ख़तरे में देश- कौन है ज़िम्मेदार? क्या आतंकी सोच को ‘एक हाथ में कुरान, दूसरे में कंप्यूटर’ की नीति दे रही है खाद-पानी?
शिक्षा और विकास के नाम पर नफ़रती तंजीमों को धन और सुविधायें देना उन्हें मजबूत करने की कवायद है. लेकिन यह हमारे राजनेताओं को समझ नहीं आता है और वे अपने वोटबैंक में मस्त रहते हैं. राजनीतिक हल्कों में शह-मात का खेल हो रहा है, जबकि देश आज ख़तरे में हैं, और लोग डर के साये में जीने को मज़बूर हैं. पता नहीं कौन कहाँ और किस तरफ़ से मौत बन कर सामने खड़ा हो जाये! इसलिए सवालों के साथ अब उठ खड़े होने की भी ज़रूरत है इस से पहले कि बहुत देर हो जाये.

देश में बीते कुछ दिनों में भारी मात्रा में विस्फोटकों की बरामदगी, ज़हर बनाकर लोगों को मारने की साज़िश और फ़िदायीन हमले ने गंभीर चिंता के साथ एक बड़ी बहस को जन्म दिया है. इस का विषय है- जिहाद, जिसे न तो छुपाया जा सकता है, और नहीं झुठलाया जा सकता है. मगर यह सवाल भी बड़ा अहम है कि देश में जिहाद आख़िर इतने ख़तरनाक स्तर पर कैसे पहुंच गया? क्या इस में सरकार की नीतियां भी जिम्मेदार हैं, या फिर यूं कहिये कि सरकार ही जिहादी मानसिकता के पोषण की व्यवस्था कर और अवसर देकर उन ख़तरनाक़ साजिशों में मददगार बन रही है, जिन की संभावना भी नहीं के बराबर होती है? जिहादियों के नए-नए षड्यंत्र या विध्वंस के तरीक़े हमारी सुरक्षा एजेंसियों के सामने बड़ी चुनौती बन रहे हैं.

देश में आज हर तरफ़ डर का माहौल है. ग़रीब को इस बात का डर है कि उस का बच्चा जो मिड-डे मिल खा रहा है उस में किसी ने ज़हर मिला दिया तो क्या होगा. अमीर इस बात से डरा हुआ है कि वह जिस फ्लाइट में जा रहा है उस का पायलट आतंकी या जिहादी निकला तो क्या होगा.
मिडल क्लास के लोग जो ट्रेन और बस में सफ़र करते हैं वे आशंकित हैं कि ड्राईवर कहीं जिहादी मानसिकता वाला तो नहीं है. अगर हुआ, तो क्या होगा?
लोग इस बात से डरे हुए हैं कि एक जिहादी अगर ट्यूबवेल ऑपरेटर बन जाता है, तो क्या होगा.
ज़ाहिर है हज़ारों लोग एकसाथ मौत के मुंह में समा जायेंगें!
हालांकि यह डर या आशंका है पर लाज़िमी है. क्योंकि जब डॉक्टर-सर्जन, पैथोलोजिस्ट आतंकी बन रहे हों, लेक्चरर-प्रोफ़ेसर, साहित्यकार, फ़िल्मकार जिहाद करने लग गए हों, इंजीनियर ख़ूनी खेल की योजना बनाने लगे हों, तो भयभीत होना स्वाभाविक है. मगर क्यों?
क्या यह सब पहली बार हो रहा है? नहीं, तो अब इस में इतनी तेजी क्यों आई है? क्या है आख़िर असली मसला, और उस के मूल में क्या है?
वास्तव में, बहस का मुद्दा यही है. इस समस्या की जड़ या मूल में जायें तो दो कारण स्पष्ट दिखाई देते हैं- दीनी और सियासी. यानी मज़हबी कट्टरता और राजनीति, दोनों ही इस समस्या के लिए समान रूप से ज़िम्मेदार हैं.
कट्टर सोच देश के लिए कितनी और कैसे ख़तरनाक है जानिए
मुस्लिम समाज या फिर यूं कहिये कि इस्लाम में हराम-हलाल, मोमिन-काफ़िर, आदि अवधारणाएं ऐसी हैं जो दूसरे समुदाय से उन्हें अलग करती हैं तथा नफ़रत और संघर्ष की स्थिति बनाती हैं.
