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मंदिरों में साईं बाबा की मूर्ति की स्थापना- आस्था या षड्यंत्र? इस के पीछे सोच क्या है जानिए

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शिरडी के साईं की कोई सदियों पुरानी परम्परा नहीं है. न तो वह कहीं पुराणों में दर्ज़ हैं और नहीं रावण का वध कर असत्य पर सत्य की विजय के ही प्रतीक हैं- राम की तरह. उल्टे वे शिरडी के ही एक सड़कछाप पहलवान मोहिद्दीन तम्बोली से अखाड़े में पटखनी खाकर ऐसे धूलधूसरित हुए जैसे गली के गुंडे के हाथों पिटे हों. कृष्ण की तरह महाभारत के सूत्रधार बनकर गीता का ज्ञान देने के बजाय साईं बाबा मटन और बिरयानी के प्रसाद के साथ चिलम फूंककर वातावरण धुआं-धुआं करते रहे. वे राजपाट से मुंह मोड़कर वे सत्य की ख़ोज में नहीं भटके-बुद्ध और महावीर की तरह. देश के कोनों को नापने नहीं निकले-शंकराचार्य की तरह.  उन्होंने आध्यात्म-ज्ञान का लोहा नहीं मनवाया दुनिया को-स्वामी विवेकानंद की तरह. साईं बाबा तो शिरडी के दो गांव राहाता और नीमगांव के बीच सिमटे ताज़िंदगी टोने-टोटके के ज़रिए गवाँरों को छलते रहे. फ़िर उस मस्ज़िद निवासी/क़ब्रगाही, मांसभक्षी और कर्मकांड विरोधी साईं को मंदिर की ज़रूरत क्यों आन पड़ी? जी हाँ, यह सवाल सुनकर साईं-भक्त और समर्थक ज़वाब नहीं देते, और भाग खड़े होते हैं, लेकिन हिन्दू विरोधी बाबा को ज़बरन हिन्दू मंदिरों में घुसेड़ रहे हैं, साईं चालीसा और मंत्र गढ़े और पढ़े जा रहे हैं.

हिन्दू देवी-देवताओं के समकक्ष दिखाए जाते साईं


जब यह साबित हो चुका है कि साईं कोई संत या महात्मा नहीं थे, यहां तक कि वे हिंदू संस्कारों या कर्मकांड के विरुद्ध कार्य करने वाले और मांसभक्षी तथा अय्याश क़िस्म के शख्श थे; ऐसे में, उन्हें मुस्लिम फ़क़ीर भी नहीं कहा जा सकता है, तो फिर उन्हें हिंदू देवी-देवताओं के समकक्ष खड़ा कर मंदिरों में उन की मूर्ति क्यों स्थापित जा रही है?

ख़ुद को यवनी कहने और सदा ‘अल्लाह मालिक़’ बोलनेवाले साईं 

ज़ाहिर है यह जानबूझकर हो रहा है, और योजनाबद्ध तरीक़े से हो रहा है. इस में पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है. लेकिन इस की वज़ह क्या है यह जानना बहुत ज़रूरी है. साईं को आख़िर मंदिर की ज़रूरत क्या है?

 

भगवान साबित करने की क़वायद  

दरअसल, ये सारी क़वायद साईं को भगवान बनाने की है. यदि वे भगवान प्रमाणित हो जाते हैं तो उनपर चढ़ा फ़क़ीरी का चोला उतर जाएगा और वो एक वैकल्पिक साधन की बजाय मूल आवश्यकता बन सकेंगें. यहाँ वैकल्पिक साधन और मूल आवश्यकता से मेरा आशय यह है कि साईं अब तक सिर्फ़ एक चमत्कारी फ़क़ीर के रूप में ही जाने जाते हैं इसलिए फटेहाल और मुसीबतों के मारे लोग जब ईश्वर, ख़ुदा या गॉड से निराश हो जाते जाते हैं, तो आज़माने के लिए साईं की शरण में जाते हैं. यानी साईं के पास लोग पहले नहीं बल्कि सब से आख़िर में पहुँचते हैं.

यूं कहिये कि लोग पहले अपने मत या आस्था के दायरे में अपने भगवानों/ख़ुदा के सानिध्य में ही तमाम संभावनाएं तलाशते हैं. निराशा या हताशा में वे साईं दरबार में हाज़िरी लगाने पहुँचते हैं- विकल्प के तौर पर. 
विदित हो कि आज़ के दौर में जब सामाजिक तथा सांस्कृतिक तानाबाना सिमटता जा रहा है, और लोग हर क़ीमत पर अपनी ख्वाहिशें पूरी करने को आमादा हैं, तो परंपराएं  टूटेंगीं ही. विचारशून्यता आएगी और आस्था भी चूर-चूर होगी.
साईं बाबा के लिए तो नियम या बंधन भी नहीं है. वह चाहे नशेड़ी हो, मांसाहारी हो या फ़िर चोर-लुटेरा हो, सिर्फ मन्नत और चढ़ावे से वास्ता है- पीर-मज़ारों और या दरगाहों की तरह. साईं सब पर मेहरबान हैं.

इसलिए, साईं के यहां भक्तों का रेला है. साईं के यहां जाना मेला घूमना जैसा है. दूसरी तरफ़, प्रबंधकों या व्यवस्थापकों के लिए यह आस्था में अवसर और फ़ायदे का बड़ा ज़रिया है. इस के लिए साईं को और अधिक ऊँचे रूतबे के साथ एक स्थाई और सर्वमान्य स्थान की भी आवश्यकता है- जैसे देवी-देवता, और उन के मंदिर होते हैं.

