बाबा बाज़ार

साईं बाबा अफ़ग़ानिस्तान के पिंडारी लुटेरे थे?

ब्राह्मण और अवतारी पुरुष बनाम ज़िहादी मुसलमान पर बहस के बीच भोले-भाले श्रद्धालु और भक्त पिस रहे हैं.....

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दान-दक्षिणा और चढ़ावे जब लालच के चरम को छूते हैं तो व्यापारिक रूप धरते हैं. फ़िर क्या चेले और क्या गुरू, सब एक ही रंग में रंगे नज़र आते हैं. बाज़ीग़र यहाँ खुले में नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे से खेल खेलता है और प्रायोजित चेहरे आस्था और विश्वास को रौंदते चले जाते हैं. शिरडी के साईं बाबा को लेकर मचा घमासान भी कुछ ऐसे ही दृश्य पेश कर रहा है. दरअसल, साईं बाबा जबतक सिर्फ़ बाबा थे, फ़क़ीर थे तब तक कोई विवाद न था. मग़र कबतक? व्यापार तो व्यापार होता है. वह नित नए उत्पाद पेश करता है, या फिर पुराने उत्पाद को ही नए और ऐसे रूप में पेश करता है जो ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा दिला सके. इसी मक़सद से साईं के ठेकेदारों ने साईं को पहले तो फ़क़ीरी से उठाकर सनातन के शिखर पर स्थित ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समकक्ष दिखाने की धृष्टता की, फिर,  जो साईं कभी मंदिर की सीढ़ियां नहीं चढ़े, मंदिरों में उन की प्राण-प्रतिष्ठा करने लगे. ऐसे में, बवाल तय था और हुआ भी. तलवारें खिंच गईं- विरोध और समर्थन में. हालात ऐसे हैं कि कल तक बेदाग़ और हमदर्द समझा जाने वाले साईं आज दाग़दार और कट्टर बताये जाने लगे हैं. समर्थक साईं को जहाँ हिन्दू साबित करने की कोशिश में हैं वहीं, विरोधी उन्हें अफ़ग़ानिस्तान से आया एक पिंडारी लुटेरा बता रहे हैं.
 
 
यह विडंबना ही है कि ब्राह्मण और अवतारी पुरुष बनाम ज़िहादी मुसलमान पर बहस के बीच श्रद्धालु पिस रहे हैं. दूसरी तरफ़, साईं पर चल रहे नित नए शोध और प्रचार पर जितना धन और ऊर्जा खप रही है उसका एक छोटा-सा हिस्सा भी यदि विज्ञान और तकनीक पर ख़र्च हो जाए तो रोजी-रोज़गार के नए आयाम स्थापित होंगें, और विकास को रफ़्तार मिलेगी. मगर ऐसी सोच है कहाँ? पंगे से फुरसत मिले तब न? इसलिए, मसले को गहराई से समझने की ज़रूरत है, ताकि सच और झूठ का पता लगाया जा सके.
 
 

साईं समर्थकों के दावे 

साईं समर्थक ये दावा करते हैं कि साईं का जन्म 28 सितम्बर 1835 में पाथरी गाँव के कश्यप गोत्र के यजुर्वेदी ब्राह्मण परिवार में हुआ था जिसे भूसारी परिवार के नाम से जाना जाता था.साईं का असली नाम था हरिबाबू भूसारी.साईं के इस तथाकथित गाँव में एक मंदिर बना हुआ है, जिसमें उनकी मूर्ति तथा कुछ अन्य चीज़ें भी रखी हुई है.मग़र तार्किक दृष्टि से यदि अवलोकन करें तो साईं का तथाकथित असली नाम,उनका परिवार, गाँव और मंदिर आदि सबकुछ योजनाबद्द रूप में स्थापित किए गए साफ़ दिखाई देते हैं.कड़ियाँ जोड़कर एक कहानी गढ़ी गई है.एक ज़ाल बुनने की एक नाकाम कोशिश हुई है.दावे स्वतः फ़र्ज़ी साबित हो जाते हैं.

 


साईं बाबा के कथित पाथरी गांव में उनका जन्मस्थान (प्रतीकात्मक चित्र) 

 

 

जन्म की तारीख़ और वर्ष स्पष्ट नहीं 

साईं के जन्म की तारीख़ और साल के सवाल पर लेखक-विचारक एकमत नहीं हैं.कोई उनका जन्म 27 सितम्बर 1830 बताता है तो कोई 28 सितंबर 1835 को उनकी पैदाइश का दावा करता है.इनसे अलग़ कुछ ऐसे भी हैं जो उनकी जन्मतिथि 27 सितम्बर 1838 बताते हैं.अलग-अलग दावे, अलग-अलग तर्क और आधार.