साथ ही, दारुल-इस्लाम (जहां निजामे-मुस्तफ़ा या इस्लामी शासन हो) और दारुल-हर्ब (काफिरों-मुशरिकों के शासन वाला देश) की अवधारणा मुसलमानों को सशस्त्र युद्ध या ख़ूनी जिहाद की ओर ले जाती है.
लेकिन इस के लिए ताक़त में होना ज़रूरी है. यानी मुसलमान जब संख्या-बल (अमूमन 30% से अधिक की आबादी में) या धन-बल या फिर दोनों में सक्षम हो जाये, तो उस का मक़सद दारुल-हर्ब की सत्ता को उखाड़ फेंक वहां मुस्लिम शासक को बिठाकर शरीयत या शरिया कानून नाफ़िज़ (लागू) करना-करवाना है. इसे फ़र्ज़-ए-किफायाह, फ़र्ज़-ए-ऐन कहा जाता है.
इस नज़रिए से देखें तो मुस्लिम समाज देश की दूसरी सब से बड़ी आबादी वाला समाज तो है, लेकिन यह आर्थिक रूप से यह पिछड़ा और कमज़ोर रहा है. यूं कहिये कि कांग्रेस-राज में मुसलमान सब से पिछड़ा (सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार- दलितों से भी पिछड़ा) और कमज़ोर था.
इस के विपरीत, मोदी सरकार के पिछले 11 सालों के कार्यकाल में मुसलमानों की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आया है. ग़रीबी की दर में तेजी से गिरावट आई है और श्रम बल भागीदारी में बढ़ोतरी हुई है. सामाजिक संकेतकों में साक्षरता और पुरुषों तथा महिला भागीदारी में वृद्धि हुई है, जो बढ़ती ताक़त को बतलाता है.
महत्वपूर्ण बात यह भी है कि अल्पसंख्यक कल्याण योजनाओं, विशेषकर ब्याजमुक्त ऋण वितरण और छात्रवृत्ति का प्रमुख लाभ मुसलमानों को ही मिला है. इस से अनेक छात्र-छात्राओं ने देश-विदेश में उच्च-शिक्षा प्राप्त की है. ख़ूनी जिहाद या उस की साजिशों में शामिल लोग भी उन्हीं लाभार्थी छात्र-छात्राओं में शामिल बताये जाते हैं.
विश्लेषकों के अनुसार मुस्लिम समुदाय कंकड़ के समान है. यानी जैसे पानी में कंकड़ नहीं घुल सकता है वैसे ही मुस्लिम समुदाय भी दूसरे समुदायों के साथ मिल-जुलकर नहीं रह सकता है. दुनिया के किसी भी गैर-इस्लामी मुल्क में देख लीजिये मुसलमान वहां अराजकता फैलाने में लगा हुआ है.
इंग्लैंड और यूरोपीय देशों का हाल किसी से छुपा नहीं है. ख़बरों के मुताबिक़ आजकल अमरीका भी परेशान है.
भू-राजनीति के विशेषज्ञों या अंतर्राष्ट्रीय जानकारों का कहना है कि मुसलमान (शरणार्थी के रूप में या घुसपैठ करके) जहां भी जाता है अपनी आबादी बढ़ाने और गिरोह बनाने में लग जाता है, और संख्या-बल में 30 फ़ीसदी या इस से ऊपर होते ही शरिया कानून की मांग करने लगता है. लिबरल लोग इसे ‘आज़ादी की मांग’ कहते हैं, जिसमें एक हाथ में विक्टिम कार्ड होता है तो दूसरे हाथ में बंदूक.
यह भी कहा जाता है कि मान्यताएं अलग हैं, खानपान और रहन-सहन अलग हैं तो रहने की जगह या देश भी अलग होना चाहिए.
इसी तर्ज़ पर भारत के दो टुकड़े हुए थे, और आज फिर से इस का बचा-खुचा भाग विभाजन की ओर जा रहा है.
