साईं बाबा अफ़ग़ानिस्तान के पिंडारी लुटेरे थे?
ब्राह्मण और अवतारी पुरुष बनाम ज़िहादी मुसलमान पर बहस के बीच भोले-भाले श्रद्धालु और भक्त पिस रहे हैं.....

साईं समर्थकों के दावे
साईं समर्थक ये दावा करते हैं कि साईं का जन्म 28 सितम्बर 1835 में पाथरी गाँव के कश्यप गोत्र के यजुर्वेदी ब्राह्मण परिवार में हुआ था जिसे भूसारी परिवार के नाम से जाना जाता था.साईं का असली नाम था हरिबाबू भूसारी.साईं के इस तथाकथित गाँव में एक मंदिर बना हुआ है, जिसमें उनकी मूर्ति तथा कुछ अन्य चीज़ें भी रखी हुई है.मग़र तार्किक दृष्टि से यदि अवलोकन करें तो साईं का तथाकथित असली नाम,उनका परिवार, गाँव और मंदिर आदि सबकुछ योजनाबद्द रूप में स्थापित किए गए साफ़ दिखाई देते हैं.कड़ियाँ जोड़कर एक कहानी गढ़ी गई है.एक ज़ाल बुनने की एक नाकाम कोशिश हुई है.दावे स्वतः फ़र्ज़ी साबित हो जाते हैं.
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| साईं बाबा के कथित पाथरी गांव में उनका जन्मस्थान (प्रतीकात्मक चित्र) |
जन्म की तारीख़ और वर्ष स्पष्ट नहीं
साईं के जन्म की तारीख़ और साल के सवाल पर लेखक-विचारक एकमत नहीं हैं.कोई उनका जन्म 27 सितम्बर 1830 बताता है तो कोई 28 सितंबर 1835 को उनकी पैदाइश का दावा करता है.इनसे अलग़ कुछ ऐसे भी हैं जो उनकी जन्मतिथि 27 सितम्बर 1838 बताते हैं.अलग-अलग दावे, अलग-अलग तर्क और आधार.
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| साईं के जन्म-मृत्यु काल की उपलब्ध जानकारी |
साईं के माता-पिता के कई नाम
जिस प्रकार बाइबल में यीशु के दादा का नाम कहीं एली तो कहीं याक़ूब बताया गया है ठीक उसी प्रकार अलग़-अलग़ लेखकों ने साईं के माता-पिता के अलग़-अलग़ नाम बताए हैं.मसलन साईं के पिता का नाम किसी ने गोविन्द भाऊ बताया है तो किसी ने भगवंत राव.अलग-अलग नाम के साथ अलग-अलग विवरण हैं.लेकिन एक बात समान है और वो ये है कि उक्त सभी लेखक या तो साईं के भक्त रहे हैं या फ़िर साईं ट्रस्ट से जुड़े और लाभार्थी रहे हैं.जो भी हो,मग़र पिता तो एक ही होता है.
साईं की माता के भी तीन नाम-देवकी, देवगिरि और अनुसुइया आदि बताए गए हैं,जो भ्रमित करते हैं और विश्वसनीय नहीं माने जा सकते.लगता है कि लेखकों का आपस में तालमेल नहीं रहा होगा.
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| साईं के असली माता-पिता पर सवाल का प्रतीकात्मक फ़ोटो |
विवादों में पाथरी गाँव
पाथरी गांव को साईं की जन्मस्थली बताया गया है.मगर कौन-सी पाथरी? महाराष्ट्र वाली या फिर आंध्रप्रदेश वाली, साईं की असली जन्मस्थली है? यह शोध का विषय है.
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| साईं का कथित पैतृक पाथरी गाँव |
साईं समर्थकों के दावे का आधार
साईं समर्थकों के दावे के स्रोत अथवा आधार ‘सद्गुरु साईं दर्शन’ के लेखक शशिकांत शांताराम गड़करी,’कलियुग में साईं अवतार’ के लेखक काशीराम और अनुवादक प्रोफ़ेसर मेलूकोटे के श्रीधर हैं.ये कौन हैं ? दरअसल,ये तीनों या तो साईं भक्त हैं या फ़िर साईं ट्रस्ट जुड़े और लाभार्थी लोग हैं जिन्हें स्वतंत्र एवं निष्पक्ष लेखक-विचारक नहीं माना जा सकता.अपने तो आख़िर अपने ही होते हैं.
