समसामयिक

नुपुर शर्मा मामला: सुप्रीम कोर्ट के जजों की टिप्पणी लोकतंत्र की न्याय प्रणाली पर ऐसा दाग़ है, जो धुल नहीं सकता- पूर्व न्यायाधीश व लोक सेवक

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– 15 रिटायर्ड जजों, 77 सेवानिवृत्त लोकसेवकों और 25 सेवानिवृत्त सशस्त्र बलों के अधिकारियों व हज़ारों प्रबुद्ध जनों ने सुप्रीम कोर्ट के जज सूर्यकांत और जेबी पारदीवाला की नुपुर शर्मा पर टिप्पणियों को देश के लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध व राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा बताया है
 
– फ़ोरम फॉर ह्यूमन राइट्स एंड सोशल जस्टिस की ओर से सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को लिखे खुले पत्र में जस्टिस सूर्यकांत के रोस्टर को तब तक वापस लेने कि मांग की गई है जब तक कि वे रिटायर नहीं हो जाते
 
– सेवानिवृत्त जजों और कई वकीलों ने महिला नुपुर शर्मा के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट के जजों की टिप्पणियों को अहंकारी, अनावश्यक व ग़ैर-कानूनी बताते हुए उनके ख़िलाफ़ आपराधिक अवमानना का मामला चलाने की मांग की गई है
 
– ‘अगर मैं ट्रायल जज होता, तो सबसे पहले इन जजों (जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जेबी पारदीवाला) को बुलाता और कहता कि आप गवाही दीजिए और बताइए कि नुपुर शर्मा ने क्या ग़लत कहा, क्यों ग़लत कहा और उसका प्रभाव आप किस रूप में और कैसे देखते हैं’- दिल्ली हाईकोर्ट के जज (रिटायर्ड) एस एन ढींगरा ने कहा
             
हर तरफ़ से निराश, टूटा-बिखर चुका व्यक्ति जब शीर्ष न्यायलय का रुख़ करता है, तो उसे आशा ही नहीं, बल्कि विश्वास होता है कि उसकी सुनी जाएगी.जो कहीं भी नहीं मिल सका, वह न्याय यहां मिलेगा.मगर, नुपुर शर्मा के मामले में जो कुछ देखने को मिला है, उसने करोड़ों देशवासियों की भावनाओं को तो आहत किया ही है, इस धारणा को और अपनी दशकों पुरानी परंपरा को भी पलटकर रख दिया है.पूर्व न्यायाधीशों, लोकसेवकों व अन्य प्रबुद्ध जनों के शब्दों में, न्यायपालिका के इतिहास में, जस्टिस सूर्यकांत व जस्टिस जेबी पारदीवाला की दुर्भाग्यपूर्ण टिप्पणियां बेमेल हैं और सबसे बड़े लोकतंत्र की न्याय प्रणाली पर ऐसा दाग़ हैं, जो कभी धुल नहीं सकता.
 
नुपुर शर्मा मामला, जजों की टिप्पणी, न्याय व्यवस्था
सुप्रीम कोर्ट के जजों की टिप्पणी पर पूर्व न्यायाधीशों, लोक सेवकों की प्रतिक्रिया (सांकेतिक)
सुप्रीम कोर्ट के जजों के, न्याय मांगने गई एक महिला के प्रति व्यवहार से जनता तो हैरान और मायूस है ही, कानून के सम्मान और संविधान की रक्षा के लिए अपना जीवन खपा चुके लोगों को भी बड़ी निराशा हुई है.वे मानते हैं कि जजों का व्यवहार अनुचित है.ग़ैर-कानूनी भी है.इस पर जल्द ध्यान देने की ज़रूरत है.चीफ़ जस्टिस एन. वी. रमण को चाहिए कि वे इस पर संज्ञान लेते हुए तत्काल क़दम उठाएं, क्योंकि समय रहते इसे सुधारा नहीं गया, तो इसके भयंकर परिणाम होंगें.
 
