क्या न्यूटन ने इनफिनिटी सीरीज चुराई थी? केरल के स्कूल की उपलब्धि- सीके राजू का बड़ा खुलासा
मैनचेस्टर युनिवर्सिटी की ऐतिहासिक स्वीकारोक्ति और पुर्तगाली मिशनरियों-जेसुइट पादरियों के ज़रिए हुई 'बौद्धिक तस्करी' का पूरा सच; जानिए कैसे केरल के स्कूल की महान उपलब्धि 'इनफिनिटी सीरीज' न्यूटन के नाम हो गई.

क्या न्यूटन ने इनफिनिटी सीरीज चुराई थी- यह सवाल जिस तरह बौद्धिक जगत में घूम रहा है इससे तो और भी कई सवाल, जैसे गुरुत्वाकर्षण, गति के नियम, प्रकाशकी, कैलकुलस, दूरबीन और अन्य कई प्रकार की खोज या आविष्कार में योगदान को लेकर, पैदा हो सकते हैं. बताया जाता है कि 14 वीं सदी में, जब यूरोप अभी मध्ययुग की नींद में था उस समय केरल के एक छोटे से गांव में आर्यभट्ट परंपरा के गणितीय-खगोल विज्ञान विद्यालय के विद्वान और गणितज्ञ माधव, नीलकंठ, ज्येष्ठदेव, आदि इनफिनिटी सीरीज, कैलकुलस, ग्रहीय मॉडल, आदि की गहराइयों में उतर चुके थे. खोजा उन्होंने और सारे प्रमाण भी दिए, लेकिन श्रेय न्यूटन और लाइबनिज़ को मिल गया. क्या यह ज्ञान पुर्तगाली मिशनरियों-जेसुइट पादरियों के ज़रिए यूरोप पहुंचा? फिर, न्यूटन ने कैसे हासिल किया? दरअसल, यह कोई साधारण इतिहास नहीं- ज्ञान की सब से बड़ी कथित चोरी की कहानी है, जो सदियों तक छिपी रही. बाद में, जब सच सामने आया भी, तो मैकाले, मॉर्गन और येसुदास रामचंद्र की तिकड़ी ने दबाने का षड्यंत्र रचा. फिर लंबे समय बाद, साक्ष्यों की चोट से झूठ का वह भव्य क़िला एक दिन अचानक भरभराकर ज़मीदोज़ हो गया. क्यों और कैसे, आइये भारतीय गणित के उस भूले-बिसरे इतिहास के पन्नों को खोलते हैं, और सच-झूठ का आकलन तर्कों और तथ्यों पर करते हैं.

यह विवाद आख़िर शुरू कैसे हुआ? किसने किया? इससे पहले कि हम गणित (भारतीय गणित) और मैथमेटिक्स (पश्चिमी गणित) की तकनीकी बातों, उनमें अंतर, खोज और चोरी की पड़ताल करें, विवाद की जड़ और दावेदारी को समझना होगा. विवाद के मूल और दावेदारों में प्रमुख डॉ. सी. के. राजू (डॉ. चंद्रकांत राजू) हैं, जो भारत के उन गिने-चुने विद्वानों में से एक हैं जिन्होंने भारत के परम सुपरकंप्यूटर के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. गणित, कंप्यूटर विज्ञान और इतिहास के क्षेत्र में गहरी पकड़ रखने वाले प्रोफ़ेसर राजू ने केरल स्कूल की खोज को न सिर्फ दोहराया, बल्कि न्यूटन और अन्य विद्वानों पर भारतीय बुद्धिमत्ता और ज्ञान की चोरी का आरोप लगाकर तूफ़ान खड़ा कर दिया.
