमें हर दिन अलग-अलग देवी-देवताओं को पूजने और रीति निभाने की परंपरा चली आ रही है.इनमें, पहला दिन धन के देवता कुबेर और भगवान धन्वंतरी से जुड़ा है, जिसे धनतेरस कहते हैं.इस अवसर पर धातु से बनी चीज़ें जैसे बर्तन, सोना, चांदी आदि ख़रीदना शुभ माना जाता है.शाम को तुलसी के पौधे या घर के द्वार पर दीपक जलाया जाता है.
दूसरा दिन नरक चतुर्दशी का दिन है, जिसे छोटी दिवाली भी कहते हैं.इस मौक़े पर रात्रि में यम देवता (मृत्यु के देवता, यमराज) के लिए दीपक जलाये जाते हैं.कई लोग विधिवत यम-पूजा करते हैं क्योंकि माना जाता है कि इससे अकाल-मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है.
तीसरा दिन श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मणजी की अयोध्या वापसी से जुड़ा है.इसे बड़ी दिवाली भी कहते हैं.इस अवसर पर घरों में सुबह से ही तरह-तरह के पकवान बनाये जाते हैं, सगे-संबंधियों और मित्रों के घर आना-जाना शुरू हो जाता है तथा मिठाइयां व उपहार बांटे जाते हैं.फिर, पूजा-पाठ होता है.
इसमें कई लोग पहले राम दरबार (भगवान राम, माता सीता, हनुमानजी और लक्ष्मणजी) की पूजा कर फिर लक्ष्मी-गणेश का पूजन करते हैं.
चौथे दिन गोवर्धन पूजा का विधान है.इस अवसर पर लोग अपने मवेशी (गाय-बैलों) को सजाते हैं तथा गोबर (जबकि कई जगहों पर अनाज) का पर्वत (ढेर) बनाकर पूजते हैं.
फिर, पांचवें दिन भैया दूज या भाई-दूज आ जाता है, जिसे यम द्वितीया भी कहते हैं.इस अवसर पर भाई और बहन के नदी में स्नान करने की परंपरा है.फिर, बहन भाई के माथे पर तिलक लगाकर उसके लिए मंगल की कामना करतीं है, और बदले में भाई उसे उपहार आदि भेंट करता है.
यह दिन व्यापारियों के लिए भी ख़ास होता है.इस मौक़े पर वे बही-खाते बदल देते हैं, और दुकानों पर लक्ष्मी-पूजन करते हैं, ताकि उनकी उन्नति-प्रगति हो.
इस प्रकार, दीपावली का त्यौहार अन्य त्योहारों से काफ़ी अलग है.दरअसल, यह एक महापर्व या पर्वों का समूह है, जो दशहरे से ही शुरू हो जाता है.इसकी ख़ासियत यह भी है इसमें दीपोत्सव की मूल भावना के साथ-साथ क्षेत्रीय मान्यताएं भी प्रभावी होती हैं, जिससे इसको मनाने के तरीक़ों में फ़र्क नज़र आता है.
यह भी महत्वपूर्ण है कि कौन किस देवी-देवता का भक्त है, या ज़्यादा मानता है.जैसे रामभक्त दीपावली पर श्रीराम की विशेष पूजा करते हैं तो कृष्णप्रेमी उनकी लीलाओं के अनुसार विधि पूरी करते हैं.धन और अन्य सुख सुविधाएं चाहने वाले लोग लक्ष्मी और गणेश का ध्यान करते हैं.
सभी की कृपा पाने को इच्छुक लोगों के लिए दीपावली से जुड़े पांचों दिवस महत्वपूर्ण होते है, जबकि कुछ दो दिनों की- छोटी और बड़ी दिवाली तो कुछ केवल बड़ी दीवाली मनाते हैं.सबके अपने-अपने विचार या भाव हैं.
जानिए भारत के अलग-अलग हिस्सों में किस तरह मनाई जाती है दीपावली
प्राकृतिक विविधताओं, अलग-अलग भाषा और जीवनशैली के बावजूद भारत एक और मजबूत इसलिए है क्योंकि इसकी आत्मा में सनातन हिन्दू धर्म बसता है.सनातन हिन्दू संस्कृति इसकी जड़ में है, जिसमें केवल सकारात्मकता और निरंतरता है.विभिन्न पर्व-त्यौहार इसको सदा सींचते रहते हैं.दीपावली के त्यौहार की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है.यह प्रतिवर्ष एक नई उर्जा के साथ आपसी सद्भाव, समभाव और भाईचारे के संदेश का प्रसार करता रहता है.मगर सभी जगहों पर यह एक जैसा नहीं मनाया जाता है, इसके तौर-तरीक़े अलग हैं, जिन्हें हमें जानना चाहिए.