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| शांताराम गड़करी लिखित सद्गुरू साईं दर्शन |
साईं विरोधियों के दावे
विरोधी ये दावा करते हैं कि बाबा यानि संत अथवा फ़क़ीर के नाम से जाना जाने वाला शिरडी का साईं यानि प्रसिद्ध साईं बाबा दरअसल, कोई बाबा नहीं बल्कि एक अफ़ग़ानी पिंडारी लुटेरा था.उसका असली नाम था चाँद मियां.बहरूद्दीन का बेटा.वही बहरुद्दीन, अफ़ग़ानी पिंडारी लुटेरों के एक क़बीले का कुख्यात सरदार, जिसने झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को हराने में अंग्रेज़ों की मदद की थी.
दरअसल,औरंगज़ेब की मौत के बाद मुग़लिया सल्तनत अपनी अंतिम साँसें गिन रही थी और मराठा योद्धाओं ने हिन्दू साम्राज्य की बुनियाद तक़रीबन रख दी थी.ऐसे में, भारत के कट्टर मुसलमानों ने जहां हिन्दुओं के ख़िलाफ़ ज़िहाद छेड़ रखा था, वहीँ तक़रीबन ख़त्म हो चुके अफ़ग़ानी पिंडारी अपनी गुज़र-बसर के लिए संघर्षरत थे.कुछ पिंडारी जहां बतौर सैनिक विभिन्न रियासतों में अपनी बहादुरी और वफ़ादारी की मिसालें क़ायम कर रहे थे,वहीं, कुछ दूसरे, ज़िहादियों की शह पर उनके संरक्षण में भेष बदलकर महाराष्ट्र और आसपास के राज्यों के हिन्दू इलाक़ों में चोरी-चकारी और डाकाजनी करते थे.ऐसा भी कहा जाता है कि ये हिन्दू महिलाओं को निशाना बनाकर उनका अपहरण व बलात्कार करते थे.
अँगरेज़ हरी चादर वाले भिखारियों को ‘चादर वाले भिखारी’ (ब्लेंकिट बैगर) कहते थे.
कुछ दिनों बाद चाँद मियां फ़िर शिरडी वापस आया और यहीं उसने अल-तक़िया का ज्ञान लिया.फ़क़ीर का रूप धरा और सुलेमानी मुसलमानों की मदद से सालों से वीरान पड़ी एक मस्ज़िद को अपना ठिकाना बना जानबूझकर उसका हिन्दू नाम रखा द्वारकामाई.गाँव में एक विवाह समारोह के अवसर पर, एक मंदिर के पुजारी म्हालसापति ने चाँद मियां को ‘आओ साईं’ कहकर बुलाया और तब से वह ‘साईं’ के नाम से जाना जाने लगा.
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| पुलिस से भागते साईं की बुर्क़े वाली फ़ोटो |
साईं विरोधियों के दावों का विश्लेषण
हम देखते हैं कि साईं विरोधियों ने साईं की पहचान,चरित्र और राष्ट्रीयता पर विभिन्न दावे किए हैं तथा सम्बंधित दलीलें पेश की हैं.इतिहास का हवाला दिया है, जबकि इतिहास में कहीं इस प्रकार का ज़िक्र नहीं मिलता है.इतिहास में, हमें ना कहीं बहरुद्दीन मिलता है और ना ही कहीं चाँद मियां.ऐसा क्यों?
परन्तु,उपरोक्त सारी बातें क्या हवा में कही गई हैं? शायद नहीं.कहानियां और उनका सन्दर्भ अध्ययन करने पर लगता है मानो वे किवदंतियां हों.साथ ही, हम सभी ये जानते हैं कि सभी किवदंतियां भी सभी लोककथाओं की तरह झूठी नहीं होतीं.ऐसे में, ये ज़रूरी हो जाता है कि उन तमाम दलीलों का परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर विश्लेषण हो, ताकि सच उजागर हो और भ्रम की स्थिति समाप्त हो जाए.यहां उन मुख्य बिन्दुओं पर चर्चा आवश्यक है, जो दावे के आधार हैं.