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है.इसको लेकर गोष्ठियां आयोजित हो रही है, जगह-जगह  परिचर्चाएं चल रही हैं.लोगों के अपने-अपने विचार हैं.दिल्ली हाईकोर्ट के जज (रिटायर्ड) एस. एन. ढींगरा कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के जजों की टिप्पणी ग़ैर-ज़िम्मदाराना और राजनीतिक है.उन्हें यही करना है, तो नेता बन जाएं, जज क्यों बने बैठे हैं?
बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट का यह मामला मौखिक टिप्पणियों से संबंधित है, जिसका आदेश या फ़ैसले से कोई लेना-देना नहीं होता.मगर यह आदेश का हिस्सा या उसके समतुल्य ही समझा जाता है, और इसका असर भी होता है.इससे एक धारणा या रिवायत बन जाती है.ऐसे, में इन टिप्पणियों के सन्दर्भ और पूरे मामले को समझना ज़रूरी हो जाता है.
 
   

घटनाक्रम की संक्षिप्त जानकारी  

कुछ दिनों पहले एक टीवी डिबेट शो के दौरान मुस्लिम कट्टरपंथी और पीएफआई-एसडीपीआई के नेता तस्लीम रहमानी के द्वारा शिवलिंग के बार-बार अपमान और उकसावे पर क्रोधित होकर बीजेपी प्रवक्ता नुपुर शर्मा ने तल्ख़ लहज़े में पैग़म्बर मुहम्मद से जुड़ी कुरान और हदीसों में लिखी बातों को सार्वजनिक रूप से कह दी थी.इससे देशभर में मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा न केवल उग्र प्रदर्शन, तोड़फोड़ और आगजनी हुई, बल्कि नुपुर शर्मा के ख़िलाफ़ फ़तवे जारी हुए और उनका रेप व सर कलम करने या ‘सर तन से जुदा’ करने के लिए इनामों की घोषणाएं हुईं.यहीं नहीं, सोशल मीडिया पर नुपुर का समर्थन करने वालों में राजस्थान के उदयपुर के कन्हैयालाल तेली और महाराष्ट की अमरावती के उमेश कोल्हे नामक हिन्दुओं की जिहादियों द्वारा निर्मम हत्या कर दी गई.
 
इस मामले में तथ्यों को तो नज़रंदाज़ किया ही गया, असली खलनायक तस्लीम रहमानी की भूमिका को भी पूरे घटनाक्रम से बाहर रख कर बड़ी चालाकी से केवल और केवल नुपुर शर्मा को दोषी बताया जाता रहा, जबकि आरएसएस, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल आदि हिन्दू संगठनों ने चुप्पी साध ली.न तो उन्होंने खुले मंचों पर नुपुर का समर्थन किया और न वे सड़कों पर ही उतरे.नतीज़तन, हुल्लड़बाज़ी के साथ राजनीति भी ख़ूब हुई और इस दौरान नुपुर शर्मा के ख़िलाफ़ देशभर के थानों में ईशनिंदा के आरोप वाली एफ़आईआर की एक लंबी फ़ेहरिस्त तैयार हो गई.
 
बीच मझधार में फंसी नुपुर शर्मा का उनकी अपनी पार्टी भाजपा ने भी साथ नहीं दिया.प्रवक्ता पद से हटाये जाने के साथ-साथ उन्हें पार्टी से भी निकाल दिया गया.
अब, नुपुर शर्मा बिल्कुल अलग-थलग पड़ गई हैं.
एक तरफ़ एक अकेली महिला है, तो दूसरी तरफ़ जिहादियों की फ़ौज और कई राज्यों की पुलिस है.जिहादी उसकी आबरू से खेलना और उसे ख़त्म कर देना चाहते हैं, तो अलग-अलग राज्यों की पुलिस मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए उसे पकड़कर जेल में सड़ाना चाहती है.
ऐसे में, इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में चौथे स्तंभ व अंतिम विकल्प के तौर पर केवल अदालत ही शेष रह जाती है, जो सबसे विश्वसनीय, निष्पक्ष और असली मददगार के रूप में नुपुर शर्मा की जान और आबरू की रक्षा के कर सकती है.नुपुर शर्मा ने यहां भी दस्तक दी.
चूंकि मामला राष्ट्रीय स्तर का था इसलिए, वह सुप्रीम कोर्ट की शरण में गईं.मगर, दुर्भाग्य.यहां भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी.कानून से जुड़े लोगों के अनुसार, सर्वोच्च न्यायलय ने उनके साथ इंसाफ़ और उनकी मदद करने के बजाय उन्हें दुत्कार कर भगा दिया.सुनवाई के दौरान कोर्ट ने फ़िल्मी स्टाइल में ‘न सबूत न गवाह फ़ैसला ऑन द स्पॉट’ की तर्ज़ पर बिना जांच व ट्रायल चलाए उन्हें दोषी बता दिया.इतना ही नहीं, केस वापस लेने के लिए मज़बूर किया गया और उन पर अनावश्यक और बेतुकी टिप्पणियां भी की गई हैं, जिससे न केवल उनके बचाव के सभी रास्ते बंद हो गए हैं, बल्कि एक नागरिक के तौर पर मूल अधिकारों से संबंधित उनका स्वाभाविक सुरक्षा कवच भी ध्वस्त हो गया है.
 