उत्तर भारत में दीपावली: उत्तर भारत के राज्यों, उत्तरप्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और दिल्ली तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में श्रीराम की विजयी गाथा एवं श्रीकृष्ण की लीलाओं का अधिक प्रभाव दिखता है.
दीपावली यहां पांच दिनों तक मनाई जाती है, जिसमें धनतेरस, छोटी दिवाली, बड़ी दिवाली, गोवर्धन पूजा और भैया दूज शामिल हैं, हालांकि अधिकांश जगहों पर बड़ी दिवाली पर लक्ष्मी और गणेश की पूजा की प्रधानता है.
दक्षिण भारत में दीपावली: दक्षिण भारत के आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, पुड्डुचेरी, लक्षद्वीप और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के क्षेत्रों में दीपावली दो दिनों की होती है.इसमें पहला दिन होता है नरक चतुर्दशी का.इस दिन सुबह उठकर लोग राक्षस (नरकासुर, जिसका श्रीकृष्ण ने वध किया था) के प्रतीक के रूप में एक कड़वे फल को पैरों से कुचलकर जीत की ख़ुशी मनाते हैं.फिर, हल्दी और तेल के मिश्रण से नकली रक्त (खून) बनाकर उससे नहाते हैं.
दूसरे दिन (अमावस्या या बड़ी दिवाली को) लोग रंगोली बनाकर तथा दीये जलाकर लक्ष्मी और नारायण की पूजा करते हैं.
पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में दीपावली: पूर्वी भारत के राज्यों, पश्चिम बंगाल, ओड़िशा, बिहार और झारखंड में उत्तर भारत जैसी ही दिवाली मनाई जाती है.मगर, यहां काली पूजा का ज़्यादा महत्त्व है.साथ ही, परंपरागत वस्त्रों और व्यंजनों का भी अंतर है.
इनमें, पश्चिमी बंगाल में दिवाली को लेकर लोगों में बड़ा उत्साह रहता है और इसकी तैयारी दशहरा बीतते ही शुरू हो जाती है.दीपावली को यहां घर के बाहर रंगोली बनाने का ख़ासा महत्व है.देर रात मां काली की विशेष पूजा होती होती है.
ओड़िशा में दीपावली पांच दिवसीय ही होती है लेकिन, थोड़ा अंतर दिखाई देता है.यहां पहले दिन धनतेरस, दूसरे दिन काली-पूजन, तीसरे दिन लक्ष्मी पूजा, चौथे दिन गोवर्धन पूजा और पांचवें दिन भैयादूज मनाया जाता है.
बिहार और झारखंड में दो दिन ख़ास होते हैं- छोटी दिवाली और बड़ी दिवाली का दिन.छोटी दिवाली को यम का दीया निकाला जाता है.रात में महिलाएं सूप बजाकर (डंडे से पीटते हुए) बोलती हैं- ‘इसर आवे, दरिदर भागे’ और फिर उस सूप को जला देती हैं.
अगले दिन रात्रि में देवी काली और लक्ष्मी की पूजा होती है.आदिवासियों में गीत, नृत्य और पूजा का प्रचलन है.
पूर्वोत्तर भारत के असम, मणिपुर, नागालैंड, मेघालय, त्रिपुरा, अरूणाचल, सिक्किम और मिजोरम में काली पूजा का विशेष महत्त्व है.यहां पारंपरिक व्यंजन व मिठाइयां खाने-खिलाने, दीप जलाने और रात्रि में काली-पूजन का प्रचलन है.तंत्र विद्या को मानने वाले लोग साधनाएं करते हैं.
पश्चिमी भारत में दीपावली: पश्चिम भारत के अंतर्गत आने वाले राज्य गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, दादरा एवं नगर हवेली और दमन एवं दीव के क्षेत्रों दीपावली की बड़ी धूम रहती है.उत्सव के साथ यह कई नए कार्य-व्यवसाय शुरू करने का शुभ अवसर माना जाता है.
