कानून और अदालत

वक्फ़ एक्ट: मुसलमानों का मज़हबी अधिकार या भारत के इस्लामीकरण का हथियार?

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वक्फ़ एक्ट को लेकर जब भी चर्चा होती है तो कहा जाता है कि यह किसी भी तरह से ठीक नहीं है. यह भारत के संविधान की मूल भावना के खिलाफ़ तो है ही, सेक्युलर ढ़ांचे को भी तहस-नहस करने वाला है. जानकारों के अनुसार कानून के रूप में यह ज़मीन आधारित वह व्यवस्था है, जो हिन्दू बहुल देश में एक गहरी साज़िश के तहत थोपी गई है. इसके ज़रिए भारत को इस्लामीकरण की ओर धकेला जा रहा है.
 
 
वक्फ़ एक्ट, वक्फ़ बोर्ड, भारत का इस्लामीकरण
वक्फ़ एक्ट और भारत का इस्लामीकरण (सांकेतिक)

 

 
तर्क यह भी दिया जाता है कि भारत जैसे सेक्युलर देश में जहां सब के लिए एक समान कानून की व्यवस्था है वहां मुसलमानों के लिए एक अलग कानून बेमानी है. विशेषज्ञों के अनुसार वक्फ़ एक्ट की व्यवस्था दरअसल, मुसलमानों को औरों से अलग करती है, उन्हें ख़ास बनाती है. यह भेदभावपूर्ण है इसलिए, इसे समाप्त कर देना चाहिए.
 
क्या वाक़ई ऐसा ही है? यह समझने के लिए वक्फ़ एक्ट की बारीकियों के साथ इस की इस्लामिक अवधारणा और एक सेक्युलर देश में इसकी आवश्यकता को समझना होगा. यह भी समझने की आवश्यकता है कि भारत में इसे बहुत अधिक महत्त्व क्यों दिया जाता है, और इस से संबंधित मामलों में सरकारों के साथ अदालतें भी हाथ डालने से क्यों कतराती हैं.
 
 

वक्फ़ आख़िर है क्या?

वक्फ़ एक अरबी शब्द है, जिसका बहुत शाब्दिक या क़रीब अर्थ नज़रबंदी या कारावास और निषेध है.इस्लाम के अनुसार, यह धन और संपत्ति (पैसे और जायदाद) के रूप में अल्लाह को सुपूर्द की गई वह दौलत है, जो हमेशा अल्लाह के क़ब्ज़े या हिरासत में रहती है.न तो इसकी ख़रीद-फ़रोख्त हो सकती है और नहीं इसकी अदला-बदली ही की जा सकती है.यह सिर्फ़ कौम की भलाई और  इस्लाम के प्रचार-प्रसार में काम आने वाली चीज़ होती है.
 
वक़्फ़ दो तरह के तरह के होते हैं- वक्फ़ बाय यूज़र और वक्फ़ बाय डीड.
 
शरिया कानून के अनुसार, एक बार वक्फ़ की स्थापना (वक्फ़ की प्रक्रिया) हो जाने के बाद, संपत्ति अल्लाह की हो जाती है, और इसे वक्फ़ करने वाले (दान करने वाले व्यक्ति या मालिक) को कभी वापस नहीं मिल सकती.
 
अब अल्लाह चूंकि कोई व्यक्ति नहीं है, जो भौतिक रूप में उपस्थित होकर वक्फ़ की संपत्तियों की देखरेख कर सके इसलिए, एक प्रबंधक या प्रशासक के रूप में मुस्लिम समाज के ही किसी व्यक्ति को नियुक्त किया जाता है, जिसे मुतवल्ली कहा जाता है.यह वक्फ़ बोर्ड के तहत काम करता है.
 
ऐसे में देखें तो वक्फ़ बिल्कुल ही मज़हबी और निजी मामला है और इसका किसी और क़ौम या समाज या शेष मानव जाति से कोई वास्ता नहीं है.इसका मक़सद केवल और केवल इस्लाम का प्रचार-प्रसार है.फिर, यह भारत जैसे सेक्युलर देश में विधि द्वारा स्थापित क्यों है? किसी और कौम के लिए ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं है?
 
