इस्लाम
शरिया क़ानून क्या है? क्या असली शरिया क़ानून से अलग है तालिबान का शरिया क़ानून?

. क़ुरान और हदीसों में लिखे नियमों को मिलाकर तैयार हुआ है शरिया क़ानून. शरिया सिर्फ़ क़ानून नहीं है बल्कि यह इस्लाम के अंदर सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से जीने के लिए क़ायदों को बयान कर करता है. शरिया के तहत पैगंबर मुहम्मद,इस्लाम और क़ुरान की आलोचना वर्जित है. शरिया में जिहाद के बारे में कहा गया है कि यह तब तक जारी रखना चाहिए जक तक पूरी दुनिया शरिया की शरण में न आ जाए. शरिया के अनुसार, एक मुसलमान का मक़सद सभी काफ़िरों और ग़ैर-मुसलमानों को धिम्मी बनाना है. पारंपरिक शरिया क़ानूनों में कुछ क़ानून गंभीर मानवाधिकारों का उल्लंघन करते हैं
इस्लाम के अंदर सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से जीवन जीने के लिए बने क़ायदों को शरीअत या शरिया क़ानून कहा जाता है.कुरान और पैगंबर मुहम्मद की सुन्नतों पर आधारित ये क़ानून मुसलमानों को ये बताते हैं कि अपने जीवन के हर पहलू को अल्लाह या ख़ुदा की इच्छा के अनुसार कैसे जीना चाहिए.
शरिया अथवा शरीअत दरअसल, इस्लामिक समाज के अंदर रहने के लिए उन नियमों का एक समूह है जिससे पूरी दुनिया में इस्लामिक समाज संचालित होता है.इसमें ज़िंदगी जीने के तरीक़ों के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के अपराधों के लिए दंड के प्रावधान भी किए गए हैं.
कड़े क़ानूनों में सरेआम कोड़े मारना,पत्थर मारना,सूली पर लटकाना,सिर धड़ से अलग कर देना आदि शामिल हैं.
अरबी भाषा में लिखी क़ुरान का बहुत कम ही लोगों को सही ज्ञान प्राप्त है.
यहां तक कि जानकार होने का दावा करने वाले अधिकांश मुस्लिम लेखक-विचारक आयतों में कोष्ठक (ब्रैकेट) लगाकर अर्थ का अनर्थ कर डालते हैं.
यह शिर्क़ भी है.
सरकारों की तरह भारतीय मीडिया का भी अपना एजेंडा है.वह भी इसमें तुष्टिकरण का रास्ता खोज लेती है.
यही स्थिति हदीसों के साथ भी है.जितने मुंह उतनी तरह की बातें.
मस्ज़िदों और मदरसों में बैठे मुल्ला-मौलवियों की तो बात ही निराली है.
सैफ़ुर रहमान मुबारक़पुरी और विलियम मुइर जैसे अनुवादकों और लेखकों की पुस्तकें जो इस्लामिक दुनिया के उच्च संस्थानों द्वारा मान्यता प्राप्त हैं वे न तो उतने प्रचलन में हैं और न आम लोगों की उन तक पहुंच ही है.
अब क़ुरान और हदीसों को सही और पूरी तरह समझे बिना शरीअत की सही व्याख्या कैसे संभव है? इसका अंज़ाम ये होता है कि एक नादान मुसलमान भ्रामक बातों में आकर न तो नादान रह जाता है और न ही इंसान, वह तालिबान बन जाता है.
ऐसे में ये शरीअत क्या है ये सवाल लाज़िमी हो जाता है.
आख़िर है क्या शरिया क़ानून?
शरिया क़ानून अथवा शरीअत से तात्पर्य इस्लामी क़ानूनी व्यवस्था से है.इसे क़ुरान और मौलानाओं के फ़ैसलों यानि फ़तवों को मिलाकर तैयार किया जाता है.
इस क़ानून की परिभाषा दो स्रोतों से होती है.इसका पहला स्रोत क़ुरान है जबकि दूसरा स्रोत हदीसों (अहादस) में दर्ज़ पैग़म्बर मोहम्मद द्वारा दी गई मिसालें हैं, जिन्हें सुन्नाह कहा जाता है.
शरिया क़ानून को बनाने की प्रक्रिया को फ़िक़्ह (मज़हबी तौर-तरीक़े) के नाम से जाना जाता है.
क़ुरान और हदीसों में दर्ज़ शरिया के बारे में बहुत से मामलों में विचार व्यक्त किए गए हैं – जैसे कि स्वास्थ्य, खान-पान, पूजा विधि, व्रत विधि, शादी, जुर्म, राजनीति, अर्थव्यवस्था इत्यादि.क्या शरई यानि इस्लामिक धर्म के मुताबिक़ है और क्या उसके खिलाफ़ है इस बात का ज़िक्र है.