गुजरात में दीपावली हिन्दू नव वर्ष (नए साल) के रूप में मनाई जाती है.इस अवसर लोग घरों को सजाकर दीवारों पर लक्ष्मी के आगमन के प्रतीक के रूप में चरणों (पैरों) के निशान बनाते और पूजते हैं.महिलाएं दीये की लौ को इकठ्ठा कर काजल के रूप में अपनी आँखों में लगाती हैं.
महाराष्ट्र में दिवाली चार दिनों की होती है.पहले दिन ‘वसुर बरस’ मनाया जाता है, जिसमें गाय-बछड़े की पूजा होती है.दूसरे दिन धनतेरस और तीसरे दिन नरक चतुर्दशी मनाई जाती है.नरक चतुर्दशी पर यहां सूर्योदय से पहले उबटन से नहाकर मंदिर में पूजापाठ करने की रीति है.
फिर, चौथे दिन दीपावली मनाई जाती है, जिसमें लक्ष्मी-पूजन होता है.
गोवा में दीपावली का त्यौहार भगवान राम और कृष्ण के सम्मान में मनाया जाता है, हालांकि दीपावली के दिन लक्ष्मी-पूजन होता है.
यहां भी यह पांच दिनों तक मनाया जाता है.गोवावासियों में इसको लेकर काफ़ी उत्साह व उमंग देखने को मिलता है.पारंपरिक व्यंजन बनते हैं, और गीत तथा नृत्य का आनंद लिया जाता है.
मध्य भारत में दीपावली: मध्य भारत के अंतर्गत मुख्यतः दो राज्य आते हैं- मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़.इनमें, दीपावली का त्यौहार पांच दिनों का होता है, जिसमें पहला दिन नरक चतुर्दशी, दूसरा दिन धतेरस या देवता कुबेर और धन्वंतरी का दिन, तीसरा दिन श्रीराम, सीता और लक्षण की अयोध्या वापसी और लक्ष्मी-पूजन, चौथा दिन गोवर्धन पूजा और पांचवां दिन भैया दूज से संबंधित होता है.
आदिवासियों में इस अवसर पर दीपदान (एक दूसरे को दीये भेंट करना) और गीत तथा नृत्य का विशेष महत्त्व है.इससे पहले धनतेरस पर ये यम (यमराज) का दीया दरवाज़े पर लगाते हैं.ऐसी मान्यता है कि इससे मृत्यु घर में प्रवेश नहीं कर पाती है.
कौन हैं लक्ष्मी और गणेश, उनके संबंध क्या हैं, और दोनों साथ क्यों दिखाई देते हैं, जानिए
लक्ष्मी शब्द की उत्पत्ति लक्ष धातु से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ है- ध्यान करना, ध्येय बनाना.इसको व्यापक रूप में देखें तो एकाग्रचित्त होकर साधना या कोई कार्य करने से जो फल प्राप्त होता है, उसे लक्ष्मी कहते हैं.कुछ विद्वानों के अनुसार, समुद्रमंथन से जिस लक्ष्मी की उत्पत्ति हुई थी वह वास्तव में स्वर्ण आदि के रूप में धन का संकेत रहा हो.

परन्तु, शास्त्रों में देखें तो लक्ष्मी सनातन हिन्दू धर्म की एक प्रमुख देवी और भगवान विष्णु की पत्नी हैं.वे त्रिदेवियों (सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती) में से एक और शांति, सुख तथा समृद्धि की देवी हैं.लक्ष्मी का उल्लेख सबसे पहले ऋग्वेद के श्री सूक्त में मिलता है.
पुराणों में लक्ष्मी की उत्पत्ति को लेकर दो तरह की कथाएं हैं.एक में, समुद्रमंथन के दौरान निकले रत्नों के साथ लक्ष्मी की उत्पत्ति बताई गई है, जबकि दूसरी में कहा गया है कि वे ऋषि भृगु और ख्याति की पुत्री हैं.
गणेश कौन हैं: गणेशजी भगवान शिव और माता पार्वती के सबसे छोटे पुत्र हैं.रिद्धि और सिद्धि उनकी पत्नियां हैं.मान्यता के अनुसार, कोई शुभ कार्य करने से पहले भगवान गणेश का नाम लेने से सफलता सुनिश्चित हो जाती है.पहली पूजा गणेशजी की होती है.
लक्ष्मी और गणेश के बीच संबंध क्या है: लक्ष्मी और गणेश के बीच मां-बेटे का संबंध है.दरअसल, लक्ष्मीजी रिश्ते में गणेशजी की मौसी लगती हैं.यह यूं कि गणेशजी उनके बहनोई शिवजी के बेटे हैं.सनातन हिन्दू समाज में मौसी या मासी का मतलब ‘मां जैसी स्त्री’ होता है.