 


साईं का सच, लुटेरे की औलाद, हिंदुओं के खिलाफ
साईं के जन्म-मृत्यु काल की उपलब्ध जानकारी 

      

 

 

साईं के माता-पिता के कई नाम 

जिस प्रकार बाइबल में यीशु के दादा का नाम कहीं एली तो कहीं याक़ूब बताया गया है ठीक उसी प्रकार अलग़-अलग़ लेखकों ने साईं के माता-पिता के अलग़-अलग़ नाम बताए हैं.मसलन साईं के पिता का नाम किसी ने गोविन्द भाऊ बताया है तो किसी ने भगवंत राव.अलग-अलग नाम के साथ अलग-अलग विवरण हैं.लेकिन एक बात समान है और वो ये है कि उक्त सभी लेखक या तो साईं के भक्त रहे हैं या फ़िर साईं ट्रस्ट से जुड़े और लाभार्थी रहे हैं.जो भी हो,मग़र पिता तो एक ही होता है.


साईं की माता के भी तीन नाम-देवकी, देवगिरि और अनुसुइया आदि बताए गए हैं,जो भ्रमित करते हैं और विश्वसनीय नहीं माने जा सकते.लगता है कि लेखकों का आपस में तालमेल नहीं रहा होगा.
 


साईं का सच, लुटेरे की औलाद, हिंदुओं के खिलाफ
साईं के असली माता-पिता पर सवाल का प्रतीकात्मक फ़ोटो 

 

 

विवादों में पाथरी गाँव 

पाथरी गांव को साईं की जन्मस्थली बताया गया है.मगर कौन-सी पाथरी? महाराष्ट्र वाली या फिर आंध्रप्रदेश वाली, साईं की असली जन्मस्थली है? यह शोध का विषय है.

 
दरअसल, पाथरी नामक गांव महाराष्ट्र में भी है और आंध्रप्रदेश में भी.कुछ साईं समर्थक महाराष्ट्र की पाथरी को ही साईं का असली जन्मस्थल मानते हैं, जबकि दूसरे, आंध्रप्रदेश वाली पाथरी के साईं का असली गांव होने का दावा करते हैं.ऐसा जान पड़ता है कि जानबूझकर ऐसे गाँव का चुनाव किया गया है, ताकि इसको लेकर भ्रम बना रहे और प्रामाणिकता की जांच ना हो सके.साथ ही, ये कोशिश है कि मज़बूरन लोग,उसी गाँव को सर्वमान्य गाँव मान लें, जिसे योजनाबद्द रूप में स्थापित किया गया है.
 
 

  

साईं का सच, लुटेरे की औलाद, हिंदुओं के खिलाफ
साईं का कथित पैतृक पाथरी गाँव

         

 

साईं समर्थकों के दावे का आधार 

साईं समर्थकों के दावे के स्रोत अथवा आधार ‘सद्गुरु साईं दर्शन’ के लेखक शशिकांत शांताराम गड़करी,’कलियुग में साईं अवतार’ के लेखक काशीराम और अनुवादक प्रोफ़ेसर मेलूकोटे के श्रीधर हैं.ये कौन हैं ? दरअसल,ये तीनों या तो साईं भक्त हैं या फ़िर साईं ट्रस्ट जुड़े और लाभार्थी लोग हैं जिन्हें स्वतंत्र एवं निष्पक्ष लेखक-विचारक नहीं माना जा सकता.अपने तो आख़िर अपने ही होते हैं.

 


साईं का सच, लुटेरे की औलाद, हिंदुओं के खिलाफ
शांताराम गड़करी लिखित सद्गुरू साईं दर्शन 

 

 

साईं विरोधियों के दावे 

विरोधी ये दावा करते हैं कि बाबा यानि संत अथवा फ़क़ीर के नाम से जाना जाने वाला शिरडी का साईं यानि प्रसिद्ध साईं बाबा दरअसल, कोई बाबा नहीं बल्कि एक अफ़ग़ानी पिंडारी लुटेरा था.उसका असली नाम था चाँद मियां.बहरूद्दीन का बेटा.वही बहरुद्दीन, अफ़ग़ानी पिंडारी लुटेरों के एक क़बीले का कुख्यात सरदार, जिसने झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को हराने में अंग्रेज़ों की मदद की थी.