नुपुर शर्मा की याचिका पर सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने कहा-
” नुपुर शर्मा देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा हैं.जिस तरह से पूरे देश में भावनाओं को उन्होंने भड़काया है, उसी का परिणाम देखने को मिल रहा है.
 
देश में जो हो रहा है, उदयपुर में जो हुआ है, उसके लिए यह महिला अकेली ज़िम्मेदार है.इन पर सत्ता का नशा चढ़ा है.इन्होंने माफ़ी मांगने में बहुत देर कर दी.सशर्त माफ़ी मांगी.इन्हें राष्ट्रीय टीवी चैनल पर आकर माफ़ी मंगनी चाहिए. ”
ज्ञात हो कि जजों की ये टिप्पणियां बाहर आते ही तुरंत मीडिया में सुर्खियां बन गईं, इस पर डिबेट शुरू हो गया.इसको लेकर देश के आम जनमानस में इस पर प्रतिक्रिया देखने को मिली ही, कानून और लोकसेवा से जुड़े लोग भी मुखर हुए.
पिछले हफ़्ते 117 सेवानिवृत्त जजों, लोकसेवकों और कानूनविदों ने एक खुला पत्र (Open Letter) लिखकर अपना रोष ज़ाहिर किया है.उन्होंने सर्वोच्च न्यायलय के जजों जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस पारदीवाला की टिप्पणियों को दुर्भाग्यपूर्ण, लोकतांत्रिक मूल्यों के ख़िलाफ़ और देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा बताते हुए मुख्य न्यायाधीश एन. वी. रमण से उन पर कार्रवाई की मांग की गई है.उनकी टिप्पणियों को वापस लेने और नुपुर शर्मा के ख़िलाफ़ देशभर में दर्ज़ एफ़आईआर को क्लब कर या एक साथ जोड़कर उन्हें किसी एक राज्य में स्थानांतरित करने की मांग की गई है, ताकि मामले में अदालती कार्यवाही सही तरीक़े से हो सके.
इस मामले में दो पत्र लिखे गए हैं.पहला, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जेबी पारदीवाला की ओर से की गई टिप्पणियों के विरुद्ध 15 रिटायर्ड जज, अलग-अलग महकमों से रिटायर्ड 77 सीनियर अफ़सर और सेना के 25 रिटायर्ड अधिकारियों द्वारा हस्ताक्षर किया हुआ खुला पत्र है, चीफ़ जस्टिस को भेजा गया है.दूसरा पत्र फ़ोरम फॉर ह्यूमन राइट्स एंड सोशल जस्टिस, जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख ऐट जम्मू ने लिखा है.
रिटायर्ड जजों व अफ़सरों ने पत्र में कहा है-

” ये टिप्पणियां बहुत परेशान करने वाली हैं.इसमें अहंकार है.इस तरह की टिप्पणियां वे कैसे कर सकते हैं? भारत की न्यायपालिका के इतिहास में यह पहली बार हुआ है, जो अनुचित और निंदनीय हैं.यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की न्याय-व्यवस्था पर ऐसा धब्बा है, जो धुल नहीं सकता.इस पर तत्काल क़दम उठाए जाने की ज़रूरत है, क्योंकि इस तरह की बातें देश के लोकतांत्रिक मूल्यों और इसकी सुरक्षा के लिए ख़तरा बन सकती हैं. ”