क्या हैं प्रोफ़ेसर राजू के दावे, और उसका आधार जानिए
प्रोफ़ेसर सी. के. राजू (Prof. C. K. Raju) का दावा है कि केरल के स्कूल यानी गणितीय-खगोल विज्ञान विद्यालय ने सिर्फ अनंत श्रृंखला या इनफिनिट सीरीज (Infinite series) नहीं खोजी थी, बल्कि पूरा कैलकुलस (Calculus), जो आधुनिक गणित का आधार है, विकसित कर लिया था. 14 वीं सदी का यह भारतीय ज्ञान 16 वीं सदी में जेसुइट पादरियों या ज्ञान के तस्करों के ज़रिए यूरोप पहुंचा, और न्यूटन (Isaac Newton) ने इसे चुपचाप लेकर या चुराकर अपना बता दिया.
प्रोफ़ेसर सी. के. राजू के अनुसार:
1.केरल के स्कूल- गणितीय-खगोल विज्ञान विद्यालय के विद्वान और गणितज्ञ संगमग्राम माधव (1340-1425) और उनके उत्तराधिकारी ने अनंत श्रेणी (infinite series) के साथ-साथ अतिसूक्ष्म तकनीकें (Infinitesimal techniques) और उनके व्यावहारिक प्रयोग (practical applications) भी विकसित किये थे. यानी आधुनिक calculus का पूरा रूप तैयार कर दिया था.
2.कोचीन में सक्रिय पुर्तगाली मिशनरियों और जेसुइट पादरियों ने स्थानीय विद्वानों और राजघरानों से ग्रंथ से धोखे से प्राप्त किये या चोरी की, और यूरोप भेजे.
3.न्यूटन और लाइबनिज़ (Gottfried Wilhelm Leibniz) ने इस ज्ञान को इस्तेमाल किया, लेकिन इसे पूरी तरह समझ नहीं पाए क्योंकि भारतीय गणित व्यावहारिक (practical or empirical) था, जबकि यूरोपीय गणित प्रमाण-आधारित (proof-based or axiomatic) था.
ऐसे में, न्यूटन ने अंत में इसमें काल के एकरैखिक होने की ईसाई अवधारणा को मिलाया और इसका समाधान निकालने का प्रयास किया. इसे ही हम आज d/dt के रूप में पढ़ते हैं.
प्रोफ़ेसर सी. के. राजू ने चार्ल्स एम. विश के पेपर (1834) और जेसुइट मिशनरियों की गतिविधियों को इस पूरे मामले में सबूत के तौर पर पेश किया है.
कौन थे चार्ल्स एम. विश, और कैसा पेपर उन्होंने तैयार किया था?
चार्ल्स एम विश (Charles Matthew Whish- 1794-1833) ईस्ट इंडिया कंपनी के मद्रास प्रतिष्ठान में कार्यरत एक अंग्रेज सिविल सेवक थे. मालाबार में रहते हुए उन्होंने केरल के स्कूल (Kerala school of astronomy and mathematics) के विद्वानों द्वारा लिखे गए भारतीय गणित के ग्रंथों का अध्ययन किया, और एक विस्तृत दस्तावेज या पेपर तैयार कर रॉयल एशियाटिक सोसाइटी (Royal Asiatic Society of Great Britain and Ireland) को सौंपा, जो 1834 में प्रकाशित हुआ.
उस पेपर में चार्ल्स विश ने बताया कि केरल के हिंदू गणितज्ञों (माधव, आदि) ने infinite series का उपयोग करके वृत्त (Circle) की गणना (Quadrature) की थी यानी (पाई) की गणना- जो यूरोप से सैकड़ों साल पहले थी.

विदित हो कि चार्ल्स विश ने तंत्रसंग्रह (Tantrasangraha), युक्तिभाषा (Yuktibhasa), कर्णपद्धति (Karanapadddhati) और सदरत्नमाला (Sadratnamala), जैसे ग्रंथों का गहन अध्ययन किया था, और उनका जिक्र करते हुए विचार व्यक्त किए.
चार्ल्स विश के प्रकाशित पेपर (दस्तावेज) का नाम:
“On the Hindu Quadrature of the Circle, and the Infinite Series of the proportion of the Circumference to the diameter……”.

