समसामयिक

विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में कैंपस खोलने की अनुमति: ग़ुलाम मानसिकता का ग़ुलामी की राह में बढ़ा क़दम

इसे समय का फेर कहिए या दुर्भाग्य, विदेशी विश्वविद्यालय जो कल तक बीजेपी को फूटी आंखों नहीं सुहाते थे उन्हीं में अब भारत की अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी नज़र आ रही है!

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इतिहास गवाह है कि अकेली ईस्ट इंडिया कंपनी सोने की चिड़िया को कंगाल बना गई थी.अभी तो दो विदेशी युनिवर्सिटी आ रही हैं.कल और भी आयेंगीं और भारत की शिक्षा व्यवस्था को रसातल में पहुंचा देंगीं.फिर शुरू होगा वही दौर, जिसकी यादें आज भी हमें झकझोर देती हैं.

यूजीसी, सरकार और विदेशी विश्वविद्यालय (सांकेतिक)

बात दरअसल, यूजीसी के नियमों में बदलाव की है.सरकार की नीयत की है, और उस चोर रास्ते की भी है, जिससे होकर राष्ट्रविरोधी कार्य भी राष्ट्रभक्ति के अंदाज़ में किए जाते हैं.

हम सभी जानते हैं कि कोई भी क़दम उठाने से पहले बाक़ायदा एक रुपरेखा बनती है, उस पर गहन चिंतन-मनन होता है, तो काम अच्छा होता है.

मॉडर्न मैनेजमेंट थ्योरी (आधुनिक प्रबंधन सिद्धांत) भी कहती है कि किसी योजना को लागू करने से पहले एनवायर्नमेंटल स्केनिंग यानि, पर्यावरणीय अवलोकन की आवश्यकता होती है.मगर, बिना सोचे-समझे या बिना चर्चा के अगर कुछ अफ़सर बैठकर अपने दफ़्तर के अंदर फ़ाइल पर अपने तर्क बनाते हैं, तो परिणाम अच्छा नहीं होता है.मोदी सरकार में कुछ ऐसा ही रहा है.यह देश के लिए ठीक नहीं है.

कुछ समय पहले ख़बर आई थी कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी), 2020 की सिफ़ारिशों के मद्देनज़र यूजीसी यानि, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने अपने नियमों में बदलाव किए हैं, जिससे विदेशी विश्वविद्यालयों के भारत में अपने परिसर खोलने का रास्ता साफ़ हो गया है.

फिर यह भी पता चला कि ऑस्ट्रेलिया के डीकिन और वोलोगोंग नामक दो विश्वविद्यालयों को अनुमति भी दे दी है और वे जल्द भारत के गुजरात इंटरनेशल फाइनेंस टेक (गिफ्ट सिटी) शहर में अपने अपतटीय परिसर स्थापित करने जा रहे हैं.

मगर, क्यों? कैसे यह सब हो रहा है? साथ ही, कई बातें और भी हैं, जिनको लेकर सवालों की एक लंबी फ़ेहरिस्त खड़ी हो जाती है और उन सब पर चर्चा ज़रूरी है.

अपने विश्वविद्यालयों को बेहतर क्यों नहीं बनाते?

स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का नारा देने वाली सरकार की कथनी और करनी में बड़ा अंतर है.ग़ुलाम मानसिकता की शिकार यह भी दूसरों को अपनों से बेहतर मानती है.तभी अपने विश्वविद्यालयों का उत्थान कर प्रतिस्पर्धा में शिखर की ओर ले जाने के लिए प्रयास करने के बजाय दूसरों के लिए लाल कालीन बिछा रही है.

देश की आर्थिक समृद्धि ‘नॉलेज इकोनोमी’ यानि, ‘ज्ञान की अर्थव्यवस्था’ पर आधारित होती है.यानि, वही देश आगे बढ़ता है, जिसके विश्वविद्यालय अच्छे होते हैं.भारत में नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला विश्वविद्यालय थे, तो वह सोने की चिड़िया कहलाता था.

मगर, मुस्लिम आक्रांताओं ने नालंदा-तक्षशिला जला-बर्बाद कर दिए.उसके बाद अंग्रेजों ने भी हमारी शिक्षा व्यवस्था को कुचला, नष्ट-भ्रष्ट किया और गुरुकुल व्यवस्था भी ख़त्म कर दी.

आज़ादी के बाद भी मैकाले ने हमारा पीछा नहीं छोड़ा.मगर, नए भारतीय विश्वविद्यालयों की जो स्थापना हुई, जो व्यवस्था बहाल हुई उसके भी अब अस्थि-पंजर ही रह गए हैं.