बयानों में यह भी कहा गया है-

” हम ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में यह विश्वास करते हैं कि किसी भी देश का लोकतंत्र तब तक बरक़रार रहेगा, जब तक कि सभी संस्थाएं संविधान के अनुसार अपने कर्तव्यों का निर्वहन करती रहेंगीं.सुप्रीम कोर्ट के दोनों जजों ने अपनी टिप्पणियों में लक्षमण रेखा लांघी है और हमें यह बयान जारी करने पर मज़बूर किया है.इसको लेकर देश ही नही विदेशों में भी लोग हैरान हैं और तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं. ”

चिट्ठियों पर हस्ताक्षर करने वाले लोगों में बॉम्बे हाईकोर्ट के रिटायर्ड चीफ़ जस्टिस क्षितिज व्यास, गुजरात हाईकोर्ट के पूर्व जज एस. एम. सोनी, राजस्थान हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस आर. एस. राठौर, और जस्टिस प्रशांत अग्रवाल, दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज एस. एन. ढींगरा आदि मुख्य हैं.
नुपुर शर्मा मामला, जजों की टिप्पणी, न्याय व्यवस्था
पूर्व न्यायाधीशों व लोक सेवकों का मुख्य न्यायाधीश को खुला पत्र
इस प्रकार, पत्रों में मुख्य रूप से तीन तरह की मांगें रखी गई हैं-
1. जस्टिस सूर्यकांत के रोस्टर को उनके रिटायर होने तक की अवधि के लिए स्थगित करने यानि उसे स्थाई रूप से वापस लेने की मांग की गई है.ज्ञात हो कि रोस्टर का मतलब वह सूची होती है, जिसमें यह दर्ज़ होता है कि कौन-सी बेंच के पास कौन-सा केस जाएगा और उसकी सुनवाई कब होगी.
2. नुपुर शर्मा के ख़िलाफ़ जजों की टिप्पणियों को वापस लिया जाए.
3. नुपुर शर्मा के ख़िलाफ़ अलग-अलग राज्यों में दर्ज़ एफ़आईआर को एक साथ जोड़कर उन्हें किसी एक राज्य में स्थानांतरित कर दिया जाए.
इसके अलावा, देशभर से कई वकीलों और कानून से जुड़े अन्य लोगों ने पत्र लिखकर दोनों जजों के ख़िलाफ़ आपराधिक अवमानना का प्रकरण चलाने की भी मांग की है.
नेटीजन्स जजों के ख़िलाफ़ महाभियोग लाने की मांग कर रहे हैं.
बहरहाल, इस मुद्दे पर न्यूज़ मीडिया और सोशल मीडिया में बहस जारी है.दोनों ही में एक शख्शियत का इंटरव्यू भी बड़ा वायरल हो रहा है.ये शख्स हैं दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज एस. एन. ढींगरा, जो अपने सेवाकाल में तो मशहूर रहे ही हैं आज भी न्यायपालिका से जुड़े मुद्दों पर बड़ी बेबाकी से और बिना घुमाए-फिराए, सीधी अपनी राय रखते हैं.कुछ न्यूज़ चैनलों प्रसारित हो चुके इनके इंटरव्यू में वो सारी बातें आ जाती हैं, जो महिला नुपुर शर्मा के केस, ताज़ा हालात व सुप्रीम कोर्ट की भूमिका से संबंधित हैं.

पूर्व जज एस. एन ढींगरा का इंटरव्यू

जज ढींगरा का इंटरव्यू सवाल-जवाब के रूप में है, जिससे बेहतर समझा जा सकता है.
नुपुर शर्मा मामला, जजों की टिप्पणी, न्याय व्यवस्था
पूर्व जज एस. एन. ढींगरा व सुप्रीम कोर्ट (प्रतीकात्मक)
सवाल- सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को आप किस रूप में देखते हैं, जिसमें कहा गया है कि उदयपुर की घटना के लिए नूपुर शर्मा ज़िम्मेदार है? अथवा,
उदयपुर के कन्हैयालाल तेली की हत्या के लिए नुपुर शर्मा के बयानों को ज़िम्मेदार ठहराना जायज़ है?
जज एस. एन. ढींगरा का ज़वाब-
” मेरे हिसाब से यह टिप्पणी अपने आप में बहुत ग़ैर-ज़िम्मेदाराना है.सुप्रीम कोर्ट को कोई अधिकार नहीं है कि वह इस प्रकार की कोई टिप्पणी करे, जिसमें वह व्यक्ति, जो न्याय मांगने आया है, उसका पूरा करियर चौपट हो जाए या सभी न्यायलय (निचली अदालतें) पूर्वाग्रही/पक्षपाती (Prejudiced) हो जाएं.सुप्रीम कोर्ट ने एक प्रकार से बिना सुने, बिना कुछ किए नुपुर शर्मा पर चार्ज (आरोप) भी लगा दिया और उस पर फ़ैसला (Judgement) भी सुना दिया.
 