ग़ैर-मुस्लिम देशों के ख़िलाफ़ जिहाद के बारे में क्या कहा गया है जानिए
इस्लाम के विस्तार के संदर्भ में कुरान और हदीसों में स्पष्ट संकेतों के अलावा, इस्लामी फ़िक्ह (इस्लामी कानून की व्याख्या) में दुनिया के देशों को दो भागों में बांटा गया है-दारुल-इस्लाम और दारुल-हरब. दारुल-इस्लाम को इस्लाम की भूमि, जबकि दारुल-हरब को युद्धभूमि या जंग का क्षेत्र कहा गया है क्योंकि यहां गैर-मुस्लिम का शासन होता है, शरिया लागू नहीं होती है, और मज़हबी सुरक्षा ख़तरे में होती है. यूं कहिये कि इसे दीन के लिए ख़तरा माना गया है, और इस्लाम के विस्तार का लक्ष्य रखा गया है.
सहीह बुखारी (किताब अल-ईमान, हदीस नंबर- 25) और सहीह मुस्लिम (किताब अल-ईमान, हदीस नंबर- 33) में हज़रत आयशा से रिवायत है- पैगंबर मोहम्मद ने कहा था:
मुझे हुक्म दिया गया है कि मैं लोगों से लडूं जब तक वे गवाही न दें कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद (पूजनीय, उपास्य) नहीं और मोहम्मद उन के रसूल हैं.
इस्लामी फ़िक्ह (जैसे इमाम अबू हनीफ़ा, अल-शाबयानी के विचारों) के अनुसार मुस्लिम शासकों (या मुसलमान जो ताक़त में हैं उन का) का फ़र्ज़ है कि वे दारुल-हरब को फ़तह करें, ताकि वहां शरिया नाफ़िज़ हो सके. लेकिन इस से पहले शांतिपूर्ण संदेश यानी दीन की दावत (कुरान, सूरह अन-नह्ल 16:125) देनी चाहिए. अगर जंग हो, तो गैर-मुस्लिमों को जजिया (कुरान, सूरह अत-तौबा 9:29) देकर रहने की अनुमति देनी चाहिए.
यानी गैर-मुस्लिमों (यहूदी, ईसाई, हिंदू, सिख, पारसी या कोई भी जो इस्लाम को न मानता हो) का देश (दारुल-हर्ब) चाहे वह लोकतांत्रिक क्यों हो, मुसलमानों के लिए दुश्मन देश है. उन का मक़सद उसे इस्लामी शासन के अधीन लाकर वहां शरिया कानून को स्थापित करना है. इस के लिए उन्हें लड़ना यानी जिहाद करना होता है.
जिहाद में, गैर-मुस्लिमों को और यहां तक कि मुनाफिक़ीन (ऐसे मुसलमान जो कलमा पढ़ते हैं, नमाज़ पढ़ते हैं, लेकिन दिल में कुफ्र या अविश्वास रखते हैं) को भी मारना जायज़ बताया जाता है. इसीलिए हैदराबाद निवासी डॉक्टर मोहिउद्दीन सैयद लोगों को मारने के लिए रिसिन (Ricin) नामक ज़हर बना रहा था. चीन से एमबीबीएस की पढ़ाई कर लौटा मोहिउद्दीन वह घातक ज़हर जैविक हथियार (Biological weapon) के रूप में खाने-पीने की चीजों के बाज़ार (फ़ूड मार्किट) में इस्तेमाल करने की योजना बना रहा था, ताकि एकसाथ बड़ी संख्या में लोगों की जान ली जा सके.
यह लिक्विड टेरर की साज़िश थी.
गौरतलब है कि जिहादी संगठनों में फ़िदायीन या आत्मघाती हमला (Suicide bombing) जायज़ या हलाल माना जाता है, जबकि कुरान (4:29) में ख़ुदकुशी (आत्महत्या) को हराम बताया गया है.
इसी मुद्दे पर दिल्ली में लाल किले के सामने आत्मघाती हमला करने वाला (Suicide bomber) डॉ. उमर मोहम्मद नबी एक वीडियो में अपनी दलील रखता नज़र आता है, जो उस ने विस्फोट को अंजाम देने से पहले रिकॉर्ड किया था. उस ने कहा है:
People misunderstand the concept of suicide attacks.
This is a step linked to a person’s destiny and in Islam it is called ‘martyrdom mission’.
There is no need to fear death. A person reaches the most dangerous mental state when he accepts that his death is destined at a particular time and place.