 
मग़र साईं भगवान बनें तो कैसे? बिना मंदिर मुमक़िन नहीं है. साथ ही, उनके नाम पर व्रत-त्यौहार और प्रतिक भी ज़रूरी हैं उनकी ठरकी छवि को ढंकने के लिए, जो उनके संत अथवा फ़क़ीर होने पर भी प्रश्नचिन्ह लगाती है. ऐसे में साईं ट्रस्ट व उसके आनुषंगिक संगठन जीतोड़ परिश्रम कर रहे हैं, तथा पैसे पानी की तरह बहाए जा रहे हैं. तिड़कमें रची जा रही हैं.

भगवान के रूप पेश किये जाते साईं 

  
बाबा बाजार बनेगा धर्म का धंधा 

बाबाओं के दिन लद गए लगते हैं. कमाई बढ़ने के बजाय घटती ही जा रही है. ऊपर से खर्चे बहुत हैं. विज्ञापन या प्रचार के लिए सोशल मीडिया से लेकर न्यूज़ मीडिया तक सबके मुंह पैसा लग चुका है. छोटी-बड़ी सभी दुकानों कमाई कर खज़ाना भरना है. ऐसे में, कोई भी अवसर लूट का अवसर दिखाई देता है. जिस में जितना दम है लूट लेता है.
जब बाबाओं का भविष्य अंधकारमय है तो साईं भक्त भी चिंतित हैं. यदि साईं डूबे तो अरबों-ख़रबों का साम्राज्य भी डूब जायेगा विजय माल्या की तरह. ऐसे में, साईं के फ़िर से किसी टूटी-फूटी मस्ज़िद में वापस जाना पड़ सकता है. लेकिन उन्हें यदि भगवान बनाकर मंदिरों में बिठा दिया जाता है तो न सिर्फ़ कमाई बढ़ेगी, बल्कि एक अलग धर्म चल पड़ेगा- साईं धर्म.
      

दौलत और शोहरत की बुलंदियों पर साईं

रोजी-रोज़गार के अवसर 

एक ओर जहां बाबा बाज़ार मंदी के दौर से गुज़र रहा है वहीं साईं ट्रस्ट और उस के आनुषंगिक संगठनों में लोगों की बढ़ती तादाद से रोजी-रोज़गार का सवाल पैदा हो गया है. सब को बराबर का अवसर चाहिए, और फ़ायदे भी. अगर ऐसा नहीं होता है तो आपस ही में प्रतिस्पर्धा शुरू होगी, और फिर मतभेद- जो विघटन की ओर ले जायेगा. लेकिन अगर साईं को भगवान बनाकर मंदिरों में बिठा दिया जाता है, तो स्थान के साथ अवसरों या दुकानों में भी भारी वृद्धि होगी. 

शिरडी साईं मंदिर में चढ़ावे में मिले नोट अलग़ करते कर्मचारी 

    

निष्कर्ष 

इस प्रकार, यह साफ़ हो जाता है कि मंदिरों में साईं की मूर्ति की स्थापना का मामला धार्मिक नहीं, बल्कि व्यापारिक-व्यावसायिक है. लेकिन यह अतिक्रमण के साथ ही ख़तरनाक भी है. इस से साईं बाबा के बाज़ार से जुड़े लोग जहां आबाद हो जायेंगें वहीं हिन्दुओं के मंदिर उन के हाथ से निकल जायेंगें. साथ ही, एक नया धर्म खड़ा होगा- साईं धर्म जो सनातन हिंदू धर्म के विखंडन का कारण बनेगा. यूं कहिये कि एक और बड़ा धर्मांतरण होगा सात बड़े धर्मांतरण की तरह. 

यह कैसे होगा, इस पर विद्वानों का कहना है कि मंदिरों में साईं बाबा की मूर्ति बिठाने के बाद साईं भक्तों की दखलंदाज़ी होगी, और वह बढ़ती जाएगी. फिर वे हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ वहां से बाहर निकालने का षड्यंत्र रचेंगें. इस से विवाद होगा और आख़िरकार आस्था व पूजा के केंद्र दंगल की जगह या अखाड़ा बन जायेंगें.   

सनातन हिन्दू धर्म के प्रतीक चिन्ह 

       
विद्वानों के अनुसार यह कोई बहुत कठिन भी नहीं है क्योंकि साईं समर्थकों को ये बख़ूबी पता है कि हिन्दू थोड़ा वाकयुद्ध करेंगें, हवा में लाठियां और त्रिशूल भी भांजेंगें, लेकिन ज़ल्द ही फ़िर ठंडे पड़ जाएंगें.

 
साईं समर्थक सूर्योदय और सूर्यास्त की सच्चाई की तरह इस बात से भी पूर्ण अवगत हैं कि धर्म से मुसलमान रहे साईं को यदि इस्लाम से जोड़ा और उन्हें, ख़ुदा तो बहुत बड़ी चीज़ है, पैग़म्बर भी बताया तो उनका सर्वनाश निश्चित है. एक दिन भी नहीं गुज़रेगा, सर तन से ज़ुदा हो जाएंगें, और साईं ट्रस्ट तथा दुनियाभर में फ़ैले उसके तमाम आनुषंगिक संगठन जलाकर राख़ कर दिए जाएंगें. साईं का नामोनिशान मिट जाएगा.

  
कमोबेश यही स्थिति अन्य अल्पसंख्यक धर्मों- सिख,जैन व बौद्ध आदि में भी है. इनके साथ भी धृष्टता का प्रतिफल यह होगा कि साईं समर्थकों को नाकों चने चबाने पड़ेंगें और अंततः उन की बर्बादी भी बहुत संभव है. इसलिए, साईं के चेलों ने बहुत आसान शिकार चुना है.

    
चलते चलते अर्ज़ है ये शेर… 
             
                                  जहालत रोग था जो दिल के अंदर,  
                                  वही मज़हब हमारा हो गया है। 

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