 
दरअसल,औरंगज़ेब की मौत के बाद मुग़लिया सल्तनत अपनी अंतिम साँसें गिन रही थी और मराठा योद्धाओं ने हिन्दू साम्राज्य की बुनियाद तक़रीबन रख दी थी.ऐसे में, भारत के कट्टर मुसलमानों ने जहां हिन्दुओं के ख़िलाफ़ ज़िहाद छेड़ रखा था, वहीँ तक़रीबन ख़त्म हो चुके अफ़ग़ानी पिंडारी अपनी गुज़र-बसर के लिए संघर्षरत थे.कुछ पिंडारी जहां बतौर सैनिक विभिन्न रियासतों में अपनी बहादुरी और वफ़ादारी की मिसालें क़ायम कर रहे थे,वहीं, कुछ दूसरे, ज़िहादियों की शह पर उनके संरक्षण में भेष बदलकर महाराष्ट्र और आसपास के राज्यों के हिन्दू इलाक़ों में चोरी-चकारी और डाकाजनी करते थे.ऐसा भी कहा जाता है कि ये हिन्दू महिलाओं को निशाना बनाकर उनका अपहरण व बलात्कार करते थे.
 


साईं का सच, लुटेरे की औलाद, हिंदुओं के खिलाफ
अफ़ग़ानिस्तान के पिंडारी लुटेरे 

        

 
 
बहरुद्दीन जैसे कुछ पिंडारी लुटेरे सरदार अंग्रेज़ों से भी मिले हुए थे तथा वे उनके लिए काम करते थे.अग्रेज़ों के इशारे पर वो ज़ासूसी के साथ भीतरघात को भी अंज़ाम देने लगे थे.झाँसी की ऐतिहासिक मिसाल सामने है.अंग्रेज़ों के साथ संघर्ष के दौरान झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की सेना में शामिल 500 अफग़ानी पिंडारी सैनिकों में बहरुद्दीन व कुछ अन्य लुटेरे जो पहले ही अंग्रेज़ों व जयाजीराव सिंधिया द्वारा रची गई साज़िश में शामिल थे, उन्होंने धोख़ा दिया और ज़ंग के मैदान से रानी जिस रास्ते निकली थीं, वो रास्ता अंग्रेज़ों को बता दिया.अंत में पीछा करने वाले अंग्रेज़ों के साथ पांच पिंडारी भी थे.
 


साईं का सच, लुटेरे की औलाद, हिंदुओं के खिलाफ
स्वर्णरेखा नदी के समीप स्थान जहाँ लक्ष्मीबाई शहीद हुईं 



 
बाद में, दगाबाज़ पिंडारियों को झाँसी छोड़कर अन्यत्र जगह-जगह छुपना पड़ा.बहरुद्दीन महाराष्ट्र के अहमदनगर पहुंचा और एक तवायफ़ के घर रहने लगा.उस तवायफ़ से एक बेटी नाज़नीन तथा बेटा चाँद पैदा हुए.फ़िर, बहरूद्दीन नाज़नीन को उसकी माँ के पास ही छोड़ चाँद को लेकर अफ़ग़ानिस्तान चला गया और वहां उसे ज़िहाद की शिक्षा दी, लूटपाट के गुर सिखाए और वापस फ़िर भारत लाकर भिखारियों के बीच छोड़ गया.नन्हा चाँद,अब यहाँ भिखारियों के रूप में पिंडारी लुटेरों का मुख़बिर था.
 


साईं का सच, लुटेरे की औलाद, हिंदुओं के खिलाफ
चाँद मियां, उसके माता-पिता व जन्म-मृत्यु काल



 
 
बताते हैं कि चाँद हरे रंग की चादर फ़ैलाकर दिनभर भीख़ मांगने की आड़ में मालदार हिन्दू घरों की निशानदेही करता था और शाम को उसी चादर के नीचे सन्देश लिखा कपड़ा सिलवाकर अफ़ग़ानिस्तान पिंडारियों को भिजवा दिया करता था.उसी सूचना के आधार पर पिंडारी लुटेरे आते और लूटपाट कर छिपने के लिए फिर वापस अफ़ग़ानिस्तान सीमा में घुस जाते.ये सिलसिला चलता रहा.

अँगरेज़ हरी चादर वाले भिखारियों को ‘चादर वाले भिखारी’ (ब्लेंकिट बैगर) कहते थे.
 
एक बार, अहमदनगर में उन्होंने चाँद की चादर पकड़ ली.जब उसपर लिखी गुप्त सूचनाओं को भी जाना तो वो चौंक गए.चाँद को गिरफ़्तार कर ज़ेल भेज दिया.यहाँ पहली बार उसकी फ़ोटो ली गई थी.
 