न गवाही हुई, न जांच, न उसे कोई अवसर दिया कि वह अपनी सफ़ाई पेश कर सके.इस प्रकार सुप्रीम का टिप्पणी करना न केवल ग़ैर-ज़िम्मेदाराना है, बल्कि ग़ैर-कानूनी भी है.किसी भी दृष्टिकोण से सुप्रीम कोर्ट को ऐसी टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है. ”
सवाल- अब यह धारणा बन गई है कि देश में जो कुछ भी हो रहा है, हिंसक वारदातें अंज़ाम दी जा रही हैं, उसके लिए नुपुर शर्मा ज़िम्मेदार हैं.नुपुर शर्मा के बयानों के कारण ही देश के कई हिस्सों में अराजकता का माहौल है, ऐसा सुप्रीम कोर्ट का कहना है.उसकी ओर से की गई यह टिप्पणी ग़लत है? अथवा,
 
सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि देश में जो भी अप्रिय घटनाएं हो रही हैं, उसके लिए नुपुर शर्मा अकेली ज़िम्मेदार हैं, क्या ग़लत है? यदि ग़लत है, तो कैसे?
जज ढींगरा का ज़वाब-
” देखिए, सुप्रीम कोर्ट भी कानून से ऊपर नहीं है, यह समझने की बात है.कानून यह कहता है कि किसी भी आदमी को दोषी ठहराने के लिए पहले उसके ऊपर आरोप तय (Framing of Charge) करने होते हैं.इसके बाद अभियोजन पक्ष अपना साक्ष्य प्रस्तुत करता है.फिर, आरोपी को मौक़ा मिलता है कि वह साक्ष्यों पर अपना बयान दे और अपने गवाह पेश करे.और इन सब के बाद यानि आख़िर में अदालत सभी साक्ष्यों के आधार पर अपना फ़ैसला सुनाती है.लेकिन, यहां तो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.यहां तो नुपुर शर्मा आने एफ़आईआर एक साथ जोड़ने और उन्हें एक राज्य में स्थानांतरित करवाने की प्रार्थना लेकर गई थीं, सुप्रीम कोर्ट ने इसके बजाय उनके बयान पर स्वतः संज्ञान ले लिया कि उनका बयान जनता को भड़काने वाला था.
 
अगर सुप्रीम कोर्ट के जजों को यह कहा जाए कि आप अदालत में आकर गवाही दें और बताएं कि यह बयान कैसे जनता को भड़काने वाला था, तो उन्हें पेश होना पड़ेगा.अदालत में जाकर यह बताना पड़ेगा कि उन्होंने कैसे यह बयान दिया.
 
अगर मैं ट्रायल कोर्ट का जज होता, तो सबसे पहले इन जजों को बुलाता कि आप आइए, गवाही दीजिए कि नुपुर शर्मा ने क्या ग़लत कहा, क्यों ग़लत कहा और उसका प्रभाव आप किस रूप में और कैसे देखते हैं.मीडिया रिपोर्टों या कुछ लोगों के बयानों पर अपनी राय क्यों बना ली? आपने ख़ुद क्या अनुभव किया, क्यों अनुभव किया, यह बताइए.
 
