जिहाद
तालिबान का चरित्र: अफ़ग़ानिस्तान में लड़कियां और औरतें ही नहीं, मासूम लड़के भी बनाए जाते हैं सेक्स ग़ुलाम

. मदरसों में पढ़े, आसमानी क़िताब के उसूलों को अमलीजामा पहनाने वाले कहलाते हैं तालिबान. इंसानी दुनिया से बिल्कुल अलग है अफ़ग़ानिस्तान में तालिबानी दुनिया. लड़कियां और महिलाएं ही नहीं, मासूम लड़के भी बनते हैं तालिबान का शिकार. शादी के बहाने हवश पूरी करने के साथ नई ज़िहादी पौध विकसित करने की क़वायद में तालिबान. बच्चा बेरीश सेक्स की भूख मिटाने के अलावा हनी ट्रैप में भी किए जाते हैं इस्तेमाल
अफ़ग़ानिस्तान में सिर्फ लड़कियां और औरतें ही तालिबान की शिकार नहीं है बल्कि छोटी उम्र के मासूम लड़के भी उनके चंगुल में फंसकर नारकीय जीवन जीने को मजबूर हो जाते हैं.लड़कियों-औरतों की तरह ही उन्हें भी सेक्स ग़ुलाम बनाकर तालिबान न सिर्फ उनका शोषण करते हैं बल्कि हमलों में हथियार के रूप में भी इस्तेमाल करते हैं.
अधिकांश लोग ये जानते हैं तथा दुनियाभर में आज इसकी चर्चा भी है कि अफ़ग़ानिस्तान में लड़कियों और महिलाओं को तालिबान उनके घरों से ज़बरन उठाकर ले जाते हैं और उन्हें सेक्स ग़ुलाम बनाकर उनका शारीरिक शोषण करते हैं.लेकिन बहुत कम ही लोगों को ये मालूम है कि तालिबान अपने हत्थे चढ़े मासूम लड़कों के साथ क्या करते हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक़,पिछले तक़रीबन दो दशकों में इनका इस्तेमाल कर तालिबान ने हज़ारों अफ़ग़ान सैनिकों और पुलिसकर्मियों को मौत के घाट उतार दिया.
तालिबान अफ़ग़ानिस्तान में क्रूरता का दूसरा नाम है.ये बेरहम और क़ातिल मज़हब और शरिया क़ानून के नाम पर वो सबकुछ कर गुज़रते हैं जो इंसानी सोच से भी परे है.
अफ़ग़ानिस्तान में इंसानी दुनिया से बिल्कुल अलग है तालिबानी दुनिया.
ऐसे में सवाल उठता है कि सामान्य परिवारों से ही निकले ये तालिबान आखिर कौन हैं.
तालिबान आखिर हैं कौन?
तालिबान या तालेबान मूल रूप में अरबी भाषा के तालिब शब्द का बहुवचन रूप है.पश्तो भाषा में इसका अर्थ होता है विद्यार्थी यानि छात्र.ऐसे छात्र जो इस्लाम की कट्टरपंथी (हिंसा पर आधारित,जिहाद) विचारधारा में यक़ीन रखते हैं.
तालिबान दरअसल, एक सुन्नी इस्लामिक आधारवादी(देवबंदी विचारधारा से प्रभावित) परंपरागत आंदोलन है जिसमें पाकिस्तान तथा अफ़ग़ानिस्तान के मदरसों में पढ़ने वाले छात्र बड़े होकर बतौर मेंबर (सदस्य) शामिल होते हैं.
ये मेंबर मुजाहिदीन यानि जिहादी (धर्मयुद्ध करने वाले) कहलाते हैं जिनका मक़सद अल्लाह और उसके रसूल की राह में चलते हुए ज़ंग के ज़रिए इस्लामी राज्य की स्थापना कर वहां शरिया क़ानून लागू करना है.
इनके नेता मौलवी और क़बाइली गुटों के प्रमुख हैं.पहले मुल्ला उमर और फ़िर 2016 में मुख़्तार मंसूर की अमरीकी ड्रोन हमले में मौत के बाद से मौलवी हिब्तुल्लाह अखुंजादा तालिबान का चीफ़ है.