यानी (उस ने कहा है कि) ‘लोग आत्मघाती हमले की अवधारणा को ग़लत समझते हैं, या ग़लत नज़रिए से देखते हैं. यह किसी व्यक्ति की नियति से जुड़ा क़दम है, और इस्लाम में इसे शहादत अभियान कहा जाता है. (मुसलमानों को) मौत से डरने की ज़रूरत नहीं है. व्यक्ति तब सब से ख़तरनाक मानसिक अवस्था में पहुँचता है जब वह यह मान लेता है कि उस की मौत एक तय समय और स्थान पर होना निश्चित है.
यूं कहिये कि अल्लाह ने सब कुछ लिख दिया है, और इस्लाम के लिए जिहाद में यह भी जायज़ है.
तुष्टिकरण की नीति ने देश को संकट में डाल दिया है
भारत दुनिया का इकलौता देश है जहां राष्ट्रहित से ऊपर विधान है. व्यवस्था के ऊपर व्यवस्था ऐसी है जिस की जवाबदेही नहीं है. जिन जवाबदेही है उन का लक्ष्य हर क़ीमत पर चुनाव जीतना और सरकारें बनाना है.
समानता के नाम पर अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की अवधारणा है. सेक्यूलरिज्म वाली व्यवस्था में कुछ लोगों को ख़ास मज़हबी अधिकार प्राप्त हैं. उन के लिए विशेष व्यवस्था है. औरों को अनदेखा कर उन की पहले सुनी जाती है.
बड़ी बात यह है कि अल्पसंख्यकों में भी कम महत्वपूर्ण और ज़्यादा महत्त्व रखने वाले समुदाय हैं क्योंकि उन की आबादी ज़्यादा है. जी हाँ, मुसलमान देश की दूसरी सब से बड़ी आबादी वाला समुदाय है फिर भी अल्पसंख्यक है!

भारतीय राजनीति का स्याह चेहरा तब और उजागर हो जाता है जब यह देखा जाता है कि मुसलमान अगर किसी मामले में ग़लत भी हैं, और उस से समाज और देश में वैमनस्यता भी फ़ैल रही हो तब भी उन का समर्थन और पोषण किया जाता है. इसे ही व्यवस्था में तुष्टिकरण या तुष्टिकरण की नीति कहते हैं.
मोदी सरकार भी इसी रास्ते पर है. सत्ता में आते ही इस ने जो तुष्टिकरण आरंभ किया वह आज भी जारी है.
‘एक हाथ में कुरान, दूसरे में कंप्यूटर’ वाली नीति के तहत मोदी सरकार क्या कर रही है जानिए
एक हाथ में कुरान और दूसरे हाथ में कंप्यूटर या लैपटॉप आधुनिक संदर्भों में एक रूपक या छवि के रूप में उपयोग किया गया है, जिस का अर्थ है भारतीय मुसलमान अपने दीनी अक़ीदे या मज़हबी मान्यताओं को बनाये रखते हुए आधुनिक संसार की ज़रूरतों, शिक्षा और तकनीक को भी अपना सकता है. यूं कहिये कि यह परंपरा और आधुनिकता के बीच सामंजस्य या संतुलन बिठाने की बात है. इस लक्ष्य को लेकर मोदी सरकार क्या कर रही है, आइये जानते-समझते हैं.

मोदी सरकार (2014 से अब तक) ने अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय (Ministry of Minority Affairs) के माध्यम से शिक्षा, कौशल विकास, आवास, स्वास्थ्य, ऋण और अन्य क्षेत्रों पर केंद्रित कई योजनायें चलाई है जो ख़ासतौर से मुसलमानों के लिए बनी हैं अथवा उन का उद्देश्य मुसलमानों को अधिकतम लाभ पहुँचाना है. इसलिए, मंत्रालय के कुल बजट (जो कि संभी अल्पसंख्यकों- मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी के लिए होता है) और वितरण में लाभार्थी भी सब से अधिक (लगभग 70-80 फ़ीसदी) मुस्लिम ही हैं.
