इस्लाम

मज़ार क्या है? मज़ारों पर चादर चढ़ाना और मन्नतें मांगना जायज़ है?

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अपनी ग़लतियों पर पर्दा डालने के लिए चाहे कितने भी बहाने बनाए जाएं, दलीलें गढ़ी जाएं लेकिन, सच यही है कि मज़ारें इबादत की जगह नहीं हैं.मगर दुर्भाग्य से आज इससे भी बड़ा सच ये है कि बड़ी शिद्दत के साथ लोग यहां जाते हैं, रौशनी करते हैं, सजदा करते हैं, पीर-औलिया के सामने अपना दुखड़ा बयान करते हैं और झोली फैलाकर ऐसे मांगते हैं जैसे कि वे ही अल्लाह हों.फिर, मन्नते पूरी होने के बाद चादरें चढ़ाते हैं और कव्वालियां गाते हुए झूमते-नाचते हैं.ऐसे में, सवाल उठता है कि मज़ार आख़िर है क्या, इसकी इतनी अहमियत क्यों है, और बदलते दौर में पीर-औलिया और ऊपरवाले के बीच कितना फ़र्क रह गया है?
 
 
मज़ार पर सजदा,चादरपोशी,कुरान और हदीस
राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और फ़िल्मी हस्तियों द्वारा ख्वाज़ा की मज़ार पर चादरपोशी
आज शायद ही कोई ऐसा होगा जो मज़ार या दरगाह से परिचित ना हो.दरअसल, जिसने ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़, निजामुद्दीन औलिया, बख्तियार काकी आदि की क़ब्रों पर नाक रगड़ने और चादर चढ़ाने को लेकर रेलमपेल नहीं देखी होगी उसने भी अपने गांव के बाहर चौक-चौराहों से लेकर शहरों में सड़कों के किनारे, हाइवे पर और फ्लाईओवर के नीचे एक आयताकार चबूतरे पर बने एक उभार को हरे रंग की चादर में लिपटा/ढंका ज़रूर देखा होगा.ये ही मज़ारें हैं.इनका नज़ारा भारत ही नहीं पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में आम है.कुछ जानकार इसे इस्लाम की सांस्कृतिक शाखा कहते हैं क्योंकि इनके गुम्बदों और मीनारों के निर्माण में इस्लामी निर्माण कला (कारीगरी) का प्रयोग हुआ/होता है.बहरहाल, यह एक दिलचस्प विषय है और इसे जानना-समझना ज़रूरी हो जाता है.
 
 

मज़ार क्या है?

मज़ार एक अरबी शब्द है, जिसका मतलब होता है क़ब्र.इसके लिए दूसरे शब्द मषद, मक़ाम या दारिया भी इस्तेमाल करते हैं.जहां मुर्दे दफ़न होते हैं उस जगह को क़ब्र कहते हैं, और उस क़ब्र को जब पक्का कर सजा-सवांर दिया जाता है, तो वही क़ब्र मज़ार या दरगाह या फिर मक़बरा कहलाने लगती है.विश्वासियों की नज़र में यह पीर-औलिया का ख़ानक़ाह होती है जहां ज़ियारत को आने वाला हर ज़ायरीन श्रद्धा के तौर पर मखमल की चादर और अक़ीदत के फूल पेश कर मन्नत मांगता है.
 
 

क्या होती है चादर?

चादर जो मज़ार शरीफ़ पर पेश की जाती है वह मखमल, सूती या साटन के हरे, लाल, पीले या नीली रंग के कपड़ों की बनी होती है.इसकी लम्बाई आमतौर पर सात गज़ से लेकर 42 गज़ तक की होती है.इस पर कुरान की आयतें, पंजतन-ए-पाक (इस्लाम की पांच पूज्य हस्तियां जैसे हज़रत मोहम्मद, हज़रत अली, हज़रत फ़ातिमा, इमाम हसन और इमाम हुसैन) के नाम, मक्का मदीना और पीर-औलिया के फ़ोटो भी छपे होते हैं.

क्यों पेश की जाती है चादर?

मज़ारों की ज़ियारत को आने वाला अकीदतमंद (श्रद्धालु) तोहफ़े में फूल, चादर, शीरनी (एक प्रकार की मिठाई जो कच्चे चावल और गुड़ के मिश्रण से बनाई जाती है, चीनी की चाशनी को टपका कर बनाई गई मिठाई जैसे बतासा) आदि लेकर आता है.यह एक तोहफ़ा है, जिससे पीर-औलिया ख़ुश होते हैं.माना जाता है कि जब ये ख़ुश होते हैं, तो अकीदतमंद का मक़सद पूरा होता है.
ज्ञात हो कि यहां छोटे पीर-औलिया भी होते हैं.कई बार बड़े पीर-औलिया की मज़ार/दरगाह से चादर का यह तोहफ़ा इनके यहां भी पहुंचाए जाते हैं.तोहफ़ा पाकर ये भी ख़ुश हो जाते हैं.

फूल और इत्र हैं अहम

फूल और इत्र को पीर-औलिया की रूह की गिजा (भोग, चढ़ाया जाने वाला भोज्य पदार्थ) कहते हैं.जब इन्हें अक़ीदत के फूल पेश किए जाते हैं, तो इनकी रूह ख़ुश हो जाती है.कहा जाता है कि अक़ीदतमंद अगर यहां फूल की एक पंखुड़ी भी पेश करता है, तो पीर ख़ुश हो जाते हैं, और जब वे ख़ुश हो जाते हैं, तो यहां आने वाला भी ख़ुश होता है, ख़ाली हाथ नहीं लौटता.