साईं का सच, लुटेरे की औलाद, हिंदुओं के खिलाफ
चादर की छानबीन का प्रतीकात्मक फ़ोटो 



 
 
आठ साल बाद चाँद मियां ज़ेल से बाहर आया और एक बारात के ज़रिए शिरडी पहुंचा.यहाँ वह सुलेमानी मुसलमानों से मिला जो हिन्दुओं के बीच रहकर चुपचाप इस्लाम को बढ़ावा देते थे.यहीं भावी रणनीति तैयार हुई और वह बारात के साथ फिर अपने वतन वापस चला गया.

कुछ दिनों बाद चाँद मियां फ़िर शिरडी वापस आया और यहीं उसने अल-तक़िया का ज्ञान लिया.फ़क़ीर का रूप धरा और सुलेमानी मुसलमानों की मदद से सालों से वीरान पड़ी एक मस्ज़िद को अपना ठिकाना बना जानबूझकर उसका हिन्दू नाम रखा द्वारकामाई.गाँव में एक विवाह समारोह के अवसर पर, एक मंदिर के पुजारी म्हालसापति ने चाँद मियां को ‘आओ साईं’ कहकर बुलाया और तब से वह ‘साईं’ के नाम से जाना जाने लगा.
 


साईं का सच, लुटेरे की औलाद, हिंदुओं के खिलाफ
वो मस्ज़िद जिसे चाँद मियां ने द्वारकामाई नाम दिया 

 

 
 
दरअसल,एक सुनियोजित साज़िश के तहत चाँद मियां को करिश्माई फ़क़ीर के रूप में प्रचारित किया गया और गंवार हिन्दू जनता उसके झांसे में आने लगी.उनमें ज़्यादातर महिलाएं थीं.वह टोने-टोटके और हक़ीमी करके अपना प्रभाव क़ायम करने लगा.धीरे-धीरे मंडलियां तैयार कर उसका प्रचार-प्रसार मुंबई में भी किया गया जिससे अमीर लोगों का भी वहां आना-जाना शुरू हुआ.
 


साईं का सच, लुटेरे की औलाद, हिंदुओं के खिलाफ
साईं का गुणगान करने वाली प्रचार मंडली 

    

 
 
विरोधी साईं के बुर्क़े वाले फ़ोटो के संदर्भ में एक घटना का ज़िक्र करते हैं.वे बताते हैं कि एक पंडित ने अपने बेटे को शिक्षा दिलवाने के लिए साईं के हवाले कर दिया था.साईं ने उसका ख़तना कर दिया.पंडित को जब ये पता चला तो उसने इसकी शिकायत कोतवाली में कर दी.साईं को पकड़ने जब एक पुलिस वाला वहां पहुंचा तो साईं ने लोगों से उसे मार भगाने को कहा, जिसकी चर्चा साईं सच्चरित्र में है.साथ ही, उस वक़्त समर्थकों की भीड़ का फायदा उठाते हुए बुर्क़े में छुपकर भाग रहे साईं का पुलिसवाले ने फ़ोटो खींच लिया.साईं का बुर्क़ा पहने फ़ोटो उसी दौरान का बताया जाता है.
 


साईं का सच, लुटेरे की औलाद, हिंदुओं के खिलाफ
पुलिस से भागते साईं की बुर्क़े वाली फ़ोटो 

 

साईं विरोधियों के दावों का विश्लेषण  

हम देखते हैं कि साईं विरोधियों ने साईं की पहचान,चरित्र और राष्ट्रीयता पर विभिन्न दावे किए हैं तथा सम्बंधित दलीलें पेश की हैं.इतिहास का हवाला दिया है, जबकि इतिहास में कहीं इस प्रकार का ज़िक्र नहीं मिलता है.इतिहास में, हमें ना कहीं बहरुद्दीन मिलता है और ना ही कहीं चाँद मियां.ऐसा क्यों?

 
परन्तु,उपरोक्त सारी बातें क्या हवा में कही गई हैं? शायद नहीं.कहानियां और उनका सन्दर्भ अध्ययन करने पर लगता है मानो वे किवदंतियां हों.साथ ही, हम सभी ये जानते हैं कि सभी किवदंतियां भी सभी लोककथाओं की तरह झूठी नहीं होतीं.ऐसे में, ये ज़रूरी हो जाता है कि उन तमाम दलीलों का परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर विश्लेषण हो, ताकि सच उजागर हो और भ्रम की स्थिति समाप्त हो जाए.यहां उन मुख्य बिन्दुओं पर चर्चा आवश्यक है, जो दावे के आधार हैं.   