अखुंजादा तालिबान के राजनीतिक,धार्मिक और सैन्य मामलों का सुप्रीम कमांडर है जबकि कमांडर मुल्ला अब्दुल गनी बारादर तालिबान में दूसरी रैंक पर है.
सऊदी अरब के पैसों और पाकिस्तानी संरक्षण में पला-बढ़ा तालिबान, हमास और आईएसआईएस की तर्ज़ पर बना एक ख़तरनाक़ आतंकी संगठन है.
लड़कियों-महिलाओं को ज़बरन क्यों उठा ले जाते हैं तालिबान?
अफ़ग़ानिस्तान पर कब्जे के दौरान तालिबान द्वारा वहां के सांस्कृतिक मंत्रालय के नाम एक खुला पत्र ज़ारी किया गया था जिसमें उन्हें 15 साल से ज़्यादा उम्र की लड़कियों और 45 साल से कम उम्र की विधवाओं की सूची उपलब्ध कराने की बात कही गई थी.
उसमें ये भी कहा गया था कि उन लड़कियों-महिलाओं की तालिबान लड़ाकों से शादी कराई जाएगी मगर उससे पहले उन्हें पाकिस्तान के वज़ीरिस्तान ले जाकर फ़िर से तालीम देकर प्रामाणिक इस्लाम (मुसल्लत ईमान वाला यानि पक्का मुसलमान) में बदला जाएगा.
इसमें ‘कब्जे वाले इलाक़े’ शब्द का भी जिक्र था.
वह पत्र कुछ इस प्रकार का था –
” कब्जे वाले इलाक़ों में सभी इमामों और मुल्लाओं को तालिबान को 15 साल से ऊपर की लड़कियों और 45 साल से कम उम्र की विधवाओं की सूची मिलनी चाहिए.लड़कियों और महिलाओं की मुजाहिदीनों से शादी कराने के लिए पाकिस्तान के वज़ीरिस्तान ले जाने का वादा किया गया है जहां उन्हें इस्लाम में परिवर्तित कर पुनः एकीकृत किया जाएगा. “
महिलाओं को लूट का माल मानते हैं तालिबान
तालिबान जिन इलाक़ों को ज़ंग में जीत लेते हैं वहां क़ब्ज़ा कर लूटपाट करते हैं.
इस लूटपाट में हासिल क़ीमती चीज़ों,औरतों और बच्चों को माले ग़नीमत कहा जाता है.
आपस में बंटवारे के बाद इस माले ग़नीमत में से अपने उपयोग के लायक या पसंदीदा वस्तु/औरत और बच्चे को तो अपने पास रख लेते हैं जबकि बाक़ी/अतिरिक्त को मंडियों में बेच दिया जाता है.
क़ुरान में इस माले ग़नीमत और उसके बंटवारे का बाक़ायदा जिक्र है और यह रिवाज़ इस्लाम की शुरुआत (पिछले 1400 साल से) से ही चला आ रहा है.
लड़कियों-महिलाओं को सेक्स ग़ुलाम बना लेते हैं तालिबान
क़ब्ज़े में आईं/माल-ए-ग़नीमत में मिली लड़कियों-महिलाओं को तालिबान अपना सेक्स ग़ुलाम (यौन दासी) बनाकर उनके साथ अपनी सेक्स की हवस पूरी करते हैं.
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| क़ब्ज़े में आईं महिलाओं के साथ तालिबान का दुराचार (सांकेतिक) |
बताया जाता है कि शादी तो एक छलावा है.तालिबान महिलाओं को बीवी का दर्ज़ा देकर उनका ख़याल नहीं रखते.
महिलाएं अगर बीमार भी हों तो भी उनकी इच्छा के विरुद्ध उनके साथ संबंध बनाते हैं.
तालिबान अपने कैंपों/ठिकानों में उनके साथ रेप करते हैं,नोचते हैं और जानवरों जैसा सलूक करते हैं.
फ़ौज बढ़ाने के लिए ज़्यादा बच्चे पैदा करना मक़सद
एक ख़ास उम्र (प्रजनन आयु वर्ग और उपयुक्त) की होने के कारण महिलाएं तालिबान के लिए सेक्स की प्यास बुझाने के साथ-साथ बच्चे पैदा करने का साधन भी होती हैं.इसलिए मुजाहिदीनों में अपनी संख्या बढ़ाने के लिए ज़ल्दी और ज़्यादा-से-ज़्यादा बच्चे पैदा करने की होड़ लगी रहती है.