इसमें उन्होंने केरल के गणितज्ञों द्वारा दिए गए Sin, cos और arctan series का ज़िक्र करते हुए कहा कि ये series यूरोपीय गणितज्ञों (जैसे न्यूटन, आदि) से बहुत पहले खोजे गए थे. यह जानकर पश्चिमी जगत (Western world) के विद्वानों को हैरानी हुई और एक बहस छिड़ गई, क्योंकि इससे पहले केरल के स्कूल की खोज के बारे में उन्होंने सुना नहीं था.

चार्ल्स एम विश के पेपर का महत्त्व:
चार्ल्स एम विश का पेपर केरल के स्कूल की उपलब्धियों का पहला आधुनिक दस्तावेजी प्रमाण माना जाता है. हालाँकि शुरू में इसे ज़्यादा तवज्जो नहीं मिली, मगर बाद में यह भारतीय गणित के इतिहास का आधार बन गया.
मैकाले-मॉर्गन-येसुदास रामचंद्र की तिकड़ी, विश के पेपर को दबाने का षड्यंत्र
जिस समय केरल के स्कूल की उपलब्धियों वाला चार्ल्स एम विश का पेपर पश्चिमी जगत (westen world) में चर्चा का विषय बना हुआ था उसी दौरान मैकाले ने भारत में अंग्रेजी शिक्षा नीति थोपने की मुहीम छेड़ रखी थी. इसमें उसकी एक पूरी लॉबी (समर्थक वर्ग) येन केन प्रकारेण यह बताने और साबित करने में जुटी थी कि भारत में ज्ञान-विज्ञान का अभाव है, और भारतीय अंग्रेजी शिक्षा से ही योग्य और समर्थ बनकर जीवन में आगे बढ़ सकते हैं.
प्रोफ़ेसर सी. के. राजू के अनुसार मैकाले चाहता था कि भारतीय गुरुकुल, वैदिक या शास्त्रीय शिक्षा को पूरी तरह ख़त्म कर ऐसा वर्ग तैयार करना, जो भारतीय रक्त और शरीर में तो हो, लेकिन स्वाद, राय, नैतिकता और दिमाग से अंग्रेज हो. इसके लिए उसने ज्ञान का आधार रही संस्कृत भाषा और उसमें लिखी पुस्तकों को बेकार बताकर वेस्टर्न सुपीरियरिटि (पश्चिमी श्रेष्ठता) का नैरेटिव बनाया.
थॉमस बेबिंगटन मैकाले (Thomas Babington Macaulay) दरअसल, चार्टर एक्ट 1833 के तहत नियुक्त भारत के गवर्नर जनरल की परिषद का प्रथम विधि सदस्य (1834-1838) का सदस्य था. उसने भारतीय ज्ञान-विज्ञान को झूठा और बेकार बताने के उद्देश्य से बाक़ायदा एक पेपर (स्मरण-पत्र) तैयार किया था.
मैकाले के पेपर का नाम:
Macaulay’s Minute on Education, February 2, 1835
मैकाले ने अपने पेपर में लिखा था- टिप्पणी की थी:
मेरा मानना है, और यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि संस्कृत भाषा में लिखी गई सभी पुस्तकों से एकत्रित ऐतिहासिक जानकारी, इंग्लैंड के प्राथमिक विद्यालयों में प्रयुक्त सब से घटिया संक्षिप्त संस्करणों में पायी जाने वाली जानकारी से भी कम मूल्यवान है.

लेकिन चार्ल्स एम विश का पेपर सामने था, जो उसकी सारी कोशिशों पर पानी फेर सकता था.
ऐसे में, मैकाले ने लंदन युनिवर्सिटी कॉलेज में मैथमेटिक्स के प्रोफ़ेसर ऑगस्टस डी मॉर्गन (Augustus De Morgan) को विश के पेपर का विरोध करने के लिए तैयार किया. मॉर्गन के नेतृत्व में विश के पेपर या रिपोर्ट के ख़िलाफ़ एक अभियान-सा चल पड़ा. उसे झूठा (clever hoax) बताया गया. नतीजतन, लोग भ्रमित होने लगे.