 

पिंडारी लुटेरे बहरूद्दीन की कहानी 

सन 1689 से लेकर 1818 तक पिंडारी भारत में भाड़े के सैनिक व लुटेरों के रूप में निर्बाध रूप में सक्रिय रहे थे.मग़र बहरूद्दीन नामक पिंडारी जिसका सम्बन्ध महाराष्ट्र आदि क्षेत्रों में लूटपाट से जुड़ा बताया गया है, भारत में उसकी सक्रियता संभावित कालखंड तक़रीबन 1800 से लेकर 1860 के बीच का बनती है.लेकिन, इस दौरान का इतिहास उठाकर देखें तो कहीं भी उसका ज़िक्र नहीं मिलता.फिर भी, सिर्फ़ इस आधार पर कि बहरुद्दीन का नाम लिखित इतिहास में कहीं दर्ज़ नहीं है, उसके वज़ूद को खारिज़ कर देना भी ग़ैरमुनासिब होगा क्योंकि उस दौर की रियासती व्यवस्था में आपराधिक रिकॉर्ड रखने की कोई व्यवस्था नहीं थी.

 
जैसा कि हम जानते हैं कि किसी अपराधी/अपराधियों की पहचान, उसके द्वारा किए गए अपराध की संख्या, अपराध का प्रकार, उसका दर्ज़ा और उसपर रखा गया ईनाम, के आधार पर की जाती है, जिसे आपराधिक रिकॉर्ड कहते हैं.रिकॉर्ड में जो जितना उपर होता है वो उतना ही कुख्यात होता है और लोग उसे उतना ही जानते हैं.भारत में यह व्यवस्था पुलिस-व्यवस्था की स्थापना के बाद आई.ऐसे में, यह बहुत संभव है कि उस वक़्त बहरुद्दीन नामक कुख्यात चोर/डाकू जो जनता की ज़ुबान पर था, वह एक कहानी बन गया और कालांतर में एक से दूसरे तक प्रसारित होता हुआ आज भी लोगों की ज़ुबान पर है.
 


साईं का सच, लुटेरे की औलाद, हिंदुओं के खिलाफ
पिंडारी लुटेरा (स्रोत-गूगल)  

      

 
 
हम सभी जानते हैं कि भारत का वास्तविक इतिहास छुपाया गया.इसे ब्रिटिश और वामपंथी इतिहासकारों ने घटनाओं को तोड़-मरोड़कर पेश किया ताकि सच का पता ना चल सके.लेकिन, पिंडारियों के तक़रीबन दो सदियों के ऐतिहासिक चरित्र पर अधिकांश लेखक-इतिहासकार एकमत दिखाई देते हैं.

इतिहासकार राजबली पांडेय पिण्डारिओं को ‘लुटेरों का गिरोह’ बताते हैं.दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के मध्यकालीन इतिहास विभाग के प्रोफ़ेसर सैयद नज़मुल रज़ा रिज़वी कहते हैं-
 

”मध्यप्रदेश,राजस्थान और महाराष्ट्र में लुटेरे पिण्डारियों का एक गिरोह था, जिन्हें मराठों ने भाड़े का सैनिक बना लिया.मराठों के पतन के बाद वे टोंक के नवाब अमीर खां के लिए काम करने लगे.नवाब के कमज़ोर होने पर पिंडारियों ने अपनी जीविका के लिए फ़िर लूटमार शुरू कर दी.इससे महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में शांति-व्यवस्था मुश्किल हो गई.”

 
 
अन्य कई लेखकों-इतिहासकारों ने पिंडारियों पर बहुत कुछ लिखा है.
 
 
 

साईं का सच, लुटेरे की औलाद, हिंदुओं के खिलाफ
लूटमार में अभ्यस्त बेरहम पिंडारी लुटेरे 

      

 

 

लक्ष्मीबाई की सेना में पिंडारी    

ये माना जाता है कि पिंडारी सिर्फ़ लुटेरे और ग़द्दार ही नहीं बल्कि वफ़ादार भी होते थे.ना उनकी कोई जात थी और ना कोई धर्म.वो जिसके साथ होते, वही उनका सबकुछ होता था और वो उसी के होकर रह जाते थे.रानी लक्ष्मीबाई की सेना में भी शामिल पिंडारियों में से कई वफ़ादार थे.इतिहास के मुताबिक़, ग़ुलाम ग़ौस खां रानी लक्ष्मीबाई की सेना के प्रमुख तोपची थे.

 


साईं का सच, लुटेरे की औलाद, हिंदुओं के खिलाफ
लक्ष्मीबाई के प्रमुख तोपची ग़ुलाम ग़ौस खां 



 
 
इतिहासकार उन पिंडारी लड़ाकों का गुणगान करते नहीं थकते.मिसाल के तौर पर कुछ चर्चित नामों में से खुदाबख्श बशारत अली,ग़ुलाम ग़ौस खां,दोस्त खां और लाला भाउ बख्शी आदि की तो बाक़ायदा क़ब्रें रानी के क़िले में मौजूद हैं.
 