सुप्रीम कोर्ट का यह काम नहीं कि वह ट्रायल करे.किसी को भी ट्रायल के लिए सबसे पहले निचली अदालत में जाना होता है.नुपुर शर्मा को जजों ने कहा भी कि ‘आप हमारे पास क्यों आईं, जबकि मजिस्ट्रेट हैं ट्रायल के लिए’.तो फिर, यह बात ख़ुद सुप्रीम कोर्ट कैसे भूल गया कि ट्रायल तो मजिस्ट्रेट करता है, मैं क्यों कर रहा हूं? इसलिए यह ग़ैर-ज़िम्मेदाराना तो है ही, ग़ैर-कानूनी भी है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट सैकड़ों ऐसे फ़ैसले दे चुका है कि जजों को अपने केस से हटकर ग़ैर-ज़िम्मेदाराना बयान नहीं देना चाहिए.उन्हें केस से संबंधित बयान चाहिए.और यहां केस था कि ‘एफ़आईआर ट्रांसफर करिए.50 थानों में एफ़आईआर, उस पर ट्रायल हो.मेरी जान को ख़तरा है’.और यह एक तथ्य है क्योंकि ऐसे अन्य केस हो चुके हैं, जिनमे नुपुर शर्मा का समर्थन करने वालों की हत्या कर दी गई.ख़ुद नुपुर शर्मा को धमकियां मिलीं.उसे रेप की धमकी मिली.ऐसे हालात में सुप्रीम कोर्ट का ही यह अधिकार था कि वह अलग-अलग राज्यों में दर्ज़ जो मुक़दमे हैं, उन्हें एक राज्य में स्थानांतरित कर देता.मगर, सुप्रीम कोर्ट ने तो उसके ऊपर सुनवाई की नहीं, केस ज़बरदस्ती वापस करवा दिया (केस वापस लेने के लिए मज़बूर किया) और एक अज़ीब, ग़ैर-ज़रूरी और राजनीतिक बयान दे दिया, जिसका न्यूज़ मीडिया और अन्य लोग फ़ायदा उठा रहे हैं.
 
लोग यह कह रहे हैं कि वे तो बच्चे थे, भटके हुए थे.क्या भटके हुए बच्चे हत्याएं कर रहे हैं? वे कहां-कहां हत्याएं कर रहे हैं? और नुपुर शर्मा के बयान से पहले क्या इस प्रकार की हत्याएं नहीं हुईं? दरअसल, इस प्रकार की हत्याएं आज़ादी के पहले से हो रही हैं जब चुन-चुनकर लगों को इसलिए मार दिया जाता था कि वह हिन्दू है और उसने, उनकी नज़र में ग़लत (मज़हब के ख़िलाफ़) बयान दिया था.निश्चित रूप से जजों का बयान ग़ैर-ज़रूरी, ग़ैर-ज़िम्मेदाराना और ग़ैर-कानूनी है. ”
 
सवाल- सुप्रीम कोर्ट की ओर से मौखिक सख्त टिप्पणी की गई, साथ ही, याचिका वापस लेने के लिए दबाव भी डाला गया मगर, आदेश में यह सब कुछ नहीं कहा गया, क्यों?
 
जज ढींगरा का ज़वाब-
 
” अफ़सोस तो यही है कि सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करके सन्देश द्वारा अपना आदेश भेज दिया जनता में.अगर सड़क पर खड़ा व्यक्ति मौखिक टिप्पणी कर दे, तो उसका कोई महत्त्व नहीं होता.लेकिन, सुप्रीम कोर्ट के जज की मौखिक टिप्पणी का महत्त्व होता है.लोग उसे गंभीरता से ले लेते हैं.इसलिए मीडिया में डिबेट हो रहे हैं.सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रकार की टिप्पणी देकर लोगों को मौक़ा दे दिया है कि वे उसे भी बता सकें कि वह ग़लत है.लोग यह कह सकते हैं कि ‘आपने ग़लत किया है’.
 
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने ख़ुद को इतने निचले और उस स्तर पर ला खड़ा कर दिया है, जहां एक मजिस्ट्रेट भी नहीं पहुंचता है.मजिस्ट्रेट भी बिना पूरी सुनवाई किए ऐसे मौखिक आदेश नहीं देता जैसे कि सुप्रीम कोर्ट ने दिया है.मेरे ख्याल से सुप्रीम कोर्ट ने अपना स्तर गिरा लिया है. ”
 
सवाल- जब सुप्रीम कोर्ट में कोई अपनी शिक़ायत लेकर जाता है, तो असल प्रक्रिया क्या होती है?
 
जज ढींगरा का ज़वाब-
 
” जब भी सुप्रीम कोर्ट में कोई यह कहता है कि उसके ख़िलाफ़ कई राज्यों में केस हैं पहली बात तो यह है कि उसके पास एक ही रास्ता है कि वह सुप्रीम कोर्ट के पास जाए.सुप्रीम कोर्ट को ही यह अधिकार है कि वह अलग-अलग राज्यों में लंबित (Pending) केस को किसी एक राज्य में स्थानांतरित करे.
 