ग़ौरतलब है कि भारतीय गणित और केरल के स्कूल की उपलब्धियों के बारे में चार्ल्स एम विश के पेपर को भ्रामक बताने वालों में सब से अग्रणी रहे प्रोफ़ेसर मॉर्गन ऐसे गणितज्ञ थे जिन्हें 10 में से 12 घटाना नहीं आता था.
यूं कहिये कि प्रोफ़ेसर मॉर्गन को ऋणात्मक संख्या (Negative number) को लेकर बड़ा भ्रम था. उनका मानना था कि कुछ भी ‘शून्य से छोटा नहीं’ हो सकता है. वे इसे ‘Less than nothing’ कहकर खारिज़ करते थे. प्रोफ़ेसर राजू के अनुसार, जबकि भारतीय गणित में (ब्रह्मगुप्त के समय से) ऋणात्मक संख्याओं का इस्तेमाल सदियों से करते थे, डी मॉर्गन जैसे यूरोपीय विद्वान इसे समझ नहीं पा रहे थे.
ऑगस्टस डी मॉर्गन ने 1836 में अपनी एक पुस्तक भी छपवाई, जिसका नाम था:
Elements of algebra preliminary to the differential calculus: De Morgan, Augustus, 1806-1871

इधर भारत में, हाल ही में ईसाई बने दिल्ली में उर्दू के लेखक, पत्रकार और शिक्षक येसुदास (यीशु का दास) रामचंद्र (Yesudas Ramchundra- 1821-1880), जो ‘मास्टर रामचंद्र’ के नाम से जाने जाते थे, उन्होंने एक पुस्तक लिख डाली. उसका प्रकाशन हुआ. मॉर्गन ने वह पुस्तक लंदन मंगाई, तारीफ़ की- संपादकीय प्राक्कथन लिखा और ईस्ट इंडिया कंपनी के खर्चे पर फिर से छपवाकर यूरोप और भारत में इसका प्रचार करवाया.
येसुदास रामचंद्र की पुस्तक का नाम:
A Treatise on the Problems of Maxima and Minima, Solved by Algebra

इसमें येसुदास रामचंद्र ने कैलकुलस (डिफरेंशियल कैलकुलस) के बजाय शुद्ध बीजगणित (Algebra) का उपयोग करके maxima और minima की समस्याओं को हल करने की कोशिश की थी.
इस पुस्तक की समीक्षा (रिव्यू) हुई, और भारतीयों का ख़ूब मज़ाक उड़ाया गया. कहा गया कि भारतीय गणित अब तक एल्जेब्रा तक ही पहुंचा है.
इसका असर यह हुआ कि विश (Whish) का पेपर- उसमें लिखी बातें, लोगों को संदिग्ध लगने लगीं, और मुख्यधारा से ओझल हो गईं, जैसे सूरज बादलों में ओझल हो जाता है. यूं कहिये कि विश का पेपर षड्यंत्र का शिकार होकर दब गया.
केरल के स्कूल की उपलब्धि- भारतीय गणित
केरल का स्कूल 14 वीं से 16 वीं शताब्दी का गणित और खगोल विज्ञान का एक बहुत उन्नत विद्यालय था. इसका नाम था- गणितीय-खगोल विज्ञान विद्यालय (Kerala School of Astronomy and Mathematics). केरल के मालाबार तट पर स्थित इस विद्यालय के संस्थापक थे संगमग्राम माधव (Sangamagrama Madhava), जिन्होंने sin, cos और arctan के infinite series (अनंत श्रेणी) खोजे थे, जो गणित के क्षेत्र में बहुत बड़ी उपलब्धि थी. यूं कहिये कि माधव ने यह खोज Isaac Newton से लगभग 250 साल पहले कर ली थी.