जहां बीस-बाइस लोगों की व्यवस्था थी वहां दो-तीन प्रोफ़ेसर और लेक्चरर ही रह गए हैं.वाइस चांसलर जाति और क्षेत्र के आधार पर पदों पर आसीन होते हैं.

लाइब्रेरी सूनी है.विज्ञान की प्रयोगशालाओं में काम नहीं हो रहा है क्योंकि उनमें ज़रूरी फंड नहीं पहुंचते.

युनिवर्सिटी में सालों से करियर एडवांसमेंट यानि, तरक्की के लिए इंटरव्यू तक नहीं हुए हैं.

एपीआइ प्रणाली लागू कर रिसर्च या शोधों की गुणवत्ता ख़त्म कर दी गई है.नक़ली जरनल, नक़ली इंटरनेशल और वीकली पब्लिकेशन आ गए हैं क्योंकि अंग्रेजी मॉडल उतारना है.

दुर्भाग्य देखिए कि कभी अकादमिक चमक रखने वाले संस्थान आज सिर्फ़ प्रशासनिक ईकाई बनकर रह गए हैं वहीं, इनका अकादमिक ढांचा उत्साहहीन अध्यापन और डिग्रियां बांटने तक सीमित होकर रह गया है.

क्या यह सब ठीक नहीं हो सकता? या इसे भी विदेशी विश्वविद्यालय ही सुधारेंगें?

हमें स्मरण होना चाहिए कि नालंदा और तक्षशिला बनाने के लिए ग्रीक दार्शनिक नहीं आए थे, उनमें आचार्य हमारे भारत के ही थे.पढ़ने के लिए लोग बाहर से आते थे.

आज क्यों अपने आचार्य बनाते हम अपनी प्रणाली में अपने तरीक़े से?

हमारे शिक्षकों-साहित्याविदों का स्पष्ट कहना है कि जितनी अच्छी शिक्षा होगी जीवन स्तर उतना ही बेहतर होगा, और व्यक्ति उतना ही जीवन में सफल होगा.

मगर, हमारे यहां भी अच्छा काम अच्छे विश्वविद्यालयों में हो रहा है.

ख़ुद को कम आंकने वालों को यह ज्ञात होना चाहिए कि अमरीका की सिलिकन वैली उन्हीं लोगों से भरी है, जिन्होंने हिंदुस्तान में आइआइटी किया है, यहां से आइआइएम किया है.

दुनिया के टॉप 10 कंपनियों के सीईओ को जांच लें वे भी भारत के ही आइआइटी ग्रेजुएट हैं.

बाहर का शिक्षक इतना बड़ा विद्वान होता, तो इंग्लैंड और अमरीका के अंदर हमारे शिक्षक नहीं पढ़ा रहे होते.

आज अंग्रेजी भाषा तक पढ़ाने के लिए इंग्लैंड भारत से शिक्षक मंगाता है क्योंकि उनकी भाषा बिगड़ (स्लैंग हो चुकी) चुकी है.

हमारे विश्वविद्यालय भी फिर से शीर्ष पर पहुंच सकते हैं.हमारे शिक्षक भी आदर्श बन सकते हैं अगर उन्हें अच्छे अवसर और अच्छी तनख्वाह मिलेगी.

हमारे देश की जैसी और इतनी स्किल्ड एजुकेशन या कौशल शिक्षा दुनिया में कहीं और नहीं थी जब हम अपने पैरों पर खड़े थे.

आज भी बहुत कुछ है हमारे पास.1100 से ज़्यादा विश्वविद्यालय हैं, और 42 हज़ार कॉलेजों में 35 करोड़ विद्यार्थी पढ़ते हैं.इतनी तो अमरीका की आबादी है.

आज विश्वप्रसिद्ध विश्वविद्यालयों की पाठ्यक्रम सामग्री सहजता से उपलब्ध है.उनसे तुलना कर अपने आधुनिक ज्ञान-कोष (नॉलेज कॉर्पस) को नई दुनिया के हिसाब से उचाईयों तक ले जा सकते हैं.

मगर, इसके लिए विश्वविद्यालयों और उनके कॉलेजों को सख्त कानूनों के जरिये थोड़ी स्वायत्तता भी देनी ज़रूरी है जिससे कि वे पाठ्यक्रम की जकड़न से दूर वैश्विक ज्ञान को सरल और तीव्र गति से आत्मसात करते हुए ऐसी पीढ़ी को तैयार करें, जो विकसित देशों के संस्थाओं को भी मात दे सकें.