कोई भी हाईकोर्ट दूसरे हाईकोर्ट से ऐसे केस नहीं मंगवा सकता.ऐसे, में नुपुर शर्मा ने सही फ़ोरम चुना, सही पेटीशन दी और सही आधार बनाया कि उन्हें जान का ख़तरा है और रेप की धमकी भी दी गई है.अब, सुप्रीम कोर्ट इस बात का नोटिस जहां-जहां एफ़आईआर थी, उन राज्यों/सरकारों को देता, पूछता कि क्यों नहीं सभी एफ़आईआर एक ही जगह ट्रांसफर कर दिए जाएं.इसके बाद वह उन्हें अलग-अलग सुनता और फिर नुपुर शर्मा के वकील को सुनता और फ़ैसला देता कि इनके केस ट्रांसफर होने चाहिए या नहीं.फिर, चाहे वह दिल्ली न कर मुंबई करता या फिर मध्यप्रदेश करता, यह सुप्रीम कोर्ट का अपना और सही निर्णय होता.
 
मगर, ऐसा करने के बजाय उन्होंने नुपुर शर्मा के वकील को तो डांटा ही, केस का रुख़ भी बदल दिया.केस की सुनवाई तो की नहीं, ऊपर से नुपुर शर्मा और दिल्ली पुलिस पर टिप्पणियां कर दी.अगर आपको दिल्ली पुलिस से नाराज़गी है, तो उसे नोटिस दे देते और पूछते नुपुर को उन्होंने गिरफ़्तार क्यों नहीं किया.
 
यह कोई पहला केस तो नहीं है कि जिसमें एफ़आईआर करने के बाद तुरंत गिरफ़्तारी नहीं हुई.ऐसे बहुत सारे केस हैं जिनमें एफ़आईआर होने के बाद तुरंत गिरफ़्तारी नहीं होती.पुलिस जब तक यह नहीं समझ लेती कि वास्तव में अपराध हुआ है या नहीं, वह आगे नहीं बढ़ती.अभी सुप्रीम कोर्ट ने गाइडलाइन दी है 498 ए और 406 आदि के मामलों में कि एफ़आईआर होते ही एकदम से किसी को गिरफ़्तार नहीं किया जा सकता.पहले यह जांच करनी होगी कि अपराध हुआ भी है या केस फ़र्ज़ी है/एफ़आईआर ग़लत ढंग से दर्ज़ हुआ है.वास्तव में यह गाइडलाइन हर एफ़आईआर के लिए होनी चाहिए.ऐसा नहीं होना चाहिए कि एफ़आईआर दर्ज़ होते ही पुलिस किसी को उठा ले.
 
यह कानून ग़लत है कि एफ़आईआर दर्ज़ होते ही अरेस्ट कर लिया जाए.जब तक साक्ष्य न हो और यह स्पष्ट न हो कि वाकई कोई अपराध में सलग्न है, तब तक उसे अरेस्ट नहीं करना चाहए.लेकिन, यहां तो मामला ही उल्टा है.
 
बजाय पुलिस से पूछने के, जो वादी गया है, उसे ही डांटे जा रहे हैं.भाई, उसने तो नहीं कहा कि मुझे अरेस्ट न करो.और यदि आपको लगता है कि पुलिस ने उसके लिए रेड कार्पेट बिछा रखा है, तो पुलिस से पूछिए.ज़वाबदेही तो पुलिस की है न.
 
और सत्ता तो, जहां तक मैं जानता हूं हर आदमी जिस ओहदे पर है, उसे उतनी ही सत्ता मिली होती है.अगर नुपुर शर्मा बीजेपी में हैं और प्रवक्ता पद पर थीं, सीनियर लीडर हैं, तो उनकी भी कुछ न कुछ सत्ता ज़रूर होगी.लेकिन, उससे कहीं अधिक सत्ता तो सुप्रीम कोर्ट के जजों की है, जो इतने ऊंचे पदों पर बैठे हैं और सत्तासीन हैं.
 