Prof. C. K. Raju के अनुसार केरल स्कूल आर्यभट्ट (Aryabhatta) की प्राचीन भारतीय गणित परंपरा का हिस्सा था. यह स्कूल खगोल गणनाओं (ग्रहों की स्थिति, समय गणना, नेविगेशन) के विषय पर काम करता था.
संगमग्राम माधव की उपलब्धियां:
1.Sine series, Cosine series और Arctangent series की खोज.
2.इन series की मदद से (पाई) को 11 दशमलव स्थानों तक सटीक गणना की जा सकती थी.
3.यह अनंत श्रेणियों (infinite series) का उपयोग त्रिकोणमितीय फलनों (trigonometric functions) के विस्तार (expansion) के लिए था, जो बाद में कलन (calculus) का आधार बना.
माधव के उत्तराधिकारी और मुख्य ग्रंथ:
नीलकंठ सोमयाजी (Nilakantha Somayaji): तंत्रसंग्रह (Tantrasangraha- लगभग 1500 ई.)
ज्येष्ठदेव (Jyeshthadeva): युक्तिभाषा (Yuktibhasa- लगभग 1530 ई., मलयालम में). इसमें series के पूर्ण प्रमाण (proofs) ज्यामिति और बीजगणित के तरीक़े से दिए गए हैं. यह ग्रंथ सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसमें सिर्फ सूत्र नहीं, बल्कि ‘क्यों और कैसे’ की भी विस्तार से वर्णन है.
खोज का महत्त्व:
केरल स्कूल के विद्वानों की ये खोजें आधुनिक गणित की रीढ़ हैं; उनके द्वारा प्रतिपादित इनफिनिटी सीरीज ही आज के कैलकुलस और डिजिटल युग की जटिल गणनाओं का आधार बनीं. मगर विडंबना यह है कि इस सब के लिए उनके बजाय श्रेय न्यूटन और लाइबनिज़ (Newton and Leibniz from Europe) को मिल गया.
इनफिनिटी सीरीज आखिर है क्या, और कहाँ-कहाँ इसका उपयोग होता है जानिए
गणित में जब किसी अनुक्रम या संख्याओं की एक श्रृंखला को बिना रुके निरंतर जोड़ा जाता है, तो उसे इनफिनिटी सीरीज (infinite series) या अनंत श्रृंखला कहते हैं. यानी इसमें पदों की संख्या सीमित नहीं होती है, बल्कि वे अनंत (infinity) तक चलते रहते हैं.
केरल स्कूल के माधव और उनके अनुयायियों ने सबसे पहले यह सिद्ध किया कि कैसे इन अंतहीन पदों का कुल योग एक निश्चित मूल्य (जैसे या triogonometric values) तक पहुंच सकता है. यही अवधारणा आगे चलकर आधुनिक कैलकुलस (calculus) या कलन का मुख्य आधार बनी.

इनफिनिटी सीरीज का उपयोग कई क्षेत्रों, जैसे कलन, भौतिकी, इंजीनियरिंग और कंप्यूटर साइंस में होता है. आज के सुपर कंप्यूटर भी इस अनंत श्रेणी के सिद्धांत का उपयोग करके पाई का मान दशमलव से अरबों स्थान तक निकालते हैं.
मैनचेस्टर युनिवर्सिटी की स्वीकारोक्ति- इनफिनिटी सीरीज की तस्करी, न्यूटन का श्रेय लेना ग़लत
गणित के इतिहास में वर्ष 2007 एक ऐसे ‘टर्निंग पॉइंट’ के रूप में दर्ज़ हुआ, जिसने आधुनिक विज्ञान के सबसे बड़े दावों की जड़ों को हिला दिया. यह वह वर्ष था जब मैनचेस्टर युनिवर्सिटी ने अधिकारिक तौर पर स्वीकार किया कि जिसे दुनिया अब तक ‘पश्चिमी चमत्कार’ मानती थी वह दरअसल, केरल के स्कूल की सदियों पुरानी विरासत थी. युनिवर्सिटी की रिपोर्ट के अनुसार कैलकुलस की आधारशिला कही जाने वाली ‘इनफिनिटी सीरीज’ की खोज न्यूटन और लाइबनिज़ से 250 साल पहले भारत में हो चुकी थी.