ऐसा ही कुछ राज्यों के विश्वविद्यालयों के लिए भी करने या क़दम उठाने की ज़रूरत है जिससे कि छात्रों को सिर्फ़ पढ़ाई के लिए ही महानगरों का रुख न करना पड़े.यही सही मायने में विकेंद्रीकरण होगा.

भारतीय भाषाओं और शिक्षा के भारतीयकरण का क्या होगा?

एक तरफ़ तो सरकार भारतीय भाषाओं के संरक्षण-संवर्धन की बात करती है, राष्ट्रभाषा हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में इंजीनियरिंग और मेडिकल जैसी प्रवेश परीक्षाएं आयोजित करने के लिए अंग्रेजी की अनिवार्यता को ख़त्म करने की पहल करती है तो दूसरी तरफ़ अपने विश्वविद्यालयों की बगल में विशेष सुविधाओं-रियायतों के साथ विदेशी शैक्षणिक संस्थानों के परिसर खोलने की भी अनुमति देती है.अज़ीब तमाशा है यह.

तमाशा न कहें तो क्या कहें? ख़ुद सरकार के लोग इसे आईपीएल का मैच बता रहे हैं.संसद टीवी पर चर्चा के दौरान शिक्षा नीति आयोग के उपाध्यक्ष हर्षित मिश्रा कहते हैं-

इसको (विदेशी विश्वविद्यालयों को) ऐसा समझिए कि आईपीएल के मैच चल रहे हैं, जिनमें घरेलू खिलाड़ी भी हैं और विदेशी भी हैं.हमारे रूल, हमारे रेगुलेशन और हमारी फ्रेंचाइजी की शर्तों पर खेल रहे हैं.वे अच्छा कर रहे हैं और हम भी अच्छा खेल रहे हैं.इसमें प्रतिस्पर्धा निर्मित हो रही है.

इसमें रिंकू सिंह, धोनी और विराट कोहली हैं तो दूसरी तरफ़ बेन स्टोक्स, कैमरून ग्रीन, सैम कर्रन और हैरी ब्रूक भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं.

मैदान हमारा है, दर्शक भी हमारे हैं, और फ़ायदा भी ‘इंडियन इको सिस्टम’ को मिलेगा बगैर कुछ ज़्यादा खर्चा किए…यह कुछ इस तरह से है.

बहरहाल, मसला अंग्रेजी का है.अंग्रेजी पर ज़ोर की वज़ह से ही भारत में शिक्षा का स्तर लगातार गिरता गया.और यह निश्चित है कि विदेशी विश्वविद्यालयों की शुरुआत से अंग्रेजी की दौड़ और तेज होगी.ऐसे में, शिक्षा, शोध, प्रशासन और न्यायलय में जो भारतीय भाषाओं में लोगों को उनके हक़ दिलाने की बात है वह बेमानी हो जाएगी.

इसके लिए समाज और सरकार, दोनों बहुत गंभीरता से सोचने की ज़रूरत है.

मगर, उस सरकार को क्या कहें, जिसके इरादे ही कुछ और हैं.शिक्षा नीति आयोग के उपाध्यक्ष हर्षित मिश्रा के मुताबिक़, मोदी सरकार तो राष्ट्रीय शिक्षा नीति को बाइबल का रूप देना चाहती है.उनका (यह भी) कहना है-

हमारी शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार के बहुत सारे प्रयास चल रहे हैं, ताकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति भारतीय पारिस्थितिकी तंत्र की बाइबल बने.

यानि, कार्य तो दिखाई दे ही रहे हैं सरकार की मंशा भी बहुत स्पष्ट है.ऐसे में, पश्चिमीकरण और बढ़ेगा.यह बढ़ता ही जाएगा, और भारतीय भाषाओं और शिक्षा के भारतीयकरण का सपना पूरा नहीं हो पायेगा.

विदेशों में पढ़ाई, प्रतिभा पलायन और आर्थिक नुकसान के आंकड़ों में सच्चाई?

सरकार की दलील है कि बड़ी संख्या में भारतीय छात्र विदेश पढ़ाई के लिए जा रहे हैं.इससे प्रतिभा पलायन के हालात बनते हैं.साथ ही, बड़ा आर्थिक नुकसान भी झेलना पड़ रहा है.यह छात्रों के लिए भी समस्या है क्योंकि विदेशों में पढ़ाई भारत के मुकाबले पांच से दस गुना महंगी है.