आपको यह जानकार हैरानी होगी कि दुनियाभर के ग़ैर-मुस्लिम देशों में भारत ही ऐसा इकलौता देश है जहां वक्फ़ की व्यवस्था है.यहां तक कि मुस्लिम देशों में भी ऐसा कोई एक्ट नहीं है.तुर्की, लीबिया, इजिप्ट, सूडान, लेबनान, सीरिया, जॉर्डन और इराक़ जैसे मुस्लिम देशों में न तो कोई वक्फ़ बोर्ड है और न ही कोई वक्फ़ कानून.कितने ताज्जुब की बात है!
 
 

भारत में वक्फ़ और वक्फ़ बोर्ड का इतिहास

भारत में वक्फ़ व्यवस्था के बारे में जानकारी हमें दिल्ली सल्तनत में मिलती है. ऐसी चर्चा मिलती है कि सुल्तान मुइजुद्दीन सैम घोर ने मुल्तान (अब पाकिस्तान में स्थित है) में दो गाँव दान कर दिए थे, और इसकी देखरेख की ज़िम्मेदारी शेख़ुल इस्लाम को दी थी.फिर, जैसे-जैसे दिल्ली सल्तनत और उसके बाद इस्लामी वंश आए, उन्होंने इस परंपरा को आगे बढ़ाया.
 
कालांतर में अंग्रेजों ने इस व्यवस्था को ख़त्म करने का प्रयास किया.लंदन की प्रिवी काउन्सिल में एक वक्फ़ संपत्ति के मसले पर सुनवाई में चार ब्रिटिश जजों ने वक्फ़ को ‘सबसे ख़राब और ‘सबसे हानिकारक’ बताते हुए इसे खारिज़ कर दिया था.मगर, भारत में इसको लेकर विरोध को देखते हुए 1913 में फिर बहाल कर दिया गया.
 
फिर, भारत के बंटवारे के वक़्त अधिकतर मुसलमान भारत में जो ज़मीनें छोड़कर पाकिस्तान गए, महात्मा गांधी की मांग पर जवाहरलाल नेहरू ने अमल करते हुए वक्फ़ को सौंप दिया.
 
इसके बाद तो यह राजनितिक मुद्दा बनकर वोटबैंक का आधार और तुष्टिकरण का हथियार बन गया.वोटबैंक को आगे बढ़ाने और इसे मजबूत बनाने के उद्देश्य से 1954 में बाक़ायदा भारतीय संसद द्वारा वक्फ़ अधिनियम बनाया गया.
 
1964 में सेन्ट्रल वक्फ़ काउन्सिल ऑफ़ इंडिया (केन्द्रीय वक्फ़ परिषद्) के साथ-साथ राज्यों में वक्फ़ बोर्ड बना दिए गए.
 
1969 में वक्फ़ एक्ट में कुछ और उपबंध जोड़े गए.
 
1984 में राजीव गांधी सरकार ने इसे विशेषाधिकार दिए.
 
वर्ष 1995 में पी वी नरसिम्हा राव सरकार ने वक्फ़ एक्ट 1954 में संशोधन किया और नए-नए प्रावधान जोड़कर वक्फ़ बोर्ड को और भी प्रशासनिक और न्यायिक अधिकारों से जुड़ी असीमित शक्तियां दे दीं.
 
और आख़िरकार, 2013 में मनमोहन सिंह सरकार ने इसमें कुछ और भी संशोधन कर वक्फ़ बोर्ड को और सुदृढ़ किया.इस सब के पश्चात वक्फ़ बोर्ड अत्यंत शक्तिशाली ही नहीं, बहुत ख़तरनाक़ भी हो गया है.एक गंभीर संवैधानिक समस्या के रूप में वक्फ़ बोर्ड आज सेक्युलर भारत के लिए चुनौति बनकर खड़ा है.
 