बनती है फूलों सेज

मज़ारों-दरगाहों पर कपड़े के अलावा फूलों की चादर भी चढ़ाने का रिवाज़ है.इसे सेज कहते हैं, जो ख़ासतौर से चमेली व मोगरे के फूलों से तैयार होती है.जानकारों के अनुसार, श्रद्धालु इसे मुराद पूरी होने के बाद या पहले भी चढ़ाते हैं.

क्या है मज़ारों का इतिहास?

मज़ारों की शुरुआत मध्य पूर्व में सूफ़ीवाद के उदय के साथ हुई.फिर, इस्लाम जहां भी पहुंचा स्थानीय रंगों में रंगता चला गया.
दरअसल, रेगिस्तान में पैदा हुआ इस्लाम दूसरी आबोहवा में परिवर्तित हुए बिना यह पनप नहीं सकता था.इस पर स्थानीय जीवन-शैली और मान्यताओं का प्रभाव पड़ना अनिवार्य था.इसलिए इस्लाम के साथ ऐसी अनेक बातें जुड़ गईं, जो पैग़म्बर की बातों और अल्लाह के आदेशों के प्रतिकूल थीं.इन्हीं में से एक था सूफ़ीवाद.इसके तहत कोई शख्स चार चरणों जैसे शरिया, तारिका, हक़ीक़ा, मारिफ़ा आदि से गुजरने के बाद एक ख़ास मज़हबी शख्शियत, अल्लाह का क़रीबी या दोस्त बन जाता है.यह मरने बाद पीर कहलाता है और इसकी क़ब्र मज़ार या दरगाह.
 
सूफ़ीवाद माने पीर और मज़ार.
 
ग़ौरतलब है कि मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब सूफ़ी नहीं था मगर, उसकी धर्मांधता और कट्टर इस्लामी शासन को लेकर उसे ज़िन्दा पीर कहा जाता था/है.इसकी भी मज़ार है.

ख्वाज़ा की मज़ार

भारत की मज़ारों-दरगाहों में सबसे मशहूर अज़मेर स्थित ख्वाज़ा की मज़ार है.दरअसल, ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ के नाम से प्रसिद्ध मोईनुद्दीन चिश्ती एक सूफ़ी संत थे, जिन्होंने इस्लाम के सूखते दरख़्त को फिर से हरा-भरा किया था.इन्हीं की रहनुमाई में और इनके आशीर्वाद से मुहम्मद गोरी ने प्रसिद्ध हिन्दू राजा पृथ्वीराज चौहान को हराया था.इसके साथ ही भारत में इस्लामी सत्ता की नींव पड़ी.
 
 
मज़ार पर सजदा,चादरपोशी,कुरान और हदीस
ख्वाज़ा की मज़ार, अज़मेर
मोईनुद्दीन चिश्ती ने अपना पूरा जीवन इस्लाम के प्रचार-प्रसार में लगा दिया.इनके प्रभाव के कारण भारत में इस्लाम की जड़ें मज़बूत होती चली गईं.
ख्वाज़ा की मज़ार इतनी मशहूर है कि यहां देश-विदेश से बड़े-बड़े नेता और अभिनेता भी आते हैं, मत्था टेकते हैं और चादरें चढ़ाते है.भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की ओर से भी ख्वाज़ा को चादरें पेश की जाती हैं.
 
पिछली बार अज़मेर शरीफ़ दरगाह पर 810 वां उर्स मनाया गया था.पीएम नरेंद्र मोदी ने आठवीं बार चादर भेंट की थी.
 
ज्ञात हो कि हर साल उर्स (सूफ़ी मुसलमान या पीर की बरसी पर होने वाला ज़श्न) के मौक़े पर पाकिस्तान से आने वाले ज़ायरीन के जत्थे की ओर से ख्वाज़ा की मज़ार पर ख़ूबसूरत चादर पेश की जाती है.ख़ास बात यह है कि सबसे पहले पाकिस्तान सरकार की ओर से यहां चादर चढ़ाई जाती है.उसके बाद ही बाक़ी ज़ायरीन को मौक़ा मिलता है.

लैला मजनूं की मज़ार

बहुरंगी देश भारत में तरह-तरह की संस्कृतियों की तरह अजीबोग़रीब मज़ारें भी हैं.इन्हीं में से एक है लैला मजनूं की मज़ार.यह प्रेमी जोड़ों का तीर्थस्थल समझी जाती है.यहां दूर दराज से प्रेमी जोड़े ज़ियारत को आते हैं, अपने प्रेम की लंबी आयु के लिए मन्नतें मांगते हैं और अक़ीदत के फूल और चादर चढ़ाते हैं.
मज़ार पर सजदा,चादरपोशी,कुरान और हदीस
लैला मजनूं की मज़ार, राजस्थान
भारत के रोमियो जूलियट कहे जाने वाले लैला मजनूं की मज़ार राजस्थान के गंगानगर जिले में अनूपगढ़ से 11 किलोमीटर दूर बिंजौर गांव में स्थित है, जहां से महज़ दो किलोमीटर के फ़ासले पर पाकिस्तान की सीमा लगती है.इस गांव के क़रीब स्थित बीएसएफ़ (Border Security Force) की पोस्ट का नाम भी ‘मजनूं पोस्ट’ रखा गया है.
दरअसल, यहां दो मज़ारें हैं- एक मजनूं की, और दूसरी लैला की.दोनों बिल्कुल पास पास हैं.यहां हर साल 15 जून को एक बड़ा मेला लगता है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग आते हैं.
बताया जाता है कि लैला और मजनूं (इसका असली नाम क़ायस इब्न अल-मुलाव्वाह था) का जन्म 11 सदी में सिंध प्रांत (अब पाकिस्तान में स्थित है) में हुआ था.दोनों मुस्लिम परिवार से थे और इनके गांव भी आसपास ही थे.
 