इसको लेकर आंकड़े बताये गए हैं.

2022 में 7.50 लाख छात्रों ने विदेश का रुख किया.

वर्तमान में 12 लाख भारतीय छात्र विदेशों में पढ़ाई कर रहे हैं.

आज हर दिन औसतन 2, 055 छात्र पढ़ाई के लिए विदेश जा रहे हैं.

2024 तक इनकी (विदेश जाने वाले छात्रों की) संख्या 18 लाख हो जाएगी, जिन पर क़रीब 8 अरब डॉलर ख़र्च होने का अनुमान है.

मगर, अपने देश में ही विदेशी विश्वविद्यालय खुल जाएं, तो कई प्रकार के अच्छे परिणाम आएंगें, और परिस्थितियां बदल सकती हैं.इसके लाभ भी बताये गए हैं.

मनचाहे शैक्षणिक संस्थानों के अवसर देश में ही मिल जाएं, तो प्रतिभा पलायन घटेगा.

विदेशों में पढ़ाई के लिए लगने वाला पैसा भी बचेगा.

दुनिया की सर्वश्रेष्ठ शिक्षा पद्धतियां भारत में शुरू हो पाएंगीं.

विदेशी विश्वविद्यालयों के भारत में खुलने से पड़ोसी देशों को इसका सीधे तौर पर लाभ होगा.

मगर, सवाल यह है कि सभी छात्र क्या अच्छी शिक्षा के लिए विदेश जा रहे हैं? उनके आंकड़े कहां हैं, जो ऑस्ट्रेलिया में सिर्फ़ रीजेंसी कार्ड लेने के लिए बुजुर्गों का इलाज करने वाले छोटे से कोर्स करने जाते हैं?

सरकारी दलीलों में उनकी कोई चर्चा नहीं है, जो ग्रीन कार्ड लेने के लिए अमरीका जाकर रहना चाहते हैं, और यहां से पलायन कर जाते हैं.

उनको क्या कहेंगें, जो पढ़ाई के नाम पर दूसरे देशों में पहुंचकर उनके द्वारा चलाए जा रहे विशेष कार्यक्रमों में शामिल होकर उनकी आबादी का हिस्सा बनने की जुगत में रहते हैं?

दरअसल, तस्वीर वैसी नहीं है जैसी बताई-दिखाई जा रही है.

सच्चाई यह है कि भारतीय प्रतिभाशाली छात्र पहले अपने यहां आइआइटी में बैठता है, आइआइएम, अहमदाबाद में जाता है, और वह इंग्लैंड के मैनेजमेंट स्कूल में नहीं जाता है.

बाहर जाने वाले ज़्यादातर छात्र वे हैं, जिन्हें हमारे शैक्षिक स्तर के हिसाब से या यूं कहिए कि अपनी मेरिट पर यहां दाखिला नहीं मिल पाता है.

इनमें ज़्यादातर रईस परिवारों के हैं, या फिर उच्च-माध्यम वर्ग के वे युवा हैं, जो किसी भी प्रकार से अपने सपने पूरे करने की उच्च कामना रखते हैं.

हक़ीक़त जांचनी हो तो युक्रेन के कॉलेजों से लौटे भारतीय छात्रों को भारत में मेडिकल की टेस्ट में बिठा दीजिये, अधिकतर (90 फ़ीसदी से ऊपर) छात्र फेल हो जाएंगें.

हम यह भूल गए हैं कि क्यों कुछ भारतीय छात्र युक्रेन (रूस-युक्रेन युद्ध की शुरुआत में जब भारतीय छात्रों को बचाकर वापस लाने के लिए ख़ास ऑपरेशन चलाया गया था) से लौटना ही नहीं चाहते थे.ख़बरों के मुताबिक़, इनमें से कई तो वहां पड़ोसी देशों में बतौर शरणार्थी बस जाने के जुगाड़ में थे.

ऐसे छात्रों को क्या कहेंगें? क्या इसे भी ब्रेन ड्रेन या प्रतिभा पलायन की श्रेणी में रखा जाएगा? ज़ाहिर है कि नहीं.इसलिए यह कहना ग़लत है कि विदेशी विश्वविद्यालयों के आने से ब्रेन ड्रेन रुकेगा.

ब्रेन ड्रेन वास्तव में शिक्षा लेने के लिए नहीं होता है.विदेशों में शिक्षा ली जाती है, ताकि वहीं पर रहकर नौकरी या व्यवसाय करके पैसा कमाया जाए.इसको कैसे रोकेंगें?