साईं का सच, लुटेरे की औलाद, हिंदुओं के खिलाफ
झाँसी के शहीदों की समाधियां  



 
 
उल्लेखनीय है कि इतिहासकारों ने ग़द्दारों के नाम छुपाने की भरसक कोशिश की लेकिन वे सफल नहीं हो पाए.कुछ लेखकों ने उनका ख़ुलासा कर दिया जिन्होंने क़िले का दरवाज़ा खोलकर फ़िरंगियों को अंदर दाख़िल करा दिया था.बाद में, ग्वालियर में भी यही हुआ.वक़्त रहते तात्या टोपे अपनी सेना लेकर पहुँच नहीं पाए और रानी कैप्टेन स्मिथ और ह्यूरोज़ की टुकड़ियों के बीच फंस गईं.लेकिन चक़मा देकर वो वहां से निकल भागीं और दूर जा पहुंचीं.अंग्रेज़ जैसे मायूस हो गए थे.लेकिन, गद्दारों को उनके छिपने का स्थान पता था.उन्होंने अंग्रेज़ों को बता दिया.रानी का पीछा कर स्वर्णरेखा नदी के किनारे उन्हें शहीद करने वाले अंग्रेज़ों के साथ वे पांच पिंडारी भी थे.रानी अंग्रेज़ो से नहीं, बल्कि गद्दार पिंडारियों के हाथों पराजित हुईं.
 
 

साईं का सच, लुटेरे की औलाद, हिंदुओं के खिलाफ
गद्दार पिंडारियों और अंग्रेजों के बीच घिरीं लक्ष्मीबाई 

 

 

गद्दारों की प्रामाणिकता? 

अब सवाल ये है कि वो गद्दार कौन थे, जिन्होंने क़िले का दरवाज़ा खोला? वो कौन थे जिन्होंने रानी के छुपने की जग़ह व वहां पहुंचने का मार्ग बताया? उनकी कोई सूची उपलब्ध है क्या? ज़वाब है- नहीं.फिर उनकी पहचान कैसे हो? ऐसे में, ये कहना ग़लत नहीं होगा कि गद्दार पिंडारी बहरुद्दीन की मौज़ूदगी का दावा करने वाला उतना ही सच्चा अथवा झूठा है जितना कि उसे खारिज़ करने वाला.

 


साईं का सच, लुटेरे की औलाद, हिंदुओं के खिलाफ
आपराधिक रिकॉर्ड का प्रतीकात्मक चित्र 

 

 

चाँद मियां और उसकी करतूतें

चाँद मियां का हाल भी वही है जो बहरुद्दीन का है.वह भी लिखित इतिहास में नहीं मिलता.अहमदनगर स्थित वेश्या का वो तथाकथित घर जहाँ चाँद पैदा हुआ, साईं समर्थकों द्वारा ढूंढ़े गए तथाकथित पैतृक गाँव वाले घर की तरह ही किवदंतियों में ही शुमार है.लेकिन हां, भिखारी के भेष में लुटेरों की तथाकथित मुख़बिरी का रहस्योद्घाटन यानि चादर के साथ चाँद की गिरफ़्तारी और तदुपरांत उसकी आठ साल की ज़ेलयात्रा पर ज़रूरी शोध से बहुत सारी उम्मीदें हैं.इससे ना सिर्फ़ कई सारी अटकलों पर विराम लग सकता है, बल्कि शिरडी के साईं बाबा का असली चेहरा भी सामने आ सकता है.                                       

 

 

चाँद मियां के सुलेमानी मुसलमानों से रिश्ते

मुसलमान और ईसाईयों के लिए जितना क़ुरान और बाइबल महत्त्व रखते हैं साईं समर्थकों के लिए ‘साईं सच्चरित्र’ भी उतना ही महत्वपूर्ण समझा जाता है.माना जाता है कि साईं के जीवन-चरित्र को दर्शाती ये पुस्तक साईं के परम भक्त गोविन्द रघुनाथ दाभोलकर (हेमाडपंत ) द्वारा साईं बाबा की प्रेरणा से लिखी गई है अथवा स्वयं साईं बाबा इसके लेखक हैं.इसमें लिखी बातें कथित सत्य एवं प्रामाणिक हैं.