मदरसे में तालीम (पढ़ाई) के दौरान उन्हें इश्क़ हुआ और वे दो ज़िस्म एक जान बन गए.उन्होंने एकसाथ साथ ज़िंदगी गुज़ारने के लिए शादी करने का फ़ैसला किया मगर, यह मुमकिन नहीं हो सका.फिर, वे भागकर राजस्थान आ गए.यहां उनकी प्राकृतिक मौत हुई या फिर हत्या, इस बारे में कई क़िस्से हैं.बहरहाल, बाद में इनकी क़ब्रें इश्क़ की दुनिया में सफ़र करने वाले जोड़ों के लिए ज़ियारत और इबादत की जगह बन गई.
 
लैला मजनूं की मज़ार की प्रसिद्धि की गूंज पडोसी देशों में भी सुनी जा सकती है.पहले पाकिस्तान से बड़ी संख्या में प्रेमी जोड़े यहां आते थे लेकिन, करगिल युद्ध के बाद सीमा द्वार बंद किए जाने के कारण उनका आना बंद हो गया.इसके बावजूद, यहां भीड़ कम नहीं होती और कई बार तो व्यवस्था चरमरा जाती है.

आशिक़-माशूक़ की मज़ार

लैला मजनूं की तरह ही एक और प्रेमी जोड़े की रूहों की ज़ियारत का स्थल है आशिक़-माशूक़ की मज़ार.यहां पूजे जाने वाले यूसुफ और मरियम की कहानी भी लैला मजनूं की कहानी से कम दिलचस्प नहीं है.यहां भी विश्वास उतना ही गहरा है, जितना कि लैला मजनूं की मज़ार पर देखने को मिलता है.
 
 
मज़ार पर सजदा,चादरपोशी,कुरान और हदीस
आशिक़-माशूक़ की मज़ार, बनारस
दरअसल, उत्तरप्रदेश सूबे के वाराणसी में सिगरा सिद्धगिरी बाग पर स्थित यह मज़ार वह जगह है जहां इश्क़ में गिरफ़्तार दिलों को क़रार तो मिलता ही है, पूरी शिद्दत के साथ किसी को चाहने और उस पर मर मिटने की प्रेरणा भी मिलती है.यही वज़ह है कि यहां एक अलग ही दुनिया के एहसास के साथ मन्नतों और मुरादों का मेला लग जाता है.
 
आशिक़ और माशूक़ की इस मज़ार के देवी-देवता मरियम और यूसुफ़ महज़ कहानी के पात्र हैं या वास्तव में वे कभी सशरीर धराधाम पर रहे थे, इसका कोई प्रमाण नहीं है.इनकी कोई किताब तो नहीं है मगर, लोगों की ज़ुबान पर बहुत कुछ है, वह सब कुछ, जो नायक-नायिका को आसमानों तक पहुंचा देते हैं, सितारा बना देते हैं.
इनको लेकर दो तरह की कहानियां हैं.लेकिन, दोनों ही मिलती-जुलती हैं.पहली, क़रीब 400 साल पहले बनारस की एक स्थानीय लड़की मरियम और ईरान का लड़का यूसुफ़ (जिसे उसके पिता मोहम्मद समद यहां लेकर आए थे) अलईपुरा में एक मेले में मिले थे.पहली नज़र में ही उन्हें इश्क़ हो गया.मगर, इश्क़ जब दीवानगी में बदल गया, तो लोगों की नज़र में आया और इस पर चर्चा होने लगी.
 
एक दिन यह बात मरियम के घर वालों को पता चली तो लोकलाज के भय से उन्होंने उसे अपने एक रिश्तेदार के यहां रामनगर भेज दिया.बताते हैं कि इसके बाद तो यूसुफ़ जैसे बावरा हो गया.वह मरियम की तलाश में घर से निकल पड़ा.गंगा किनारे उसने मरियम की चप्पल देखी, तो उसे लगा कि मरियम गंगा में डूब गई है.उसे बचाने के लिए यूसुफ़ ने पानी में छलांग लगा दी, जबकि उसे तैरना नहीं आता था.अपने इश्क़ में वह ऐसा डूबा कि फिर निकल नहीं पाया.
उधर जब मरियम को यह पता चला तो उसने भी गंगा में छलांग लगा दी.
दूसरी कहानी यह है कि वे साथ-साथ जी नहीं सकते थे इसलिए उन्होंने एकसाथ मरने का फ़ैसला किया और गंगा में डूबकर अपनी जान दे दी.
कई दिनों बाद इनकी लाशें निकाली गईं, तो दोनों के हाथ एक दूसरे से जकड़े हुए थे.
 
बहरहाल, सिगरा में दोनों को दफना दिया गया.बाद में कुछ लोगों ने यहां उनकी मज़ारें बना दी और पूजने लगे.
वैसे तो हज़रत आशिक़ माशूक़ की मज़ार पर वृहस्पतिवार को चोरी-छिपे या खुले में प्यार के परिंदे उड़ते हुए आते ही रहते हैं लेकिन, ख़ासतौर से वेलेंटाइन डे के मौक़े पर यहां आने वालों की तादाद कुछ ज़्यादा बढ़ जाती है.फिर, दिल खोलकर इबादत होती है, चादरों के साथ शादी के कार्ड तक चढ़ते हैं.