देवी भागवत के चतुर्थ स्कंध, विष्णु पुराण, अग्नि पुराण और श्रीमद्भागवत के खंडों में वर्णनों से पता चलता है कि लक्ष्मी महर्षि भृगु और ख्याति की बेटी हैं.महर्षि भृगु राजा दक्ष के भाई थे.राजा दक्ष की बेटी थीं माता सती.यानि, सती और लक्ष्मी, दोनों बहनें (सौतेली बहनें) थीं.
सती का विवाह शिव से हुआ था.वे भगवान शिव की पहली पत्नी थीं.दूसरी तरफ़, भगवान विष्णु माता लक्ष्मी के पति हैं.यानि, भगवान शिव भगवान विष्णु के साढू हैं.साढू भाई जैसा, और उसका पुत्र (गणेश), पुत्र समान होता है.
लक्ष्मीजी के साथ गणेशजी क्यों दिखाई देते हैं: माता लक्ष्मी और गणेशजी, दोनों साथ क्यों दिखाई देते हैं, और दीपावली में इनकी पूजा होती है, इसको लेकर दो तरह की कथाएं, या शास्त्रों में वर्णन है.
1.ऐसा कहा गया है कि प्रारंभ में दीपों के उत्सव या दीपावली में यक्षों के राजा कुबेर की पूजा होती थी.कालांतर में उनकी जगह देवी लक्ष्मी को पूजा जाने लगा.
फिर, भौव-संप्रदाय के लोग देवी लक्ष्मी के साथ कुबेर और रिद्धि-सिद्धि (समृद्धि और सफलता) के दाता के रूप में गणेश को भी स्थापित कर पूजने लगे.इसे दूसरों ने भी यही अपना लिया.
लेकिन, इसमें फिर बदलाव आया, और लोग केवल लक्ष्मी-गणेश (कुबेर के बिना) को पूजने लगे.आज अधिकांश लोग इन्हीं (लक्ष्मी और गणेश) की पूजा करते हैं.यही कारण है कि प्रतिमाओं-चित्रों में ये दोनों साथ दिखाई देते हैं.
2.समुद्रमंथन से प्रकट हुईं लक्ष्मी का भगवान विष्णु से विवाह हुआ, और उन्हें सृष्टि के धन और ऐश्वर्य की देवी बनाया गया, तो उन्होंने यक्षों के राजा कुबेर को प्रबंधक बनाया.लेकिन, जल्द ही माता लक्ष्मी को अनुभव हुआ कि उनके भक्तों को उनकी पर्याप्त कृपा नहीं प्राप्त हो रही है.
दरअसल, कुबेर ठहरे हिसाब-किताब वाले, ऊपर से उनका थोड़ा कंजूस स्वभाव बाधा बन रहा था.कुबेर धन का वितरण करने के बजाय धन के भंडारी बन बैठे थे.
इससे दुखी माता लक्ष्मी ने नारायण (भगवान विष्णु) को समस्या बताई, तो उन्होंने एक अतिरिक्त सहायक व धन के वितरक के रूप में गणेशजी को दायित्व सौंपने का सुझाव दिया.
हुआ भी यही.गणेशजी ने कार्यभार संभाला, और भक्तों पर कृपा की वर्षा होने लगी.यह देखकर माता लक्ष्मी बहुत प्रसन्न हुईं, और कहा- ‘श्री विष्णु की अनुपस्थिति में पुत्र गणेश मेरे साथ होंगें’.
तभी से गणेशजी कुछ अवसरों पर माता लक्ष्मी के साथ दिखाई देते हैं.
बताते हैं कि लक्ष्मीजी को प्रतिवर्ष शरद पूर्णिमा से अमावस्या (दीपावली के अवसर पर) के बीच 15 दिनों के लिए पृथ्वी पर भ्रमण के लिए आना होता है.मगर, इस अवधि में भगवान विष्णु योगनिद्रा में होते हैं, वे जागते हैं देवोत्थान के दिन.ऐसे में, माता लक्ष्मी यहां गणेशजी को अपने साथ लेकर आती हैं.पृथ्वीलोक में इनकी यही उपस्थिति प्रतिमाओं या चित्रों में दर्शायी जाती है.दीपावली पर दोनों ही पूजे जाते हैं.
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