पिंडारी लुटेरे बहरूद्दीन की कहानी
सन 1689 से लेकर 1818 तक पिंडारी भारत में भाड़े के सैनिक व लुटेरों के रूप में निर्बाध रूप में सक्रिय रहे थे.मग़र बहरूद्दीन नामक पिंडारी जिसका सम्बन्ध महाराष्ट्र आदि क्षेत्रों में लूटपाट से जुड़ा बताया गया है, भारत में उसकी सक्रियता संभावित कालखंड तक़रीबन 1800 से लेकर 1860 के बीच का बनती है.लेकिन, इस दौरान का इतिहास उठाकर देखें तो कहीं भी उसका ज़िक्र नहीं मिलता.फिर भी, सिर्फ़ इस आधार पर कि बहरुद्दीन का नाम लिखित इतिहास में कहीं दर्ज़ नहीं है, उसके वज़ूद को खारिज़ कर देना भी ग़ैरमुनासिब होगा क्योंकि उस दौर की रियासती व्यवस्था में आपराधिक रिकॉर्ड रखने की कोई व्यवस्था नहीं थी.
इतिहासकार राजबली पांडेय पिण्डारिओं को ‘लुटेरों का गिरोह’ बताते हैं.दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के मध्यकालीन इतिहास विभाग के प्रोफ़ेसर सैयद नज़मुल रज़ा रिज़वी कहते हैं-
”मध्यप्रदेश,राजस्थान और महाराष्ट्र में लुटेरे पिण्डारियों का एक गिरोह था, जिन्हें मराठों ने भाड़े का सैनिक बना लिया.मराठों के पतन के बाद वे टोंक के नवाब अमीर खां के लिए काम करने लगे.नवाब के कमज़ोर होने पर पिंडारियों ने अपनी जीविका के लिए फ़िर लूटमार शुरू कर दी.इससे महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में शांति-व्यवस्था मुश्किल हो गई.”
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| लूटमार में अभ्यस्त बेरहम पिंडारी लुटेरे |
लक्ष्मीबाई की सेना में पिंडारी
ये माना जाता है कि पिंडारी सिर्फ़ लुटेरे और ग़द्दार ही नहीं बल्कि वफ़ादार भी होते थे.ना उनकी कोई जात थी और ना कोई धर्म.वो जिसके साथ होते, वही उनका सबकुछ होता था और वो उसी के होकर रह जाते थे.रानी लक्ष्मीबाई की सेना में भी शामिल पिंडारियों में से कई वफ़ादार थे.इतिहास के मुताबिक़, ग़ुलाम ग़ौस खां रानी लक्ष्मीबाई की सेना के प्रमुख तोपची थे.
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| गद्दार पिंडारियों और अंग्रेजों के बीच घिरीं लक्ष्मीबाई |
गद्दारों की प्रामाणिकता?
अब सवाल ये है कि वो गद्दार कौन थे, जिन्होंने क़िले का दरवाज़ा खोला? वो कौन थे जिन्होंने रानी के छुपने की जग़ह व वहां पहुंचने का मार्ग बताया? उनकी कोई सूची उपलब्ध है क्या? ज़वाब है- नहीं.फिर उनकी पहचान कैसे हो? ऐसे में, ये कहना ग़लत नहीं होगा कि गद्दार पिंडारी बहरुद्दीन की मौज़ूदगी का दावा करने वाला उतना ही सच्चा अथवा झूठा है जितना कि उसे खारिज़ करने वाला.
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| आपराधिक रिकॉर्ड का प्रतीकात्मक चित्र |
चाँद मियां और उसकी करतूतें
चाँद मियां का हाल भी वही है जो बहरुद्दीन का है.वह भी लिखित इतिहास में नहीं मिलता.अहमदनगर स्थित वेश्या का वो तथाकथित घर जहाँ चाँद पैदा हुआ, साईं समर्थकों द्वारा ढूंढ़े गए तथाकथित पैतृक गाँव वाले घर की तरह ही किवदंतियों में ही शुमार है.लेकिन हां, भिखारी के भेष में लुटेरों की तथाकथित मुख़बिरी का रहस्योद्घाटन यानि चादर के साथ चाँद की गिरफ़्तारी और तदुपरांत उसकी आठ साल की ज़ेलयात्रा पर ज़रूरी शोध से बहुत सारी उम्मीदें हैं.इससे ना सिर्फ़ कई सारी अटकलों पर विराम लग सकता है, बल्कि शिरडी के साईं बाबा का असली चेहरा भी सामने आ सकता है.