 

वक्फ़ और वक्फ़ बोर्ड की वर्तमान स्थिति

गांधीवाद-नेहरूवाद आधारित राजनीति या तुष्टिकरण और वोटबैंक की नीति ने वक्फ़ बोर्ड को देश की सबसे शक्तिशाली संस्था के रूप में कर दिया है.वक्फ़ को कानूनी वैधता के साथ संवैधानिक मान्यता भी प्राप्त है.बहुत कम ही लोगों को यह पता है कि विषय ‘वक्फ़’ भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची से जुड़ी समवर्ती सूची में प्रविष्टि संख्या 10- ‘ट्रस्ट और ट्रस्टी’ के सदृश (के जैसा) है, जो घोषित करता है कि यह केंद्र और राज्य, दोनों सरकारों का मामला है.
 
वक्फ़ अधिनियम के तहत स्थापित वक्फ़ बोर्ड के कामकाज को देखने के लिए एक वकील, एक विधायक, एक सांसद, एक टाउन प्लानर या इंजीनियर, एक आइएएस अफ़सर, एक स्कॉलर यानि इस्लाम का जानकार, एक मुतवल्ली (सीईओ के जैसा) आदि नियुक्त होते हैं.ये सभी मुस्लिम होते हैं.वक्फ़ अधिनियम, 1995 के सेक्शन 101 की व्यवस्था के अनुसार, ये सभी पदाधिकारी/कर्मचारी पब्लिक सर्वेंट या सरकारी कर्मचारी हैं.इनका सब का ख़र्च सरकार उठाती है.
 
जैसा कि ऊपर बताया गया है कि वक्फ़ बोर्ड को प्रशासनिक शक्तियों के साथ-साथ वैधानिक शक्तियां भी प्राप्त हैं,ऐसे में, क़ानूनी समस्याओं या विवादों के निपटारे के लिए वक्फ़ ट्रिब्यूनल की व्यवस्था है.यह सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत एक सिविल कोर्ट द्वारा प्रयोग होने वाली सभी शक्तियों का उपयोग और कार्यों को करने की क्षमता रखता है.इसे स्पेशल कोर्ट (विशेष अदालत) कह सकते हैं.इसका फ़ैसला आख़िरी और सभी पक्षों (वास्तव में पीड़ित या वादी) पर बाध्यकारी होता है.
 
वक्फ़ ट्रिब्यूनल के फैसले किसी भी दीवानी अदालत या सिविल कोर्ट से ऊपर हैं.इसके फ़ैसले को हाईकोर्ट और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौति नहीं दी जा सकती है.
 
 

वक्फ़ बोर्ड के विशेषाधिकार

वक्फ़ एक्ट, 1954 का सेक्शन 27 और वक्फ़ एक्ट, 1995 का सेक्शन 40 वक्फ़ बोर्ड को यह अधिकार देता है कि वह किसी भी ट्रस्ट, मठ-मंदिर, गुरुद्वारा, चर्च, चारागाह या हरित भूमि (ग्रीन बेल्ट) या अन्य किसी भी प्रकार की ज़मीन-संपत्ति को संबंधित पक्ष (ज़मीन के मालिक, जो उस पर क़ाबिज़ है) को बताए बिना वक्फ़ की संपत्ति घोषित कर सकता है.
 
ऐसे में, होता यह है कि जानकारी के अभाव में लोग तय समयसीमा के भीतर अपना दावा/शिक़ायत पेश नहीं कर पाते.इसके परिणामस्वरूप वक्फ़ बोर्ड उस ज़मीन-संपत्ति को क़ब्ज़ा लेता है और लोग/पीड़ित हाथ मलते रह जाते हैं.
 
वक्फ़ एक्ट, 1995 कहता है कि वक्फ़ बोर्ड को अगर लगता है (यानि सिर्फ़ सोचना ही काफ़ी है) कि कोई ज़मीन किसी मुसलमान से संबंधित है, तो वक्फ़ की संपत्ति है.इसके लिए उसे कोई सबूत पेश करने की ज़रूरत नहीं है.यह ज़िम्मेदारी पीड़ित पक्ष की है कि वह साबित करे कि वह ज़मीन-संपत्ति उसकी है.
 