दरअसल, हालात ही कुछ और हैं.भारत में अकादमिक माहौल बड़ा अज़ीब हो चुका है.दाख़िला और नौकरी छोड़िए, केवल एक सेमिनार के लिए बुलावा आ जाए और किराया मिल जाए, तो हमारे लोग वहां दौड़कर जाते हैं.देश के खिलाफ़ बोलते हैं.

दूसरा सवाल यह है कि विदेशी विश्वविद्यालय भारत में क्या दान-धर्म के लिए आ रहे हैं? नहीं.यहां बहुत बड़ा बाज़ार उन्हें मिल रहा है, जहां उनकी पांचों उंगलियां घी में होंगीं.

समझ लीजिए कि दुधारू गाय को दूहने का अवसर है, जिसे वे हाथोंहाथ लपक लेने को तैयार खड़े हैं.

सरकार ने भी दिल दरिया कर दिया है.विदेशी विश्वविद्यालयों को न सिर्फ़ दाख़िला, फ़ीस, पाठ्यक्रम और शिक्षकों की नियुक्ति जैसे सभी क्षेत्रों में पूरी आज़ादी मिल गई है, बल्कि सबसे बड़ी यह छूट भी मिल गई है कि अपने मुनाफ़े को वे अपने मूल देश में भेज सकते हैं.

यानि, डॉलरों, पाउंडों और यूरो के रूप में धन फेमा कानून की शर्तों का पालन करते हुए वे अपने देश ले जाएंगें.तब क्या देश का पैसा विदेश नहीं जाएगा?

विदेशी विश्वविद्यालयों की सोच से क्या परिचित नहीं हैं हम?

अनजाने में कुछ हो जाए, तो उसे ग़लती कहते हैं.मगर, जान-समझकर भी ऐसे क़दम उठाए जाएं जो अहितकारी हों, तो इसे स्वजन-विरोधी या देशविरोधी कार्य कहलाता है.ऐसा ही कुछ भारत में हो रहा है.

दुनियाभर की लंबी चर्चा करने के बजाय केवल ऑक्सफ़ोर्ड और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालयों की ओर नज़र डालें तो सब कुछ समझ आ जाता है.बड़ी ही नकारात्मक सोच रखते हैं ये विश्वविद्यालय भारत के बारे में.भारत विरोध इनका एजेंडा है.अज़ीबोगरीब और आपत्तिजनक भाषण तो आयोजित करवाए जाते ही हैं, भारत समर्थकों को यूनियन तक में खड़ा नहीं होने दिया जाता है चुनावों में यहां.

पाणिनि की अष्टाध्यायी पर शोध को ही देखिए कि किस तरह कैम्ब्रिज युनिवर्सिटी ने एक भारतीय छात्र को खड़ा कर ढाई हज़ार साल पुरानी परंपरा को झूठलाने का असफल प्रयास किया और अपनी किरकिरी होते देख भी लजाये नहीं!

इनके यहां लगे नक्शों (मानचित्र) को देखिए.पाक अधिकृत कश्मीर और चीन द्वारा भारत के कब्जाए गए हिस्सों को पाकिस्तान और चीन का हिस्सा बताते हैं.क्यों? इसलिए कि भारत विरोधी विचार ही इनके मनोमस्तिष्क में रचा-बसा है.

अब भी हमें ये ग़ुलाम ही मानते हैं और हमारी क़ाबिलियत को अपनी कार्बन कॉपी बताते हैं.

यह हमारे ब्यूरोक्रेट या नौकरशाह नहीं समझते मगर, हमारे राजनेता तो भलीभांति जानते-समझते हैं कि विदेशी कभी हमारे सांस्कृतिक मूल्यों, देश की अखंडता, संप्रभुता और शक्ति का आदर करने वाले नहीं हैं.बावजूद इसके, इन्हें बुलाया और सिर पर बिठाया जा रहा है!

कैसे समझाया जाए कि विदेशी विश्वविद्यालयों के बिना हम दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकते हैं तो पहली अर्थव्यवस्था भी बन सकते हैं.

वैधानिक प्रक्रिया के बजाय रेगुलेशन के ज़रिए हो रहा है बदलाव?