शरिया क़ानून में अपराध की श्रेणियां
शरिया क़ानून को दो भागों में बांटा जाता है.इसके पहले भाग में ‘हद’ है जबकि दूसरे भाग में ‘ताज़ीर’ को रखा गया है.
दोनों में अलग-अलग तरह के अपराधों की विवेचना व सुनवाई का प्रावधान है.
हद की श्रेणी में दंड
हद का मतलब ही सीमा को लांघना होताहै.इसलिए ऐसे अपराध जो इस्लामिक नज़रिए से संगीन माने जाते हैं, उन्हें हद की श्रेणी में रखा गया है तथा उनके लिए उन्हीं के मुताबिक़ सज़ा की व्यवस्था की गई है.
इसमें अपराधी के हाथ काटकर दंड दिया जा सकता है.
व्यभिचार करने पर संगसारी (पत्थर मारकर) कर मौत के घाट उतारा जा सकता है.
इसके अलावा सार्वजानिक रूप से फांसी देने, सिर काटने (सर तन से जुदा करने) और कोड़े मारने की सजाएं भी शरिया के अनुसार दी जाती हैं.हालांकि सभी मुस्लिम देशो में हद अपराधों के लिए ऐसी सज़ाएं नहीं दी जातीं.
ताज़ीर की श्रेणी में दंड
ताज़ीर श्रेणी में छोटे-मोटे अपराध शामिल होते हैं.
ज़्यादातर मामलों में ज़ुर्माने वसूलने का प्रावधान है.इसलिए ऐसे मामलों में सज़ा के फ़ैसले जज के विवेक पर छोड़ दिए जाते हैं.
क़ाज़ी और इमाम करते हैं फ़ैसले
शरीअत के मुताबिक़ सज़ा को लेकर फ़ैसले करने वाले पारंपरिक जजों को क़ाज़ी कहा जाता है.
कुछ जगहों पर इमाम भी जज के रूप में काम करते हैं.मगर उनका काम सज़ा को लेकर मामलों का अध्ययन करना-कराना होता है.
शरिया क़ानून के स्रोत
मुसलमान ये तो मानते हैं कि शरीअत अल्लाह का क़ानून है लेकिन इसे कैसे परिभाषित और लागू किया जाए, इस बात को लेकर उनमें एकराय नहीं है.
इनमें कुल छह फ़िक़्ह हैं.इन्हें स्कूल ऑफ़ थॉट भी कहते हैं.
सुन्नी समुदाय में फ़िक़्ह
सुन्नी समुदाय में चार अलग-अलग फ़िक़्ह के नज़रिए हैं.
हनबली – यह शरिया नज़रिए का सबसे रूढ़िवादी (अतिवादी,कट्टर) और धार्मिक स्कूल है.
यह दुनियाभर में जिहाद के सभी तरीक़ों को बड़ी बारीक़ी से प्रसारित करता है.
अधिकांश मुस्लिम राष्ट्रों पर इसका वर्चस्व स्थापित है.
इसका अधिकांश उपयोग सऊदी अरब और नाइजीरिया में किया जाता है.
हनफ़ी – यह स्कूल उदारवादियों की गिनती में आता है.
इसमें कुछ सीमित आधुनिकता का माहौल देखने को मिलता है.
इसका प्रभाव बांग्लादेश, इंडोनेशिया आदि उदारवादी मुस्लिम देशों में है.
मलिकी – यह पैग़म्बर मुहम्मद की निज़ी ज़िंदगी (उनका रहन-सहन, आचार-विचार) से जुड़ी तथा उनके द्वारा कही गई बातों पर आधारित है.
शफ़ीई – यह दूसरे दर्ज़े का रूढ़िवादी स्कूल है जो पैग़म्बर मुहम्मद के सहाबा (साथियों) के विचारों पर आधारित है.
शिया समुदाय में फ़िक़्ह
शिया समुदाय में दो भिन्न फ़िक़्ह हैं.
इनका सिध्यांत शिया जाफरी या जाफरी न्यायशास्त्र के नाम से जाना जाता है.
कुछ जानकार इसे पांचवा स्कूल ऑफ़ थॉट बताते हैं.
बताया जाता है कि इसमें इस्लाम के क़ानूनों को खोजने में इज्तिहाद (कोशिश करना, रास्ता निकालना ) का उपयोग होता है.
इसके तहत जहां क़ुरान और हदीस का आदेश स्पष्ट न हो वहां अपनी राय से उचित रास्ता निकाला जाता है.
शिया और सुन्नी के बीच यह भी एक अंतर है और वैमनस्यता का कारण भी है.