मामा भांजे की मज़ार

मज़ारों की फ़ेहरिस्त में मामा भांजे की मज़ार का नाम भी आता है.यह नाम आम है, यानि देश में इस नाम की मज़ारों की भरमार है.संख्या में ये कुल कितनी हैं और कहां-कहां हैं, सही बता पाना मुश्किल है.क़रीब आधा दर्ज़न जगहों के नाम तो उंगलियों पर गिनाए जा सकते हैं.मगर, हैरानी बात यह है कि मामा भांजे की सभी मज़ारों की कहानी अलग-अलग है.इनकी मान्यताएं अलग-अलग हैं.पर, एक बात समान है कि सभी पर अच्छी-ख़ासी भीड़ इकट्ठी होती है, और चढ़ावे भी ख़ूब आते हैं, अच्छी कमाई होती है.
हरियाणा के सोनीपत और अंबाला में मामा भांजे की मज़ारें हैं.दोनों के पीर अलग-अलग हैं, मान्यताएं अलग-अलग हैं.अंबाला कैंट क्षेत्र में स्थित मामा भांजे की मज़ार पर चढ़ावे में घपले को लेकर बवाल हुआ तो सेना ने हस्तक्षेप कर मामले को शांत किया.अब यह मिलिट्री अथॉरिटी के क़ब्ज़े में है.
छतीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में गंज चौक के पास भी एक मामा भांजे की मज़ार है.बताया जाता है कि ये मामा-भांजा कभी किसी रियासत के सिपहसालार थे.इन्होंने किसी ज़ंग में शहादत दी थी.फिर, लोगों ने इनकी क़ब्र पर मज़ार बना दी और उन्हें पूजने लगे.यह सिलसिला आज भी जारी है.
मज़ार पर सजदा,चादरपोशी,कुरान और हदीस
मामा-भांजे की मज़ार, राजनांदगांव, छत्तीसगढ़
उतरप्रदेश के एटा जिले की जलेसर तहसील में स्थित मामा-भांजे की मज़ार दशकों पुरानी बताई जाती है.यहां दूर-दराज़ से लोग आते हैं, मन्नतें मांगते हैं और चादरें चढ़ाते हैं.
राजस्थान के हनुमानगढ़ नगर स्थित भटनेर दुर्ग में स्थित मामा भांजे की मज़ार क़रीब डेढ़ दशक से चर्चा में है.इसकी देखरेख ग़रीब नवाज़ युवा वेलफेयर सोसायटी करती है.
बिहार में गंगा किनारे बसे हाजीपुर जढुआ स्थित मामा भांजा या मामू-भांजा की मज़ार ऐतिहासिक बताई जाती है.यहां आम लोगों के साथ राजनेताओं की भी पूरी श्रद्धा है.ख़ासतौर से, उर्स के मौक़े पर प्रदेश के बड़े नेता-मंत्रियों के अलावा केंद्रीय मंत्री भी यहां मत्था टेकते नज़र आते हैं.
 
        

गधे की मज़ार

सुनने में अज़ीब ज़रूर लगेगा लेकिन, इस बात के भी दावे किए गए हैं कि अभाव में या जानबूझकर, कमाई करने के लिए कुछ लोगों ने अपने गधे या खच्चरों की मज़ार दी.अंधश्रद्धा के कारण ये मज़ारें भी चल निकलीं और एक अच्छा व्यवसाय बन गईं.पाकिस्तान और बांग्लादेश ही नहीं भारत में भी इसकी चर्चा आम है.
इसमें सच्चाई कितनी है, ये तो जांच का विषय है मगर, इस बारे में इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि अधिकांश इंसानी मज़ारों (यानि वे 99 फ़ीसदी क़ब्रें, जिनमें इंसान के दफ़न होने की बात कही जाती है) की तरह इनका भी इतिहास से कोई नाता नहीं है.उन्हीं की तरह ये भी तथ्यों से परे, क़िस्से-कहानियों से ही ताल्लुक रखती हैं.
हैरानी की बात ये है कि गधे पूजे तो जाते हैं मगर, इनकी मज़ारें दिखाई नहीं देतीं.
मज़ार पर सजदा,चादरपोशी,कुरान और हदीस
गधा (व्यंग्य चित्र)
बहरहाल, गधे की मज़ार का क़िस्सा बड़ा मज़ेदार है.यह न सिर्फ़ अन्धविश्वास को उजागर करता है बल्कि, इंसानी मजबूरियों और ज़िंदगी की जद्दोजहद की बड़ी साफ़ और सच्ची तस्वीर भी पेश करता है.
 
लोग बताते हैं कि एक फेरी वाले की एक मज़ार में बड़ी श्रद्धा थी.वह कपड़े बेचकर लौटता तो रास्ते में स्थित उस मज़ार पर रूककर उसके दर्शन ज़रूर करता था.यह उसका रोज़ का नियम था.यह देखकर वहां का ख़ादिम या मुजावर (सेवक, चढ़ावे आदि पर हक़ रखने वाला) बड़ा ख़ुश होता था.इस तरह फेरी वाले से उसे क ख़ास लगाव हो गया था.
 