शोध यह भी उजागर करता है कि कैसे 16 वीं सदी के पुर्तगाली मिशनरियों और जेसुइट विद्वानों (जैसे मैटियो रिक्की) ने केरल के तटों से इन गणितीय पांडुलिपियों को हासिल कर यूरोप भेजा, जहां कैलेंडर सुधार और नौवहन (Navigation) की ज़रूरतों के लिए इस भारतीय ज्ञान का उपयोग किया गया. यह केवल एक शैक्षणिक भूल-सुधार नहीं, बल्कि पश्चिमी जगत द्वारा भारतीय बौद्धिक संपदा के हस्तांतरण- या कहें तो ‘बौद्धिक तस्करी’ की एक ऐतिहासिक स्वीकारोक्ति थी.
लेकिन इसमें भी गड़बड़झाला हो गया था. भारतीय विद्वान C. K. Raju ने आरोप लगाया कि शोध के मुखिया रहे जॉर्ज जोसेफ (George Gheverghese Joseph) ने ‘जेसुइट ट्रांसमिशन’ संबंधी उनके मूल शोध का बिना अनुमति और बिना श्रेय दिए इस्तेमाल किया. हालाँकि 2010 में मैनचेस्टर युनिवर्सिटी की तरफ़ से भूल-सुधार कर प्रोफ़ेसर सी. के. राजू के महत्वपूर्ण योगदान को मान्यता दे दी गई.
निष्कर्ष:
केरल के स्कूल, माधव, आदि की विरासत इनफिनिटी सीरीज की तस्करी और श्रेय की चोरी (प्लेजियरीज्म) के प्रकरण में पुर्तगाली मिशनरियों-जेसुइट पादरियों, न्यूटन, लाइबनिज़, और मैकाले-मॉर्गन-येसुदास की तिकड़ी के तमाम प्रयास धूल-धूसरित हो चुके हैं. सच को उजागर करने का बीड़ा जो चार्ल्स एम विश ने उठाया उसे प्रोफ़ेसर सी. के. राजू और अंततः मैनचेस्टर युनिवर्सिटी ने पूरा कर दिया.
लेकिन देखा जाये तो यह प्रकरण केवल गणितीय सूत्रों की खोज का नहीं, बल्कि उस औपनिवेशिक अहंकार के ढहने का प्रतीक है जिसने सदियों से गैर-यूरोपीय मेधा को दोयम दर्ज़े का माना. पश्चिमी मानसिकता ने उस सच को अंधेरी कोठरियों में दबा दिया, ताकि ‘यूरोपीय श्रेष्ठता’ का भ्रम बना रहे.
मैनचेस्टर युनिवर्सिटी की स्वीकारोक्ति उस वैश्विक दीवार में पहली दरार है. यह पूरी दुनिया के लिए एक संदेश है कि ज्ञान किसी एक भूगोल की बपौती नहीं है. अब समय आ गया है कि विश्व के इतिहास को ‘यूरोपीय चश्मे’ से देखना बंद किया जाये, और उस ‘बौद्धिक छल’ का हिसाब मांगा जाये जिसने सदियों तक भारतीय प्रतिभा को गुमनामी के अँधेरे में रखा. यह आह्वान है- इतिहास की उन कड़ियों को फिर से जोड़ने का, जिन्हें साजिशन तोड़ा गया था. भारत से चोरी हुई ‘इनफिनिटी सीरीज’ अब केवल एक समीकरण नहीं, बल्कि वैश्विक न्याय की वह गूँज है जो चीख-चीख कर कह रही है कि सत्य का सूर्य अब पश्चिम की मुट्ठी में क़ैद नहीं रह सकता है. ज्ञान के इस महाकुंभ में भारत का योगदान अब केवल एक अध्याय नहीं, बल्कि उसका आधार है.
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