 
 

साईं का सच, लुटेरे की औलाद, हिंदुओं के खिलाफ
साईं सच्चरित्र 



 
 
साईं सच्चरित्र स्वयं ये स्वीकारता है कि साईं के सुलेमानी मुसलमानों से प्रगाढ़ रिश्ते थे.मालेगांव के फ़कीर पीर मोहम्मद उर्फ़ बड़े बाबा, जो एक सुलेमानी मुसलमान थे, साईं बाबा के लिए सबसे अहम थे.
 
साईं सच्चरित्र के अध्याय-23 में पेज़-161 में लिखा है-
 
”साईं बाबा मालेगांव के फ़क़ीर पीर मोहम्मद उर्फ़ बड़े बाबा (सुलेमानी मुसलमान ) का बहुत आदर किया करते थे.इस कारण, वे सदैव उनकी दाहिनी ओर ही बैठा करते थे.सबसे पहले वे ही चिलम पीते और फ़िर बाबा को देते, बाद में अन्य भक्तों को.जब दोपहर को भोजन परोस दिया जाता,तब बाबा बड़े बाबा को आदरपूर्वक बुलाकर अपनी दाहिनी ओर बिठाते और तब सब भोजन करते.बाबा के पास जो दक्षिणा एकत्रित होती, उसमें से वे 50 रूपए प्रतिदिन बड़े बाबा को दिया करते थे.जब वे लौटते तो उस वक़्त बाबा भी उनके साथ सौ क़दम दूर तक जाया करते थे.”
 
 
ऐसे ढ़ेरों उदाहरण साईं सच्चरित्र में ही मिल जाते हैं.बिल्कुल तार्किक और प्रामाणिक उदाहरण.
 
 
 

साईं का सच, लुटेरे की औलाद, हिंदुओं के खिलाफ
पीर मोहम्मद उर्फ़ बड़े बाबा की सेवा करते साईं 



 
 
उल्लेखनीय है कि साईं सुलेमानी मुस्लिम फ़क़ीर पीर मोहम्मद को चढ़ावे में से रोज़ 50 रूपये उस वक़्त देते थे जब 20 रूपये तोला सोना मिलता था.ये प्रेम था या कोई क़रार? यहाँ साईं विरोधियों की ये दलील मायने रखती है कि चूँकि सुलेमानी मुसलमानों ने ही साईं की मस्ज़िद में रहने की व्यवस्था करने के साथ उनकी दुकानदारी भी जमाई (प्रचार-प्रसार किया था) थी, इसलिए साईं उनके साथ हुए क़रार से बंधे हुए थे और वो ताउम्र उसी का निर्वहन करते रहे.इसके अलावा वो आमना नामक एक मुस्लिम बच्ची के घरवालों और एक अन्य मुस्लिम महिला को पांच-पांच रूपये रोज़ाना भिजवाया करते थे.साईं ने कभी किसी हिन्दू संत या किसी मंदिर तो क्या किसी ग़रीब हिन्दू भक्त को आर्थिक मदद नहीं दी.उन्होंने हिन्दू भक्तों को कुछ देने के बजाय उल्टा उनसे ही लिया.

 

 

साईं हिन्दू थे या मुसलमान ?    

साईं समर्थक साईं को हिन्दू ब्राह्मण तो दूर अबतक हिन्दू भी साबित नहीं कर पाए हैं.यही वजह है कि लोग उन्हें मुस्लिम फ़क़ीर मानने लगे हैं.

 
साईं विरोधियों का ये तर्क कि ‘साईं बाबा उर्फ़ चाँद मियां एक अफ़ग़ानी पिंडारी था,साईं सच्चरित्र में इसकी पुष्टि हो जाती है.साईं सच्चरित्र के अध्याय-7 के पेज़ संख्या-50 पर लिखा है-
”कोई भी निश्चयपूर्वक यह नहीं कह सकता था कि वे हिन्दू थे या यवन.
 
साईं ‘सुन्नत(ख़तना) कराने के पक्ष में थे.” 


 
साईं सच्चरित्र ये भी बताता है कि साईं कफ़नी (मुस्लिम फ़क़ीरों का सिर पर पहननेवला वस्त्र )पहनते थे.वो ख़ासतौर से हिन्दू व्रत-त्योहारों के मौक़े पर मांस एवं मछली बनवाकर स्वयं तो खाते ही थे चेलों की भी खाने को देते थे.कभी भक्ति-भाव में तो कभी परीक्षा के नाम पर ब्राह्मणों को बिरयानी चखाते थे.
 
 
साईं का सच, लुटेरे की औलाद, हिंदुओं के खिलाफ
चिकन बिरयानी पकाते साईं बाबा 



 
 
एक बार मस्ज़िद के प्रांगण में वे स्वयं बक़रा हलाल करने को तैयार हो गए थे(अध्याय-23,पेज़-161).