हालाँकि इन योजनाओं के लिए वर्ष-वार सभी आवंटित कुल बजट और व्यय-विवरण उपलब्ध नहीं हैं, और PIB (Press Information Bureau) और मंत्रालय की रिपोर्ट से भी इतना ही पता चलता है कि 2014-15 में कुल बजट 3711 करोड़, जबकि 2017-18 में कुल बजट 4195 करोड़ तथा कुल व्यय अनुपात 60%, 2023-24 में कुल बजट 3000 करोड़ तथा कुल व्यय अनुपात 33% (1032 करोड़) और 2025-26 में कुल बजट 3350 करोड़ का था. 2014-19 के पहले कार्यकाल में मंत्रालय पर कुल व्यय लगभग 22 हज़ार करोड़ रुपये हुआ, जिस में मुस्लिम सब से बड़े लाभार्थी रहे. इसलिए, योजनाओं, उन के उद्देश्य, मुस्लिम लाभार्थियों की संख्या और व्यय आंकड़ों को मोदी सरकार के 5-10 वर्षों के कार्यकाल-वार विश्वसनीय विश्लेषण को समझने की ज़रूरत है. प्रमुख योजनायें और उन पर व्यय विवरण इस प्रकार है:
| योजना का नाम | लक्ष्य | मुस्लिम लाभार्थी (2014-2024 तक) | व्यय (2014 से अब तक अनुमानित) |
| प्री मैट्रिक, पोस्ट मैट्रिक और मेरिट-कम-मीन्स स्कॉलरशिप | अल्पसंख्यक छात्रों को शिक्षा के लिए वित्तीय सहायता. मुस्लिम छात्रों पर विशेष ध्यान. | 2.37 करोड़ (2014-19); कुल 3.14 करोड़ अल्पसंख्यक छात्र. | 3,2000 करोड़ रुपये (स्कॉलरशिप पर कुल); 2014-24 में शिक्षा सशक्तिकरण पर 1,575 (2024-25 बजट) |
| नई मंज़िल (Nai Manzil) | ड्रॉपआउट मुस्लिम युवाओं को ब्रीज कोर्स, कौशल प्रशिक्षण और रोज़गार | 3 लाख+युवा प्रशिक्षित (मुख्यतः मुस्लिम) | 2015 से 500+ करोड़ (कुल कौशल योजनाओं में) |
| सीखो और कमाओ (Seekho aur Kamao) | युवाओं (मुख्यतः मुस्लिम) को कौशल प्रशिक्षण और नियुक्ति या प्लेसमेंट | 1.5 लाख+लाभार्थी | 200+ करोड़ (2014-24) |
| नया सवेरा (Naya Savera) | मुस्लिम युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं (UPSC, SSC) के लिए मुफ़्त कोचिंग | 50,000+छात्र | 100+ करोड़ |
| बेग़म हज़रत महल | मुस्लिम लड़कियों की सहायता | 50,000+ | 50+ करोड़ |
| नेशनल स्कॉलरशिप | लड़कियों की उच्च शिक्षा के लिए | लड़कियां | उपलब्ध नहीं |
| राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास एवं वित्त निगम (NMDFC) | मुस्लिम उद्यमियों को कम ब्याज ऋण (टर्म लोन, माइक्रो फाइनेंस) | 1.74 लाख लाभार्थी | 752 करोड़ रुपये (2014 से 2025 तक) |
| प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) | ग़रीब मुस्लिम परिवारों को सस्ता आवास | 33.61 लाख घर मुसलमानों को (कुल 34.65 लाख अल्पसंख्यकों के लिए) | 50,000+ करोड़ (कुल PMAY में मुसलमानों का हिस्सा) |
| प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) | मुस्लिम काहिलों को मुफ़्त LPG कनेक्शन | 1 करोड़+मुस्लिम महिलाएं लाभांवित | 5,000+ करोड़ (मुस्लिम हिस्सा) |
| स्किल इंडिया प्रोग्राम | मुस्लिम युवाओं को कौशल प्रशिक्षण | 22.7% लाभार्थी मुस्लिम (कुल 1 करोड़+) | 10,000+ करोड़ (कुल में मुस्लिम हिस्सा) |
| मल्टी-सेक्टरल डेवलपमेंट प्रोग्राम (MSDP) | मुस्लिम बहुल क्षेत्रों का विकास (शिक्षा, स्वास्थ्य) | 196 जिलों में (मुख्यतः मुस्लिम) | 5,000+ करोड़ (2014-24) |
कुल व्यय का सारांश: 1. मोदी सरकार के पहले कार्यकाल (2014-19) में अल्पसंख्यक कल्याण पर 22,000 करोड़ व्यय हुआ, जिसमें मुसलमान सब से बड़े लाभार्थी (स्कॉलरशिप में 75%+) रहे.