क्या असली शरिया क़ानून से अलग है तालिबान का शरिया क़ानून?
नहीं, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है.
असली या नक़ली शरिया क़ानून जैसी कोई बात नहीं है क्योंकि तालिबान द्वारा लागू किया जाने वाला शरिया क़ानून भी वही शरिया क़ानून है जो कमोबेश दूसरे इस्लामिक देशों में व्यवहार में है और क़ुरान तथा हदीसों में दर्ज़ है.
फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि तालिबान क़ुरान और हदीसों में लिखे शरिया क़ानून नामक उन नियमों का पालन करवाने को लेकर सख्त़ी करते हैं जबकि दूसरे इस्लामिक देश अपनी सुविधा और अवाम के मिज़ाज़ के हिसाब से इसकी व्यवस्था करते हैं.
यह नुकसानदेह चीज़ों को अधिक या कम मात्रा में इस्तेमाल में लाने जैसी बात है.
दरअसल, यह एक प्रपंच है, एक ऐसा सफ़ेद झूठ है, जिसे एक ख़ास रणनीति के तहत सच पर पर्दा डालने के लिए, फ़ैलाया जाता है.
ऐसा करने वाले भी वही लोग हैं जो प्रत्यक्ष रूप से तो अमन और इंसाफ़ की बात करते हैं लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से भेदभाव और बर्बरता का ही समर्थन करते हैं, इस्लामिक आतंकवाद का नाम भी ज़ुबान पर नहीं लाते.
जो लोग तालिबान को परंपरावादी बताते हैं उनसे ये पूछना चाहिए कि क़ुरान और हदीसों में नया क्या है.उनमें पिछले कुछ दशकों में कुछ भी रद्दोबदल हुआ है क्या?
दरअसल, अकेले तालिबान ही क्यों, जैश-ए-मोहम्मद, अलक़ायदा, हक्कानी नेटवर्क, हमास और आईएसआईएस भी तो परंपरावादी हैं और सातवीं सदी वाले ख़ून से सने झंडे को उठाए हुए हैं, बस चेहरे बदल गए हैं.उन्हें इस्लामिक दुनिया पालना-पोसना और समर्थन करना क्यों नहीं बंद करती?
शरिया मांगने वाले शरिया से डरकर भाग रहे हैं?
अंतर्राष्ट्रीय प्यू रिसर्च सेंटर की एक शोध की रिपोर्ट में बड़े चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं.यह रिपोर्ट मुस्लिम देशों में शरिया क़ानून के आधिकारिक क़ानून के रूप में समर्थन को लेकर वहां की जनता की राय पर आधारित है.
रिपोर्ट के मुताबिक़, दुनिया के तमाम इस्लामिक देशों में अफ़ग़ानिस्तान वो देश है जहां जनता का शरिया क़ानून को सबसे ज़्यादा समर्थन प्राप्त दिखाई देता है.
यहां 99 फ़ीसदी लोगों ने शरिया क़ानून को पसंद किया.
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| प्यू रिसर्च सेंटर की सर्वेक्षण रिपोर्ट |
अब वही लोग शरिया क़ानून को लेकर दहशत में हैं और देश छोड़ने के लिए अपनी ज़ान भी दांव पर लगा रहे हैं.
शरिया को सिर्फ़ क़ानून कहना या समझना ग़लतफहमी
शरिया को सिर्फ़ क़ानून कहना या समझना एक बड़ी ग़लतफहमी होगी क्योंकि इसमें सिर्फ़ क़ानून ही नहीं बल्कि उन सारे दूसरे कार्यों/क्रियाओं को भी स्थान दिया गया है जिनका इंसान के साथ संबंध है.
शरिया में क़ुरान और इस्लाम के साथ-साथ पैग़म्बर मुहम्मद की आलोचना भी वर्जित है.ऐसा करना कुफ्र है.इसके लिए गंभीर परिणाम भुगतने की बात कही गई है.
इसमें जिहाद की चर्चा है तथा बाक़ायदा इसकी परिभाषा दी गई है.
शरिया के अनुसार मुसलमानों को तब तक जिहाद जारी रखने के लिए कहा गया है (एक तरह का आदेश है) जब तक पूरी दुनिया शरिया की शरण में न आ जाए यानि इस्लाम न क़बूल कर ले/मोमिन/मुसलमान न बन जाए.
शरिया का उद्देश्य सभी काफ़िरों और ग़ैर-मुसलमानों को धिम्मी बनाना है.
इस्लाम में धिम्मी उस व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह को कहते हैं जो मुसलमान नहीं हैं और शरिया के अनुसार चलने वाले (इस्लामिक शासन के अंतर्गत आने वाले) राज्य की प्रजा है.