एक दिन उसने फेरी वाले को एक गधा भेंट किया.
फेरी वाले के लिए यह गधा बड़े काम का साबित हुआ.एक तो उसे अब कपड़े का गट्ठर ख़ुद ढोना नहीं पड़ता था.साथ ही, वह ख़ुद भी गधे पर ही बैठकर दूर-दराज़ के इलाक़ों में भी कपड़े बेचने पहुंच जाता था.इससे उसे समय की बचत के साथ कमाई भी ज़्यादा होने लगी.उसका परिवार, जिसका गुज़ारा मुश्किल से हो पाता था, अब वह ख़ुशहाली की ओर बढ़ रहा था.
मगर एक दिन अचानक गधा बीमार हो गया.चलते-चलते रास्ते में जो बैठा, वह फिर उठ न सका.फेरी वाले पर तो मानो वज्रपात हो गया.उसका एक बहुत बड़ा सहारा छिन गया था.भविष्य अंधकारमय लगने लगा था.गधे के साथ मानो वह ख़ुद भी निढ़ाल हो गया था, बिखर गया था.
मगर उसने हिम्मत की, ख़ुद को समेटा, उठ खड़ा हुआ और एक गड्ढा खोदकर अपने साथी (गधे) की लाश को दफ़ना दिया.
शोक में डूबा फेरी वाला गधे की क़ब्र के पास बैठकर उसके साथ बिताए दिनों की याद कर रहा कि तभी उधर से गुजर रहे कुछ लोग वहां आए, सिर नवाया और कुछ पैसे रखकर चले गए.
फेरी वाला हैरान था.
वह दूसरे दिन भी आया.फिर वही सब कुछ देखा, तो उसे समझ आ गया कि माजरा क्या है.
अगले दिन वह सुबह सवेरे वहां पहुंच गया.क़ब्र को पक्का कर उस पर एक ख़ूबसूरत चादर डाल दी और ख़ुद भी ख़ादिम के कपड़े पहनकर वहीं बैठ गया.वहां का नज़ारा अब देखने लायक था.
धीरे-धीरे लोगों की तादाद बढ़ने लगी और गधे की मज़ार चल निकली.
फिर, एक दिन वह ख़ादिम, जिसने फेरी वाले को गधा भेंट किया था, भी उधर से गुज़रा तो मज़ार देखकर वहां दर्शन करने पहुंचा.मगर, यहां ख़ादिम की जगह फेरी वाले को देखकर अवाक रह गया.
दोनों मिले.नई मज़ार के नए ख़ादिम बने फेरी वाले ने पुरानी मज़ार के पुराने ख़ादिम का स्वागत किया और पूरी बात बताई.
पूरी बात सुनकर पुराने ख़ादिम ने कहा- बेटा, तुम नहीं जानते कि मैं जहां बैठता हूं, वह किसकी मज़ार है.वह दरअसल, इस मज़ार के अंदर जो बैठे हैं, इनकी माताजी की मज़ार है.
नए ख़ादिम बने फेरी वाले को अब हैरान होने का कोई कारण नहीं था.

मज़ारों पर चादर चढ़ाना और मन्नतें मांगना ज़ायज़ है?

जब कभी मज़ारों पर सवाल उठते हैं, इनकी आलोचनाएं होती हैं तो इनसे जुड़े लोग सामने आते हैं और अपनी दलीलें पेश करते हैं.वे कहते हैं कि क़ब्र वालों (पीर-औलिया जो क़ब्रों में बैठे हैं) से वे कुछ नहीं मांगते, उन्हें वसीला (मध्यस्थ, ज़रिया) बनाते हैं क्योंकि वे अल्लाह के क़रीबी हैं और उनकी सिफ़ारिश करेंगें/करते हैं.इनके अनुसार, क़ब्रों में दफ़न लोग पीड़ित-असहायों की बात अल्लाह तक पहुंचाते हैं, तो दुआ क़बूल हो जाती है.मगर कुरान की आयतों और हदीसों में देखें तो स्थिति बिल्कुल अलग ही नज़र आती है इनकी ये दलील खोखली और बेबुनियाद साबित हो जाती है.

मज़ारों के संदर्भ में कुरान की राय

कुरान में ऐसी कई आयतें हैं, जो क़ब्रों, उनमें बैठे पीर-औलिया और इन्हें पूजने वालों की हक़ीक़त बयान करती हैं.एक आयत में अल्लाह ने कुछ इस तरह फ़रमाया है-

” ये जान लो कि इबादत सिर्फ़ अल्लाह ही के लिए है, और जिन लोगों ने उसके सिवा औलिया बनाए हैं, वो कहते हैं कि हम इसलिए पूजते हैं कि ये हमको अल्लाह के नज़दीकी मर्तबा तक हमारी सिफ़ारिश कर दें, तो जिन बातों से ये इख्तेलाफ़ (असहमति) करते हैं, अल्लाह उनमें इनका फ़ैसला कर देगा.बेशक़ अल्लाह झूठे और नाशुक्रे (कृतघ्न) लोगों को हिदायत नहीं देता. ” (सूरह अज-ज़ुमर, आयत नंबर 3)

यानि अल्लाह इनके बीच उस बात का फ़ैसला करेगा, जिसमें वे असहमति रखते हैं.वह ऐसे झूठे और कृतघ्नों को सही रास्ता नहीं दिखाता.
 
मज़ार पर सजदा,चादरपोशी,कुरान और हदीस
अज़-जुमर की आयत संख्या 3 (सूरह 39:3)
यह भी ग़ौरतलब है कि दुआओं को अल्लाह को अलावा कोई और क़बूल करने वाला नहीं है.सिर्फ़ अल्लाह ही पूजने के क़ाबिल है.इसके बावजूद, लोग अल्लाह के बजाय उसके बनाए हुए इंसानों से फ़रियाद करते हैं, और उनसे भी जो क़ब्र के अंदर हैं, उनसे अपना दुखड़ा (हाजत) बयान करते हैं, निहायत ग़लत है.इस बाबत अल्लाह ने फ़रमाया है-
 

” भला कौन बेक़रार की इल्तिजा (प्रार्थना) क़बूल करता है, और कौन उसकी तकलीफ़ को दूर करता है, और कौन तुम्हें ज़मीन पर जानशीन (उत्तराधिकारी, वारिस) बनाता है (निश्चय ही यह सब कुछ अल्लाह ही करता है), तो क्या अल्लाह के सिवा कोई और भी माबूद (पूजने के लायक) है (हरगिज़ नहीं), मगर तुम इस पर बहुत कम ग़ौर करते हो. ” (सूरा अन-नमल, आयत संख्या 62)

 
इस प्रकार, स्पष्ट हो जाता है कि अल्लाह के बजाय उसके बंदों (जो कि उसी के द्वारा बनाए गए हैं, उसके कारण ही अस्तित्व में हैं) से किसी तरह की फ़रियाद करना, उनसे कुछ मांगना सर्वथा अनुचित है.लेकिन, विडंबना ये है कि लोग इस पर ध्यान नहीं देते.
 