महत्वपूर्ण और नीतिगत कार्यों में पारदर्शिता होनी चाहिए.इसके लिए ज़रूरी है कि सभी विषय-वस्तु सदन के पटल पर रखे जाएं, ताकि बहस के ज़रिए गुण-दोषों का पता लगाकर एक आम राय के रूप में निर्णय तक पहुंचा जा सके.मगर, सरकार ने अलग ही तरीक़ा अपनाया है, जिससे झूठ दबा रहे, और मुद्दा न बन सके.

ज्ञात हो कि विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में लाने का काम रेगुलेशन के ज़रिए हो रहा है, जबकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में विधायी ढ़ांचे के ज़रिए दुनिया की 100 ग्लोबल उनिवार्सिटी को भारत में शिक्षा मुहैया कराने की अनुमति व सुविधा देने की बात कही गई है.

यहां तक कि यूजीसी के मसौदा (प्रारूप) नियमों में एनईपी (नेशनल एजुकेशन पॉलिसी) का ध्यान नहीं रखा गया है.ऐसे में, हम विदेशी संस्थानों की जवाबदेही कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं? जब वे भारतीय शिक्षा प्रणाली की ख़ास बातों और मुद्दों को समझ ही नहीं पाएंगें तो उनका ख़याल कैसे रखेंगें, उनके प्रति सावधानी कैसे बरतेंगें?

विदेशी विश्वविद्यालयों को लाना क्या हमारी बाध्यता है?

मोदी सरकार का हाल तो देखिए कि एक ओर जहां कुशल नेतृत्व और मजबूत सरकार के दावे किए जाते हैं वहीं, अप्रत्यक्ष रूप से यह भी स्वीकारना पड़ रहा है कि विदेशी विश्वविद्यालयों को रोकना इनके बूते की बात नहीं है.डब्ल्यूटीओ की बात की जा रही है और याद दिलाया जा रहा है कि हमने गैट साइन किया है.

ज्ञात हो कि डब्ल्यूटीओ (विश्व व्यापार संगठन) को लेकर उरुग्वे राउंड (उरुग्वे दौर- 1986-93) के आख़िर में दुनिया के 123 सदस्य देशों ने गैट (टैरिफ एंड ट्रेड यानि, प्रशुल्क एवं व्यापार संबंधी सामान्य समझौते) पर हस्ताक्षर किए थे.भारत भी उन्हीं में से एक है.

अब चूंकि भारत भी इसका सिग्नेटरी यानि, हस्ताक्षरकर्ता देश है इसलिए यह अनुबंधों में शामिल व्यापार, निवेश, श्रम व पर्यावरणीय मानकों के साथ-साथ बौद्धिक संपदा के अधिकार के मामलों में डब्ल्यूटीओ की नीतियों के हिसाब से चलने के लिए बाध्य है, ऐसा कहा जा रहा है.

मगर, यह पूरा सच नहीं है.वास्तविकता यह है कि अनुबंधों पर हस्ताक्षरकर्ता होते हुए भी भारत और कई अन्य विकासशील देश अपनी प्रभुत्व संपन्न स्थिति का दावा करते हैं और विदेशी निवेशकों और ऋणदाताओं के आगे झुकने तथा उनकी अनुचित शर्तों को मानने के बजाय अपने विवेक का प्रयोग करते हैं.

यह माना जाता है कि राष्ट्रहित पहले है, और इससे समझौता नहीं किया जा सकता है.

2014 से पहले भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों को लेकर विधेयक (विदेशी विश्वविद्यालय विधेयक) लाकर कड़े प्रावधान करने की कोशिश चल रही थी मगर, 2012-13 में इसे ठंडे बसते में डाल दिया गया था.

तब से क़रीब 6 सालों तक इस ओर देखा नहीं गया.

मगर फिर, इसे समय का फेर कहिए या दुर्भाग्य, विदेशी विश्वविद्यालय जो कल तक बीजेपी को फूटी आंखों नहीं सुहाते थे उन्हीं में अब भारत की अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी नज़र आ रही है.

कहते हैं कि जो इतिहास से सबक नहीं लेता वह इतिहास बन जाता है.मगर, यह बहुत पुरानी बात भी तो नहीं है.अभी 8 दशक भी पूरे नहीं हुए हैं आज़ाद भारत के कि फिर से हम उल्टी दिशा में चलने लगे हैं.वही ग़लतियां दुहरा रहे हैं, जिन्हें भयंकर भूल की संज्ञा दी गई है.

जिसको लिख-लिखकर अनगिनत लोग मर-खप चुके हैं उसी को झूठलाने का प्रयास चल रहा है.विकास के नाम पर.बर्बादी की क़ीमत पर.

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रामाशंकर पांडेय

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