तालिबान ही तालिबान से खरीदते हैं औरतें और बच्चे
जब कोई तालिबान लड़ाका मारा जाता है तो उसका तालिबान भाई या क़रीबी रिश्तेदार उसकी बेवा/विधवा के संग लेविरेट मैरिज़ के तहत निक़ाह कर लेता है.
लेकिन, जब ऐसा कोई क़रीबी मौज़ूद नहीं होता तो उस स्थिति में तालिबान नेता उस औरत और उसके बच्चों की बोली लगाते हैं और सबसे ज़्यादा क़ीमत लगाने वाले के हाथों उन्हें बेच दिया जाता है.
दूधमुंही बच्चियों का भी यहां सौदा होता है ताकि उन्हें तैयार कर उनके ज़रिए आतंकवाद की नई पौध तैयार की जा सके.
मासूम लड़कों के साथ क्या करते हैं तालिबान?
तालिबान मासूम लड़कों को प्रशिक्षित कर उनके ज़रिए भी अपने नापाक़ इरादों को अंज़ाम देते हैं.
उनके द्वारा प्रशिक्षित किए जाने वाले विभिन्न लड़कों में शामिल सबसे पहले तो वे नाज़ायज़ बच्चे होते हैं जो विभिन्न तालिबानी कैंपों में पैदा होते हैं.ये मुजाहिदीनों द्वारा शारीरिक शोषण की शिकार उन महिलाओं द्वारा पैदा किए गए होते हैं जिन्हें ज़िस्म की मंडियों से खरीदकर या फ़िर कहीं से ज़बरन उठा कर लाया जाता है.
दूसरे, वे लड़के होते हैं जो पाकिस्तान,अफ़ग़ानिस्तान और भारत (ख़ासतौर से केरल,बंगाल और यूपी के मदरसों में पढ़ने वाले) के मदरसों से उच्च शिक्षा के नाम पर पाकिस्तान के वज़ीरिस्तान स्थित ख़ास मदरसे में लाए जाते हैं.
यहां उनका दिमाग नफ़रत और हिंसा से भरने के बाद उन्हें सरहद पार तालिबानी कैंपों में पहुंचा दिए जाते हैं.
तीसरे, वे लड़के होते हैं जो अफ़ग़ानिस्तान के ही मूल निवासी होते हैं और तालिबान उन्हें हमलों और लूटपाट में बतौर माल-ए-ग़नीमत हासिल कर लेते हैं.उन्हें तालिबानी क़ब्ज़े वाले क्षेत्रों में शिक्षित/प्रशिक्षित किया जाता है.
कुछ मीडिया सूत्रों के मुताबिक़, कुछ अफ़ग़ान परिवार ख़ुद ही अपने मासूम लड़कों को तालिबान के हाथों बेच देते हैं.
प्रशिक्षण के लिए लड़कों का वर्गीकरण
तालिबान की एक ख़ास यूनिट में कुछ एक्सपर्ट (तजुर्बेकार व्यक्ति) होते हैं जो लड़कों की पहचान करते हैं.
वे उनकी शारीरिक बनावट और मानसिक विशेषताओं के आधार पर ये तय करते हैं कि किस लड़के को किस तरह के प्रशिक्षण की आवश्यकता है.फ़िर उन्हें अलग-अलग समूहों में बांटकर प्रशिक्षण दी जाती है.
वैसे तो सभी लड़कों को लड़ने की ट्रेनिंग दी जाती है लेकिन शरीर से मज़बूत और आक्रामक स्वभाव के लड़कों को विशेष युद्ध-कला और रणनीति सिखाई जाती है.
दूसरी तरफ़, सामान्य और कोमल स्वभाव के लड़कों को ‘बचा बाज़ी’ (बच्चा बाज़ी) के लिए तैयार करने के लिए अलग इंतज़ाम किए जाते हैं.उन्हें नाच-गाने के साथ-साथ अप्राकृतिक यौन संबंधों के लिए तैयार किया जाता है.
क्या है ‘बचा बेरीश’ और ‘बचा बाज़ी’?
मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा अफ़ग़ानिस्तान से सनातन हिन्दू व्यवस्था को ख़त्म कर इस्लामिक व्यवस्था स्थापित किए जाने के बाद वहां कई तरह की सामाजिक बुराइयों का भी जन्म हुआ.उनमे से एक थी ‘बचा बाज़ी’ या ‘बच्चा बाज़ी’.एक ऐसी प्रथा- एक ऐसा खेल जिसमें बच्चा बेरीश यानि बिना मूंछ-दाढ़ी वाले लड़कों को औरतों के कपड़ों में सजा-संवारकर नचाया जाता है.
वृद्ध और जवान पुरुष इनके नाच-गाने का आनंद तो लेते ही हैं साथ ही उनके साथ अप्राकृतिक यौन संबंध भी बनाते हैं.
अफ़ग़ानिस्तान में कानूनी रूप से प्रतिबंधित होने के बावज़ूद वहां पश्तून समाज में यह प्रथा आज भी ख़ूब फल-फूल रही है.वे ‘एक महिला को अपवित्र करने’ की तुलना में इसे कहीं ‘अधिक नैतिक’ मानते हैं.
यह समलैंगिकता में पुरुष का पुरुष के साथ संबंधों का एक रूप है.इसे गुदा मैथुन या नितंब मर्दन भी कहते हैं.
ट्रोज़न हॉर्स की तरह बच्चा बेरीश का इस्तेमाल
इस बात के सबूत मौज़ूद हैं कि बच्चा बाज़ी के लिए प्रशिक्षित बच्चा बेरीश का इस्तेमाल एक लंबे अरसे से तालिबान दुश्मनों को ख़त्म करने के लिए करता आया है.
वे ट्रोज़न हॉर्स की तरह बच्चा बेरीश को दुश्मन के गढ़ में पहुंचा देते हैं और उनकी मदद से हमलों को अंज़ाम देते हैं.
यह एक तरह का हनी ट्रैप भी है.
तालिबान ख़ुद इन्हें अपनी हवस का शिकार तो बनाते ही हैं साथ ही इनका हनी ट्रैप के लिए भी इस्तेमाल करते हैं.
प्रशिक्षित बच्चा बेरीश नाच-गाकर दुश्मनों (विरोधियों,अफ़ग़ान पुलिस और सेना) को रिझाते हैं,उन्हें सेक्स संबंध के लिए ललचाते हैं और फ़िर उनका ‘पुरुष रखैल’ बनकर उनका सारा भेद और संदेश तालिबान को देते हैं.
यह सारा जाल ट्रोज़न हॉर्स हमले (एक कहानी जिसमें ग्रीक सैनिक लकड़ी के घोड़े में बैठकर ट्रॉय नगर के अंदर घुसने में कामयाब हो गए और फ़िर हमला कर सबकुछ तबाह कर दिया) की योजना की तरह बुना जाता है.
इन बच्चा बेरीश के संकेत मिलते ही पहले से तैयार तालिबान लड़ाके दुश्मन पर हमला कर उन्हें ख़त्म कर देते हैं.
कभी-कभार बच्चा बेरीश यह सबकुछ ख़ुद ही कर लेते हैं.
दरअसल, ये दुश्मन से इतना घुलमिल जाते हैं कि वह इन पर आंख मूंदकर यक़ीन करने लगता है.ऐसे में, मौक़ा देख ये खाने-पीने की चीज़ों में नशीले पदार्थ मिलाकर उन्हें बेहोश कर देते हैं और फ़िर मौत के घाट उतार देते हैं.
तालिबान ख़ुद उड़ाते हैं शरिया क़ानून की धज्जियां
ये कितनी अज़ीब बात है कि अफ़ग़ानिस्तान में जो तालिबान शरिया के नाम पर समलैंगिकों के लिए मौत की सज़ा का ऐलान करते हैं वही अपनी नापाक़ साजिशों को अंज़ाम देने के लिए समलैंगिकों का ही इस्तेमाल करते हैं.