अगर नुपुर शर्मा का कोई दायित्व है कि वह सोच-समझकर बोलें, तो उनसे कहीं ज़्यादा दायित्व सुप्रीम कोर्ट के जजों का है कि वे भी सोच-समझकर बोलें.यदि वे सोचते हैं कि वे राजा हैं और ‘किंग कैन डू नो रौंग’, तो यह अधिकार, हर आदमी सोचता है कि उसे भी है. ”
 
सवाल- अब ऐसी स्थिति में नुपुर शर्मा के पास क्या विकल्प है, ख़ासतौर से, सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों के बाद?
 
जज ढींगरा का ज़वाब-
 

” जहां तक मैं समझता हूं नुपुर शर्मा के ख़िलाफ़ जहां-जहां भी केस हैं, उन्हें वहां/सभी जगहों के हाईकोर्ट में जाना होगा कि या तो एफ़आईआर रद्द किए जाएं या फिर उन्हें एक ही जगह ट्रांसफर कर दिया जाए.सुप्रीम कोर्ट ने तो अपने दरवाज़े बंद कर दिए.हालांकि पेटीशन वापस हुई है, जिसका लाभ या होता है कि दुबारा सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं.लेकिन, सुप्रीम कोर्ट का जो फ़िलहाल रुख़ है, उसे देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि वहां दुबारा पेटीशन डाली जाए.बहुत मुमकिन है कि सभी हाईकोर्ट में ही जाकर सभी केस एक जगह ट्रांसफर करने की मांग करनी होगी. ”

 
सवाल- अब इस केस में नुपुर शर्मा जब निचली अदालतों में जाएंगीं, तो सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों का क्या असर होगा? इस मामले में ख़ासतौर से, मजिस्ट्रेट क्या सोचेंगें, वे इसे किस रूप में लेंगें?
 
जज एस. एन. ढींगरा का ज़वाब-
 
” इसमें जो सबसे बड़ी अफ़सोस की बात है वह यही है कि सभी मजिस्ट्रेट पूर्वाग्रहित/पूर्वनिर्धारित होंगें.इसमें होना वही है, जिसके बारे में सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही अपना रुख़ बता दिया है.इस बात का नुपुर शर्मा  के केस पर बहुत बुरा असर होगा.ट्रायल के ऊपर बहुत बुरा असर होगा और मैं जानता हूं कि किसी भी ट्रायल कोर्ट जज में या हाईकोर्ट के जज में इतना साहस नहीं है कि वे सुप्रीम कोर्ट के इन जजों को गवाह के रूप में अपनी अदालत में पेश होने के लिए बुलाए और कहे कि आप अपना क्रॉस एग्जामिनेशन करवाएं, बताएं कि वह सब कैसे है, जो आपने कहा है.
 
अगर किसी जज में इतना साहस है, तो यह ट्रायल वास्तव में एक असली ट्रायल होगी.
 
अगर किसी भी जज में ऐसा साहस नहीं है, तो सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी उसके लिए एक आदर्श वाक्य के रूप में रहेगी.और जो भी नुपुर शर्मा के विपक्ष में होगा, वह तो यही कहेगा कि देखिए कि सुप्रीम कोर्ट ने तो पहले ही कह दिया है.अब वे फ़ैसला क्या करेंगें जब सुप्रीम कोर्ट ने कह चुका है कि पूरे भारत में जितने दंगे हुए/हो रहे हैं, उनके लिए अकेली नुपुर शर्मा ही ज़िम्मेदार हैं.जो कुछ भी हो रहा है, उनके बयान के कारण ही हो रहा है. ”
 
किसी शायर ने कहा है-
मिट्टी का जिस्म ले के चले हो तो सोच लो,
इस रास्ते में एक समंदर भी आएगा| 

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    रामाशंकर पांडेय

    दुनिया में बहुत कुछ ऐसा है, जो दिखता तो कुछ और है पर, हक़ीक़त में वह होता कुछ और ही है.इस कारण कहा गया है कि चमकने वाली हर चीज़ सोना नहीं होती है.इसलिए, हमारा यह दायित्व बनता है कि हम लोगों तक सही जानकारी पहुंचाएं.वह चाहे समाज, संस्कृति, राजनीति, इतिहास, धर्म, पंथ, विज्ञान या ज्ञान की अन्य कोई बात हो, उसके बारे में एक माध्यम का पूर्वाग्रह रहित और निष्पक्ष होना ज़रूरी है.khulizuban.com का प्रयास इसी दिशा में एक क़दम है.

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