इसके लिए पीड़ित पक्ष अदालत (सिविल कोर्ट या किसी भी अन्य कोर्ट) का दरवाज़ा भी नहीं खटखटा सकता है.उसे वक्फ़ बोर्ड (जहां सुनवाई करने वाले सभी मुसलमान हैं) जाना होगा.यहीं अपना पक्ष रखना होगा.
 
वक्फ़ बोर्ड को संतुष्ट नहीं कर पाने की स्थिति में (या वक्फ़ बोर्ड के अन्यायपूर्ण फैसले के ख़िलाफ़)) भी अदालत में दीवानी दावा दायर नहीं किया जा सकता है.सेक्शन 85 कहता है कि वादी (पीड़ित) को अपनी सफ़ाई पेश करने के लिए आगे वक्फ़ की ही संस्था ट्रिब्यूनल (जो कि वक्फ़ के लिए ही बना है और उसके प्रति समर्पित है) जाना होगा.
 
वक्फ़ ट्रिब्यूनल में भी वादी केस हार जाता है, तो सेक्शन-52 और सेक्शन-54 के अनुसार, उक्त संपत्ति वक्फ़ की संपत्ति घोषित हो जाएगी और वादी को अतिक्रमणकारी या घुसपैठिया करार दिया जाएगा.
 
अब इसे ख़ाली कराने और उस पर क़ब्ज़े के लिए वक्फ़ बोर्ड स्थानीय प्रशासन को कहेगा.यह स्थानीय प्रशासन के लिए एक प्रकार से निर्देश माना जाएगा क्योंकि सेक्शन-28 और सेक्शन-29 के तहत कलेक्टर और डीएम इसका पालन करने-कराने को बाध्य हैं.
 
ज्ञात हो कि किसी भी ज़मीन से संबंधित, यानि दीवानी मामले में दावेदारी को लेकर एक समयसीमा निश्चित है.मगर, वक्फ़ बोर्ड के साथ ऐसा नहीं है.
 
मान लीजिए कि 2004 में मुकेश ने कोई ज़मीन का टुकड़ा या प्लाट सुरेश से खरीदा.फिर, उसने क़ब्ज़ा लेकर उस पर मकान बना लिया और अब वह उसमें पिछले 18 सालों से रह रहा है, तो भी वक्फ़ बोर्ड यहां अपना दावा ठोंक सकता है, जबकि अन्य प्रकार की ज़मीनों के लिए 1 से 3 साल और व्यक्तिगत ज़मीनों पर दावेदारी की अधिकतम समयसीमा 12 सालों की होती है.
 
यहां वक्फ़ बोर्ड यह दलील पेश कर सकता है कि 30 साल पहले यानि वर्ष 1974 में इस ज़मीन का मालिक जुबेर था.उसने अपनी ज़मीन वक्फ़ को दे दी थी और वह वक्फ़ की संपत्ति है.
 
वक्फ़ बोर्ड से जुड़ी एक अज़ीब बात यह भी है कि अगर किसी हाउसिंग सोसायटी के किसी अपार्टमेंट का मुस्लिम मालिक अपना अपार्टमेंट वक्फ़ (दान) कर देता है, तो वह अपार्टमेंट किसी भी दिन सोसायटी के अन्य सदस्यों की इज़ाज़त या उनसे बातचीत के बिना ही मस्जिद या मदरसे में तब्दील हो सकता है.इसे रोका नहीं जा सकता.
 
कोई ज़मीन किसी भी प्रकार की हो, सरकारी हो या किसी की निजी, अगर उस पर लंबे समय से इस्लामिक कार्य जैसे नमाज़ या जलसे आदि होते आए हैं, तो वह ज़मीन भी वक्फ़ की ज़मीन हो जाती है.
 
 

रेलवे और रक्षा विभाग के बाद सबसे ज़्यादा ज़मीनों का मालिक है वक्फ़ बोर्ड

संसदीय समिति की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रेलवे और सेना के बाद भूमि का तीसरा सबसे बड़ा स्वामित्व वक्फ़ बोर्ड का है.
 