चाँद मियां के सुलेमानी मुसलमानों से रिश्ते
मुसलमान और ईसाईयों के लिए जितना क़ुरान और बाइबल महत्त्व रखते हैं साईं समर्थकों के लिए ‘साईं सच्चरित्र’ भी उतना ही महत्वपूर्ण समझा जाता है.माना जाता है कि साईं के जीवन-चरित्र को दर्शाती ये पुस्तक साईं के परम भक्त गोविन्द रघुनाथ दाभोलकर (हेमाडपंत ) द्वारा साईं बाबा की प्रेरणा से लिखी गई है अथवा स्वयं साईं बाबा इसके लेखक हैं.इसमें लिखी बातें कथित सत्य एवं प्रामाणिक हैं.
”साईं बाबा मालेगांव के फ़क़ीर पीर मोहम्मद उर्फ़ बड़े बाबा (सुलेमानी मुसलमान ) का बहुत आदर किया करते थे.इस कारण, वे सदैव उनकी दाहिनी ओर ही बैठा करते थे.सबसे पहले वे ही चिलम पीते और फ़िर बाबा को देते, बाद में अन्य भक्तों को.जब दोपहर को भोजन परोस दिया जाता,तब बाबा बड़े बाबा को आदरपूर्वक बुलाकर अपनी दाहिनी ओर बिठाते और तब सब भोजन करते.बाबा के पास जो दक्षिणा एकत्रित होती, उसमें से वे 50 रूपए प्रतिदिन बड़े बाबा को दिया करते थे.जब वे लौटते तो उस वक़्त बाबा भी उनके साथ सौ क़दम दूर तक जाया करते थे.”
साईं हिन्दू थे या मुसलमान ?
साईं समर्थक साईं को हिन्दू ब्राह्मण तो दूर अबतक हिन्दू भी साबित नहीं कर पाए हैं.यही वजह है कि लोग उन्हें मुस्लिम फ़क़ीर मानने लगे हैं.
”कोई भी निश्चयपूर्वक यह नहीं कह सकता था कि वे हिन्दू थे या यवन.साईं ‘सुन्नत(ख़तना) कराने के पक्ष में थे.”
साईं सच्चरित्र ये ख़ुला कहता है कि ‘अल्लाह मालिक़ सदैव उनके होठों पर था (अध्याय-4,5 और 7).’ इसलिए साईं विरोधियों की ये दलील सही है कि उनके मुँह से कभी भी ‘भगवान मालिक़’, ‘राम मालिक़’ या फिर ‘कृष्ण मालिक़’ इसलिए नहीं निकला क्योंकि वो मुसलमान थे.बाद में, इसे ढंकने के मक़सद से ही ‘सबका मालिक़ एक’ गढ़ा गया जो साईं ने कभी बोला ही नहीं.
”मंदा त्वांची उदरिले ! मोमिन वंशी जन्मुनी लोंका तारिले !”
निष्कर्ष
ग़ौरतलब है कि बीती हुई घटनाएं ही इतिहास का हिस्सा बनती हैं, जिसका प्रत्यक्ष गवाह शायद ही कोई इतिहासकार स्वयं बनता है वर्ना एक से दूसरे तथा दूसरे से तीसरे और यहाँ तक की सबसे आख़िरी पंक्ति में खड़े किसी व्यक्ति की सुनी-सुनाई बातें ही दर्ज़ होकर हम तक पहुँचती हैं.इसलिए जानकारी का स्रोत जितना पुख़्ता है इतिहास में सच की गुंज़ाइश भी उतनी ही बनती है.इसमें सन्दर्भ बहुत महत्वपूर्ण होता है, जिसकी अनदेखी नहीं की सकती.
ऐसे में, निष्कर्ष के रूप में यहाँ ये कहा जा सकता है कि साईं विरोधियों के तमाम दावों और उनके पक्ष में दी गई दलीलों को झूठ बताकर पूरी तरह खारिज़ नहीं किया जा सकता.हालांकि, उनकी ओर से पेश कहानी के कई अंश साईं सच्चरित्र में दर्ज़ कहानियों की तरह ही काल्पनिक लगते हैं, तथा उनका कोई ऐतिहासिक प्रमाण भी उपलब्ध नहीं है.फिर भी, उनके सच साबित होने की संभावना प्रबल है.आवश्यकता है एक गहन शोध की.एक सिरा पकड़ने की.फिर तो तार से तार जुड़ते चले जाएंगें और पूरा सच सामने आ जाएगा.
और चलते चलते अर्ज़ है ये शेर… ख़ामोशी की गिरह खोले सर-ए-आवाज़ तक आए,
इशारा कोई तो समझे कोई तो राज़ तक आए !!
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