दशकों से तालिबान नाबालिग लड़कों को बच्चा बाज़ी की प्रथा में धकेल कर उनका शारीरिक शोषण करने के साथ-साथ उनका जीवन भी दांव पर लगा रहे हैं मगर न तो बाल अधिकारों और उनके शोषण के खिलाफ़ बात करने वाले लोग आज तक मुखर हुए हैं और न संयुक्त राष्ट्र संघ ने ही इस मसले पर कोई चिंता व्यक्त की है.
बच्चा बाज़ी और तालिबान के सन्दर्भ में एक बार अफ़ग़ानिस्तान के उरुज़गान की अदालत ने कहा था –
” तालिबान यह देखने में अंधे नहीं हैं कि यह लत अफ़ीम से भी बदतर है. “
एक बच्चा बेरीश द्वारा कराए गए हमले में जिंदा बच निकला 21 वर्षीय मतिउल्लाह पहले अफ़ग़ान पुलिस में नौकरी करता था.आजकल वह एक दर्ज़ी की दुकान पर काम कर अपना व अपने परिवार का गुज़ारा करता है.
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| पूर्व पुलिसकर्मी मतिउल्लाह (बाएं) |
घटना के वक़्त मतिउल्लाह अपने साथियों के साथ तारिन कोट के पास एक चौकी पर सुरक्षा में तैनात था.वहां एक बच्चा बेरीश ज़बीहुल्लाह (काल्पनिक नाम) का काफ़ी आना-जाना था.रात में अक्सर वह कमांडर के पास चौकी में ही ठहरता था.
उसने एएफपी को बताया –
” हमारे चौकी कमांडर का ज़बीहुल्लाह के साथ अवैध संबंध था.उस रात भी ज़बीहुल्लाह कमांडर के ही साथ था.तभी अचानक तालिबान ने हमारी चौकी पर धावा बोल दिया.बहुत भयानक हमला था.हम तैयार नहीं थे.उन्होंने कमांडर समेत हमारे सभी साथियों को मार डाला.मैं अकेला जिंदा बचा था.मैंने मरने का नाटक किया.वे हमारे हथियार और गोला बारूद इकठ्ठा कर रहे थे और साथ ही अपनी बंदूक की नोक से भोंक-भोंककर ये देख रहे थे कि कहीं कोई जिंदा तो नहीं रह गया था.तभी ज़बीहुल्लाह ने घोषणा की – सभी मर चुके हैं.फ़िर वे जाने लगे तो ज़बीहुल्लाह भी उन्हीं के साथ हो लिया. ”
इसी प्रकार, एक अन्य पूर्व पुलिसकर्मी नज़ीबुल्ला भी इसी तरह के सुनियोजित हमले में बच निकला था.
वह ख़ुदको बहुत ख़ुशनसीब मानता है.
मगर उसके साथियों को एक नाचने-गाने वाले लड़के ने किस तरह मरवाया था यह सोचकर आज भी वह विचलित हो उठता है.
उसने एएफपी को बताया –
” उस लड़के का व्यवहार बहुत सामान्य था.हमें इसका अंदाज़ा भी नहीं था कि हमारे लिए वह ख़तरनाक़ साबित हो सकता था.मगर हम एक बड़ी ग़लतफ़हमी के शिकार हो गए.जो हुआ वह बहुत भयानक था.मैं जिंदा बच गया. ”
बताया जाता है कि आत्मघाती हमला बच्चा बेरीश से संबंधित हमलों से कम ज़ोखिम भरा है.उसमें जिंदा बचने की संभावना ज़्यादा होती है.
ऐसी घटनाएं भी सामने आई हैं जिनमें तालिबान के दुश्मन ज़हर के शिकार हो गए.उनके खाने-पीने की चीज़ों में ज़हर मिलाया गया था.यह काम तालिबान के सेक्स ग़ुलाम यानि बच्चा बेरीश द्वारा अंज़ाम दिया गया था.
यही तालिबान का इस्लाम है.
मगर, वे भी तो क़ुरान का ही हवाला देकर तमाम गुनाह करते हैं.ऐसे में, गुड टेररिज्म और बैड टेररिज्म में फ़र्क करने में उलझी दुनिया को आतंकवाद के ख़िलाफ़ अपनी नक़ली अवधारणा को बदलना होगा.
एक सकारात्मक सोच के साथ जब तक कोई ठोस क़दम उठाया नहीं जाता, दुनिया में शांति क़ायम नहीं हो सकती.
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