2. दूसरे कार्यकाल (2019-24) में बजट औसतन 3,000 करोड़/वर्ष; कुल- 15,000 करोड़, जिसमें शिक्षा-कौशल पर 40% ध्यान रहा.
3. 2014-25 तक अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय पर कुल 37,000-40,000 करोड़ रुपये व्यय (अनुमानित); मुसलमानों पर (प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष) 25,000-30,000 करोड़ व्यय (लाभार्थी आंकड़ों के आधार पर) हुआ.
4. बजट ट्रेंड देखें तो यह 2014-15 में 3,711 करोड़ से शुरू, 2025-26 में 3,350 करोड़ का रहा. कुछ वर्षों में कमी (जैसे 2023-24 में 38% की कटौती) हुई, लेकिन उपयोगिता 98% रही.
विश्लेषकों की राय में, ये योजनायें ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ यानी मुसलमानों का विश्वास या दिल जीतने के लिए चलाई गईं, जिनमें मुसलमानों को भरपूर लाभ मिला.
जम्मू-कश्मीर में तो सरकार ने हद कर दी. दूसरे अल्पसंख्यकों (सिख, जैन, बौद्ध, पारसी) के हक़ का पैसा मुसलमानों (जो वहां बहुसंख्यक हैं) पर ख़र्च कर रही थी, जबकि सुप्रीम कोर्ट में सरकार और प्रशासन, दोनों ने लिखित वादा किया था कि सुधार करेंगें. फिर, वहां से कुछ सकारात्मक ख़बरें भी आई थी. लेकिन अल्पसंख्यकों का केस लड़ चुके एडवोकेट अंकुर शर्मा बताते हैं कि कुछ भी नहीं बदला है. PMO अपने ही 15-सूत्रीय कार्यक्रम के ‘इम्प्लीमेंटेशन गाइडलाइन’ की धज्जियाँ उड़ा रहा है.
विदित हो कि देशभर में छात्रवृत्ति योजनाओं में प्री मैट्रिक-पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति और मेरिट आधारित छात्रवृत्ति समेत तक़रीबन 70 प्रकार की योजनायें (Schemes) हैं, जिनमें अल्पसंख्यक छात्रों को भेदभाव-रहित और सीधे आर्थिक सहायता देने का प्रावधान है, लेकिन पैसे का बहुत बड़ा हिस्सा मुस्लिम छात्रों में बांट दिया जाता है. प्री मैट्रिक छात्रवृत्ति का विवरण नीचे देखिये-

पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति वितरण विवरण नीचे देखिये-

एडवोकेट अंकुर शर्मा के मुताबिक़ सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास के बजाय मोदी सरकार केवल और केवल ‘मुसलमानों का साथ, मुसलमानों का विकास, मुसलमानों का विश्वास’ की नीति पर चल रही है.
इस का असर भी दिखाई देता है. आंकड़ों के अनुसार सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की भागीदारी 4.5-5% से बढ़कर 10% से भी अधिक हो गई है. गैर-सरकारी नौकरियों और रोज़गार में भी तेजी से सुधार आया है, और ताक़त बढ़ी है. मगर साथ ही मस्जिदों और मदरसों में हलचल भी बढ़ गई है.
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय का कहना है कि देश पर मंडराते संकट के सब से बड़े, या फिर यूं कहिये कि मूल कारण मदरसे हैं. मदरसे दरअसल, वह जगह हैं जहां दीनी तालीम के नाम पर मोमिन-काफ़िर, जिहाद और क़त्ल-ओ-किताल की बातें दिलोदिमाग़ में भरी जाती हैं. अपने बदन पर बम बांधकर फटने की प्रेरणा दी जाती है. इन्हें बंद कर देना चाहिए.
वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक टिप्पणीकार व सार्वजनिक वक्ता पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ट का कहना है कि मदरसों को बंद किये बिना देश में सेक्यूलरिज्म और सामाजिक सौहार्द की कल्पना भी बेमानी है. समाज कल्याण के नाम पर इन को दिया जाने वाला पैसा समाज का कल्याण नहीं, आतंकवाद का पोषण करता है. चाहे केंद्र की सरकार हो या राज्य सरकारें, उन से पूछा जाना चाहिए कि क्या ऐसा करना कसाई के हाथ में छुरी ख़रीदकर देने जैसा नहीं है?
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