इस्लाम के अनुसार ऐसे लोगों को ज़िन्दा रहने के लिए एक प्रकार का कर (टैक्स) देना अनिवार्य है जिसे जज़िया कहा जाता है.
धिम्मी को मुसलमानों की तुलना में बहुत कम सामाजिक और क़ानूनी अधिकार प्राप्त होते हैं लेकिन, अगर वे इस्लाम क़बूल कर लें तो मुसलमानों के जैसे वे भी नागरिक बन सकते हैं.
बलात्कार की सज़ा का प्रावधान एक मज़ाक़
शरिया के तहत औरतों के क्या अधिकार हैं, यह तालिबानी राज में दुनिया देख चुकी है.अकेले तालिबान ही क्यों, दूसरे मुस्लिम (इस्लामिक शासन के तहत) मुल्कों में भी औरतों की ज़िंदगी कम दुश्वार नहीं है.उन्हें तो औरत होना ही जैसे गुनाह लगता है.
शरिया के अनुसार, कोई व्यक्ति अगर चार लोगों के सामने किसी महिला/लड़की के साथ बलात्कार करता है तभी यह बलात्कार माना जाएगा और उसके लिए सज़ा का प्रावधान किया गया है.लेकिन, यही बलात्कार अगर वह चार से कम व्यक्तियों (तीन,दो या एक व्यक्ति) के सामने होता है तो इसे बलात्कार नहीं माना जाएगा.
ज़रा सोचिए, कोई बेवकूफ़ ही होगा जो चार लोगों को अपने गुनाह का गवाह बनाएगा.
बलात्कार में मर्दाना ताक़त थोड़ी दिखानी होती है, यह तो वहशीपन है जो ज़िस्म की आग़ बुझाने के लिए एक महिला की आबरू लूटी जाती है.
एकांत (अकेले (जहां सिर्फ़ बलात्कारी और पीड़िता हों) में भी तो बलात्कार होते हैं.
इसका मत्लब ये हुआ कि शरीअत क़ानून में बेवकूफ़ी की तो सज़ा है, बलात्कार की नहीं.
इसके अलावा शरिया में सज़ा के तौर पर, आज़ाद के बदले आज़ाद, ग़ुलाम के बदले ग़ुलाम और औरत के बदले औरत को मार डालने की बात कही गई है.
ऐसे में सवाल उठता है कि एक व्यक्ति जब किसी दूसरे व्यक्ति की बीवी की हत्या कर देता है तो क्या बदले में हत्यारे (हत्या करने वाले व्यक्ति) की बीवी को मार दिया जाएगा?
ये कैसा इसाफ़ है? ये इंसाफ़ नहीं है.इसे कहते हैं – खेत खाए गदहा, मार खाए जुलाहा.
किन-किन देशों में लागू है शरिया?
वर्ल्ड पॉपुलेशन रिव्यू डॉट कॉम के मुताबिक़ शरिया क़ानून दुनिया के कई देशों में लागू है.कहीं इसे आंशिक रूप में अपनाया गया है तो कहीं यह थोड़े सख्त़ रूप में भी दिखाई देता है.लेकिन, वास्तविकता ये है कि आज किसी भी देश में शरिया पूरी तरह लागू नहीं है.बावज़ूद इसके, जिन देशों में यह प्रचलन में है, वे देश धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं.
ये देश निम्नलिखित हैं –
1. मिस्र 2. इंडोनेशिया 3. ईरान 4. इराक़ 5. मलेशिया 6. मालदीव 7. मॉरिटानिया 8. नाइजीरिया 9. पाकिस्तान
10. अफ़ग़ानिस्तान 11. क़तर 12. सऊदी अरब 13. संयुक्त अरब अमीरात 14. यमन 15. बहरीन 16. ब्रूनेई
भारत और शरिया क़ानून
भारत जैसे लोकतांत्रिक और सेक्यूलर देश में भी मुस्लिम पर्सनल लॉ है.
मुस्लिम पर्सनल लॉ दरअसल, शरिया क़ानून का ही एक रूप है, सिर्फ़ नाम अलग है.इसमें भी उन्हीं इस्लामिक क़ानूनों की व्याख्या है जो शरीअत क़ानूनों में है.
मगर शरिया क़ानून यहां मुसलमानों के सिर्फ़ निज़ी मामलों जैसे शादी, तलाक़ और प्रॉपर्टी आदि पर लागू होता है.
भारतीय संविधान की तरफ़ से मुसलमानों को यह विशेषाधिकार दिया गया है.
मुस्लिम तुष्टिकरण की होड़ में लगी भारत की अब तक की सरकारों ने ये कभी सोचा ही नहीं है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ वास्तव में शरिया क़ानून ही है.
यह देश की एकता और अखंडता के लिए एक बड़ा ख़तरा है.
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