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भारतीय सेना के पास क़रीब 18 लाख एकड़ ज़मीनों पर स्थित संपत्तियां हैं, जबकि रेलवे की चल-अचल संपत्तियां क़रीब 12 लाख एकड़ में फैली हैं.वहीं, वक्फ़ बोर्ड मैनेजमेंट सिस्टम ऑफ़ इंडिया के हालिया आंकड़ों के मुताबिक़ वक्फ़ बोर्ड के पास कुल 8 लाख, 54 हज़ार 509 संपत्तियां हैं, जो 8 लाख एकड़ से ज़्यादा ज़मीनों पर फैली हैं और आज यह उपरोक्त दोनों संस्थानों (रेलवे और रक्षा विभाग) के बाद देश में सबसे ज़्यादा ज़मीनों का मालिक है.
 
 

13 साल में दुगनी हो गईं वक्फ़ बोर्ड की ज़मीनें!

पिछले 13 सालों के दौरान वक्फ़ बोर्ड की ज़मीनों व संपत्तियों में बेतहाशा वृद्धि हुई है.
 
साल 2009 के वक्फ़ मैनेजमेंट सिस्टम ऑफ़ इंडिया के आंकड़े देखें तो वक्फ़ बोर्ड के मालिकाना हक़ वाली ज़मीनें केवल क़रीब 4 लाख एकड़ थीं, जबकि हालिया आंकड़ों में यह बढ़कर 8 लाख एकड़ तक पहुंच गई हैं.
 
हम सभी जानते हैं कि ज़मीनें फैलती नहीं हैं, तो फिर ऐसा कैसे हुआ?
 
अतः राष्ट्रहित में यह ज़रूरी है कि वक्फ़ बोर्ड की ज़मीनों और उसकी संपत्तियों की गहन जांच हो, ताकि षड्यंत्र और इस महाघोटाले का पर्दाफाश हो सके.
 
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील अश्विनी उपाध्याय बताते हैं कि वक्फ़ बोर्ड एक प्रॉपर्टी मफिया है, जो सरकारी संरक्षण में देशभर में ज़मीनों पर अवैध क़ब्ज़े, लूटपाट और गुंडागर्दी करता है.उपाध्याय का आरोप है कि वक्फ़ बोर्ड अपने असीमित अधिकारों का ग़लत इस्तेमाल कर ग़रीब और असहायों का धर्मान्तरण भी करवाता है.ख़ासतौर से, आदिवासी इलाक़ों में यह ज़मीनों पर नोटिस भेजता रहता है.जब घबराये लोग इसके पास आते हैं, तो परेशानी से छुटकारा दिलाने के बदले उन पर अपना धर्म त्यागकर इस्लाम अपनाने का मानसिक दबाव बनाता है.
 
हाल ही में ख़बर आई है कि तमिलनाडु के एक हिन्दू बाहुल्य और ऐतिहासिक गांव तिरुचेंथुरई और उसके 1500 साल पुराने मंदिर (जो कि पैग़म्बर मुहम्मद और इस्लाम के जन्म से भी क़रीब 60-70 साल पहले से स्थापित है) समेत 6 गांवों को वक्फ़ बोर्ड ने अपनी मिल्कियत घोषित कर दिया है.
 
इसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृहप्रदेश गुजरात के सूरत के नगर निगम की इमारत को भी क़ब्ज़ा लिया है.
 
इससे पहले वक्फ़ बोर्ड देवभूमि द्वारका में दो द्वीपों के स्वामित्व पर दावा करने गुजरात हाईकोर्ट पहुंच चुका है.
 
यहां तक कि ताजमहल और लालकिले जैसी इमारतों पर वक्फ़ बोर्ड का दावा क्या दर्शाता है? दरअसल, यह भारत सरकार द्वारा वक्फ़ एक्ट, 1954 के सेक्शन 27 और वक्फ़ एक्ट, 1995 के सेक्शन 40 में वक्फ़ बोर्ड को असीमित शक्तियां देने का ही परिणाम है.

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रामाशंकर पांडेय

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