साईं का सच, लुटेरे की औलाद, हिंदुओं के खिलाफ
बक़रा हलाल करने को तैयार साईं का प्रतीकात्मक चित्र 



 
 
साईं के पास आनेवाले सभी लोग उन्हें यवनी फ़क़ीर के रूप में ही जानते थे क्योंकि भारत में उस वक़्त अफ़ग़ानिस्तान से आए मुसलमानों को यवन या यवनी कहा जाता था.लोकसत्ता की एक रिपोर्ट के मुताबिक़,साईं का जन्म तमिलनाडु में हुआ था.अब्दुल सत्तार(मुस्लिम) उनके असली पिता थे, जबकि उनकी माता का नाम था वैष्णवदेवी (हिन्दू महिला).
     
साईं सच्चरित्र ये ख़ुला कहता है कि ‘अल्लाह मालिक़ सदैव उनके होठों पर था (अध्याय-4,5 और 7).’ इसलिए साईं विरोधियों की ये दलील सही है कि उनके मुँह से कभी भी ‘भगवान मालिक़’, ‘राम मालिक़’ या फिर ‘कृष्ण मालिक़’ इसलिए नहीं निकला क्योंकि वो मुसलमान थे.बाद में, इसे ढंकने के मक़सद से ही ‘सबका मालिक़ एक’ गढ़ा गया जो साईं ने कभी बोला ही नहीं.
 


साईं का सच, लुटेरे की औलाद, हिंदुओं के खिलाफ
साईं सच्चरित्र में साईं के मुस्लिम होक प्रमाण 

     

 
 
शिरडी साईं मंदिर में गाई जानेवाली आरती ही साईं के मुसलमान होने का सबसे बड़ा सबूत है.इसके एक अंश में लिखा है-
 

”मंदा त्वांची उदरिले ! मोमिन वंशी जन्मुनी लोंका तारिले !”

 

यहाँ ‘मोमिन वंशी जन्मुनी’ यानि ‘मुसलमान वंश में जन्मे’ शब्द स्पष्ट आया है.


 

निष्कर्ष 

ग़ौरतलब है कि बीती हुई घटनाएं ही इतिहास का हिस्सा बनती हैं, जिसका प्रत्यक्ष गवाह शायद ही कोई इतिहासकार स्वयं बनता है वर्ना एक से दूसरे तथा दूसरे से तीसरे और यहाँ तक की सबसे आख़िरी पंक्ति में खड़े किसी व्यक्ति की सुनी-सुनाई बातें ही दर्ज़ होकर हम तक पहुँचती हैं.इसलिए जानकारी का स्रोत जितना पुख़्ता है इतिहास में सच की गुंज़ाइश भी उतनी ही बनती है.इसमें सन्दर्भ बहुत महत्वपूर्ण होता है, जिसकी अनदेखी नहीं की सकती.


ऐसे में, निष्कर्ष के रूप में यहाँ ये कहा जा सकता है कि साईं विरोधियों के तमाम दावों और उनके पक्ष में दी गई दलीलों को झूठ बताकर पूरी तरह खारिज़ नहीं किया जा सकता.हालांकि, उनकी ओर से पेश कहानी के कई अंश साईं सच्चरित्र में दर्ज़ कहानियों की तरह ही काल्पनिक लगते हैं, तथा उनका कोई ऐतिहासिक प्रमाण भी उपलब्ध नहीं है.फिर भी, उनके सच साबित होने की संभावना प्रबल है.आवश्यकता है एक गहन शोध की.एक सिरा पकड़ने की.फिर तो तार से तार जुड़ते चले जाएंगें और पूरा सच सामने आ जाएगा.

और चलते चलते अर्ज़ है ये शेर…                                           ख़ामोशी की गिरह खोले सर-ए-आवाज़ तक आए,               
                                     इशारा कोई तो समझे कोई तो राज़ तक आए !!

            

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    रामाशंकर पांडेय

    दुनिया में बहुत कुछ ऐसा है, जो दिखता तो कुछ और है पर, हक़ीक़त में वह होता कुछ और ही है.इस कारण कहा गया है कि चमकने वाली हर चीज़ सोना नहीं होती है.इसलिए, हमारा यह दायित्व बनता है कि हम लोगों तक सही जानकारी पहुंचाएं.वह चाहे समाज, संस्कृति, राजनीति, इतिहास, धर्म, पंथ, विज्ञान या ज्ञान की अन्य कोई बात हो, उसके बारे में एक माध्यम का पूर्वाग्रह रहित और निष्पक्ष होना ज़रूरी है.khulizuban.com का प्रयास इसी दिशा में एक क़दम है.

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