मज़ार पर सजदा,चादरपोशी,कुरान और हदीस
अन-नम्ल की आयत संख्या 62 (सूरह 27:62)
अल्लाह के सिवा कोई नफ़ा या नुकसान पहुंचाने वाला नहीं है.फिर, क़ब्र वाले क्या दे सकते हैं? ज़ाहिर बात है, कुछ भी नहीं.वे न किसी को कुछ दे सकते हैं और न ही किसी से कुछ छीन सकते हैं.मगर, ज़ाहिलों के साथ-साथ समझदार लोग भी गफ़लत का शिकार हैं और क़ब्र वालों से उम्मीदें लगाए बैठे हैं.
 
लोग उनसे मांगना ज़ायज़ समझते हैं, जो कुछ देने के क़ाबिल ही नहीं हैं.यह सरासर शिर्क है.
 
अल्लाह ने फ़रमाया है-
 

” और ये कि (ऐ मुहम्मद सब से हटकर) यकसू (एक तरफ़) हो दीन-ए-इस्लाम की पैरवी किए जाओ, और मुशरिकों (अल्लाह के सिवा/बजाय किसी और को मानने वालों, बहुदेववादी, काफ़िर) में से हरगिज़ न होना, और अल्लाह को छोड़कर किसी ऐसी चीज़ को न पुकारना, जो न तुम्हारा कुछ भला कर सके, और न कुछ बिगाड़ सके.अगर ऐसा करोगे, तो ज़ालिमों में हो जाओगे. ” (सूरह युनूस, आयत संख्या 105-106)

 
इसमें स्पष्ट कहा गया है कि अल्लाह के अलावा या उसके बजाय किसी और से उम्मीद रखने वाला, उससे फ़रियाद करने वाला मुशरिक या काफ़िर (अल्लाह और उसके रसूल को इनकार करने वाला) है.वही ज़ालिम (जुल्मी, अत्याचारी) भी है और वाजिब-उल-क़त्ल (क़त्ल के लायक़) है.
 
मज़ार पर सजदा,चादरपोशी,कुरान और हदीस
युनूस की आयत नंबर 105-106 (सूरह 10:105-106)
मौत के बाद सबका मामला अल्लाह के हवाले हो जाता है.वे हमें नहीं सुन सकते.जब उन तक हमारी आवाज़ ही नहीं पहुंच पाती, तो वे हमारी दुआओं की सिफ़ारिश कैसे कर सकते हैं?
अल्लाह ने फ़रमाया है-

” और ये जिंदा और मुर्दा बराबर नहीं हो सकते, अल्लाह जिसे चाहता है, सुना देता है.और ये जो अपनी क़ब्रों में दफ़न हैं, तुम उनको नहीं सुना सकते. ” (सूरह फ़ातिर, आयत नंबर 22)

यह समझना ज़रा भी कठिन नहीं है कि जो सुन नहीं सकते वे किसी की बात को आगे पहुंचा भी नहीं सकते.फिर भी, जो लोग यह समझ नहीं पा रहे हैं दरअसल, वे ना समझने का ढोंग कर रहे हैं.
मज़ार पर सजदा,चादरपोशी,कुरान और हदीस
फ़ातिर की आयत नंबर 22 (सूरह 35:22)
क़ब्र वाले यानि क़ब्रों में दफ़न पीर-औलिया न तो सुन सकते हैं और न ही बोल/ज़वाब दे सकते हैं.कुरान में अल्लाह ने फ़रमाया है-
” और उस शख्स से बढ़कर कौन गुमराह हो सकता है, जो ऐसे को पुकारे जो क़यामत तक उसे ज़वाब न दे, और उनको इसके पुकारने की ख़बर की ही ख़बर न हो. ” (सूरा अहकाफ़, आयत नंबर 5)
कमाल की बात है.पुकारने वाला ये समझ बैठा है कि उसकी बात सुन ली गई है, जबकि सुनने वाले (जिसे पुकारा गया है) को ख़बर ही नहीं है कि उसे किसी ने पुकारा भी है.यानि बात बीच में ही अटकी हुई है.
मज़ार पर सजदा,चादरपोशी,कुरान और हदीस
अल-अहकाफ़ की आयत संख्या 5 (सूरह 46:5)
जो क़ब्रों में हैं, बेशक़ वे औलिया हों, पीर हों या पैग़म्बर हों, ये भी आम इंसानों की तरह ही रचे गए (मख्लूक़) हैं, इन्हें अल्लाह ने पैदा किया है.इन लोगों ने अपनी तरफ़ से कोई निर्माण (तख्लीक़) नहीं किया फिर भी, कुछ ज़ाहिल लोग इनसे मदद की गुहार लगाते हैं.इस बाबत कुरान में अल्लाह ने फ़रमाया है-

” और जिन्हें ये अल्लाह के सिवा (उससे हटकर) पुकारते हैं, वे किसी चीज़ को पैदा नहीं कर सकते बल्कि, वे ख़ुद भी पैदा किए जाते हैं/किए गए हैं.वे बेजान लाशें हैं, जिन्हें ये भी मालूम नहीं है कि कब उठाए जाएंगें. ” (सूरह अन-नहल, आयत नंबर 20-21)

सब कुछ बहुत साफ़ और आंखें खोलने वाला है.जिसने पैदा किया है, उसे छोड़कर उसके द्वारा पैदा किए गए लोगों को, जो अब वजूद में भी नहीं हैं, उन्हें पुकारा जा रहा है.बेजान लाशों से अपनी दुनिया का पता पूछा जा रहा है.
मज़ार पर सजदा,चादरपोशी,कुरान और हदीस
अन-नहल की आयत संख्या 20-21 (सूरह 16:20-21)
सच तो सच ही होता है और झूठ तभी तक चलता है जब तक सच से उसका सामना नहीं हो जाता.बहरहाल, कुरान की आयतों के अलावा कई हदीसें भी देखने को मिलती हैं, जो क़ब्र और क़ब्रपरस्ती की हक़ीक़त बयान करती हैं.

हदीसों की रौशनी में मज़ार की हक़ीक़त

क़ब्रों की सेवा में लगे, चढ़ावा बटोरने वाले (मुजावर) लोग वहां पूजा या इबादत करते हैं, और ये समझते हैं कि पीर-औलिया लोगों की ख़्वाहिशें (हाजतें) पूरी करेंगें.मगर, हक़ीक़त में वे ज़ाहिलियत के शिकार, गुमराह और बदतरीन लोग हैं.
 
पैग़म्बर मुहम्मद ने फ़रमाया है-
 

” मेरी उम्मत (मुस्लिम समुदाय) के बदतरीन लोग वे होंगें, जो क़ब्रों की इबादत करेंगें, और उनकी ज़िंदगी में ही उनके ऊपर क़यामत आएगी. ” (मुस्नद अहमद, हदीस नंबर 4844)

 
एक वाकये में पैग़म्बर मुहम्मद साहब कहते हैं-

” यहूद-ओ-नसारा (यहूदी और ईसाई) पे अल्लाह की फटकार जिन्होंने अपने नबियों की क़ब्र को सजदहगाह (सजदे की जगह, इबादतगाह) बना लिया. ” (सहीह बुख़ारी, हदीस नंबर 435-436)

पैग़म्बर साहब आगे फरमाते हैं-

” ऐ मेरी उम्मत के लोगों, ख़बरदार हो जाओ कि तुमसे पहले जो लोग गुज़रे हैं उन्होंने अपने औलिया और अम्बिया की क़ब्रों को अपना इबादतगाह बना लेते थे, ख़बरदार…तुम क़ब्रों को इबादतगाह मत बनाना, मैं तुम्हें ऐसा करने से मना करता हूं. ” (सहीह मुस्लिम 1188)

आज अगर अल्लाह का कोई नेक बंदा मृत्यु को प्राप्त होता है, तो लोग उसे पक्का कर उसे  मज़ार की शक्ल दे देते हैं.इस पर अल्लाह के रसूल (पैग़म्बर मुहम्मद) ने सख्त़ ऐतराज़ किया है, मना किया है-

हज़रत जाबिर से रवायत है कि  रसूलल्लाह (अल्लाह के रसूल, पैग़म्बर मुहम्मद) ने क़ब्रों को पक्का करने, वहां बैठने की जगह बनाने या वहां कोई इमारत खड़ी करने से मना किया है. (सहीह मुस्लिम, हदीस नंबर 970, अबु दाउद, हदीस नंबर 3225)

  
जो लोग क़ब्रों के सेवादार बने बैठे हैं, वहां चढ़ावा आदि लेते हैं, उनके लिए बहुत बड़ा अज़ाब है, जैसा कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इस हदीस में ज़िक्र है-

हज़रत अबु हुरैरा से रिवायत है कि रसूलल्लाह कहते हैं- ” जो शख्स किसी क़ब्र पर (सेवादार बनकर) बैठे उससे बेहतर है कि वह आग के अंगारों पर बैठे और आग उसके जिस्म और कपड़ों को जलाकर कोयला बना दे. ” (सहीह मुस्लिम, हदीस नंबर 971)

 
क़ब्रों की इबादत करने वाले यहां नमाज़ें भी पढ़ते हैं, मन्नतें मांगते हैं और चादरें चढ़ाते हैं.ऐसा वे क्यों करते हैं, इस सवाल पर ऐसी दलीलें पेश करते हैं, जो ना तो कहीं कुरान में दर्ज़ हैं, और ना ही हदीसों में मिलती हैं.
दरअसल, ये अपनी दुकानें चलाने-चमकाने के लिए लोगों को बेवकूफ़ बनाते हैं.इसके लिए इन्होंने कुछ हदीसों को तोड़-मरोड़कर इस तरह तैयार किया है कि कमअक्ल और आंखों पर अक़ीदे की पट्टी बांधे लोग समझ नहीं पाते, तर्क नहीं करते और बड़ी आसानी से गुमराह हो जाते हैं.मगर, इनकी यह हरक़त कितनी ग़लत है यह हज़रत सलमा की बयान की गई एक हदीस में साफ़ ज़ाहिर हो जाता है.इसमें पैग़म्बर मोहम्मद ने सख्त़ चेतावनी देते हुए कहा था-

” जो व्यक्ति मुझसे संबंध जोड़कर वह बात कहे जो मैंने नहीं कही, वह अपना ठिकाना जहन्नम में बना ले. ”

बहरहाल, मज़ारों के हिमायती हदीसों को तोड़-मरोड़कर किस तरह पेश करते हैं यह देखने की ज़रूरत है.
एक सही हदीस इस प्रकार है-
 

” हज़रत इब्ने अब्बास से रवायत है कि रसूलल्लाह की क़ब्र में सुर्ख (लाल) रंग की मखमली चादर रखी गई थी. ” (सुनन निसाई, हदीस 2011, अल-तिर्मिजी 1048)

 
तोड़-मरोड़कर पेश की हदीस इस प्रकार है-

” हज़रत इब्ने अब्बास से रिवायत है कि रसूलल्लाह की क़ब्र मुबारक पर सुर्ख रंग की मखमली चादर डाली गई थी. ”

दोनों में फ़र्क– स्पष्ट है कि उपरोक्त सही हदीस में चादर क़ब्र के अंदर (रसूलल्लाह की क़ब्र में) बताई गई है, जबकि तोड़-मरोड़कर पेश की गई हदीस में चादर को क़ब्र के ऊपर (रसूलल्लाह की क़ब्र मुबारक पर) बता/दिखा दिया गया है.
 
इस प्रकार, मज़ार वाले कुरान के आदेशों को तो मानते नहीं, हदीसों में काट-छांट कर/तोड़-मरोड़कर उनकी अहमियत को बट्टा लगा रहे हैं.

सही और ग़लत वसीला

वसीला का शाब्दिक अर्थ होता है मध्यस्थ या ज़रिया.इस्लाम में इसका ज़िक्र दुआओं के संदर्भ में मिलता है.
 
इस्लामी परंपरा में दुआओं के लिए किसी इंसान को वसीला (मध्यस्थ) बनाने की मिसाल मिलती है.कुरान की आयतों और कई हदीसों में भी इस बात का ज़िक्र मिलता है कि नेक और सालेह (सदाचारी) इंसानों को वसीला बनाकर अपने लिए दुआ कराई गई.इसे (इसी मिसाल को) मज़ारों-दरगाहों के समर्थक हथियार ( एक ख़ास दलील) के रूप में इस्तेमाल करते हैं और पीर-औलिया के वसीले को जायज़ ठहराने की कोशिश करते हैं.
 
मगर, जानकारों के मुताबिक़, क़ब्र-मज़ार वाले इस संदर्भ में पूरी बात नहीं बताते.वे यह नहीं बताते कि जिनका वसीला लिया गया, वे उस वक्त मौजूद और ज़िंदा थे या कि वफ़ात (मर चुके) पाए हुए.दरअसल, सच्चाई ये है कि जहां किसी अच्छे और सदाचारी (धर्मपरायण) व्यक्ति के वसीले से दुआ मांगने की चर्चा है, वहीं इस बात की भी स्पष्ट चर्चा है कि वह इंसान (जिसका वसीला लिया गया) उस वक़्त मौजूद और ज़िंदा था, न कि वफात पाया हुआ.
ग़ौरतलब है कि दुआ सिर्फ़ अल्लाह ही क़बूल करता है और दुआओं की कुबूलियत के लिए अगर वसीला लेना ही है तो ज़िंदा लोगों का वसीला लेना चाहिए न कि क़ब्र वालों का.
इस्लाम में मरे हुए इंसान का वसीला नाजायज़ है.यह शिर्क है और अल्लाह शिर्क को माफ़ नहीं करेगा.
एक मोमिन (पक्के मुसलमान) को यह ध्यान रखना चाहिए कि अल्लाह से दुआ करने के लिए किसी इंसान (मख्लूक़) को ज़रिया बनाने की ज़रूरत नहीं है.
कुरान में अल्लाह ने फ़रमाया है-

” तुम मुझसे दुआ करो, मैं तुम्हारी दुआ क़बूल करूंगा. ” (सूरह गाफिर, आयत नंबर 60)

फ़ातिहा पढ़ते समय मोमिन यह इक़रार करते हैं कि वे अल्लाह की इबादत करते हैं और अल्लाह ही से मांगते हैं-

” ऐ परवरदिगार, हम तेरी इबादत करते हैं और तुझसे ही मदद मांगते हैं. ” (सूरह अल-फ़ातिहा, आयत नंबर 4)

इनके अनुसार, इस्लाम अपने अच्छे आमाल जैसे नमाज़, रोज़ा, कुरान की तिलावत, ज़रुरतमंदों की मदद, अमानत की हिफाज़त वगैरह के वसीले की बात करता है.यही जायज़ वसीला है.
अल्लाह के रसूल पर दुरूद (दुआ और सलाम) भेजना भी एक अच्छा वसीला है, जिसकी वज़ह से अल्लाह दुआ क़बूल करता है.
अंत में और निष्कर्ष के रूप में यही कहा जा सकता है कि क़ब्रों की ज़ियारत को आने वाला हर ज़ायरीन अल्लाह या ईश्वर की नहीं बल्कि, एक मुर्दे की इबादत या पूजा करता है.ऐसी इबादत या पूजा इस्लाम में तो हराम है ही, सनातन हिन्दू धर्म भी निषेध है.इस्लाम के अनुसार, ‘अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं’ है, यानि अल्लाह के अलावा किसी दूसरे की इबादत शिर्क है.वहीं, सनातन हिन्दू धर्म में भी मृतकों की आत्मा की शांति के लिए पूजा होती है, मृतकों की नहीं.यह देवदोष की श्रेणी में आता है और पतन की ओर ले जाता है.यह तत्काल बंद होना चाहिए.

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    रामाशंकर पांडेय

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